Thursday 8 January 2009

हाल-फिलहाल : 10



मंगलेश डबराल

इस स्तंभ के अंतर्गत अभी तक आप अशोक वाजपेयी, उदय प्रकाश, लीलाधर जगूड़ी, पुष्पिता, आलोक श्रीवास्तव, कृष्ण बलदेव वैद, गीताश्री, कुँवर नारायण एवं प्रभाकर श्रोत्रिय की हाल में प्रकाशित पुस्तकों पर आलोचक-समीक्षक डॉ. ओम निश्चल की टिप्पणियाँ पढ़ चुके हैं।

इस बार प्रस्तुत है हिंदी के सुपरिचित कवि मंगलेश डबराल की ताजा पुस्तक कवि का अकेलापन पर ओम निश्चल का समीक्षात्मक आलेख। गद्य कवियों का निकष है। हमारे समय के अंत्यंत तेजस्वी कवियों ने जब भी अपने समय को गद्य में उपनिबद्ध किया है, भाषा की गतिमयता ने नई करवट ली है। मंगलेश डबराल की पिछली कृतियों --एक बार आयोवा और लेखक की रोटी का आस्वाद जो लोग ले चुके हैं, उन्हें इस कृति में उनकी विवेकी कवि-दृष्टि और सर्जनात्मक समीक्षा की बेहतरीन बानगी मिलेगी।
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कवि का अकेलापन
मंगलेश डबराल
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन
7/31, अंसारी रोड
दरियागंज, नई दिल्ली
संस्करण : 2008
मूल्य : 250 रूपये
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कवि-संपर्क : मंगलेश डबराल, 326, निर्माण अपार्टमेंट, मयूर विहार, फेज-1, दिल्ली
फोन-011-22711805, मोबाइल-09910402459
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आरोह-अवरोह में विन्यस्त गद्य

ओम निश्चल

गद्य को कवियों की कसौटी माना गया है। इस दृष्टि से आज के अनेक वरिष्ठ कवियों के पास लिखने का जो बेहतरीन हुनर है, उसकी एक मिसाल मंगलेश डबराल की डायरियाँ, टिप्पणियाँ और समकालीन कविता, समाज, संस्कृति, कला और फिल्म पर लिखे विमर्श हैं। आज भी प्राय: कवि-कुटुम्ब यह मानता है कि अपने समय के रचना संसार पर बेहतरीन संवेदना और समझ के साथ लिखने वाले कवि ही होते हैं। एक बार आयोवा और लेखक की रोटी के बाद प्रकाशित कवि का अकेलापन मंगलेश डबराल को फिर एक बार अपने समकालीनों में गद्य-रचना के शिखर पर पहुँचा देता है।

आलोचना के स्पंदनहीन, जड़ीभूत और संस्कारित समझ के कोलाहल के बीच जब भी कवियों का लिखा गद्य सामने आया है, उसने रूढ. होती मूल्यांकन प्रविधियों, यथास्थितिशीलता में साँस लेती रचनाकारिता को सिरे से विचलित और विस्थापित किया है। केदारनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, लीलाधर मंडलोई, अरुण कमल, उदय प्रकाश, विजय कुमार, देवीप्रसाद मिश्र और यतीन्द्र मिश्र की गद्य रचनाओं में जहाँ संवेदना की सबसे सुकोमल दुनिया खुलती नजर आती है, वहीं अपने समय की रचनाशीलता की अलक्षित बारीकियाँ भी अपने पंख खोल देती हैं। मंगलेश डबराल जिस संवेदना और समझ के कवि हैं, वे जीवन और समाज को सतही तौर पर न देख कर उसके चौतरफ होते बदलावों को विभिन्न कला रूपों के आलोक में देखते हैं और अचरज नहीं कि उनके देखने का ढंग केवल एक कवि जैसा नहीं, एक सु्चिंतित, सुपठित विमर्शकार जैसा है। उनकी गद्य-संरचना में संगीत का आरोह-अवरोह धड़कता है।

