ओम निश्चल
( पिछले अंक से जारी .......)
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होने न होने से परे / अमित कल्ला
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन
18, इंस्टीट्यूशनल एरिया
लोदी रोड, नई दिल्ली, मूल्य 120 रुपये
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चित्त और चैतन्य का रूपायन
भौतिकतावादी समय की आपाधापी और संसारी वृत्तियों में गहरे धँसे समाज के सापेक्ष अमित कल्ला की कविताएँ हमें अतीन्द्रिय आस्वाद से भर देती हैं। उनकी कविता का वस्तु-विधान समकालीन कविता से बहुत अलग है और आत्मा व मन की निश्छल गहराइयों में उतर कर रचा गया है। होने न होने से परे संग्रह भी भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित है, किन्तु इस नाते ही नहीं, यह कवि जीवन, संसार और समाज की गतिविधियों को बिल्कुल विरल दृष्टि से निरखता, रचता और अपने इंद्रियबोध का विषय बनाता है।
कवि आस्था, नियति, स्वप्न, मुक्ति, अन्तर्बाह्य, आगम, व्याप्ति, इच्छा, कबीरी, राग, वैराग्य, वृक्ष, ब्रह्मांड और समाधि के पक्ष को लेकर कविता में उपस्थित होता है। कवि के अवचेतन में धँसी अनेक अंतश्छवियाँ यहाँ कविता के गुह्य अर्थ में निबद्ध हुई हैं, जिनसे गुजरते हुए दृश्यों के आचमन का-सा बोध होता है। इस कवि के पास भाषा की सरहदें नहीं हैं। वह ऐसे मुक्त दिखता है जैसे मात्राओं की उलझनों से मुक्त शब्द। प्रकृति को देखने का उसका नजरिया अत्यंत सूक्ष्म है। टुकड़े टुकड़े फिरदौसी बादल को अपनी चितवन में उतारता कवि किसी कुम्हलाए ख्वाब-से प्रकृति के हर रंग को अपनी चाक्षुष अनुभूतियों में भर लेना चाहता है। एक गहरी प्रश्नाकुलता कविताओं की अन्तश्चेतना में समाई है। प्रकृति से उसका तादात्म्य गहरा और उद्वेलनों से भरा है। उसके ही शब्दों में, अंदर मैं / और बाहर वृक्ष / देखते देखते समा जाता / किन्तु वृक्ष, वृक्ष ही रहता / मैं नहीं रह पाता / वृक्ष हो जाता हूँ। (वृक्ष और मैं)
सच कहें तो ये कविताएँ जिज्ञासाओं और पृच्छाओं से भरी हैं, इनके भीतर से फूटती एक आध्यात्मिक, दार्शनिक उजास हमें सहज नहीं रहने देती। ये कविताएँ, डूब कर पढ़ें, तो पाठक को समाधिस्थ कर देती हैं। कबीरी कविता के बहाने इन कविताओं की मूर्त अन्तर्वस्तु को देखें तो इनमें एक कबीरी अर्थात फकीरी भाव विद्यमान है। कवि को इस बात का भरम नहीं है कि वह शब्दों का सारथी है। बार बार फिसलते बिखरते जाते शब्दों को सहेजना ही उसका काम्य है। एक कविता में वह कहता है--रोज रात में खोलता हूँ पोथी / भोर होते ही शब्द चिड़िया बन / उड़ जाते हैं इक - इक कर / बस रह जाते कुछ / टूटे-बिखरे पंख / सँजोता बटोरता रखता हूँ किसी अन्य खाली पोथी में / आशा से कि रात उन्हें फिर शब्द बना देगी। आशा, निराशा, निस्पृहता और रहस्यमयता को मथती-भेदती कवि की निस्संगता आखिर जानती ही है-- अपने आप मिट जाती हैं रेखाएँ / यकायक टूट जाता सचमुच / निर्लिप्त आवाजों के सहारे ही / गुजर जाता यह संसार (कितनी रिक्तता)
