Wednesday 27 May 2009

अपने कार्यालय के कमरे से…



मैं जिस संस्था में काम करता हूं वह बिहार विधानमंडल का उच्च सदन है : बिहार विधान परिषद। और इस संस्था के जिस कमरे में मैं बैठता हूं वह यहां का प्रकाशन विभाग है जहां से यहां के हिंदी प्रकाशनों से जुड़ी तकरीबन तमाम प्रक्रियाओं का निष्पादन होता है। यहां के प्रकाशनों में सदन की कार्यवाहियों, समितियों के प्रतिवेदनों के अतिरिक्त यहां से निकलने वाली पत्रिकाएं--संवाद तथा साक्ष्य शामिल हैं। संवाद यहां की इन-हाउस जर्नल है, जबकि साक्ष्य के अंक साहित्यिक, सामाजिक एवं संसदीय विषयों पर आयोजित होते हैं, और जिससे आपमें से कई लोग परिचित भी हैं। साक्ष्य की स्तरीयता तथा विभिन्न विषयों पर केंद्रित इसके विशेषांकों ने देश भर के साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों तथा पाठकों के बीच अपनी ठोस उपस्थिति दर्ज़ की है।

यह एक सुखद और विरल संयोग-सा प्रतीत हो सकता है कि यहां जिस कमरे में मैं बैठता हूं, वहां, इसी कमरे में, और भी कई चर्चित-अल्पचर्चित युवा रचनाकार, कवि, कथाकार हमारे सहकर्मी के रूप में कार्यरत हैं। इनमें से तीन कवियों की कविता-पुस्तक अभी-अभी एक साथ प्रकाशित हुई है।

  • अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस / शहंशाह आलम

  • बुतों के शहर में / एम के मधु

  • इच्छाओं की पृथ्वी के रंग / राकेश प्रियदर्शी
ये तीनों कविता-पुस्तकें अपनी अंतर्वस्तु, शिल्प, संवेदना एवं दृष्टि में एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी अपनी सहकालीन उपस्थिति के कारण एक दूसरे से जुड़ती हैं। इनमें जो एक महत्वपूर्ण साम्य है वह यह कि बिहार के राजभाषा विभाग ने पांडुलिपि प्रकाशन के लिए इस वर्ष अनुदान हेतु जिन पांडुलिपियों का चयन किया उनमें ये तीनों पुस्तकें शामिल हैं।

ये तो रही उन कवियों के बारे में जिनकी कविता पुस्तक अभी-अभी आई है। लेकिन इन तीन कवियों के अतिरिक्त भी कई रचनाकर्मी परिषद के इस साहित्य-प्रकोष्ठ में साथ-साथ बैठते हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में लगातार सृजनरत हैं, जैसे--मुसाफिर बैठा (कवि), अरुण नारायण (समीक्षक), अजय कुमार मिश्र (कवि-कथाकार), चंद्रमोहन मिश्र (लेखक-टिप्पणीकार)।

किसी सरकारी संस्था के एक प्रकोष्ठ में एक साथ इतनी-इतनी सृजनात्मक प्रतिभाओं की उपस्थिति क्या एक महज संयोग की बात हो सकती है? शायद नहीं। याद कीजिए, एक समय जिस तरह भोपाल में किसी शख्स ने भारत भवन की संकल्पना को साकार करने का संघर्ष किया था, उसी तरह बिहार में भी एक शख्स हिंदी भवन को आकार देने की कोशिश में लहूलुहान हुआ… लहूलुहान इसलिए कि बिहार की राजनीतिक परिस्थितियां साहित्य-संस्कृति के लिए भोपाल जैसी अनुकूल नहीं, बल्कि बुरी तरह प्रतिकूल थीं। फिर भी, उस प्रयास के अवशेष के रूप में जो कुछ अच्छी चीजें बची रह गईं, उन्हीं में ये प्रतिभाएं भी शामिल हैं।

जानकार लोग जानते हैं कि परिषद कार्यालय के इस कमरे की खिड़कियों-दरवाजों से बाहर झांकती… दूर-दूर तक रचनात्मक हस्तक्षेप करती इन प्रतिभाओं की उपस्थिति एक सुनियोजित दृष्टि का प्रतिफलन रही है। विधानमंडल के इस उच्च सदन को इसके नाम और गरिमा के अनुरूप अपनी सृजनात्मक कल्पना-दृष्टि से संचालित करने के लिए प्रो जाबिर हुसेन ने अपने सभापतित्व-काल में (वे 1995 से 2006 तक बिहार विधान परिषद के सभापति रहे, और संप्रति सांसद हैं) रूढ़ परंपराओं से मुठभेड़ करते हुए इन प्रतिभाओं का चयन किया था… इसलिए ये प्रतिभाएं अगर हमें आश्चर्य में डालती हैं तो केवल इसलिए कि यहां के पूरे सचिवालयीय बाबूमय पर्यावरण में, जहां राजनीतिक दांव-पेंच, कर्मियों के बीच अपने दायित्वों के प्रति गहरी उदासीनता और बेफिक्री तथा विद्वता और प्रतिभा के प्रति अनादर और विद्रोह-भाव तक का वर्चस्व हो, ये अपने दायित्वों के प्रति निष्ठा, समर्पण और रचनात्मकता से अपनी अलग पहचान बनाए रख सके हैं।

इनकी रचनात्मकता पर आप स्वयं गौर करें। हाल में आई इनकी पुस्तकों से यहां प्रस्तुत हैं इनकी कुछ कविताएं :