पुस्तक की शुरुआत चंद्रकुँवर बर्त्वाल की वसीयत से हुई है। अकालकवलित बर्त्वाल की कविताओं पर लोगों की दृष्टि लगभग नहीं गयी है। किन्तु अट्ठाईस की वय में कविता में वाक् और अर्थ का जैसा समन्वय उनमें मिलता है, वैसा कम देखने को मिलता है। दुख ने ही मुझको प्रकाश का देश दिखाया जैसी पंक्ति लिख कर बर्त्वाल ने अपनी सधी लेखनी का परिचय दिया था। मंगलेश डबराल पर जिन दो कवियों की कविता का गहरा प्रभाव दिखता है, वे शमशेर और रघुवीर सहाय हैं। मंगलेश अनुभूति की शुद्धता की सीख शमशेर से लेते हैं तो संकटों से घिरे मनुष्य की वेदना और विडंबनाओं से ग्रस्त समाज की बारीकियों को उकेरने की प्रविधि रघुवीर सहाय से हासिल करते हैं। यदि संक्षेप में शमशेर और रघुवीर सहाय का मिजाज समझना हो तो मंगलेश के इन निबंधों में उसकी मुकम्मल पहचान मिलेगी। मंगलेश शमशेर को विचार के सँकरे बना दिए गए साँचों में न अँटने वाला कवि मानते हैं। तेरी खोपड़ी के अंदर शीर्षक नागार्जुन की कविता को मंगलेश इसीलिए महत्व देते जान पड़ते हैं क्योंकि सांप्रदायिकता के उभार के दिनों में इस कविता का पात्र कल्लू मुसलमान हिंदुओं की घृणा से बचने के लिए जीविका के निमित्त अपना नाम और चोला बिल्कुल बदल लेता है। नागार्जुन इस बहाने समाज में जड़ जमाती धार्मिक घृणा का अनावरण करते हैं।

यहाँ कुँवर नारायण, लीलाधर जगूड़ी, आलोकधन्वा, नरेश सक्सेना, सुदीप बनर्जी, असद जैदी, नरेन्द्र जैन, वीरेन डंगवाल, विजय कुमार, कात्यायनी और ऋतुराज की कविताओं पर मंगलेश की टिप्पणियाँ हैं तो साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलने के अवसर पर दिया गया वक्तव्य--कवि का अकेलापन भी, जो इस पुस्तक का एक मार्मिक निबंध है। कुँवर नारायण पर लिखते हुए मंगलेश आश्चर्यजनक ढंग से कुँवर नारायण और रघुवीर सहाय को आमने सामने रख कर देखते हैं। मंगलेश के शब्दों में, रघुवीर सहाय साहित्य का उद्देश्य उपलब्ध यथार्थ के सामने एक दूसरे और ज्यादा मानवीय यथार्थ की ओर संकेत करना मानते थे तो कुँवर नारायण यथार्थ के बरक्स एक आदर्श की, एक उदात्त की स्थापना करते, वास्तविकता के सामने जैसे कल्पना का एक आईना रखते हैं। किन्तु जगूड़ी पर लिखते हुए मंगलेश डाक्यूमेंटेशन की-सी प्रविधि अपनाते जान पड़ते हैं तथा कविता को अनुभव के जिन सुदूर इलाकों में जगूड़ी ले गए हैं, उनके कवि-सामर्थ्य के आगे मंगलेश की टिप्पणी नाकाफी जान पड़ती है। हाँ, मंगलेश का यह कहना तोष देता है कि वे संसार की प्रत्येक गतिविधि और हलचल और कंपन को भाषा के अनुभव में बदलने का उपक्रम करते हैं और दूर तक उसका पीछा करते हैं। कदाचित मंगलेश जगूड़ी के नवीनतम संग्रह खबर का मुँह विज्ञापन से ढका है पढ़ने के बाद यह टिप्पणी लिखते तो निश्चय ही वे जगूड़ी के मुरीद हो उठते। तब जगूड़ी घबराये हुए शब्द में अपनी कविता की जिन विशेषताओं का स्मरण करते हैं--यानी अनुभव में तात्कालिक, स्वभाव में तत्वदर्शी, कथ्य में सबकी आवाज लिए, विन्यास में सर्वाधिक नाटकीय...इत्यादि इनका विरल संगम इस संग्रह में वे लक्ष्य कर पाते। ऋतुराज पर उनका कहना सटीक है कि अन्याय, क्रूरता, घृणा और असत्य के जटिल लीलालोक को चीरती उनकी कविताएँ उस जीवन की कामना करती हैं जो ज्यादा सरल, मानवीय और सच हो। आलोक धन्वा में वे रेटारिक की खूबियाँ लोकेट करते हैं तो नरेश सक्सेना की कविता में उन्हें एक नैतिक मनुश्य हलचल करता साफ दिखता है। संप्रेषणीयता का वैसा कोई संकट नरेश के पास नहीं है जो बौद्धिक माने जाने वाले अन्य कवियों में। अलग अलग कारणों से मंगलेश असद जैदी और नरेन्द्र जैन की कविताओं को महत्व देते हैं। असद की कविता में उन्हें एक दलित हास्य जैसा तत्व सक्रिय दिखता है तो नरेन्द्र जैन में फैली उदासी हमेशा एक संभावना का हाथ थामे हुए दिखती है। वे नरेन्द्र जैन की कविताओं में अनुस्यूत उस संगीत तत्व की ओर भी ध्यान दिलाते हैं जिसकी आमद कविताओं में धीरे धीरे कम होती जा रही है।

