Thursday 5 February 2009

साक्षात्कार



कविता स्वभावत: एक स्वायत्त कला है

वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण से अरुंधती सुब्रह्मणियम की बातचीत

मूल अंग्रेजी से अनुवाद : योगेंद्र कृष्णा

अ. सु. : आपके छ: कविता-संग्रहों के क्रम में आपकी कविता ने कौन-सी दिशाएं तय की हैं? क्या आप एक संग्रह से दूसरे संग्रह तक की अपनी इस कविता यात्रा को विषय-वस्तु, सरोकार, और रूपाकार के प्रति अपने दृष्टिकोण के संदर्भ में निरूपित करना चाहेंगे? क्या इस बीच काव्य-शास्त्र को लेकर आपके अपने दृष्टिकोण में कोई तब्दीलियां आई हैं?

कुं. ना. : मैं अट्ठाइस वर्ष का था जब मेरा पहला कविता-संग्रह चक्रव्यूह प्रकाशित हुआ. इसके पूर्व मैंने अंग्रेजी में लिखना प्रारंभ किया था, और उस निर्मिति-काल में मुझ पर योरप की रोमानी कविताओं का पुरजोर असर था. अंग्रेजी रोमानी कवियों की अपेक्षा मैं फ्रांसिसी प्रतीकवादियों, विशेषकर बॉदेलेयर, मलार्मे, वर्लाइने, रिम्बॉद आदि से अधिक प्रभावित था. चक्रव्यूह में कई कविताएं हैं जिनपर प्रतीकवादी प्रभाव दिखते हैं. उदाहरण के लिए, मुक्त छंद (फ्री वर्स) ने मुझे हिंदी कविता के सख्त छंद-विधान को अधिक स्वतंत्रता और अन्वेषणों के साथ रूपांतरित करने में हमारी मदद की. मैंने संस्कृत के वार्णिक मीटर के प्रति एक सहज निकटता महसूस की क्योंकि इसकी संरचना समान थी--शब्द-गणना यहां स्वराघात (स्ट्रेस) और अंत्यानुप्रास (राइम) से अधिक महत्वपूर्ण हैं. हिंदी शब्दों की व्युत्पत्ति का एक लंबा और आकर्षक इतिहास रहा है--शब्दों के अर्थ होते हैं, लेकिन इससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण उनकी संस्कृति और इतिहास होता है. शब्दों की एक तात्कालिकता होती है, लेकिन उससे कहीं अधिक अर्थपूर्ण उनका एक व्यक्तित्व होता है जिसे कविता में जीवंत कर, सदियों लंबी उनकी उन अनुभव-यात्राओं के बारे में जाना जा सकता है जिनसे गुजर कर वे वर्तमान अर्थ-संदर्भ तक पहुंचे हैं. इस दृष्टि से चक्रव्यूह की कविताएं शब्दों के इस जादुई लोक में मेरी पहली अनुभव-यात्रा थीं.

