योगेंद्र कृष्णा
ऐसे विकट एवं अराजक समय में--जबकि जीवन के सारे आयाम,सारे अनुशासन और इसलिए साहित्य भी छद्म आकांक्षाओं, कृत्रिम सरोकारों, जटिलताओं एवं महत्त्वाकांक्षी दांव-पेंच से निरंतर आक्रांत हैं--हमें कुछ ऐसे ठोस और प्रभावी तिनकों की फिर भी जरूरत है जो हमें एक सहज मनुष्य बने रहने में हमारी मदद कर सके, और इस तरह हमें अपने छद्म, अपनी चालाकियों, अपनी कृत्रिमताओं और अपने ही द्वारा विरूपित अपनी छवियों को पहचानने के पर्याप्त अवकाश और औज़ार उपलब्ध करा सके। बाजार और उपभोक्तावाद में स्थगित होती जिंदगी के भयावह परिदृश्य में भी कविता ही हमें ज्यादा से ज्यादा आदमी बने रहने का प्रलोभन देती प्रतीत होती है. और यही हमारी विरूपित छवियों की शिनाख्त कर हमें मुक्त करने की आश्वस्ति भी प्रदान करती है.
लेकिन शायद कुछ लोग ऐसा मानने के लिए तैयार न हों, जैसा कि राजेंद्र यादव जी बड़ी उत्सवधर्मिता के साथ जोर-शोर से यह कहते सुने-पढ़े जा रहे हैं कि `यह कविता से मुक्ति की सदी है´। और अगर सचमुच ऐसा है तो यह सदी उत्सव की नहीं, मातम की होगी। यह केवल कविता से मुक्ति की नहीं, बल्कि उन सारे उदात्त मूल्यों से मुक्ति की सदी होगी जिनसे कविता--और मूलत: कविता ही--सदियों से संपोषित-समृद्ध होती रही है।
मेरा निवेदन तो सिर्फ इतना है कि यह राजेंद्र जी या आपके द्वारा बहुत जल्दबाजी में कर लिया गया यक़ीन है कि कविता मर गई! लेकिन इस निराशाजनक परिदृश्य में भी कविता के विस्तृत फलक पर ऐसे अल्पसंख्यक कवि-लेखक जरूर मौजूद हैं जो कविता के मर जाने की इस खबर पर पूरे संदेह के साथ सक्रिय हैं.
यहां कुंवर नारायण जी की ये काव्य-पंक्तियां कितनी प्रासंगिक हो उठती हैं :
एक बार खबर उड़ी कि
कि कविता अब कविता नहीं रही
और यूं फैली
कि कविता अब नहीं रही!
यकी़न करने वालों ने यक़ीन कर लिया
कि कविता मर गई,
लेकिन शक करने वालों ने शक किया
कि ऐसा हो ही नहीं सकता
और इस तरह बच गई कविता की जान
ऐसा पहली बार नहीं हुआ
कि यक़ीनों की जल्दबाज़ी से
महज़ एक शक ने बचा लिया हो
किसी बेगुनाह को
( कुंवर नारायण / यक़ीन की जल्दबाज़ी से )
लेकिन शायद कविता से मुक्ति की यह घोषणा या खबर कविता के विरुद्ध कोई सुनियोजित या सार्थक बयान नहीं है, बल्कि आज कविता के नाम पर लिखी जा रही अनर्गलों और अत्यंत साधारण कवित-विवेक और अखबारी कतरनों से निर्मित कविताओं के आतंक से घबराई हुई एक बेबस चीख-सी है. कविता का यह आतंक आज कई स्तरों पर महसूस किया जा रहा है. साहित्य में आज साधारण के वर्चस्व ने भी हमें आतंकित कर रखा है. साधारण और अनर्गल के वर्चस्व को बनाए रखने में भरपूर मदद करते साहित्य के आधुनिक कारपोरेट मठाधीशों ने भी साहित्य और समाज का कम अहित नहीं किया है. इनमें से कुछ तो साहित्य को बाजार में बिकाऊ नारों-इश्तहारों की तरह भी उपयोग में लाने से परहेज नहीं करते, क्योंकि इन्हें तो हड़बड़ी है...बिना कौशल, बिना प्रतिभा, बिना साधना और सर्वोपरि बिना अंत:करण के सब कुछ पा लेने की... वैसे ही जैसे कारपोरेट जगत में सत्यम और एनरॉन जैसी कंपनियों के शीर्ष पर बैठे सफेदपोश बुद्धिजीवियों को हड़बड़ी होती है सीधे शिखर पर पहुंचने की... पूरी जिंदगी समर्पित कर देने के बाद भी जो काम अधूरा रह जा सकता है, वे तो उसे रातों-रात कर गुजरने की ख्वाहिश पाले मंच के सधे कलाकार-बहुरूपिए हैं.
