Sunday 21 December 2008

हाल-फिलहाल : 9

प्रभाकर श्रोत्रिय
हाल-फिलहाल स्तंभ के अंतर्गत आप साहित्य की दुनिया में नये प्रकाशनों से रू-ब-रू हैं। हमारे इस स्तंभ में अबतक आप अशोक वाजपेयी, उदयप्रकाश, लीलाधर जगूड़ी, पुष्पिता, गीताश्री, कुंवर नारायण, कृष्ण बलदेव वैद एवं आलोक श्रीवास्तव की पुस्तकों पर ओम निश्चल की टिप्पणी पढ चुके हैं। इस श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत है हमारे समय के एक महत्वपूर्ण आलोचक डॉ प्रभाकर श्रोत्रिय की पुस्तक कवि-परंपरा

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कवि-परम्परा : तुलसी से त्रिलोचन
प्रभाकर श्रोत्रिय
भारतीय ज्ञानपीठ, लोदी रोड,
नई दिल्ली-3
कीमत रू 195 रुपये
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उदात्त और उच्चादर्शों की बाट जोहती आलोचना

ओम निश्चल

आलोचकों से भरी इस दुनिया में कम से कम हिंदी में कुछ इने-गिने ही नाम ऐसे हैं जिनके यहाँ भाषा अपनी सतत् साधना से गुजरती हुई अपनी प्रकृति में उत्सवता का आभास कराती है। प्रभाकर श्रोत्रिय उनमें से एक हैं, जिनका लिखना, बोलना, मुस्कराना और यहाँ तक कि फटकारना भी एक लय से आबद्ध होता है। एक जमाना था, उत्तरप्रदेश को लोग हिंदी का ह्वदय प्रदेश कहा करते थे, किन्तु प्रभाकर श्रोत्रिय के गद्य का प्रभामंडल इस धारणा को ध्वस्त करता हुआ अपने मालवी ठाठ के प्रति अभिभूत कर लेता है। मालवा की माटी का संस्कार ही ऐसा है कि वह साहित्य को एक अल्पना की तरह रचती है। गिरिजा कुमार माथुर के गीतों की माधवता देखें या नरेश मेहता के रचना संसार में पैठी वैष्णवता, अखबारी दुनिया में राहुल बारपुते, राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी की भाषा का वैभव अब पत्रकारिता के सरसब्ज इलाके से गायब होता जा रहा है। अकारण नहीं कि मालवा के पर्यावरण में पल्लवित प्रभाकर श्रोत्रिय की साहित्यिक मेधा शुरु से ही सकारात्मक के उन्मेष को पहचानने, स्थापित करने और उसे अग्रसर करने के मुहिम में लगी रही है।

हाल में प्रकाशित कवि-परम्परा:तुलसी से त्रिलोचन शीर्षक आलोचनात्मक कृति के जरिए प्रभाकर श्रोत्रिय ने फिर एक बार अपनी आलोचना के उपकरणों और मानदंडों को हिंदी कविता के सुदूर हित में व्यवह्वत और विन्यस्त किया है। वे कविता के उन हितैषियों में हैं, जिनके पास पहुँच कर कविता आश्वस्ति और गौरव के भाव से भर उठती है। यह उनके भीतर रसज्ञ आलोचक का ही निवास है कि वह सुदूर अंचलों तक से आती हुई कविता की पुकार सुन पाता है और अपने कवित-विवेक से कवितानुशीलन को अपने साहित्यिक कार्यभार का अनिवार्य अनुषंग बनाता है। यही कारण है कि श्रोत्रिय की आलोचना क्षिद्रान्वेषी न होकर मूल्यान्वेषी है---वह रचना के उदात्त की बाट जोहती और प्राय: रचना में गुँथे उच्चाशयों को ही चुनती-बीनती आई है।