अमित कल्ला कला के पारखी हैं। चित्र रचना में निमग्न अमित ने कविता के अंत:संसार में भी उतर कर चित्र ही आँके हैं। जीवन की खोज में कला और कविता दोनों माध्यमों की सोहबत की है। वागर्थ के साधक हैं। ये कविताएँ तर्क और विवेक से ज्यादा चैतन्य और दार्शनिक प्रत्यभिज्ञा से उद्भूत हैं। ये आध्यात्मिक चेतना से उगाही गयी कविताएँ हैं। शायद यही कला है में अमित के चैतन्य का विश्लेषण करें तो कविता रचने की उनकी प्रविधि खुलती दीखती है। एक चित्र देखने से पहले चित्त को देखना होगा-- कहने वाले कवि को साधन और साध्य की पवित्रता खींचती है। इन कविताओं में झाँकने से पहले अपने चित्त में झाँकना जरूरी है। अमित को सांख्य दर्शन लुभाता है। प्रकृति-पुरुष का पारस्परिक सहकार खींचता है। विस्मयता इन कविताओं की नींव में है। यथार्थ, जैसा दिखता है, वैसा नहीं है। वह जटिल है, परिवर्तनशील है, सदैव संभावी है। एक वाक्य में कहें तो अमित कल्ला की ये कविताएँ यथार्थ के सूक्ष्म तंतुओं के रुबरू व्यक्ति के मनोजगत का साक्ष्य हैं और शब्द-संयम का उत्कृष्ट प्रतिफलन। इन्हें पढ़ने के लिए निस्संदेह संस्कारित चित्त चाहिए। एक दूसरे अर्थ में, ये कविताएँ चित्त और चैतन्य का रूपायन हैं।
भौतिकतावादी समय की आपाधापी और संसारी वृत्तियों में गहरे धँसे समाज के सापेक्ष अमित कल्ला की कविताएँ हमें अतीन्द्रिय आस्वाद से भर देती हैं। उनकी कविता का वस्तु-विधान समकालीन कविता से बहुत अलग है और आत्मा व मन की निश्छल गहराइयों में उतर कर रचा गया है। होने न होने से परे संग्रह भी भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित है, किन्तु इस नाते ही नहीं, यह कवि जीवन, संसार और समाज की गतिविधियों को बिल्कुल विरल दृष्टि से निरखता, रचता और अपने इंद्रियबोध का विषय बनाता है।
कवि आस्था, नियति, स्वप्न, मुक्ति, अन्तर्बाह्य, आगम, व्याप्ति, इच्छा, कबीरी, राग, वैराग्य, वृक्ष, ब्रह्मांड और समाधि के पक्ष को लेकर कविता में उपस्थित होता है। कवि के अवचेतन में धँसी अनेक अंतश्छवियाँ यहाँ कविता के गुह्य अर्थ में निबद्ध हुई हैं, जिनसे गुजरते हुए दृश्यों के आचमन का-सा बोध होता है। इस कवि के पास भाषा की सरहदें नहीं हैं। वह ऐसे मुक्त दिखता है जैसे मात्राओं की उलझनों से मुक्त शब्द। प्रकृति को देखने का उसका नजरिया अत्यंत सूक्ष्म है। टुकड़े टुकड़े फिरदौसी बादल को अपनी चितवन में उतारता कवि किसी कुम्हलाए ख्वाब-से प्रकृति के हर रंग को अपनी चाक्षुष अनुभूतियों में भर लेना चाहता है। एक गहरी प्रश्नाकुलता कविताओं की अन्तश्चेतना में समाई है। प्रकृति से उसका तादात्म्य गहरा और उद्वेलनों से भरा है। उसके ही शब्दों में, अंदर मैं / और बाहर वृक्ष / देखते देखते समा जाता / किन्तु वृक्ष, वृक्ष ही रहता / मैं नहीं रह पाता / वृक्ष हो जाता हूँ। (वृक्ष और मैं)
सच कहें तो ये कविताएँ जिज्ञासाओं और पृच्छाओं से भरी हैं, इनके भीतर से फूटती एक आध्यात्मिक, दार्शनिक उजास हमें सहज नहीं रहने देती। ये कविताएँ, डूब कर पढ़ें, तो पाठक को समाधिस्थ कर देती हैं। कबीरी कविता के बहाने इन कविताओं की मूर्त अन्तर्वस्तु को देखें तो इनमें एक कबीरी अर्थात फकीरी भाव विद्यमान है। कवि को इस बात का भरम नहीं है कि वह शब्दों का सारथी है। बार बार फिसलते बिखरते जाते शब्दों को सहेजना ही उसका काम्य है। एक कविता में वह कहता है--रोज रात में खोलता हूँ पोथी / भोर होते ही शब्द चिड़िया बन / उड़ जाते हैं इक - इक कर / बस रह जाते कुछ / टूटे-बिखरे पंख / सँजोता बटोरता रखता हूँ किसी अन्य खाली पोथी में / आशा से कि रात उन्हें फिर शब्द बना देगी। आशा, निराशा, निस्पृहता और रहस्यमयता को मथती-भेदती कवि की निस्संगता आखिर जानती ही है-- अपने आप मिट जाती हैं रेखाएँ / यकायक टूट जाता सचमुच / निर्लिप्त आवाजों के सहारे ही / गुजर जाता यह संसार (कितनी रिक्तता)