काश उन्हें ऐसी आपाधापी और हड़बड़ी नहीं होती तो शायद समझ पाते :
...उसे कोई हड़बड़ी नहीं
कि वह इश्तहारों की तरह चिपके
जुलूसों की तरह निकले
नारों की तरह लगे
और चुनावों की तरह जीते
वह आदमी की भाषा में
कहीं किसी तरह जिदा रहे बस
( कुंवर नारायण / कविता )
बहुत कुछ दे सकती है कविता
बहुत कुछ हो सकती है कविता
जिंदगी में
अगर हम जगह दें उसे
जैसे फूलों को जगह देते हैं पेड़
जैसे तारों को जगह देती है रात...
( कुंवर नारायण / कविता की जरूरत )
साहित्य की दूकान चलाने वालों तथा उपलब्धि की सुविधाजनक रास्तों-सीढ़ियों की तलाश में भटकती अतृप्त बेचैन आत्माओं और अपने लिखे पर आत्ममुग्ध साहित्यकारों के लिए निर्मल वर्मा की यह सलाह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है :
...साहित्य अन्य अनुशासनों से बहुत अलग है-- वहां कोई सीधा रास्ता निर्दिष्ट सत्य की ओर नहीं जाता, वहां अपने ही मन के अंधेरे गलियारों में भटकना पड़ता है. यहां यदि पैर लड़खड़ाते हैं तो कोई ऐसा संबल नहीं जो आपको संभाल सके. यदि संबल की तलाश हो, तो हमें साहित्य की शरण में नहीं जाना चाहिए-- वहां संदेह और भी सघन होगा, अंधेरा और भी अंधकारपूर्ण, तृष्णा और भी अधिक तृष्णाकुल. साहित्य में हम अपना सत्य केवल अस्तित्व के चरम छोर पर जाकर ही पा सकते हैं और चूंकि दुनियावी सुविधाओं के बीच हम वहां जाने का खतरा नहीं उठाना चाहते, साहित्य यह जोखिम हमारे लिए उठाता है. इसलिए हमें यह गर्व नहीं करना चाहिए कि हम साहित्य को कुछ देते हैं. हम जो कुछ लिखते हैं एक तरह से इस ऋण से उऋण होने का विनम्र प्रयास करते हैं, जो हमने होमर, व्यास, शेक्सपियर और तुलसीदास, दॉस्तोयवस्की और तॉल्सतॉय जैसे लेखकों से प्राप्त किया है. क्या हम कभी कल्पना कर सकते हैं कि उन्होंने जो दुनियाएं हमारे लिए रची हैं उनके बिना हमारी यह दुनिया कैसा अंतहीन मरुस्थल बन जाती?
लेकिन निर्मल वर्मा या कुंवर नारायण जैसी शख्सियतों का कोई असर संवेदनहीन समाज पर नहीं हो सकता. संकट का एक समय वह होता है जब हम अपने भीतर नैतिकता को लेकर अंतर्द्वंद्वों से मुठभेड़ कर रहे होते हैं या फिर अपने बाहर के सत्ता केंद्रों से टकरा रहे होते हैं... यहां तो न कोई अंतर्द्वंद्व है और न कोई संघर्ष--बल्कि अनैतिकता और अराजकता के पक्ष में खड़े वयस्क होते एक संपूर्ण रूप से निर्द्वंद्व और संवेदनहीन समाज से हम टकराने को विवश हैं...और जहां इस बहुसंख्यक समाज को नेतृत्व प्रदान करने की होड़ में साहित्य पत्रकारिता की सांस्थानिक कमान संभाले कुछ बहुरूपिए अपने निजी झगड़ों विवादों को पूरी निर्लज्जता के साथ निपटाते हुए अपने शिष्यों-अनुयायियों को भेंड़ बकरियों की तरह हांक रहे हैं.