लेकिन मैंने हिंदी मीटर में मात्रा को बिलकुल छोड़ नहीं दिया. परिवेश : हम-तुम, जो पांच वर्ष बाद प्रकाशित हुआ, में मुक्त छंद और छंद दोनों साथ-साथ चलते हैं, लेकिन भाषिक और सामाजिक स्तर पर, यह एक ज्यादा वैविध्यपूर्ण दुनिया है जिसमें मेरी कविता सांस लेती है. अपने संग्रह प्रकाशित कराने की मुझे कभी कोई हड़बड़ी नहीं रहती : पांच-दस वर्षों के बीच का अंतराल उसी प्रकार दिक्काल से भरा होता है जिस प्रकार दो शब्दों के बीच की खाली जगह--जो खाली दिखती है, लेकिन वास्तव में होती नहीं. देखा जाए तो, इन अलग-अलग संग्रहों के बीच एक सिलसिला है, वे एक-दूसरे से जुड़े हैं, और इन्हें हम एक नैरन्तर्य (कंटिनुअम) के रूप में पढ़ सकते हैं--जो मेरे भीतर और बाहर की दुनिया में घटित हो रहे बदलावों के प्रति मेरी प्रतिक्रियाओं के रूप में अभिव्यक्त हुए हैं. आत्मजयी (कठोपनिषद पर आधारित और 1965 में प्रकाशित एक लघु महाकाव्य) मेरे अन्य संग्रहों से बिलकुल भिन्न है. यहां मृत्यु के प्रति मेरी दृष्टि उजागर हुई है. मृत्यु--जिसका सामना हर व्यक्ति को अपने जीवन में करना होता है. मुझे लगता है, सृजनात्मक जीवन हमें एक प्रकार का अमरत्व-बोध (इंटिमेशन ऑफ इम्मोर्टालिटी) प्रदान करता है और मृत्यु के भय से हमारा ध्यान हटाता है. अपने सामने (1979) देश में आपातकाल के पूर्व तथा बाद की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का प्रत्यक्ष जायजा लेता है. इसके बाद के संग्रह कोई दूसरा नहीं (1993) और इन दिनों (2002) में मैंने मानव जीवन और उसकी दुनिया के बारे में अपनी दृष्टि को विस्तार देने की कोशिश की है. इस दृष्टि को वैश्विक कह देना भर बहुत स्थूल बात होगी क्योंकि इस दृष्टि में मिथक, इतिहास, संस्कृति, विकास आदि से जुड़ी हमारी व्यापक चिंताएं और सरोकार शामिल हैं. अपने जीवन-संघर्ष की समझ को व्यापकता प्रदान करने के लिए कविता एक संवेदनात्मक और कल्पनाशील साधन है. इस तरह, मेरी कुछ कविताओं को इस रूप में पढ़ना अर्थपूर्ण हो सकता है. एक संपूर्ण जीवन-यथार्थ केवल अनुभूत दुनिया से ही नहीं बनता बल्कि यह काल्पनिक दुनिया से संपृक्त होकर अनुप्राणित होता है. अपनी कविताओं पर मैंने किसी प्रकार का सौंदर्यशास्त्र आरोपित नहीं किया है, बल्कि उन्हें स्वयं अपने `रूपाकार´ और `विषयवस्तु´ निर्धारित करने की स्वतंत्रता दी है. मार्क्स की यह मान्यता कि `रूप´ `विषयवस्तु´ का ही `रूप´ है, या जगन्नाथ (17वीं शताब्दी) की पुरानी संस्कृत उक्ति `शब्दारथौ-सहितौ-काव्यम्´ (कविता शब्द और अर्थ का सुखद संयोजन है) मेरे लिए काव्य-रचना की एक सारगर्भित व्यावहारिक परिभाषा प्रस्तुत करती है.

अ. सु. : साहित्य के प्रति आपका लगाव कैसे हुआ? अपने प्रारंभिक अनुभवों के बारे में हमें कुछ बताएं.

कुं. ना. : पुस्तकें मुझे बहुत शुरू से ही आकिर्षत करती रहीं और मैं अपना अच्छा खासा समय पुस्तकें पढ़ने और स्वयं भी कुछ लिख डालने में व्यतीत कर देता. जब मैं विश्वविद्यालय में था तभी मैंने कविताएं लिखना शुरू कीं--पहले अंग्रेजी में और फिर थोड़े ही समय बाद हिंदी में. काव्य-लेखन की प्रक्रिया, किसी भी अन्य सृजनात्मक प्रक्रिया की तरह, जटिलताओं से भरी है, इसलिए इसे बहुत स्पष्ट शब्दों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता. जीवन और भाषा में इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं, और यह एक प्रकार के जैव विकास की प्रक्रिया के समान है. यही कारण है कि अपने विकास-क्रम की एक खास अवस्था पर पहुंच कर कवि के लिए यह असंभव-सा होता है कि वह अपनी रचनात्मक पहचान को बनाए रख सके और उसे एक वस्तुपरक स्वायत्त सत्ता के रूप में निरूपित करे. अपनी कविताओं को वह एक आलोचकीय दृष्टि से परख तो सकता है, लेकिन उसकी कविताएं इस रूप में किस तरह प्रतिफलित हुईं, इसकी तार्किक व्याख्या वह शायद ही कभी कर पाए. अपने बारे में मैं ऐसा ही कुछ महसूस करता हूं.