अमित कल्ला कला के पारखी हैं। चित्र रचना में निमग्न अमित ने कविता के अंत:संसार में भी उतर कर चित्र ही आँके हैं। जीवन की खोज में कला और कविता दोनों माध्यमों की सोहबत की है। वागर्थ के साधक हैं। ये कविताएँ तर्क और विवेक से ज्यादा चैतन्य और दार्शनिक प्रत्यभिज्ञा से उद्भूत हैं। ये आध्यात्मिक चेतना से उगाही गयी कविताएँ हैं। शायद यही कला है में अमित के चैतन्य का विश्लेषण करें तो कविता रचने की उनकी प्रविधि खुलती दीखती है। एक चित्र देखने से पहले चित्त को देखना होगा-- कहने वाले कवि को साधन और साध्य की पवित्रता खींचती है। इन कविताओं में झाँकने से पहले अपने चित्त में झाँकना जरूरी है। अमित को सांख्य दर्शन लुभाता है। प्रकृति-पुरुष का पारस्परिक सहकार खींचता है। विस्मयता इन कविताओं की नींव में है। यथार्थ, जैसा दिखता है, वैसा नहीं है। वह जटिल है, परिवर्तनशील है, सदैव संभावी है। एक वाक्य में कहें तो अमित कल्ला की ये कविताएँ यथार्थ के सूक्ष्म तंतुओं के रुबरू व्यक्ति के मनोजगत का साक्ष्य हैं और शब्द-संयम का उत्कृष्ट प्रतिफलन। इन्हें पढ़ने के लिए निस्संदेह संस्कारित चित्त चाहिए। एक दूसरे अर्थ में, ये कविताएँ चित्त और चैतन्य का रूपायन हैं।
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याज्ञवल्क्य से बहस / सुमन केशरी
राजकमल प्रकाशन
नई दिल्ली, मूल्य 200 रुपये
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अंत:संसार से बाहर आती स्त्री
कविता में देर से आई सुमन केशरी का पहला कविता संग्रह याज्ञवल्क्य से बहस एक बार फिर कविता में मिथकों के पुनरवतरण की ओर हमारा ध्यान खींचता है। लोहे के पुतले, कबीर-अबीर, तुम्हारी चाह, एक निश्चित समय और मैंने ठान लिया है-- शीर्षकों में विभक्त सुमन केशरी की कविताओं का दायरा बहुआयामी है। पहले खंड में वे मिथकीय चरित्रों का पुनर्मार्जन करती हुई अश्वत्थामा, द्रौपदी, कृष्णा, याज्ञसेनी, कर्ण, सीता, रावण, राधा, माधवी तथा सत्यवान को समकालीनता की रोशनी में देखती हैं। द्रोपदी की अपनी पीड़ा है, उसके भीतर अपमानों की याद ताजा है। द्रोपदी जिन्दगी भर बँटने वाली एक संज्ञा-भर रही है, जिसका अपना कोई वजूद नहीं रहा। उसके सवालों का न पहले उत्तर था, न आज है। कृष्ण के रूप में परिणत होकर भी उसकी विक्षुब्धताओं का हल नहीं निकला, सखा कृष्ण से उसकी शिकायतें ज्यों की त्यों हैं। स्त्री की आवाज आज भी अनसुनी है। वह आज भी पुरुषों से जुड़कर ही पहचानी जाती है। कर्ण के अपने दुख हैं। जीवन भर सूत पु़त्र होने का लांक्षन सहना पड़ा, तरसता रहा कि माँ बस एक बार कह भर दे कि हाँ तुम राधेय हो, तुम्ही मेरे पुत्र। पर नियति देखें कि अर्जुन को श्रेष्ठ धनुर्धर का खिताब देने के लिए कितने व्यूह रचे गए। छली इंद्र ब्राह्मण बन कर कवच कुंडल तक दान में ले गए। सीता के अपने संताप हैं तो राधा की अपनी व्यथा। माधवी की स्त्री चेतना भी पिता गालव की गुरुदक्षिणा के आगे निष्प्रभ हो उठती है और दान में गृहीता बन कर विश्वामित्र के भोग का अंश बनती है।