मकालीन हिंदी कविता में शहंशाह आलम एक जाना-माना नाम है। अपने पहले संग्रह गर दादी की कोई खबर आए (1993) के साथ शहंशाह ने समकालीन हिंदी कविता के उर्वर प्रदेश में दस्तक दी थी। फिर दो साल बाद अभी शेष है पृथ्वी-राग (1995) के साथ वे उपस्थित हुए। इसके बाद एक लंबे अंतराल के बाद उनका यह नया संग्रह अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस (2009) अभी हाल में प्रकाशित हुआ है। कविता के अतिरिक्त कला एवं रेखांकन में भी इनकी गहरी रुचि है, तथा इनके रेखांकन देश की लगभग सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।




शहंशाह आलम

अभी-अभी


अभी-अभी
एक शब्द जनमा
उस बच्चे के मुंह से
मां से जनमी
एक पूरी भाषा समृद्ध

अभी-अभी
यह समय था तुम्हारा
अब हुआ किसी अन्य का

अभी-अभी
वह दरख़्त हुआ
उस चिड़िया का
एकदम अपना

अभी-अभी
एक पूरा युद्ध लड़ा गया
खुरपी से
हंसिया से
कुदाल से
लाठी से

अभी-अभी
खुली एक ट्रेन
कि दूसरी आ लगी झट से

अभी-अभी
रसोईघर से निकल
फैली इस पृथ्वी पर
लहसुन की गंध अनोखी

अभी-अभी
यह देह हुई उसकी
यह बीज
यह कामना
यह शोर
यह एकांत हुआ उसी का

अभी-अभी
आग हुई मेरी
फाग हुआ मेरा
राग हुआ मेरा

अभी-अभी
वहां था सूर्यास्त
अब दिखता था
सूर्योदय वहीं पर

अभी-अभी
जो भूल गया था
रास्ता अपने घर का
बता रहा था
किसी अन्य को
उसके घर का रास्ता

अभी-अभी
वह मटका था खाली
अब भरा था
मीठे जल से

अभी-अभी
एक लड़का कूदा पानी में
बहा धार में
एक दूसरे लड़के ने लांघा
अपने ही अंदर के पुरुष को

अभी-अभी
जलतरंग बजाया उसने अद्भुत
ओझल को प्रकट किया उसी ने

अभी-अभी
मैं धंसा तुम्हारी ही धमक में
तुम धंसी मुझ में
सन्नाटे को चीर





म के मधु की कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं--कथादेश, उद्भावना, वनिता, सरिता, हिंदुस्तान, प्रभात खबर आदि--में प्रकाशित तथा दूरदर्शन से समय-समय पर प्रसारित होती रही हैं। समय के शिलालेख संग्रह के बाद बुतों के शहर में, जो अभी-अभी प्रकाशित हुआ है, इनका दूसरा कविता संग्रह है। अन्य विधाओं में पत्रकारिता, रंगमंच तथा सिनेमा से गहरा जुड़ाव है। राष्ट्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य भी रहे।



एम के मधु

इन दिनों


इन दिनों
मेरी परछाइयां हिल रही हैं
इन दिनों
शब्द मेरे गडमड हो रहे हैं

इन दिनों
हर आहट पर
मेरी आंखें
खिड़की से फिसलकर
दरवाजे तक चली जाती हैं

इन दिनों
सड़क का शोर
अनसुना लगता है

इन दिनों
आकाश में उड़ती पतंगें
लगता है मेरे लिए उड़ी है…
कट कर गिरती हैं
तो लगता है
मेरे लिए गिरी हैं

इन दिनों
बहुत अच्छा लगता है
घुटर-घूं, घुटर-घूं करता
पड़ोसी की दीवार पर
कबूतर का जोड़ा

आधा रास्ता चल लेने पर भी
मन बार-बार
लौट जाने को करता है
इन दिनों…




युवा कवि राकेश प्रियदर्शी लंबे समय से रचना-कर्म में सक्रिय हैं। इनकी कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा आकाशवाणी पटना तथा दूरदर्शन से प्रसारित होती रही हैं। कविता के अलावा रेखांकन में भी इनकी गहरी रुचि है तथा इनके रेखांकन हंस समेत देश की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। हिंदी के अलावा मगही में भी कविताएं लिखते हैं, तथा स्कूल पाठ्यक्रम में भी इनकी मगही कविता शामिल है।



राकेश प्रियदर्शी

कागज बीनता बच्चा


कूड़े के ढेर से कगज बीनता बच्चा
पूरा का पूरा हिंदुस्तान की जीती-जागती तस्वीर है
कागज बीनता बच्चा हमारी वर्तमान व्यवस्था
की पोल खोल रहा है

उसके फटे-चीटे कपड़े देख कर भी हम
स्वच्छ और विकसित होने की कर रहे हैं
घोषनाएं अगले दशक के अंत तक

उसकी भूख से सटी हुई आंतों और गालों पर
सूखे हुए आंसुओं के निशान से
हम लिख रहे हैं भारत का इतिहास

कूड़े के ढेर से कागज बीनता बच्चा
बाजार के विरुद्ध एक चीख है

हम कर रहे हैं जिस कूड़े के ढेर से घृणा
वही उसका सपना है
भारत का सपना
भारत का भविष्य और कूड़े का ढेर!