उन्नीस सौ पचपन में मैंने पोलैंड, रूस, और चीन की यात्रा की थी, और वारसा में मुझे पाब्लो नेरुदा, नाज़िम हिकमत और एंटन स्लोनिस्मकी से मुलाक़ात का अवसर मिला था. इस उम्र में ये मुलाक़ातें मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थीं. इसने कविता के प्रति मेरे आकर्षण को और बढ़ा दिया. लखनऊ का तत्कालीन साहित्यिक जीवन काफी समृद्ध था--कॉफी हाउस में नियमित विचार-विमर्श और लेखक मित्रों के साथ लेखक संघ की साप्ताहिक साहित्यिक गोष्ठियां हुआ करतीं. इस दौरान मुझे अनेक अग्रज साहित्यकारों, शिक्षाविदों तथा राजनीतिज्ञों से मिलने का अवसर मिला. आचार्य नरेंद्र देव, आचार्य कृपलानी तथा डा. राम मनोहर लोहिया--जो मेरे पारिवारिक सदस्य के समान थे--का मेरे विचारों की निर्मिति में पर्याप्त योगदान रहा. उन्होंने मुझे मेरे परिवार की व्यापारिक पृष्ठभूमि से बाहर निकाल कर साहित्य की दिशा में प्रेरित किया. इन सभी अनुभवों को मैं अपनी साहित्यिक निर्मिति में अत्यंत महत्वपूर्ण मानता हूं.

अ. सु. : आपने कई अंतरराष्ट्रीय लेखकों का अनुवाद किया है. उदाहरण के लिए बोर्खेज़, कवाफ़ी, वालकॉट आदि. अनुवाद की इस प्रक्रिया ने--जो कि स्वयं एक रचनात्मक प्रक्रिया है--आपके लेखन को किस तरह प्रभावित किया?

कुं. ना. : मेरा मानना है कि किसी अच्छे कवि को जानने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि आप उसे अनुवाद करने की कोशिश करें. जब मैंने अपने फ्रेंच शिक्षक की मदद से मलार्मे का अनुवाद सीधे फ्रेंच से करने की कोशिश की तो मुझे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला. मेरे यह अनुवाद मलार्मे की मूल रचना से सर्वथा भिन्न थे : लेकिन उस विरल काव्य-सामग्री पर स्वतंत्र रूप से कार्य करने के इस उर्वर अनुभव ने मुझे कविता में एक ऐसी मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान की जो उन कविताओं के शाब्दिक अनुवाद से कभी संभव नहीं होता. जर्मन अनुवादकों के साथ मिलकर किए गए कवाफी, बोर्खेज़, वालकॉट तथा हाल में, गुंटर ग्रास की रचनाओं के अनुवाद ने भी उसी तरह मेरे अनुभवों को काफी समृद्ध किया है. ये सारे कवि एक-दूसरे से काफी अलग हैं, इसलिए इस अनुभव ने मुझे काव्य-शिल्प के विभिन्न आयामों को समझने में मेरी मदद की. कविता अकसर पूरी तरह संस्कृति-विशिष्ट तथा भाषा-विशिष्ट कला है, और बहुतेरी ऐसी कविताएं हैं जिनके शाब्दिक अनुवाद का या तो बहुत कम या कोई अर्थ नहीं निकलता जबतक कि उस दूसरी भाषा में उनका पुनर्लेखन न कर दिया जाए. उदाहरण के लिए, उर्दू की अधिकांश कविताएं अतिशय संस्कृति/भाषा-विशिष्ट हैं : इसलिए गालिब के अंदाज़े-बयां का अनुवाद करना बिलकुल असंभव है. विभिन्न प्रकार के कवियों की रचनाओं के अनुवाद के क्रम में एक अहम अंतर जो मैंने महसूस किया वह यह कि किसी एक भाषा में समान रूप से सभी प्रकार की कविताओं को ग्रहण करने की क्षमता नहीं होती. ऐसा भी हो सकता है कि एक ही कवि की विभिन्न कविताओं में से कुछ कविताओं का अनुवाद संभव हो और कुछ का नहीं. उदाहरणस्वरूप, गुंटर ग्रास को अनुवाद करते हुए मैंने पाया कि सैटर्न जैसी उनकी कविताओं का हिंदी अनुवाद तो सहज है, किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध से जुड़े विशिष्ट अनुभवों पर केंद्रित उनकी कविताओं का अनुवाद हिंदी में उतना सहज नहीं जितना कि यूरोपीय भाषाओं में.

