Saturday 2 May 2009

इस्लाम का विष-वृक्ष



प्रेमचंद

प्रेमचंद ने कहानियों और उपन्यासों के अतिरिक्त अन्य विधाओं में भी भरपूर लेखन किया है। अपने दौर की साहित्यिक पत्रकारिता में उनकी भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं थी। प्रेमचंद ने अपने समय की कई चर्चित पत्र-पत्रिकाओं की चुनौतीपूर्ण कमान बतौर संपादक संभाली थी, जिनमें जागरण एक प्रमुख पत्र था। यहां प्रस्तुत है इसी पत्र का उनका एक संपादकीय जो हमारे देश की एक ज्वलंत समस्या सांप्रदायिकता पर लेखक की दृष्टि को रेखांकित करने के साथ-साथ यह भी संकेत करता है कि तब की पत्रकारिता कम जोखिम भरी नहीं थी, लेकिन उसका निर्वहन नैतिक साहस और उत्तरदायित्वपूर्ण दृष्टि से किया जा सकता था। इस नैतिक साहस और उत्तरदायित्वपूर्ण लेखन के बरक्स हम आज की पत्रकारिता पर भी गौर कर सकते हैं, जहां वैश्विक स्तर पर ख़बरें बेची और खरीदी जा सकती हों और ख़बरों का विश्लेषण तथा हमारे विचार भी प्रायोजित हो रहे हों। --योगेंद्र कृष्णा


भी हाल में इस नाम की एक पुस्तक साहित्य-मंडल देहली ने प्रकाशित की है। इसके लेखक हैं श्री चतुरसेन जी शास्त्री। शास्त्री जी यशस्वी लेखक हैं, उनकी शैली में ओज है, आकर्षण है, तेज है, पर दुर्भाग्यवश वह कभी-कभी इन गुणों का दुरुपयोग किया करते हैं। थोड़े से धन और थोड़े से यश के लोभ से ऐसी रचनाएं कर डालते हैं, जिनसे सनसनी के साथ देश में सांप्रदायिक द्वेष को उत्तेजित करने की मनोवृत्ति साफ झलकती है। ऐसी जहरीली पुस्तकें बिकती ज़्यादा हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। मुसलमानों ने हिंदुओं पर जो अत्याचार किए, उसका विषद और एकांगी विस्तार दिखाकर सांप्रदायिक मनोवृत्ति वाली हिंदू जनता में मुसलमानों के प्रति द्वेष बढ़ाया जा सकता है। यह ऐसा मुश्किल काम नहीं, लेकिन क्या इस द्वेष को भड़काना एक यशस्वी और जिम्मेदार लेखक की मर्यादा के अनुकूल है? दोष सभी धर्मों में निकाले जा सकते हैं। क्या हिंदू धर्म दोषों से खाली है? अपने-अपने समय में प्रभुता पाकर अत्याचार भी सभी जातियों ने किये हैं, लेकिन उन गई-बीती बातों को कीने की तरह पालना और उनका प्रचार करके जनता में द्वेष फैलाना, राष्ट्र को सर्वनाश की ओर ले जाना है।

धार्मिक कट्टरता से भूमंडल को जितनी यातनाएं भोगनी पड़ी हैं, उनसे इतिहास के पोथे भरे पड़े हैं। इस लिहाज से क्या ईसाई, क्या बौद्ध, क्या हिंदू सभी समान रीति से अपराधी हैं। उसमें से किसी एक धर्म को छांट लेना और सारी बुराइयां उसी में दिखाना,अस्वस्थ और पक्षपातपूर्ण मन का परिचय देता है।
'रंगीला रसूल' के ढंग की पुस्तकों से देश का क्या कल्याण हो सकता है? इस्लाम का विष-वृक्ष के पृष्ठ पैंतालीस पर कुरान में लिखी हुई बातों के विषय में कहा गया है कि कुरान के अनुसार--

  • खुदा आदमी को बहकाता है।

  • खुदा सबसे बड़ा कपटी है।

  • खुदा ने प्रत्येक शहर में पापियों के सरदार छोड़ रखे हैं, ताकि वे लोगों को बहकाते और धोखा देते रहें।

  • खुदा घात में लगा रहता है।

  • बिहिश्त में शराब पीने को, मांस खाने को, तथा सत्तर हूरें और लौंडे मौज करने को मिलेंगे।


हम नहीं समझते कि इस तरह की लचर, बेबुनियादी, धोखे में डालने वाली बातों के प्रचार का इसके सिवा और क्या उद्देश्य है कि हिंदुओं में इस्लाम और मुसलमानों के प्रति घृणा और द्वेष पैदा किया जाए। ऐसी मनोवृत्ति वालों से इश्वर इस देश की रक्षा करे।