रचना एक यातना है, कालयात्री है कविता तथा संवाद के बाद कवि-परम्परा:तुलसी से त्रिलोचन प्रभाकर श्रोत्रिय के आलोचना कर्म का एक बड़ा पड़ाव है। यद्यपि यह हिंदी के एक बड़े रचना फलक का विवेचन है सो कवि-परम्परा की तमाम कड़ियाँ यहाँ छूट भी गयी हैं, परन्तु श्रोत्रिय के ही शब्दों में, यह इतिहास नहीं, एक चयन है। प्रभाकर श्रोत्रिय आलोचकों की उस कोटि में आते हैं,जिनके बौद्धिक निर्माण में देश की सांस्‍कृतिक और भारतीय मनीषा का गहरा योगदान है। वे हर चीज समग्रता में देखने के अभ्यस्त हैं । परम्परा को फलाँगते हुए समकालीनता में उछल-कूद कर अपने गौरव का ढिंढोरा पीटना उनका मकसद नहीं रहा। एक पौराणिक की तरह सदियों से पल्लवित विकसित मूल्यों की खोज के लिए यदि वे भक्ति परंपरा के बड़े कवियों--तुलसी, मीरा, सूर, और कबीर तक जाते हैं तो एक आधुनिक की तरह वे प्रसाद, निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, सुमन, शमशेर, भवानी प्रसाद मिश्र, नरेश मेहता और त्रिलोचन की समकालीनता से संवाद करते हैं।

प्राचीन कवियों के रचना-संसार में नवजागरण के मूल्य तलाशते हुए श्रोत्रिय तत्कालीन समय और सर्जनात्मक आचरण का दृश्यालेख लिखते हैं तो आधुनिक समाज और जीवन में उसकी प्रासंगिकता और उसके सार्थक उपयोग की मनोभूमि भी तलाशते हैं। तुलसी के अध्ययन से समारंभ इस कृति से वे परोक्षत: यह भी उद्घाटित करते हैं कि तुलसी को आचार्य रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा तथा कबीर को हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे दिग्गजों ने अपना लक्ष्य कवि बनाया है। इसलिए हिंदी कविता को समग्रता में देखने के लिए तुलसी और कबीर जैसे जनकवियों का अध्ययन आवश्यक है। यह उस अनवरत एक कवित विवेक और आँखिन देखी की सैद्धांतिकी से परिचालित है, जिसे तुलसी और कबीर बार-बार अपनी रचना के केंद्र में रखते हैं।

भक्ति परंपरा के कवियों तुलसी, कबीर, सूरदास और मीरा का अनुशीलन करते हुए श्रोत्रिय को जहॉं तुलसी के साहित्य में सब कँह हित दिखाई देता है, वहीं कबीर में तोड़ने और रचने की समझ। कबीर ने समाज को निर्भयता का संदेश दिया तो मीरा ने भी कृष्ण से समाजवर्जित प्रेम कर जताया कि प्रेम और भय साथ नहीं चलते। जिस तरह की क्रांतिकारिता मीरा के प्रेम में नजर आती है, उससे श्रोत्रिय उन्हें पॉंच सौ बरस की युवती का खिताब देते हैं। सूर के बारे में लिखते हुए श्रोत्रिय कहते हैं कि भक्ति की सीमा को लाँघकर सूर ने प्रेम की जिस गरिमा को स्थापित किया, उससे वह भक्ति और सामाजिक शील में बदल गया। भक्त कवियों के बाद मैथिलीशरण गुप्त को वे संभवत: पहला आधुनिक कवि मानते हैं, जिसने कविता में इतिवृत्तात्मकता को प्रश्रय दिया। यद्यपि महादेवी, पंत और निराला पर भी उन्होंने यहाँ रम कर लिखा है। किन्तु छायावादियों में प्रसाद कई कारणों से श्रोत्रिय की मनोरचना के ज्यादा अनुकूल पड़ते हैं। प्रसाद पर उन्होंने बृहद शोध किया है। प्रसाद की कविता का सौंदर्य-विन्यास उन्हें बाँधता है। निराला की शक्ति को वे राम की शक्तिपूजा में तलाशते हैं तो पंत की सुकुमार कल्पनाओं की टोह लेते हुए उनकी उपेक्षा के पीछे मौजूद कारणों की तह में भी जाते हैं।