वीरेन डंगवाल की कविता का ठीहा न केवल मंगलेश को बल्कि आलोक धन्वा को भी बेहद प्रिय है। वीरेन की कविता का जिक्र करते हुए दोनों ही कवि कदाचित भावुक हो उठें। दुश्चक्र में स्रष्टा से वीरेन ने अपनी कविता की एक अलग प्रजाति निर्मित की है जहाँ भाषा की देशज भंगिमाएँ आधुनिकता बोध से टकराती हैं। वीरेन के सान्निध्य में रहते हुए मंगलेश ने उनके कवि-स्वभाव की जैसी पड़ताल की है वैसी किसी अन्य के द्वारा संभव नहीं। मंगलेश ने अपनी काव्यरुचि के खाने में न अँटने वाले विजय कुमार और कात्यायनी को भी सलीके से आकलित किया है। और यहाँ असद जैदी की कविता सामान की तलाश पर मंगलेश की वह टिप्पणी भी शामिल है जिस पर हाल ही में काफी अप्रिय ब्लागबाजी हुई है। देखा जाए तो मंगलेश का मन विचार-बोझिल कविता पर नहीं, क्लासिकी की गतिमयता से भरी कविताओं पर मुग्ध होता है। संवेदना के कोमल आघात से जन्म लेने वाली कविता उन्हें प्रिय लगती है।

नेरुदा, ब्रेख्त, कवाफी, आक्तेवियो पाज की कविताओं से गहरे बावस्ता मंगलेश का वक्तव्य कवि का अकेलापन कवि का जैसे कि एक कन्फेशन हो। लीक से अलग चलने वाले कवि का अकेलापन किस तरह उत्तरोत्तर सघन हुआ है, इसकी तफसील से वे इस आलेख में व्याख्या करते हैं। कवि का अकेलापन उन तमाम दबावों, संतापों, उदासियों से घिरे कवि के अंत:करण का खुलासा है जिनसे होकर कवि गुजर रहा है। वह प्राकृतिक आपदा के मारे लोगों को दी जाने वाली राहत को हिंदू राहत, मुसलमान राहत और दलित राहत जैसे वर्गीकरणों में तकसीम करने के सियासी खेल से आहत है। मंगलेश गुजरात त्रासदी से इतने आहत दिखते हैं कि उनका कहना है कि सत्ता-राजनीति अपनी कमतर संवेदनशीलता के चलते इस तरह की ग्लानियों से मुक्त कर लेती है, किन्तु कविता संताप और पश्चात्ताप की गठरी अपने सर से नहीं उतार सकती। यह आलेख अपने समय के ऐसे ही क्रूरतम वृत्तांतों, राजनीतिक दावपेंच से जन्म लेते राहत-पुनर्वास के दलगत वर्गीकरणों, मनुष्यता को क्षुद्र प्रलोभनों के चलते लगातार शर्मसार करती स्थितियों की प्रतिक्रिया में लिखा गया शोकलेख है जिस पर यों तो भीतर से अवसाद की धुँधली परत छाई दिख सकती है किन्तु जहाँ ताकत की संरचना के बीच मिटती मनुष्यता की पहचान के बावजूद कवि का यह स्वप्न नाक में कील की तरह दमकता है कि---काश, हिंदी एक छोटी-सी भाषा होती, लोग उसे प्रेम और मनुष्यता के साथ बरतते तो उसका लेखक इतना अकेला नहीं होता। मुक्तिबोध नामक एक विराट पेड़ होता, जिस पर नागार्जुन के घने पत्ते होते और शमशेर नाम की सुंदर चिड़ियाँ उस पर बैठ कर मीठी गजल गुनगु्नातीं। यहाँ हिंदी को छोटी-सी भाषा कहने का कवि का तात्पर्य कदाचित यह है कि हिंदी थोड़े लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा होती।