अनुवाद में जिस चीज ने मुझे सर्वाधिक आकृष्ट किया वह है इसका अन्वेषणात्मक पक्ष. यह सहज स्वाभाविक था कि मैंने अनुवाद के लिए वैसे कवियों को चुना जो मेरी संवेदना और सरोकारों के सर्वाधिक निकट थे. बोर्खेज़ और कवाफ़ी में मैंने जीवन और अतीत को देखने का जो तरीका पाया वह मेरे लिए भी, भारतीय इतिहास को जैसे मैं देखता हूं, उस संदर्भ में प्रासंगिक जान पड़ा. मैं गुन्नार एकलॉफ और पाब्लो नेरुदा के नाम भी जोड़ना चाहता, जिनका मैं प्रशंसक रहा हूं, लेकिन उनका अनुवाद करना मुझे कभी सहज नहीं लगा. कविता अपना शिल्प अनेक स्रोतों से ग्रहण करती है, मेरी कविताओं के संदर्भ में भी ऐसा ही रहा है--जिन कवियों का अनुवाद मैंने किया है वे इन स्रोतों में से केवल एक स्रोत हैं. पचास और साठ के दशक में विश्व साहित्य पर मार्क्सवाद का जबर्दस्त प्रभाव रहा. जमीनी यथार्थ, आम गरीबी और शोषण के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समाधान के प्रति मार्क्सवाद के प्रबल आग्रह से आम आदमी की समस्याओं की ओर चिर-अपेक्षित ध्यान आकृष्ट हुआ. इसने लोगों में एक उम्मीद को जन्म दिया कि उनके दुख और संताप का शमन प्रभावी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कार्रवाई से संभव है--यह महसूस किया जाने लगा कि महान आदर्शवादी स्वप्न अब उनकी पहुंच से दूर नहीं है. लेकिन बहुत जल्द ही स्वयं मार्क्सवादी राजनीति के भीतर के अंतर्विरोध उभरकर सामने आने लगे, और राजकीय नियंत्रण के नाम पर फासीवादी प्रवृत्तियां--जैसा कि मार्क्सवाद के सोवियत और चीनी मॉडल में हमें देखने को मिला--उन्हीं लोगों का शोषण करती प्रतीत हुईं जिन्हें मुक्त करने का संकल्प उसने लिया था. जल्द ही, एक रूपांतरित मार्क्सवाद--ज्यादा उदार और लोकतांत्रिक--अस्तित्व में आ चुका प्रतीत होता है और जिसने आज लोगों के ज़ेहन में एक जगह बना रखी है. मार्क्सवाद के हिंस्र और युद्धोन्मुख संस्करण की अपेक्षा इसका ज्यादा पसंदीदा यह समाजवादी मॉडल ही मेरे लेखन में भी अंतत: बना रहा है.

गांधी के दर्शन में मुझे एक सक्रिय नैतिक क्रांति दिखाई देती है. बुद्ध के विश्व-दर्शन और गांधीवादी विचार-व्यवहार में काफी समानताएं हैं. क्रांति के हिंसक साधन अनगढ़ भावोत्तेजनाओं के ख़ूनी विस्फोट हैं: अहिंसक क्रांति एक अटल और दृढ़ नैतिक बल की मांग करती है--और इसका सर्वोत्तम दृष्टांत हमें ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध गांधी के प्रतिरोध में देखने को मिलता है. बौद्ध दर्शन, जैसा कि मेरी कविताओं में आप पाएंगे, आस्था के कारण उतना नहीं, जितना कि लंबे समय से स्वयं को अस्तित्व में बनाए रखने के कारण मुझे आकृष्ट करता है. इसके अस्तित्व की गहरी जड़ें बीहड़ संयम और समायोजन की इसकी क्षमता में निहित है, न कि इसकी रूढ़िवादी प्रकृति में. भारत और मध्य एशिया में विकसित और संविर्द्धत बौद्ध दर्शन के विभिन्न संप्रदायों पर यदि एक सरसरी निगाह दौड़ाई जाए तो हमें करुणा और संवेदना के इस दर्शन में एक अद्भुत लचीलापन देखने को मिलेगा. मानवतावाद वह विराट विंदु है जहां मानव कल्याण से जुड़ी तमाम विचार-धाराएं आकर मिलती हैं, और अपनी कविताओं में मैंने इस विंदु का हमेशा ध्यान रखा है.

अ. सु. : कविता के अलावा, अन्य विधाओं में भी आपकी रुचि रही है. एक कवि के रूप में आपकी मूल विधा के साथ आपकी ये अन्य अभिरुचियां किस तरह पेश आती हैं?