शब्द और समाज पर गहराती इस धुंध में भी अनेक युवा कवि शब्द की खो रही गरिमा और मूल्य को अपनी-अपनी तरह से पुनर्वासित करने की दिशा में सक्रिय दिखते हैं. हाल में प्रकाशित जिन कुछ युवा कवियों की कविता-पुस्तकों ने संयोग से मेरी अध्ययन मेज पर अपनी जगहें बना रखीं हैं उनमें अनीता वर्मा की रोशनी के रास्ते पर, नीलेश रघुवंशी की अंतिम पंक्ति में, निरंजन श्रोत्रिय की जुगलबंदी तथा आशुतोष दुबे की यक़ीन की आयतें शामिल हैं. इन्हीं कविता पुस्तकों से गुजरते हुए मैंने यहां अपनी कुछ फुटकर प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं. शायद कहने की जरूरत नहीं कि यह युवा कविता के परिदृश्य के आकलन का नहीं, बल्कि कविता की मृत्यु की खबर पर संदेह को और भी सघन करने का प्रयास है.
जटिल से जटिलतर होते जीवन के बीच गहरी मूल्यवान सहजता और कोमलता की तलाश, निजता की सीमाओं का अतिक्रमण कर सार्वजनीन अनुभवों की दिशा में संवेदना का विस्तार इन कविताओं के प्रस्थान विंदु बन कर उभरते हैं.
हमारे जीवन में स्वाभाविक सहजता और सरलता के निरंतर अभाव के गहरे अहसास की शिनाख्त अनीता वर्मा की कविताओं में की जा सकती है. जो चीजें जितनी ही सरल और सहज हैं वे उतनी ही गहरी और मूल्यवान भी हैं... नैसर्गिक सहजता और सरलता उतनी आसान भी नहीं हैं जितनी वह दिखती हैं. गहन अंधकार में भी उम्मीद की उजली किरणें अनीता की कविताओं की विशिष्टता है. देखें उनकी इन पंक्तियों को :
हवा और पानी सरल हैं
जब तक वे सांस और प्यास नहीं बन जाते
और मनुष्य के रुदन को कैसे देखा जाए
वह सिर्फ आंसू नहीं है
उसमें हर बार नए सिरे से दिखता है एक पूरा जीचन
फूल और फल सरल हैं
लेकिन कितनी गहराइयां लांघ कर वे आए हैं ऊपर
( अनीता वर्मा / सरलता )
इंसानों से भरी-पूरी दुनिया में
मैं खोजती हूं एक मनुष्य
जो बाशिंदा हो इस मृत्युलोक का
धरती पर आए हुए पहले नि:स्वार्थ प्राणी की तरह...
ऐसे मनुष्य को खोजना
एक भ्रम का पीछा करना है
एक ऐसा भ्रम जिसे मैं सत्य मानती हूं
(अनीता वर्मा / मैं खोजती हूं )
एक पेड़ को पेड़ होकर ही जाना जा सकता है
उसकी धूप और कोमलता को
उसके रंध्रों से होकर गुजरना
आकाश को अपने ऊपर समझने की तरह है
( अनीता वर्मा / अपना पेड़ )
सोचती हूं एक फूल को कैसे समझा जाये
क्या यह संभव है फूल में बदले बिना...
(अनीता वर्मा / देखते हुए )
हमारा समाज जितना ही मूल्यहीन होगा, वस्तुएं उतनी ही कीमती. कीमती वस्तुओं के इस मूल्यविहीन बाजार में हमें लूटा जा रहा हो, हमें लुट जाने का अहसास भी हो और हम कुछ कर नहीं सकते हों तो समझ सकते हैं कि बाजार ने धीरे-धीरे हमें अपनी गिरफ्त में लेकर मानसिक रूप से कितना पंगु बना डाला है. यहां बाजार द्वारा लूटे जाने का एक और अत्यंत निर्मम और विश्वासघाती तरीका गौरतलब है. शिखर पर दिखती सत्यम जैसी कंपनियों के देशी-विदेशी हजारों लाखों कर्मी रातों-रात सड़क पर आ जाते हैं...और हम कुछ कर नहीं सकते! यह समाज के कुछ सफेदपोश बुद्धिजीवियों द्वारा लाखों सामान्य जीवन की कीमत पर रातों-रात यश-समृद्धि और शिखर पा लेने की खूनी और लोलुप होड़ की दुष्परिणति नहीं तो और क्या है!
अनीता वर्मा अपनी कविता बाजार की इन पंक्तियों में अपने बचपन के बाजार को अकारण ही याद नहीं करतीं :
इस बाजार में एक चीज के साथ दूसरी चीज मुफ्त नहीं है
जैसा कि चलन है इन दिनों का
यह सुंदर तारिकाओं के साबुन नहीं बेचता
अर्द्धनग्न सुंदरता नहीं बेचता....