कुड़े के ढेर से कागज बीनता बच्चा
कूड़े के ढेर पर सफ़ेदी की ऊंचाई नाप रहा है अपनी आंखों से
कूड़े के ढेर की खोज में भटकता बच्चा
कोसों नंगे पांव चलता है पीठ से बोरा लटकाए
बोरे के वजन में उसके पूरे परिवार की
रोटी की संख्या छिपी है
कहां-कहां नहीं कूड़े के ढेर से मिलती है
उसे रोटी की गंध!

कूड़े के ढेर से कागज बीनते बच्चे के बारे में सोचता हूं
यह हम सब पर निर्भर करता है कि वह
भविष्य का निर्माता बनेगा या विध्वंसकारक

Tuesday 12 May 2009

मुलाक़ात



मेरे जीने के लिए सौ की उमर छोटी है

विष्णु प्रभाकर से हुई एक मुलाकात

ओम निश्चल‍

वह मई 2005 का कोई निपट दोपहरी वाला दिन था, जब मुझे वयोवृद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी से मिलने जाना था। साल के शुरू में सहारा समय ने उम्र को जीतते देश के ख्यातिप्राप्त बुजुर्गों की एक तालिका बना कर उनके जीवन के विभिन्न पक्षों पर रोशनी डाली थी। एम एफ हुसैन, शामलाल, यशपाल, नौशाद, बाबा आम्टे, ए के हंगल, हबीब तनवीर, लक्ष्मी सहगल, रजनी कोठारी, बिस्मिल्लाह खॉं, के के बिड़ला आदि के साथ विष्णु प्रभाकर का नाम भी उसमें शामिल था। मुजफ्फरनगर, उत्तरप्रदेश के कस्बे मीरापुर में 12 जून, 1912 को जन्मे विष्णु प्रभाकर का पिछले दिनों देहावसान हो गया। वे 97 वर्ष के थे। वे अभी होते तो 12 जून 2009 को 98वें वर्ष में प्रवेश करते। छोटी आयु में ही वे मुजफ्फरनगर से हिसार (हरियाणा) आ गए थे जो पहले पंजाब में था। जीवट के धनी विष्णु जी को बंधी-बंधायी नौकरी कभी रास नहीं आयी। हाईस्कूल करते हुए उन्हें एक नौकरी से जुडना पडा परन्तु यह सिलसिला देर तक न चला। बाद में भी कहीं भी लंबी अवधि तक वे टिक नहीं सके। गाँधी जी के जीवनादर्शो से प्रेम के कारण उनका रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ तथा आजादी के दौर में बजते राजनीतिक बिगुल में उनकी लेखनी का भी अपना एक मिशन बन गया था जो आजादी के लिए प्रतिश्रुत और संघर्षरत थी। अपने लेखन के दौर में वे प्रेमचंद, यशपाल, जैनेन्द्र, अज्ञेय जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, किन्तु रचना के क्षेत्र में उनकी अपनी एक अलग पहचान बनी। 1931 में हिन्दी मिलाप में पहली कहानी दीवाली के दिन छपने के साथ ही उनके लेखन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आठ दशकों तक निरंतर सक्रिय रहा। नाथूराम शर्मा प्रेम के कहने से वे शरतचन्द्र की जीवनी आवारा मसीहा लिखने के लिए प्रेरित हुए जिसके लिए वे शरत को जानने के लगभग सभी स्त्रोतों, जगहों तक गए, बाँग्ला भी सीखी और जब यह जीवनी छपी तो साहित्य में विष्णु जी की धूम मच गयी। कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद आवारा मसीहा उनकी पहचान का पर्याय बन गयी। बाद में अर्द्धनारीश्वर पर उन्हें बेशक साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हो, किन्तु आवारा मसीहा ने साहित्य में उनका मुकाम अलग ही रखा। उन पर लिखे नया ज्ञानोदय के अपने एक संपादकीय में प्रभाकर श्रोत्रिय ने ठीक ही लिखा था कि विष्णु जी साहित्य और पाठक के बीच स्लिप डिस्क के सही हकीम हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य पुरस्कारों के कारण नहीं, पाठकों के कारण चर्चित हुआ है।

हिंदी के वयोवृद्ध साहित्यकारों में विष्णु प्रभाकर का समवयस अब शायद ही कोई हमारे बीच विद्यमान हो। सुपरिचित कवि-गीतकार जानकीवल्लभ शास्त्री भी 94 वर्ष के हो रहे हैं तथा मुजफ्फरपुर में रहते हुए साहित्य-साधना में संलग्न हैं। उनसे मिलने लोग कभी कभार जाते रहते हैं। मूड में होते हैं तो बतियाते हैं। यों स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं रहता।
अपनी सुदीर्घ आयु से लगभग एक शताब्दी का पर्याय बन चुके विष्णु प्रभाकर कोई अस्सी वर्षों से साहित्य में सक्रिय रहे तथा आखिरी दिनों से कुछ पहले तक वे सुबह 8 बजे अखबार पढ़ने के बाद लिखने-पढ़ने बैठ जाते थे। एक पूरी शताब्दी की हलचल को अपने भीतर समेटे विष्णु जी के निकट बैठें तो उनके चेहरे पर एक निष्काम आभा तैरती नज़र आती थी। यश, धन, लोभ तथा मानवीय दुर्बलताओं से बहुत हद तक अछूते विष्णु जी पाठकों के पत्रों का मनोयोग से जवाब लिखते हुए देखे जा सकते थे।