निराला के बाद मुक्तिबोध और अज्ञेय हिंदी की दो बड़ी काव्य शक्तियॉं हैं। कहना न होगा कि मुक्तिबोध अपने विपुल और अर्थगर्भी काव्य संसार के बल पर आज भी महत्वपूर्ण हैं। नई कविता के भीतर के कल्मष को साफ करने के लिए मुक्तिबोध ने न केवल फैंटेसी तथा रहस्यवादी कवियों का-सा शिल्प अपनाया बल्कि आलोचना की तार्किक समझ के साथ नई कविता के आत्मसंघर्ष की एक नई जमीन भी तैयार की। जहॉं व्यक्तिवादी मूल्यों का कोई आधार न था। यहीं से वे धीरे-धीरे अज्ञेयवादी प्रयोगवादी राहों से अपना अलग रास्ता अख्तियार करते हैं। नई कविता में व्याप्त जड़ीभूत सौंदर्याभिरूचि के खतरों से आगाह करने वाले मुक्तिबोध ही थे। उनकी कविता को अस्तित्ववादी कहे जाने का प्रत्याख्यान करते हुए श्रोत्रिय मुक्तिबोध को कविता की शब्दावली को नए अर्थ और तेवर का सूत्रधार मानते हैं। अन्वीक्षा की कँटीली राहों से गुजरे मुक्तिबोध की कवि-छवि जहाँ उन्हें कचोटती है, अज्ञेय की कविता का आभिजात्य अपील करता है। अज्ञेय के व्यक्तिवाद की निंदा उन्हें भली नहीं लगती। व्यक्ति और समाज तथा मम और ममेतर पर समूची बहस को केंद्रित करते हुए श्रोत्रिय ने व्यक्ति की स्वाधीन सत्ता की अज्ञेयवादी विचारणा को सही ठहराया है।

प्रगतिशील कवियों में नागार्जुन एक नई परंपरा के वाहक हैं। उनके लिए कविता कोई व्यक्तिगत इकाई नहीं है, बल्कि समाज से उसका गहरा रिश्ता है। राजनीति से उसका बराबर का लेना देना है। जनता की नियति को प्रभावित करने वाली हर चीज नागार्जुन के निशाने पर रही है। प्रभाकर के शब्दों में ऐसे कवि को शास्त्र-वास्त्र या भाषा का पातिव्रत्य रास नहीं आता। नागार्जुन हर तरह की चौखट का इन्कार है। श्रोत्रिय का कहना है कि वे ज्ञान और संस्‍कृति के सार्थवाह नहीं, लोकाकांक्षा के सहचर थे। अकारण नहीं कि तारानंद वियोगी ने हाल ही में प्रकाशित अपने एक संस्मरण में नागार्जुन को तुम चिर सारथि कह कर संबोधित किया है। बिसराये न बिसरैं के केंद्र में सुमन हैं जिन्हें श्रोत्रिय ने गुराँस के फूल और काँस के फूल दोनों रूपों में देखा है। सुमन की कविता में संवेदना की बारीक बीनाई न होने की शिकायत श्रोत्रिय करते हैं फिर भी उनके पास बैठना उन्हें खुले जलाशय के पास घनी छाँह तले बैठने जैसा लगता रहा है। वे कहते हैं कि इस सिकुड़ती हुई टुच्ची दुनिया के रास्ते से चलते हुए जब हम उनके पास पहुँचते हैं तो पता चलता है कि वे सदाशयता और परदुखकातरता की कितनी दुर्लभ मूर्ति थे।