यहां बिना जरूरत कोई कुछ नहीं खरीदता
यहां आकर नहीं होता लुटे-पिटे होने का अहसास
यह चलकर नहीं आता हमारे घरों तक....
( अनीता वर्मा / बाजार )
आशुतोष दुबे की कविताएं सामान्य पाठकों के लिए प्रथम दृष्टया थोड़ी अबूझ, थोड़ी जटिल, थोड़ी वायवीय प्रतीत हो सकती है. लेकिन बाद के पाठ में आपका श्रम बेकार नहीं जाता--वे कई स्तरों पर खुलती हुई आपको चकित भी करती हैं. कविता में सपाटबयानी के प्रतिकूल वे एक ऐसी भाषा और शिल्प रचते हैं जो आपसे थोड़ी अतिरिक्त संवेदना, बौद्धिकता और संयम की मांग करते हैं. आशुतोष की कविताओं की गहरी और बारीक संवेदनाएं हमें जीवन और जगत के रिश्ते को देखने-समझने की नई दृष्टि प्रदान करती हैं.
कवि को पता है कि जीवन को बार-बार दूसरों के लिए खाली कर देना ही जीवन का मर्म है. एक अच्छा इंसान होना कवि होने की पहली शर्त भी है. देखें उनकी इन पंक्तियों को :
खुद को खाली कर देने के बाद
पेड़ की तरह
प्रतीक्षा कर रहा हूं
( आशुतोष दुबे / हो रहा हूं )
अनीता वर्मा की कविताओं के संदर्भ में बाजार के दांव-पेंच और प्रलोभनों की जो चर्चा मैंने की है, उस फरेब को आशुतोष भी बखूबी पहचानते हैं :
प्रलोभन की उकसाती इबारत के नीचे
बारीक फरेबी हर्फों में लिखा है
शर्तें लागू
जो बहुत गौर से देखने पर ही नजर आता है
शर्तें तो फिर भी नजर नहीं आतीं
( आशुतोष दुबे / शर्तें लागू )
जीवन-मृत्यु, सुख और दुख को देखने-परखने की आशुतोष की शैली और संवेदना उन्हें अपनी अभिव्यक्ति में निर्मल वर्मा की शैली के बहुत करीब लाती है :
तालाब में डूबते हुए
उसने सोचा
उसके साथ उसका दुख भी डूब जाएगा...
कहा जा सकता है
कि वह जलाशय दरअसल एक दुखाशय था
जहां हल्के और भारी
बड़े, छोटे और मझोले दुख तैरते रहते थे...
( आशुतोष दुबे / जलाशय )
डर, पृथ्वी के इर्द-गिर्द
एक उपग्रह की तरह
मंडराता है
( आशुतोष दुबे / जलाशय )
निरंजन श्रोत्रिय की कविताएं भी हमें जीवन में गहरी संवेदना और कोमलताओं के प्रति आस्थावान बनाती हैं. शिल्प की नैसर्गिक सहजता के साथ कठिन और भयावह समय को साधने की आकांक्षा निरंजन की कविताओं की विशिष्टता है. और यह उनकी कविता जुगलबंदी में ही नहीं उनकी अन्य कविताओं में भी लक्ष्य की जा सकती है.
फिलहाल
जबकि सारे जाहिल लोग
थक कर सोये हैं
नींद से लड़ता कवि
लिखता एक आसान-सी कविता
कठिन समय पर
( निरंजन श्रोत्रिय / कठिन समय की कविता )
निरंजन की लंबी कविता जुगलबंदी प्रतिकूलताओं से भरे इस कठिन समय में भयावह हिंसाओं और दु:स्वप्नों से उबरने के लिए जीवन में एक ऐसी समन्वयकारी दृष्टि और मानवीय सौंदर्य को प्रतिष्ठापित करती है जो क्रूरताओं और हिंसा के विरुद्ध कोमलताओं और मानवीय संवेदना की पक्षधर है. यह कविता आज पूरे विश्व में घट रही हिंसा और अमानवीयता की घटनाओं के विरुद्ध एक विवेकशील मानवीय प्रस्तावना और प्रार्थना की तरह है... अपनी संवेदना में इतनी नाजुक कि अपने ही समय की कठोरता से टकराकर लहूलुहान होती हुई, और फिर भी अपनी ही आंतरिक ऊर्जा से उठ खड़ी होती हुई...