इसके आगे चलकर शास्त्री जी ने इर्विन, एलफिंस्टन आदि योरोपियन लेखकों की रचनाओं के उद्धरण देकर इस मत का समर्थन करने की चेष्टा की है कि मुहम्मद मनुष्य जाति का भयानक शत्रु था और यह कुरान में मुर्खता के सिवा और कुछ नहीं है। योरोप के इतिहासकारों ने इस्लाम को इसलिए कलंकित किया कि वे यूनान और बलकान आदि देशों से तुर्कों को निकालना चाहते थे। इस्लाम का प्रभुत्व उनकी आंखों में कांटे की तरह खटकता था। उनके कथन को प्रमाण मानकर, यहां नकल करना किसी तरह भी स्तुत्य नहीं कहा जा सकता। हम स्वयं संप्रदायों के वकील नहीं हैं। धार्मिक कट्टरता से भूमंडल को जितनी यातनाएं भोगनी पड़ी हैं, उनसे इतिहास के पोथे भरे पड़े हैं। इस लिहाज से क्या ईसाई, क्या बौद्ध, क्या हिंदू सभी समान रीति से अपराधी हैं। उसमें से किसी एक धर्म को छांट लेना और सारी बुराइयां उसी में दिखाना, अस्वस्थ और पक्षपातपूर्ण मन का परिचय देता है। यह पुस्तक इस्लाम का इतिहास है। किसी जाति या धर्म का इतिहास लिखना बुरा नहीं, यदि निष्पक्ष होकर, पूरे अध्ययन और खोज से, सत्यासत्य का पूरा विचार करने और उसके साथ सौजन्य का पालन करते हुर लिखा जाए। इस पुस्तक का नाम ही बतला रहा है कि इसकी रचना किस भाव की प्रेरणा से हुई है, और पुस्तक के कवर पर जो रंगीन चित्र दिया है, वह तो लेखक के विषैले मनोभाव की नंगी तस्वीर है। यह इस्लाम का विष-वृक्ष रूपी मन है। इस पुस्तक में अधिकांश उन्हीं अंग्रेजी इतिहासों से नकल किया गया है, जिनमें मुसलमानों के प्रति काफी द्वेष और ईर्ष्या का भाव भरा हुआ है, जैसे बर्नियर और मनूची आदि। वही बादशाहों के महल के अंदर की बातें, मीनाबाज़ार के कपोलकल्पित किस्से, इस पुस्तक के आधार हैं। न जाने किस प्रमाण से पृष्ठ एक सौ तीन पर लिखा गया है कि मुगल बादशाह सांप पालते थे और जिस सरदार से उन्हें शंका होती थी, उसे सांप से डसबा देते थे, या जहरीले कपड़े पहना कर उसकी जीवन-लीला समाप्त कर देते थे। हम कहते हैं मान लो यह ठीक भी है, तो इससे क्या? हिंदुओं के राजा भी तो विष-कन्याएं रखते थे और उनके द्वारा अपने शत्रुओं को यमराज के घर भेज देते थे। आज इन बातों पर आक्षेप करने का क्या अर्थ है?

श्री चतुरसेन जी हमारे मित्र हैं। वह विद्वान हैं, मनस्वी हैं, उदार हैं, हम उनसे प्रार्थना करते हैं कि ऐसी जटिल और द्रोह भरी रचनाएं लिख कर अपनी प्रतिभा को और हिंदी भाषा को कलंकित न करें और राष्ट्र में जो चाहे द्रोह और द्वेष पहले से ही फैला हुआ है, उस बारूद में आग न लगाएं।

(संपादकीय : जागरण, 24 जुलाई, 1933)

7 comments:

कपिल said...

सामयिक और जरूरी पोस्‍ट। शुक्रिया।

Anonymous said...

अरे वाह बडी जल्दी पेट के दर्द हुआ इससे हिंदु धर्म का क्या लेना देना . पर आप को तो हर हालत मे हिंदु धर्म को गालिया देने का मौका ढूंढना है जी सो चालू हो लिये .सीता को राम कॊ बहन बताये तो आपके कान मे तेळ पड जाता है छ्द्म सेकुलरता की कोल्हू के बैल ? जो जैसा है उसे वैसा ही कहा जायेगा . अब रसूल रंगीला राजा था तो दूसरे क्या करे ? सही लिखा है लेखक ने.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

जिनको खुद पर भरोषा नही होता वो हमेशा छुप के वार करते है।

इस सामयिक लेख के लिये आपको बधाई।

Ek ziddi dhun said...

yahi tatv Premchand ko us waqt ke punurathanvadiyon se alag karta hai.

रवि सिंह said...

अच्छी समीक्षा है
मुंशी प्रेमच‌ंद क‌ा ये लेख पढ़कर "इस्लाम का विष-वृक्ष" पढ़ने की जिज्ञासा जाग गई

क्या आप बता सकते ह‌ैं कि ये किताब क‌हां मिल सकती है? इसके प्रकशक कौन हैँ?

रवि सिंह said...

"खुदा आदमी को बहकाता है।खुदा सबसे बड़ा कपटी है।खुदा ने प्रत्येक शहर में पापियों के सरदार छोड़ रखे हैं, ताकि वे लोगों को बहकाते और धोखा देते रहें।
खुदा घात में लगा रहता है।बिहिश्त में शराब पीने को, मांस खाने को, तथा सत्तर हूरें और लौंडे मौज करने को मिलेंगे।"

आप इस्लाम का विष बृक्ष के और अधिक अंश प्रकाशित कीजिये ताकि हम जान सकें के ये कितनी बुरी किताब है

हो सके तो पूरी की पूरी किताब आनलाइन डाल दीजिये

hindusthangaurav said...

इस्लाम पर अधिक जानकारी के लिये देखें साइट http://www.hindusthangaurav.com/index.asp

 
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