कवयित्री का ध्यान पुरुष पात्रों की तरफ तो गया ही है, किन्तु स्त्री पात्रों की पीड़ा उसे ज्यादा कचोटती है। इन स्त्रियों के अनुत्तरित सवाल आज भी याज्ञवल्क्य से गार्गी के बहस की याद दिलाते हैं। संग्रह के कबीर अबीर खंड में बच्चे को लेकर पेड. और माँ को लेकर कवयित्री ने मार्मिक अनुभूतियाँ सँजोई हैं। बदले हुए समय और हालात को बूझने की कोशिश भी उनके यहाँ दिखती है और अपने अतीत से भी वे रू ब रू होती हैं जब लौंगिया की बेल देख कर मन में माँ की याद कौंधती है। सुमन केशरी के कवि-चित्त को परखना हो तो उसके लिए तुम्हारी याद व एक निश्चित समय पर खंडों की कविताएँ देखनी चाहिए। स्त्री-जीवन की तपश्चर्या को वे कविताओं में पिरोती हैं। कवयित्री के शब्दों में, अपने होने का बहाना ढूढती है औरत और बहाने से जीवन जीती है। उसकी सक्रियता घड़ी की सुइयों से परिचालित होती है और दिन भर खटती हुई शाम को अपने सपनों को खूँटी पर टाँग सुबह पुनर्जन्म लेने के लिए नींद को भेंट चढ. जाती है। माँ से संवाद करती हुई या माँ को याद करती हुई किसी कल्पना में खोई सुमन केशरी स्त्री जीवन को कभी रोजी में टटोलती है कभी बीजल में। देर से कविता के इलाके में आना भी उनकी उस जिद के कारण ही संभव हुआ है जब वे श्रृंखला की कड़ियां तोड़ कर कविता लिखने का व्रत ठानती हैं और यह करते हुए वे इस अनुष्ठान में पाठक को भी न्योतती हैं:--पिछले दिनों याज्ञवल्क्य से चलते चलते हुई मुलाकात एक लंबी बहस में बदल गयी है। क्या तुम मेरे साथ उनसे बहस में उलझोगे। स्त्री-जीवन की कारुणिकता को मन में बसाए एक घरेलू स्त्री किन्तु जागरूक कवयित्री का परिचय देते हुए वे अतीत में सोए प्रश्नों को जगाती हैं, वे मिथकों, किंवदन्तियों में उद्धृत की जाती स्त्रियों के प्रारब्ध से टकराती हैं तथा एक सहज स्त्री-मन के साथ उन प्रश्नों को एक बार फिर अपनी ताकिर्कता के धरातल पर ले आती हैं जिनके सटीक उत्तर अभी तक प्रतीक्षित हैं।
कविता शब्द-संयम माँगती है--यह न तो बयान है, न सपाटबयानी, न सुभाषित है न निंदा पुराण या शिकवा-शिकायत। यह दुनियावी हकीकत से उपजा जीवन-सारांश है। सच कहें तो कवि अपनी कविताओं में एक बार और जन्म लेता है। सुमन केशरी की चाहत भी तो जीवन को कविता में बदल देने की है। वे इस संग्रह के बूते भले ही कवियों की उल्लेखनीय पंक्ति में शरीक न हो पाएँ किन्तु वे कवित्व के सहज गुणधर्म से भरी हैं, इसमें संदेह नहीं।
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अंत:संसार से बाहर आती स्त्री
कविता में देर से आई सुमन केशरी का पहला कविता संग्रह याज्ञवल्क्य से बहस एक बार फिर कविता में मिथकों के पुनरवतरण की ओर हमारा ध्यान खींचता है। लोहे के पुतले, कबीर-अबीर, तुम्हारी चाह, एक निश्चित समय और मैंने ठान लिया है-- शीर्षकों में विभक्त सुमन केशरी की कविताओं का दायरा बहुआयामी है। पहले खंड में वे मिथकीय चरित्रों का पुनर्मार्जन करती हुई अश्वत्थामा, द्रौपदी, कृष्णा, याज्ञसेनी, कर्ण, सीता, रावण, राधा, माधवी तथा सत्यवान को समकालीनता की रोशनी में देखती हैं। द्रोपदी की अपनी पीड़ा है, उसके भीतर अपमानों की याद ताजा है। द्रोपदी जिन्दगी भर बँटने वाली एक संज्ञा-भर रही है, जिसका अपना कोई वजूद नहीं रहा। उसके सवालों का न पहले उत्तर था, न आज है। कृष्ण के रूप में परिणत होकर भी उसकी विक्षुब्धताओं का हल नहीं निकला, सखा कृष्ण से उसकी शिकायतें ज्यों की त्यों हैं। स्त्री की आवाज आज भी अनसुनी है। वह आज भी पुरुषों से जुड़कर ही पहचानी जाती है। कर्ण के अपने