कुं. ना. : मैं आरंभ से ही कविता के साथ-साथ कहानियां, साहित्यालोचना, फिल्म समीक्षा तथा निबंध लिखता रहा हूं. अक्सर विषय ही विधाओं का चयन कर लेते हैं. सिनेमा, नाटक, संगीत और कला का गहरा रिश्ता मेरी काव्य-संवेदना से है, लेकिन वे मेरी काव्यानुभूत दुनिया के विस्तार नहीं हैं, बल्कि इस दुनिया--जिसमें हम रहते हैं--से जुड़े मेरे अनुभवों और मेरे विचारों के विस्तार हैं. इनमें बदलाव आते रहते हैं और मेरी कविता अक्सर इन बदलावों से नई स्फूर्ति और ऊर्जा प्राप्त करती है.

अ. सु. : आपकी राय में वे कौन-सी चुनौतियां हैं जिनसे आज का कवि रू-ब-रू है? समकालीन हिंदी कवि के सामने क्या कोई विशेष चुनौतियां भी हैं?

कुं. ना. : किसी महान विचारधारा का पतन अपने पीछे एक विराट शून्य छोड़ जाता है. आधी सदी से अधिक समय से हिंदी रचनाशीलता का एक अच्छा-खासा हिस्सा मार्क्सवादी तथा आधुनिकतावादी सिद्धांतों से प्राण-शक्ति लेता रहा. विगत 15-20 वर्षों के दरमियान इस स्थिति मे आमूल परिवर्तन हुआ है. आज की तारीख में हम उत्तर-मार्क्सवादी व उत्तर-आधुनिकतावादी दुनिया में रह रहे हैं, जहां हम बाजार के अर्थतंत्र और वैश्वीकरण से पैदा हुई नई चुनौतियों से दो-चार हैं. भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जहां गरीबी, निरक्षरता, प्रदूषण और भ्रष्टाचार आज भी समाज में व्याप्त हैं, नए बदलावों ने आशाओं से अधिक चुनौतियां ही पैदा की हैं. हिंदी साहित्य सामान्यत: इन समस्याओं के प्रति सजग है. लेकिन इसकी प्रतिक्रिया अक्सर हड़बड़ी में लिखी गई अखबारी लेखन-सी प्रतीत होती है, न कि आत्म-मंथन से पैदा हुई कोई चीज. ऐसा संभवत: इसलिए है कि ये समस्याएं हमारे जीवन की सतह पर घटित हो रहे तेज बदलावों से जुड़ी हैं, न कि उन मूल्यों से जिनकी जड़ें व्यक्ति की सांस्कृतिक, कलात्मक और मानवीय अनुभूतियों की गहराइयों तक जाती हैं. दोनों ही प्रकार के जीवन से जुड़ी कविताएं एक जटिल संरचना में अभिव्यक्त होती हैं जिसे सहज रूप में परिभाषित या व्याख्यायित कर पाना संभव नहीं है. जीवन की सामान्यीकृत व्याख्याओं से कहीं अधिक काव्यात्मकता मुझे जीवन और साहित्य की विविधताओं और जटिलताओं में मिली है.

इसमें भी कोई संदेह नहीं कि जातीय अलगाव, सांप्रदायिक हिंसा, रूढ़िवादिता तथा आतंकवाद ने आज हर सही सोच वाले व्यक्ति के अंत:करण को झकझोर कर रख दिया है. इनमें से कई समस्याओं की जड़ें आज की भारतीय राजनीति में हैं. वर्चस्ववादी भ्रष्ट राजनीति और हाशिए से उठती साहित्य की आवाज़ के बीच का असहज रिश्ता उन कई समस्याओं में से एक है जिनके कारण हमारे देश की मानवतावादी संस्कृति का क्षरण हो रहा है. इसे मैं आज हिंदी कविता के सामने खड़ी एक अति विशिष्ट समस्या के रूप में देखता हूं.

अ. सु. : बोर्खेज़ का कथन है `हर लेखक अपने पूर्ववर्ती लेखकों को रचता है.´ आपकी नजर में वे कौन से लेखक हैं जिन्हें आप अपने पूर्ववर्ती मानते हैं या जो आपकी सृजन-यात्रा में उल्लेखनीय रहे हैं?