कुछ वर्षों पूर्व गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित होने के बावजूद अपने पुत्र के साथ राष्ट्रपति भवन में प्रवेश न मिल पाने से खिन्न मन घर लौटने पर जब वे यह निर्णय लेने को बाध्य हुए कि उन्हें मिला पद्मभूषण लौटा देना चाहिए तो वे अचानक कुछ दिनों सुर्खियों में रहे। पता चलने पर राष्ट्रपति ने जब उन्हें वाहन भेज कर बुलाया और असावधानीवश हुई त्रुटि के लिए क्षमा मांगी तो विष्णु जी ने अपनी पेशकश वापस ले ली।

जागरण पुनर्नवा के संयोजक कथाकार राजेन्द्र राव जी का यह आग्रह था कि विष्णु जी से एक बातचीत करुँ तो मन असमंजस से घिर गया। पहला असमंजस तो यही कि जब ऐसा कोई प्रकरण या स्कूप मीडिया के सम्मुख आता है तो वह अचानक सक्रिय हो उठता है। अपनी मार्केटिबिलिटी के लिहाज से उसके लिए व्यक्ति से ज्यादा वह न्यूज वैल्यू महत्वपूर्ण है जो उसकी साख को बढ़ाता हो। इलेक्ट्रानिक मीडिया तिल को ताड़ बनाने में माहिर है। लिहाजा यह अनुमान लगा पाना असंभव नहीं था कि इस समय विष्णु जी कैसे इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया के संवाददाताओं से घिरे होंगे और उनके न चाहते हुए भी उनका निजी अपमान, निजी अफसोस मलाल और क्षोभ के दायरे से छिटक कर राष्ट्रीय सुर्खियों का विषय बन जाएगा। इसलिए मैंने सोचा जब यह तूफान शांत हो तो उनसे बातचीत करना बेहतर रहेगा। यद्यपि वैसे भी लोग आए दिन उनसे मिलने जुलने, बातचीत करने के निमित्त आते ही रहते हैं तथा उनका घंटों समय खराब कर चले जाते हैं। ऐसे में फिर एक बातचीत, वही वही सवाल, प्रश्नों की झड़ी निश्चय ही एक वयोवृद्ध लेखक के लेखन और आराम के समय में एक व्यवधान ही बनेगा। यह सोच मन उद्विग्न रहा। फिर भी जब एकाधिक बार राजेन्द्र जी ने इस बाबत याद दिलायी तो उनसे मिलना अपरिहार्य हो उठा।

पहले वे कुंडेवालान, अजमेरी गेट में रहते थे, पर इधर एक दशक से वे दिल्ली की एक कालोनी महाराणा प्रताप एन्क्लेव में आ गए थे। उनका हाल चाल जानने जब मैंने फोन किया तो पता चला वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के निमंत्रण पर हैदराबाद गए हैं, जहॉं से वे लौटे तो कुछ दिनों अस्वस्थ रहे। फिर एक दिन उनकी सेहत और दिनचर्या की जानकारी चाही तो उनके पुत्र अतुल जी ने बताया कि वे अभी सुबह अखबार पढ़ रहे हैं। फिर डेढ़ दो बजे तक लिखने पढ़ने, पत्रों का उत्तर देने आदि का कार्य करेंगे। दो बजे भोजन के उपरांत पॉंच बजे तक आराम करेंगे। इसलिए उनसे या तो दोपहर से पहले मिला जा सकता था या अपराह्न पॉंच के बाद।