हिंदी साहित्य में इन दिनों जो हड़बड़ी का माहौल है, सब कुछ थोड़े ही समय में कम संघर्ष और जद्दोजहद से पा लेने की अधीर आकांक्षा है वह दिनोदिन विरूप होती गयी है। रिक्त स्थानों की कविता में मंगलेश इसी हड़बड़ी और क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं का ग्राफ खींचते हैं--इतनी पत्रिकाएँ, इतने सारे कवि, पढ़ना कठिन, उनका नामोल्लेख तक कठिन, रोज ब रोज आते पोस्टकार्डों में लेखकों के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव---रिक्त स्थानों को भरने के लिए आतुर नई पीढ़ी, खद्योत सम कवियों की बहुतायत, लगभग एक काव्यात्मक घमासान---यह टिप्पणी इन मुद्दों पर सावधानी और विवेक के साथ गौर करती है और अफसोस करती है कि आलोचना जिसे अंबार में से बेहतर के चयन का काम करना चाहिए, अपने सामने हाथ बाँधे खड़ी कविता के अलावा और कुछ नहीं देखती। गद्य कविता नहीं में कविता में गद्य के सौंदर्य से लेकर कविता में जड़ जमाती निबंधात्मकता तक पर गौर किया गया है और इस विड़बना पर भी दृष्टिपात किया गया है कि आज सुंदर सुगठित गद्य दुर्लभ होता जा रहा है।

कवि का अकेलापन में केवल कवि का एकालाप ही नहीं है, पुस्तकों का विलाप भी ध्वनित होता है। समाज में लगातार कम होते जा रहे किताबों के स्पेस और दूसरी तरफ शवासन में पुस्तकालयों में निश्चेष्ट और उपेक्षित पड़ी किताबें---मंगलेश ने इस प्रकरण पर पुस्तक का रुदन लेख लिखा है तो हिंदी सेवा के इस छद्म पर ज्ञानेन्द्रपति ने एक कविता में कड़ी फटकार लगाई है। खेद है कि किताबें हमारी आदतों का हिस्सा नहीं बन पा रही हैं। उनके लिए आज हमारी शेल्फ में जगह नहीं है। पुस्तक में कई आलेख कला, संस्कृति और फिल्म पर हैं। रामकुमार की कला्कृति पृथ्वी, ब्रेष्ट के नाटक लाइफ आफ गैलीलियो, संजय काक की वृत्त फिल्म जश्ने आजादी, बाजार के बीच खड़ी कला, सौंदर्य के बाजारवादी यथार्थ और प्रसिद्धि के उद्योग में बदलने के वृत्तांत को लेकर मंगलेश ने संजीदा टिप्पणियाँ की हैं। किन्तु इस पुस्तक का बेहद निजी कोना उनके डायरी अंश हैं जो मरना भी रहना है शीर्षक से छपे हैं। जून 2001 से नवम्बर 2005 तक के चुनिंदा डायरी अंशों से मंगलेश के भीतर निवास करते संवेदी कवि की अनेक छवियाँ मिलती हैं तो उनके नागरिक मन को आहत करने वाले अनेक प्रसंग भी। मंगलेश दिल्ली में बढ़ते कलावा कल्चर, एक शक्की पति की कवयित्री पत्नी की पीड़ा, तात्कालिक अमरता के लिए जोड़तोड़ करते हिंदी समाज, दिवंगत कवियों, मित्रों पर लिखी अपनी कविताओं, राजनैतिक कविता, पेज थ्री संस्कृति, रघुवीर सहाय, साहित्यिक हल्के में चलन में आती नई शब्दावलियों और लोकार्पण युगीन माहौल पर टिप्पणियाँ करते हैं। मंगलेश दर्ज करते हैं कि जहां प्राय: नेता, इंजीनियर, एमबीए, नौकरशाह राज्य, सत्ता, बाजार और ग्लोबलाइजेशन के विरोध में नहीं जाते, सिर्फ कवि-लेखक-बुद्धिजीवी हैं जो सत्ताओं के प्रतिकूल सोचते हैं। वरवर राव जैसे कवि हमारे समक्ष एक मिसाल हैं जो सत्ता के आगे झुके नहीं, भले ही उन्हें टाडा और अन्य आरोपों में बरसों जेल की सीखचों में बंद रहना पड़ा। कहना न होगा कि कवि का अकेलापन अपनी व्यंजकता में समाज में रह रहे उन तमाम बौद्धिकों और संवेदनशील व्यक्तियों की बेचारगी की ओर भी इंगित करता है जिन्हें बाजार, हिंसा, राजनीति, धार्मिक बर्बरता और वर्चस्ववादी ताकतों ने अकेला कर दिया है।
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संपर्क : डॉ.ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059,
मोबाईल: 09955774115 ईमेल: omnishchal@yahoo.co.in


2 comments:

Kumar Navin said...

Manglesh ki nayi gadya pustak par aalekh dekha. Unki tippaniyan yatr-tatr padhta raha hoon. Aalekh poori pustak padhne ke liye prerit karta hai.

Arvind Mishra said...

मंगलेश जी की इस नयी कृति से परिचय कराने के लिए आभार !

 
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