कुं. ना. : महान कृतियों--जिन्हें हम पढ़ते हैं, हमारे ऊपर पड़ने वाले प्रभावों, पूर्ववर्ती लेखकों--आदि के साथ हमारे रिश्ते शायद ही कभी चिर-स्थायी या अटल होते हैं--मेरे मामले में तो बिलकुल ही नहीं. समय के साथ, जैसे-जैसे कवि का विकास होता है वे बदलते रहते हैं. जब हम किसी वैसे पूर्ववर्ती विशिष्ट साहित्यकार को पुन: पढ़ते हैं जो एक समय में हमारे लिए एक महान साहित्यकार रहे थे, तो उनके साथ हमारा रिश्ता या हमारे ऊपर उनका प्रभाव वही नहीं रहता जो उस समय था. एक विकासवान लेखक की संवेदनाएं तथा स्वयं के बारे में और अपने समय के बारे में उसकी अपनी समझ यह निर्धारित करती हैं कि कोई खास लेखक, कवि या कृति उसकी रचनात्मक प्रवृत्तियों को किस तरह प्रभावित करेगी. मैं समझता हूं कि बोर्खेज़ का तात्पर्य यही था जब उसने कहा कि `हर लेखक अपने पूर्ववर्ती लेखकों को रचता है´. मैंने पहली बार महाभारत तब पढ़ी जब मैं 15 या 16 वर्ष का था. युद्ध के अद्भुत दृश्यों से मैं अभिभूत था. इसमें भरपूर नाटकीयता थी. जब मैं बड़ा हुआ तो महाभारत को कई बार पुन: पढ़ा, लेकिन उन्हीं आकर्षणों के कारण नहीं. एक लंबे समय तक भागवत गीता से मेरी सोच और कल्पना मुग्ध रही. लेकिन अब, हो सकता है कि शांतिपर्वम् मुझे ज्यादा आकिर्षत करती हो. बाद के दिनों में, भारतीय क्लासिकी लेखकों में, उदाहरण के लिए, कबीर ने मुझे अपने सामाजिक और रहस्यवादी सरोकारों के कारण, और गालिब ने अपने उदात्त शिल्प तथा मानवीय समझ की गहराई के कारण प्रभावित किया. इन महान कृतियों के साथ मेरा सक्रिय और गतिशील रिश्ता मुझे अत्यंत प्रिय है--रचनात्मक स्तर पर यह मेरे लिए ज्यादा समृद्धिकारक रहा है.

अ. सु. : समकालीन हिंदी कविता की प्रवृत्तियों या धाराओं को लेकर आपकी प्रतिक्रिया क्या रही है?

कुं. ना. : समकालीन हिंदी कविता की प्रवृत्तियों और प्रभावों को लेकर मेरी प्रतिक्रिया उदासीन रही है, कभी-कभी तो नकारात्मक भी जब कोई आंदोलन अत्यंत हठधर्मी हो गया. कविता स्वभावत: एक स्वायत्त कला है, यह किन्हीं अवरोधों या शासनादेशों को स्वीकार नहीं करती. मैं लगभग आधी सदी से कविता लिख रहा हूं. इस दरमियान मैं आधे दर्जन से अधिक साहित्यिक आंदोलनों की शुरुआत और अंत का साक्षी रही हूं. इन सब से जो जीवित बचा रहा वह उदात्त कविता है, न कि इसके आस-पास मंडराता कोलाहल. दरअसल, किसी प्रवृत्ति को नाम देने के पीछे कवि से कहीं अधिक सक्रिय आलोचक होते हैं, और जो नाम किसी सच्चे कवि के लिए शायद ही कोई मायने रखता हो. हिंदी कविता में, इसी तरह छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता आदि जैसे नाम अस्तित्व में आए, लेकिन अच्छी कविता सदैव इन नामकरणों से अपेक्षाकृत उदासीन ही रही. कई बार तो, कविता के विकास में इनकी भूमिका प्रतिगामी रही. किसी आंदोलन ने जब किसी खास प्रकार की कविता या कवि को एक आदर्श नमूना के तौर पर तरजीह दिया तो इससे नकल को प्रोत्साहन मिला, और मौलिकता अवरुद्ध एवं उपेक्षित हुई.