मैं जब विष्णु प्रभाकर जी के घर महाराणा प्रताप एन्क्लेव पहुंचा, उस समय दोपहर के लगभग बारह बज रहे थे। बाहर धूप थोडी तीखी हो चली थी। मुख्य गेट खोल कर अंदर कमरे में दाखिल हुआ तो वे पालथी मारे लैंप की रोशनी में चिट्ठियों का उत्तर लिख रहे थे। इतनी वय में भी वे अपने पाठकों का ख्याल रखते हैं, यह जानकर मन को संतोष हुआ। अपना परिचय देते हुए उनका कुशल क्षेम जानने की जिज्ञासा की तो उन्होंने कहा, देखिए 93 बरस से ज्यादा का हो गया हूँ। छिहत्तर बरस लिखते हो गए। अब यह सब कठिन होता जा रहा है। काम नहीं होता। अखबार के अक्षर पढने में कम आते हैं। उम्र का असर है यह। फिर भी आपके मन में पाठकों के पत्रों के प्रति उत्साह बचा हुआ है। उत्साह ही नहीं, कोई भी पत्र अनदेखा, अनुत्तरित न चला जाए, इस बात का कितना ख्याल रखते हैं आप? कहने लगे, अब क्या कहूँ। नौजवान पाठक- पाठिकाएं दूर-दराज से पत्र लिखते हैं। कोई चीज पढी--किसी रचना ने उन्हें छुआ, उद्वेलित किया तो वे पत्र लिखने बैठ जाते हैं। उन्हें क्या मालूम कि मुझसे अब उत्तर नहीं दिया जाता। हाँ, कोई उत्तर लिखने वाला होता है तो बोल कर लिखाता भी हूँ, पर इसके लिए कोई नियमित रूप से आता भी नहीं। देखिए, जब तक निभा पाता हूँ, उत्तर देता रहूंगा। पर मैं चाहता हूं कि मेरे पाठक समझें कि अब मैं वृद्ध हो गया हूं--उनके पत्रों का उत्तर लिखने की सामर्थ्य मुझमें दिनोंदिन कम होती जा रही है। मैंने कहा भी कि वे चाहें तो कुछ पत्रों के उत्तर बोल दें तो मैं लिख देता हूँ, पर उन्होंने शालीनता से मना कर दिया। ऐसी स्थिति में लेखन के सिरे को नियमित कैसे रख पाते हैं? मैंने जानना चाहा तो उन्होंने कहा, भई, अब मुझे किसी यश की आकांक्षा तो है नहीं, धन की भी मुझे ज्यादा दरकार नहीं है, सब कुछ तो मिल चुका--वही बहुत है। हां, मैं शांति से अपनी आत्मकथा का चौथा खंड पूरा कर सकूं, इतनी मोहलत और एकांत ईश्वर से और चाहता हूं। वैसे तो वह अभी ही उठा ले तो मैं क्या कर सकता हूं। उन्होंने बताया कि लेख निबंध आदि के लिए एक व्यक्ति को वे पारिश्रमिक पर बुलाते हैं, बोल कर लिखाते हैं। पर यह भी अब नियमित रुप से नहीं हो पाता और रचनात्मक कार्य तो खुद ही करना प़ड़ता है। उसे बोल कर लिखाना संभव नहीं। जैनेन्द्र इस कार्य में निपुण थे----दशार्क और कई कृतियॉं उन्होंने बोल कर ही लिखवाई हैं। उन दिनों हाल ही में विष्णुकांत शास्त्री के निधन से वे आहत थे। बोले, शास्त्री जी सहृदय साहित्यिक व्यक्ति थे---मेरा उनसे साहित्यिक रिश्ता ही था, कभी राजनीति की चर्चा मैंने उनसे नहीं की। घंटों बतियाते थे वे। एक बार जब वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे तो कुछ लोग मेरे गॉंव हरियाणा से मेरे पास आए और बोले कि आपके तो राज्यपाल शास्त्री जी दोस्त हैं----उनसे गॉंव के स्कूल का उद्घाटन करा दीजिए। मैंने पहले तो मना किया पर फिर सोचा कि चलो गॉंव की तरक्की की बात है तो शास्त्री जी से कह देता हूँ। मैंने कहा तो वे सहमत हो गए। मेरे गॉंव आए, स्कूल का उद्घाटन किया और बहुत ही प्रभावी भाषण किया। मैं भी समारोह में था, बहुत सी बातें हुईं पर साहित्यिक-सांस्कृतिक ही----राजनीति पर न तो वे एक शब्द अपने भाषण में बोले न ही मुझसे उसकी कोई चर्चा की। प्रभाकर जी बोले, राजनीति में ऐसे लोग अब कम होते जा रहे हैं। मैं उन पर जल्दी ही एक लेख लिखूँगा। क्योंकि मेरे उनके संबंध राजनीतिक नहीं, साहित्यिक रहे हैं----उनकी सहृदयता का मैं ऋणी हूँ।

इस जराजीर्ण स्वास्थ्य के चलते आत्मकथा का चौथा खंड कैसे पूरा करेंगे, पूछने पर वे संजीदा हो उठे। बोले, हफ्ते में तीन-चार दिन लोग भेंट करने-बातचीत करने के लिए आ जाते हैं- बातचीत से मैं थक जाता हूं। लिखने का समय ही नहीं मिल पाता। किसी गुमनाम-सी जगह चला जाऊँ तो शायद इसे पूरा कर सकूं । कहने लगे, अभी कल परसों की ही बात है, टी वी वाले चार-पाँच घंटे लगाकर गए। कोई मानदेय नहीं- समय की बरबादी अलग। टी. वी. वालों को तो अपने कार्यक्रम चलाने हैं, लोगों की सुविधा- असुविधा का ख्याल उन्हें कहां है। अखबारों से भी लोग अक्सर आते रहते हैं-मुझे खुद उनकी स्क्रिप्ट भी सुधारनी पडती है, पर पारिश्रमिक के नाम पर कुछ भी नहीं। एक बार एक टी. वी. चैनल वाले मेरा इंटरव्यू ले गए और बदले में किसी मशहूर होटल के खाने का कूपन दे गए कि वहां जाने पर 50 प्रतिशत की रियायत मिलेगी। अब वहां जब हजार रुपये का बिल आएगा तो पचास फीसदी काट कर भी तो पांच सौ देने पडेंगे। इससे तो मैं दस दिन खा लूंगा। तो यह हाल है!
मोहन सिंह प्लेस का काफी हाउस कभी विष्णु प्रभाकर की मौजूदगी से गुलजार रहा करता था। पिछले लगभग दस वर्षो से वे वहां नहीं आ-जा पाते थे। वे जब भी काफी हाउस में दिखते, लेखकों के वृत्त से घिरे होते। खद्दर का कुर्ता और गाँधी टोपी दूर से ही दिख जाती। बतरस के धनी विष्णु जी उस दौर को याद कर भावुक हो उठते हैं। कभी लोहिया भी वहां आते थे, अन्य राजनेता भी। लोहिया से खूब बातें होती थीं। उनके भीतर देश को लेकर विलक्षण सपने थे। मोहन सिंह प्‍लेस स्थि‍त काफी हाउस न जाने की पीड़ा उन्‍हें सालती तो है, पर अपनी हालत से लाचार थे। बोले, मन तो होता है, लोग भी कहते हैं क‍ि कभी कभी तो आ जाया कीजिए, पर एक बार यहॉं से जाने-आने का किराया 75 रुपये लगता है। फिर शरीर भी साथ नहीं देता। इसलिए मेरे लिए शा‍रीरिक-आर्थिक दोनों दृष्टियों से वहॉं जा पाना मुश्किलतलब है। बाहर भी कम ही निकलता हूँ। अभी पिछले दिनों हैदराबाद गया था, हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन वालों के बुलावे पर। वहॉं से लगभग पचास हजार रुपये मिले। इससे छह-सात महीने का मेरा काम चल गया।