दुख हैं। जीवन भर सूत पु़त्र होने का लांक्षन सहना पड़ा, तरसता रहा कि माँ बस एक बार कह भर दे कि हाँ तुम राधेय हो, तुम्ही मेरे पुत्र। पर नियति देखें कि अर्जुन को श्रेष्ठ धनुर्धर का खिताब देने के लिए कितने व्यूह रचे गए। छली इंद्र ब्राह्मण बन कर कवच कुंडल तक दान में ले गए। सीता के अपने संताप हैं तो राधा की अपनी व्यथा। माधवी की स्त्री चेतना भी पिता गालव की गुरुदक्षिणा के आगे निष्प्रभ हो उठती है और दान में गृहीता बन कर विश्वामित्र के भोग का अंश बनती है।
कवयित्री का ध्यान पुरुष पात्रों की तरफ तो गया ही है, किन्तु स्त्री पात्रों की पीड़ा उसे ज्यादा कचोटती है। इन स्त्रियों के अनुत्तरित सवाल आज भी याज्ञवल्क्य से गार्गी के बहस की याद दिलाते हैं। संग्रह के कबीर अबीर खंड में बच्चे को लेकर पेड. और माँ को लेकर कवयित्री ने मार्मिक अनुभूतियाँ सँजोई हैं। बदले हुए समय और हालात को बूझने की कोशिश भी उनके यहाँ दिखती है और अपने अतीत से भी वे रू ब रू होती हैं जब लौंगिया की बेल देख कर मन में माँ की याद कौंधती है। सुमन केशरी के कवि-चित्त को परखना हो तो उसके लिए तुम्हारी याद व एक निश्चित समय पर खंडों की कविताएँ देखनी चाहिए। स्त्री-जीवन की तपश्चर्या को वे कविताओं में पिरोती हैं। कवयित्री के शब्दों में, अपने होने का बहाना ढूढती है औरत और बहाने से जीवन जीती है। उसकी सक्रियता घड़ी की सुइयों से परिचालित होती है और दिन भर खटती हुई शाम को अपने सपनों को खूँटी पर टाँग सुबह पुनर्जन्म लेने के लिए नींद को भेंट चढ. जाती है। माँ से संवाद करती हुई या माँ को याद करती हुई किसी कल्पना में खोई सुमन केशरी स्त्री जीवन को कभी रोजी में टटोलती है कभी बीजल में। देर से कविता के इलाके में आना भी उनकी उस जिद के कारण ही संभव हुआ है जब वे श्रृंखला की कड़ियां तोड़ कर कविता लिखने का व्रत ठानती हैं और यह करते हुए वे इस अनुष्ठान में पाठक को भी न्योतती हैं:--पिछले दिनों याज्ञवल्क्य से चलते चलते हुई मुलाकात एक लंबी बहस में बदल गयी है। क्या तुम मेरे साथ उनसे बहस में उलझोगे। स्त्री-जीवन की कारुणिकता को मन में बसाए एक घरेलू स्त्री किन्तु जागरूक कवयित्री का परिचय देते हुए वे अतीत में सोए प्रश्नों को जगाती हैं, वे मिथकों, किंवदन्तियों में उद्धृत की जाती स्त्रियों के प्रारब्ध से टकराती हैं तथा एक सहज स्त्री-मन के साथ उन प्रश्नों को एक बार फिर अपनी ताकिर्कता के धरातल पर ले आती हैं जिनके सटीक उत्तर अभी तक प्रतीक्षित हैं।
कविता शब्द-संयम माँगती है--यह न तो बयान है, न सपाटबयानी, न सुभाषित है न निंदा पुराण या शिकवा-शिकायत। यह दुनियावी हकीकत से उपजा जीवन-सारांश है। सच कहें तो कवि अपनी कविताओं में एक बार और जन्म लेता है। सुमन केशरी की चाहत भी तो जीवन को कविता में बदल देने की है। वे इस संग्रह के बूते भले ही कवियों की उल्लेखनीय पंक्ति में शरीक न हो पाएँ किन्तु वे कवित्व के सहज गुणधर्म से भरी हैं, इसमें संदेह नहीं।




1 comments:
प्रिय योगेन्द्र जी,
यवा कवियों की रचनाएं और उनकी पुस्तकों पर डॉ. ओम निश्चल जी की टिप्पणी आपके परिश्रमिक की सार्थकता सिद्ध करता है. ओम जी तो मझे हुए आलोचक, समीक्षक और कवि हैं. आपको उनका साथ मिला हुआ है, यह बहुत अच्छी बात है. आप, ओम जी और कवियों को बधाई.
चन्देल
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