आधुनिकतावादी आंदोलन की शुरुआत टी. एस. इलियट की कविता एवं उनकी साहित्यिक आलोचना से होती है. सामान्यत:, इसका तात्पर्य था काव्य-शिल्प, परंपरा, संस्कृति, अतीत, प्रयोगशीलता आदि को एक नए अंदाज में देखना. हिंदी कविता पर आधुनिकीकरण के प्रभाव को अज्ञेय द्वारा संपादित चार सप्तकों (समकालीन कवियों की कविताओं के चार संग्रह--प्रत्येक में शामिल सात कवि जो 1943 और उसके बाद कविता में सक्रिय रहे) में देखा जा सकता है. देखा जाए तो मार्क्सवाद, आधुनिकतावाद, प्रयोगवाद, नव-वाद जैसी धाराएं इस काल-खंड की कविताओं में परस्पर एक-दूसरे से आच्छादित हैं, जैसा कि वे आज भी हैं. तीसरा सप्तक में शामिल एक कवि के रूप में, मुझे जल्द ही यह महसूस हुआ कि कविता को इस तरह वर्गीकृत नहीं किया जा सकता. बार-बार यह आलाचकों द्वारा गिनाई गई अपनी विशेषताओं एवं कर्तव्यों की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है. यह जरूर महसूस होता है कि समकालीन हिंदी कविता, संदर्भ और विषयवस्तु के स्तर पर आज ज्यादा बड़ी और ज्यादा स्वाधीन दुनिया में सांस ले रही है.
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पूर्वग्रह (जनवरी-मार्च, २००९) से साभार

8 comments:

Ranjana Khare said...

Kunwarji ko padhna atyant sukhad laga. Yah to bahut baad mein dhyan gaya ki yah mool angrezi se anuvad tha. Aashwast hui ki anuvad mein bhi itna sahaj aur svabhavik hua ja sakta hai. Itni achchi samagri padhvane ke liye bahut bahut aabhari hoon. Apki yah patrika shuru se hi bahut gambhir rahi hai.

Ranjana Khare, Varanasi

सुभाष नीरव said...

यदि आप इस साक्षात्कार पर से "अंग्रेजी से अनुवाद" वाली सूचना हटा दें तो पता ही न चले कि यह अनुवाद है। इस अनुवाद की खासियत यही है कि पढ़ते समय यही लगता रहा कि यह साक्षात्कार हिन्दी में लिया गया है। योगेन्द्र जी आपकी इस प्रतिभा को नमन करता हूँ। यह तो थी अनुवाद की बात। कुंवर नारायण जी की कविताओं ने सदैव प्रभावित किया है। उनको पढ़वा एक सुखद अनुभव देता है। साक्षात्कार में उनके द्वारा दिए गए उत्तर एक गम्भीर रचनाकार की सोच और उनके सरोकारों की ओर भी इशारा करते हैं। "शब्द सृजन" के माध्यम से आपने इसे प्रिंट मीडिया से उठाकर विश्वभर के पाठकों को सहज उपलब्ध कराकर बहुत अच्छा कार्य किया है।

वर्तिका नंदा said...

योगेंद्र जी,
शब्द सृजन के लिए बधाई। इससे गुजरते हुए एक सुखद अनुभूति हुई। क्या इसके लिए हम भी कविताएं भेज सकते हैं?

शुभकामनाएं।

वर्तिका नन्दा

Arun Aditya said...

अच्छा इंटरव्यू है। और अनुवाद भी अच्छा है।

योगेंद्र कृष्णा said...

आप सब को साक्षात्कार पसंद आया…और अनुवाद भी… बहुत-बहुत आभार।

इला said...

योगेन्द जी,
इन लम्बे साक्षात्कारों के साथ यदि कवि की कुछ कविताएँ होतीं तो बेहतर होता । अंतत: लेखक/कवि की पहचान उसकी रचना ही होती है।
इला

Anonymous said...

Samkalin kavita ke bare men kunwar ji ki satik tippani swagat yogya hai. Es sakshatkar ke jarie bahut kuchh mahtavpurna janane samghne ko mila,aabhari hun--aapka anuvad bhi kabiletaarif hai--ranjana srivastava, Siliguri

रूपसिंह चन्देल said...

Arundhati ji ke saath Kunwar ji ki mahatvapurna baat-chit ko English se anuvad karake prakashit karane ke liye badhai. Aapne ullekhaniya kaarya kiya hai.

Chandel

 
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