बातचीत के दौरान उन्‍होंने पंडित नेहरू से होने वाली मुलाकातों को याद किया, इंदिरागॉंधी से भी। डॉ0 राजेन्‍द्रप्रसाद जी से भी उनके ताल्‍लुकात थे। एक बार, वे बताते हैं, डाक्‍टर राजेन्‍द्रप्रसाद जी के सम्‍मान में समारोह आयोजित हुआ था। उसमें पं0 नेहरू , डॉ राजेन्‍द्रप्रसाद, अन्‍य नेतागण साहित्‍यकार सभी उपस्थित थे। अंत में कलाकारों ने मंच पर उनसे मिलने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की और मंच पर इकट्ठे आ खड़े हुए। पंडित नेहरू व डॉ राजेन्‍द्रप्रसाद जी से अनुरोध किया गया तो नेहरू जी बोले, क्‍या आप समझते हैं कि देश का प्रधानमंत्री मंच पर चल कर इन लोगों से मिलने जाएगा। वे कुछ नाखुश-से हुए कि तभी किसी ने कहा, नहीं, वे तो इसलिए एक साथ मंच पर आ खड़े हुए हैं क‍ि पंक्तिबद्ध होकर एक एक कर आपके निकट आकर आपसे मिल सकें, तब उन्‍होंने कहा, हॉं, तब तो ठीक है। विष्‍णु प्रभाकर जी ने ऐसे और बहुत से प्रसंगों की याद करते हुए तब के राजनीतिकों की सराहना की। हालॉंकि वे गॉंधीवादी थे, कॉंग्रेसी भी, किन्‍तु कॉंग्रेस के आपात्‍काल के विरोध में थे तथा जेल जाते जाते बचे थे।

चूंकि बातचीत का कोई निश्चित क्रम बन नहीं पा रहा था और वे बीच बीच में पत्र भी लिखते जाते थे, मैंने चर्चा के सिरे को बढाते हुए आवारा मसीहा की बात उठायी। कहने लगे, निश्चय ही मुझे साहित्य में यह कृति जिंदा रखेगी। मैंने पूछा, बंगाल में इसका रिस्पांस कैसा रहा, तो बोले कुछ बहुत अच्छा तो नहीं। बांग्ला अनुवाद भी इसका हुआ, पर उसमें बांग्लाभाषियों ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखायी। हालांकि वे भीतर ही भीतर इस काम को रिकग्नाइज तो करते ही हैं।

ब्यूरोक्रेसी और सरकारी तंत्र की बात छिडी तो उनके चेहरे पर आक्रोश और क्षोभ की लकीरें खिंच गयीं। उन्हें अपने मकान को छलछद्म से अपने नाम करा लेने वाले किरायेदार को बेदखल कराने के लिए सरकारी अहलकारों तक की गयी दौडधूप और बदले में मिलने वाले अपमान और झिडकियों की याद ताजा हो उठी। बोले, मकान बनाने पर कुछ दिनों के लिए उसे एक किरायेदार को रहने को दिया तो उसने भीतर ही भीतर विष्णु जी की अवस्था, लाचारी का लाभ उठाकर तथा डीडीए वालों से सांठगांठ कर उसे अपने काम करा लिया। सेल डीड और अन्य कागजात पर विष्णु जी के जाली हस्ताक्षर भी हो गए। डीडीए वालों से मिलने पर कोई सुनवाई नहीं हुई। डीडीए के अधिकारी यह मानने को तैयार ही नहीं हुए कि इसमें कोई जालसाजी हुई है, क्योंकि ये लोग पैसे ले चुके थे। यह मकान उन्होंने सस्ती के जमाने में चार-पांच लाख की लागत में बनवाया था। आज इसकी कीमत कई लाख होगी। विष्णु जी और उनके लडके ने मदद के लिए बहुतों से संपर्क किया पर किसी ने ध्यान न दिया। अंतत: पुलिस महकमे का एक इंस्पेक्टर काम आया। साहित्यिक रुचियों का होने के कारण उसने इस काम में दिलचस्पी ली, तब कहीं जाकर मकान खाली हो पाया। विष्णु जी ने बड़े क्षोभ से कहा, सभी सरकारी मशीनरी बिकी हुई है-सभी स्तर के कर्मचारियों के पैसे बँधे हैं।