जुगलबंदी नहीं यह प्रार्थना थी दरअसल
कि लहलहा उठें मुरझाई फसलें
बहने लगें झरने सदियों से सूखे
भर जाएं उजास से अंधेरी सुरंगें दुनिया की
स्पंदन होने लगे पत्थरों में
( निरंजन श्रोत्रिय / जुगलबंदी )
नीलेश रघुवंशी की कविताएं आशुतोष दुबे की कविताओं की तरह बहुत कोमल या वायवीय संसार से अपना रिश्ता नहीं जोड़तीं. वे सामान्य जन-जीवन के स्वप्न की तलाश अपने निर्वैयक्तिक स्वप्न में करती प्रतीत होती हैं. नीलेश के यहां स्वप्नाकांक्षाओं और उपलब्धियों की वैयक्तिकता या निजता का निषेध बहुत स्पष्ट रूप से लक्ष्य किया जा सकता है.
इतना-इतना ज्यादा सोच लेती हूं
अपने हिस्से का ही नहीं सबके हिस्से का सोचकर
न इस पार रह पाती हूं, न उस पार जा पाती हूं...
( नीलेश रघुवंशी / नया दिन )
जन-सामान्य के जीवन की विडंबनाएं उन्हें गहरे विचलित करती हैं. वे उनके सुख-दुख की भागीदार बनने की आकांक्षा रचना चाहती हैं, उन्हीं के सपने देखना चाहती हैं :
वो जो घर बनाते हैं उसके स्वप्न भी नहीं आते उन्हें
जिस कुएं को खोदते हैं उसका जल भी नहीं तैरता नींद में...
( नीलेश रघुवंशी / सपनों का उच्चारण )
मैं डाकिया बन जाना चाहती हूं
सुख और दुख को अपने झोले में भरकर
हर घर की चौखट पर सुख को घर देना चाहती हूं...
( नीलेश रघुवंशी / रसायन )
समय कितना भी जटिल और उलझनों भरा क्यों न हो
जगह होनी चाहिए उसमें पेन खिड़कियों और कागज की
मुंश्किल है बहुत मुंश्किल है सपनों को ठंडी नींद सुला देना
( नीलेश रघुवंशी / ठंडी नींद )
नीलेश अमानवीयता के विरुद्ध अपने स्वप्न को पूरे संकल्प के साथ यथार्थ में बदलने का उपक्रम करती हैं लेकिन रास्ते में आती कठिनाइयों से भी वे बेखबर नहीं हैं :
इस बदरंग और ऊबड़-खाबड़ दुनिया को बदल देना
एक खेत में और उसमें मनुष्यता को बो देना
एक स्वप्न है जाती हूं जिसमें बार-बार
लौटती हूं हर बार
मकड़ी के जाले-सी बुनी इस दुनिया के भीतर...
( नीलेश रघुवंशी / एक स्वप्न )
कविताओं की ये बानगियां हमें आश्वस्त करती प्रतीत होती हैं कि कविता अपनी सारी उदात्त आकांक्षाओं स्वप्नों के साथ आज भी जिदा है और समय की बढ़ी हुई चुनौतियों के साथ और भी बड़े और उन्मुक्त स्पेस में सांस ले रही है.
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5 comments:
aapne bilkul sahi kaha hai kavita to jeevan hai ye kese mar sakti hai shabd mar sakte hain magar abhiviyakti nahi
yah rajendra yadav ke arajak vyaktivadi ahankar aur kuntha se labalab vyaktitva se mukti ki sadi hai...
शुक्रिया का जो इतना अच्छा आलेख चुनिँदा कविताओँ के साथ प्रस्तुत किया आपने
कविता न रहेगी तब ज़िँदगी जीने लायक ही नहीँ रहेगी
- लावण्या
प्रिय योगेन्द्र जी,
कविता कभी नहीं मर सकती. राजेन्द्र जी---- वह तो चर्चा में रहने के लिए कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं.
इस महत्वपूर्ण आलेख के लिए बधाई.
रूपसिंह चन्देल
प्रिय योगेन्द्र जी,
कविता कभी नहीं मर सकती. राजेन्द्र जी---- वह तो चर्चा में रहने के लिए कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं.
इस महत्वपूर्ण आलेख के लिए बधाई.
रूपसिंह चन्देल
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