उन दिनों जब से पद्मभूषण लौटाने का प्रसंग चर्चा में आया, उन्हें कुछ व्यक्तियों के अभिनिंदक पत्र भी मिले। पद्मभूषण उन्हें भाजपा शासनकाल में मिला, जिस कारण कुछ लोग आरोप लगाते रहे कि उन्होंने यह पुरस्कार भाजपा से मैनेज किया है, जबकि विष्णु जी का मानना था कि उनका नाम तो साहित्य अकादमी से प्रस्तावित हुआ था और सांप्रदायिकता के मुद्दे पर वे अपने को भाजपा का विरोधी मानते हैं। यह और बात है कि भाजपा के भी शीर्ष नेताओं में अटल जी से उनसे निकट के संबंध थे। विष्णुकांत जी से भी थे। वे गुस्से से बोले, वैसे भी इस तमगे की बाजार में कोई कीमत तो है नहीं। मुझे क्या मिलने वाला है इससे? जो मिलना था, बहुत मिल चुका। अब मुझे किसी भी चीज की स्पृहा नहीं है। ऐसे अलंकरण से कहीं ज्यादा संतोषदायी बात मेरे लिए यह है कि मेरा लेखन चलता रहे। मैंने कहा कि कुछ लोग तो अपने नाम के पीछे पद्मश्री- पद्मविभूषण लगाने में गौरव समझते हैं तो उन्होंने कहा, वे लोग शायद नहीं जानते कि ऐसा करना जुर्म है। यह तो महज अलंकरण है, नाम और उपाधि का हिस्सा नहीं है। इस बीच उनकी पुत्रवधू चाय रख गयी थीं। उन्होंने मेरे साथ चाय पी और बिस्कुट भी लिया और पुन: पत्रों को पढने और उनके उत्तर देने में दत्तचित्त हो उठे थे। मैंने कैमरे से उनकी फोटो लेने की इजाजत चाही तो उन्होंने सिर उठाया। दो-तीन स्नैप के बाद वे फिर ध्यानमग्न हो गए। दोपहर के डेढ बज चुके थे। सुई दो की ओर अग्रसर थी। उनके स्नान व भोजन का समय हो चुका था। मैंने विदा लेने के पूर्व पूछना चाहा कि विधिवत बातचीत के लिए कब आऊँ। वे इस पर कोई उत्‍साह न दिखाते हुए बोले, यों मिलने के लिए कभी भी आ सकते हैं, पर बातचीत के निमित्‍त नहीं। बहुत बातचीत कर चुका हूँ मैं। वही वही बातें बार बार, इसलिए अब इसमें मेरी कोई दिलचस्‍पी नहीं है। यशेषणा से मुक्‍त विष्‍णु जी को देख कर मुझे शंभुनाथ सिंह के गीत की पंक्ति‍ याद हो आई। लगा जैसे विष्‍णु जी उन्‍हीं के शब्‍दों में कहना चाहते हों---मेरे जीने के लिए सौ की उमर छोटी है। पर नियति देखिए, सौ के होने के दो बरस पहले ही वे इस दुनिया से विदा हो गए। यदि वे दो बरस और हम सबके बीच रहते तो जीते जी जन्‍मशताब्‍दी मनाने वाले पहले हिंदी साहित्‍यकार होते।

• डॉ. ओम निश्‍चल, जी-1/506 ए, उत्‍तम नगर, नई दिल्‍ली-110059
• फोन: 09955774115, ई मेल omnishchal@yahoo.co.in

Saturday 2 May 2009

इस्लाम का विष-वृक्ष



प्रेमचंद

प्रेमचंद ने कहानियों और उपन्यासों के अतिरिक्त अन्य विधाओं में भी भरपूर लेखन किया है। अपने दौर की साहित्यिक पत्रकारिता में उनकी भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं थी। प्रेमचंद ने अपने समय की कई चर्चित पत्र-पत्रिकाओं की चुनौतीपूर्ण कमान बतौर संपादक संभाली थी, जिनमें जागरण एक प्रमुख पत्र था। यहां प्रस्तुत है इसी पत्र का उनका एक संपादकीय जो हमारे देश की एक ज्वलंत समस्या सांप्रदायिकता पर लेखक की दृष्टि को रेखांकित करने के साथ-साथ यह भी संकेत करता है कि तब की पत्रकारिता कम जोखिम भरी नहीं थी, लेकिन उसका निर्वहन नैतिक साहस और उत्तरदायित्वपूर्ण दृष्टि से किया जा सकता था। इस नैतिक साहस और उत्तरदायित्वपूर्ण लेखन के बरक्स हम आज की पत्रकारिता पर भी गौर कर सकते हैं, जहां वैश्विक स्तर पर ख़बरें बेची और खरीदी जा सकती हों और ख़बरों का विश्लेषण तथा हमारे विचार भी प्रायोजित हो रहे हों। --योगेंद्र कृष्णा


भी हाल में इस नाम की एक पुस्तक साहित्य-मंडल देहली ने प्रकाशित की है। इसके लेखक हैं श्री चतुरसेन जी शास्त्री। शास्त्री जी यशस्वी लेखक हैं, उनकी शैली में ओज है, आकर्षण है, तेज है, पर दुर्भाग्यवश वह कभी-कभी इन गुणों का दुरुपयोग किया करते हैं। थोड़े से धन और थोड़े से यश के लोभ से ऐसी रचनाएं कर डालते हैं, जिनसे सनसनी के साथ देश में सांप्रदायिक द्वेष को उत्तेजित करने की मनोवृत्ति साफ झलकती है। ऐसी जहरीली पुस्तकें बिकती ज़्यादा हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। मुसलमानों ने हिंदुओं पर जो अत्याचार किए, उसका विषद और एकांगी विस्तार दिखाकर सांप्रदायिक मनोवृत्ति वाली हिंदू जनता में मुसलमानों के प्रति द्वेष बढ़ाया जा सकता है। यह ऐसा मुश्किल काम नहीं, लेकिन क्या इस द्वेष को भड़काना एक यशस्वी और जिम्मेदार लेखक की मर्यादा के अनुकूल है? दोष सभी धर्मों में निकाले जा सकते हैं। क्या हिंदू धर्म दोषों से खाली है? अपने-अपने समय में प्रभुता पाकर अत्याचार भी सभी जातियों ने किये हैं, लेकिन उन गई-बीती बातों को कीने की तरह पालना और उनका प्रचार करके जनता में द्वेष फैलाना, राष्ट्र को सर्वनाश की ओर ले जाना है।

धार्मिक कट्टरता से भूमंडल को जितनी यातनाएं भोगनी पड़ी हैं, उनसे इतिहास के पोथे भरे पड़े हैं। इस लिहाज से क्या ईसाई, क्या बौद्ध, क्या हिंदू सभी समान रीति से अपराधी हैं। उसमें से किसी एक धर्म को छांट लेना और सारी बुराइयां उसी में दिखाना,अस्वस्थ और पक्षपातपूर्ण मन का परिचय देता है।
'रंगीला रसूल' के ढंग की पुस्तकों से देश का क्या कल्याण हो सकता है? इस्लाम का विष-वृक्ष के पृष्ठ पैंतालीस पर कुरान में लिखी हुई बातों के विषय में कहा गया है कि कुरान के अनुसार--

  • खुदा आदमी को बहकाता है।

  • खुदा सबसे बड़ा कपटी है।

  • खुदा ने प्रत्येक शहर में पापियों के सरदार छोड़ रखे हैं, ताकि वे लोगों को बहकाते और धोखा देते रहें।

  • खुदा घात में लगा रहता है।

  • बिहिश्त में शराब पीने को, मांस खाने को, तथा सत्तर हूरें और लौंडे मौज करने को मिलेंगे।


हम नहीं समझते कि इस तरह की लचर, बेबुनियादी, धोखे में डालने वाली बातों के प्रचार का इसके सिवा और क्या उद्देश्य है कि हिंदुओं में इस्लाम और मुसलमानों के प्रति घृणा और द्वेष पैदा किया जाए। ऐसी मनोवृत्ति वालों से इश्वर इस देश की रक्षा करे।

इसके आगे चलकर शास्त्री जी ने इर्विन, एलफिंस्टन आदि योरोपियन लेखकों की रचनाओं के उद्धरण देकर इस मत का समर्थन करने की चेष्टा की है कि मुहम्मद मनुष्य जाति का भयानक शत्रु था और यह कुरान में मुर्खता के सिवा और कुछ नहीं है। योरोप के इतिहासकारों ने इस्लाम को इसलिए कलंकित किया कि वे यूनान और बलकान आदि देशों से तुर्कों को निकालना चाहते थे। इस्लाम का प्रभुत्व उनकी आंखों में कांटे की तरह खटकता था। उनके कथन को प्रमाण मानकर, यहां नकल करना किसी तरह भी स्तुत्य नहीं कहा जा सकता। हम स्वयं संप्रदायों के वकील नहीं हैं। धार्मिक कट्टरता से भूमंडल को जितनी यातनाएं भोगनी पड़ी हैं, उनसे इतिहास के पोथे भरे पड़े हैं। इस लिहाज से क्या ईसाई, क्या बौद्ध, क्या हिंदू सभी समान रीति से अपराधी हैं। उसमें से किसी एक धर्म को छांट लेना और सारी बुराइयां उसी में दिखाना, अस्वस्थ और पक्षपातपूर्ण मन का परिचय देता है। यह पुस्तक इस्लाम का इतिहास है। किसी जाति या धर्म का इतिहास लिखना बुरा नहीं, यदि निष्पक्ष होकर, पूरे अध्ययन और खोज से, सत्यासत्य का पूरा विचार करने और उसके साथ सौजन्य का पालन करते हुर लिखा जाए। इस पुस्तक का नाम ही बतला रहा है कि इसकी रचना किस भाव की प्रेरणा से हुई है, और पुस्तक के कवर पर जो रंगीन चित्र दिया है, वह तो लेखक के विषैले मनोभाव की नंगी तस्वीर है। यह इस्लाम का विष-वृक्ष रूपी मन है। इस पुस्तक में अधिकांश उन्हीं अंग्रेजी इतिहासों से नकल किया गया है, जिनमें मुसलमानों के प्रति काफी द्वेष और ईर्ष्या का भाव भरा हुआ है, जैसे बर्नियर और मनूची आदि। वही बादशाहों के महल के अंदर की बातें, मीनाबाज़ार के कपोलकल्पित किस्से, इस पुस्तक के आधार हैं। न जाने किस प्रमाण से पृष्ठ एक सौ तीन पर लिखा गया है कि मुगल बादशाह सांप पालते थे और जिस सरदार से उन्हें शंका होती थी, उसे सांप से डसबा देते थे, या जहरीले कपड़े पहना कर उसकी जीवन-लीला समाप्त कर देते थे। हम कहते हैं मान लो यह ठीक भी है, तो इससे क्या? हिंदुओं के राजा भी तो विष-कन्याएं रखते थे और उनके द्वारा अपने शत्रुओं को यमराज के घर भेज देते थे। आज इन बातों पर आक्षेप करने का क्या अर्थ है?

श्री चतुरसेन जी हमारे मित्र हैं। वह विद्वान हैं, मनस्वी हैं, उदार हैं, हम उनसे प्रार्थना करते हैं कि ऐसी जटिल और द्रोह भरी रचनाएं लिख कर अपनी प्रतिभा को और हिंदी भाषा को कलंकित न करें और राष्ट्र में जो चाहे द्रोह और द्वेष पहले से ही फैला हुआ है, उस बारूद में आग न लगाएं।

(संपादकीय : जागरण, 24 जुलाई, 1933)

 
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