जिन कवियों में श्रोत्रिय के कवित-विवेक को विश्रांति का अनुभव होता है, उनमें अज्ञेय, शमशेर, नरेश मेहता, भवानी प्रसाद मिश्र और धर्मवीर भारती प्रमुख हैं। त्रिलोचन के कवि-व्यक्तित्व को भी श्रोत्रिय ने उचित मान दिया है। अनूठे सौष्ठव से भरी शमशेर की संवेदना-तरल कविताओं में जहॉं श्रोत्रिय को कविता की वास्तविक शक्ति नजर आती है, वहीं मार्क्‍सवादी चिंतन से संपृक्त कविताओं से उनकी वैचारिक दृढ़ता का पता चलता है। श्रोत्रिय शमशेर की काव्यकला के चरम वैशिष्ट्य की दृष्टि से अमन का राग, पिकासोई कला, टूटी हुई बिखरी हुई और कहीं बहुत दूर से सुन रहा हूँ आदि कविताओं को चिह्नित करते हैं। श्रोत्रिय के कवि चित्त में भवानी प्रसाद मिश्र की छवि भक्त कवि जैसी है। उन्हें भवानी दा की भाषा भीगी हुई लगती है, जैसे कि उसमें आधुनिकता का तीखा तेवर प्रकट करने की मुखर बेचैनी न हो। किन्तु उनकी कविता में भाषाई तराश और शिल्प के टटकेपन को वे गजब का मानते हैं। नरेश मेहता की क्लासिक उदात्तता और सौंदर्य के बनानी परिवेश पर श्रोत्रिय का आलोचक विमुग्ध दिखता है। श्रोत्रिय के शब्दों में, उन्होंने हर संग्रह में अपने नए और बदले होने का आभास दिया है। सौंदर्य की जितनी अपूर्व विवक्षा नरेश मेहता के यहाँ संभव हुई है, वह बाद के कवियों में-धर्मवीर भारती तक में नहीं दीखती, जिनकी कनुप्रिया को अनुभूति की तीव्रता के चलते श्रोत्रिय ने अंधायुग से ज्यादा मान दिया है। श्रोत्रिय कहते हैं कि अगर नरेश जी चरम तक पहुँचे हैं तो संसार को लाँघ कर नहीं, उसमें से होते हुए पहुँचे हैं। नरेश जी की उपेक्षा भले हुई पर बकौल् श्रोत्रिय वे न पराजित हुए न याचक, न उनका सर झुका न ओठ फैले। उनकी वैष्णवता के पीछे उनकी आत्मवान प्रज्ञा का योगदान है। अल्पश्रुत रामविलास शर्मा और वीरेन्द्रकुमार जैन की कविता-प्रकृति भी उन्हें मोहक लगती रही है। रंजना अरगड़े के एक सवाल में शमशेर अपनी तुलना जिस एक कवि से करते हैं, वह वीरेन्द्र कुमार जैन हैं। जैन में भाषा का जैसा अंत:संसार है, वैसा कम कवियों में दीखता है।

अनेक किंवदन्तियों के नायक त्रिलोचन को संस्मरणों में बाँधते हुए श्रोत्रिय उन्हें चलता-फिरता विश्वविद्यालय मानते हैं, जिसमें कई फैकिल्टयाँ हैं। उन्हें लगता है, त्रिलोचन को जानने के लिए शास्त्र और लोक परंपरा दोनों से जुड़ना अनिवार्य है। प्रमुखत: धरती, दिगंत, चैती और मेरा घर की कविताओं पर आधारित इस मूल्यांकन में श्रोत्रिय को त्रिलोचन में उदात्त मेधा और अनूठी प्रतिभा के मेहनतकश कवि का स्वर सुन पड़ता है जिसकी बानगी संतों की बानी में है। जहाँ भीतर ज्वाला धधकती है लेकिन बाहर केवल एक शांत तप झलकता है। बकौल श्रोत्रिय उनकी भाषा व्याकरण, अभिधा, व्यंजना और छंद के चतुष्पाद पर खड़ी दिलीप की नंदिनी है, जिसकी रक्षा में वे धनुष ताने हैं। काश श्रोत्रिय उस जनपद का कवि हूँ, ताप के ताए हुए दिन, व जीने की कला के काव्य विस्तार को भी ध्यान में रख पाते तो उनके प्रति अधिक न्याय कर पाते।

कुल मिला कर कवि परम्परा: तुलसी से त्रिलोचन पर ध्यान दें तो यह आलोचना नहीं, अनुशीलन से उपजी उपपत्‍तिपूर्ण विवेचना है। अक्सर लगता है कि श्रोत्रिय पर कहीं न कहीं नरेश मेहता की वैष्णवता हावी है और शुभ- शुभ देखने-सुनने की आकांक्षी उनकी रसज्ञ आलोचना-वृत्ति सर्जनात्मक अन्वेषण-निदिध्यासन में ही सुख पाती है। वे कविता में कुलीनतावाद के भी हामी है, व्यक्तिवाद के भी, कबीर की अक्खड़ता भी प्रिय है और तुलसी का परंपरापोषण भी , नागार्जुन को भी वे कालिदास सच सच बतलाना, तथा बादल को घिरते देखा है जैसी कविता के आलोक में परखते हैं। उनकी राजनीतिक समाजधर्मी कविताओं का जिक्र यहाँ कम ही है, जिनके आधार पर नागार्जुन का असली जन चरित्र सामने आता है और वे जनता की लहरों पर सवार दिखते हैं।

नरेश मेहता की वैष्णवता, भारती की माधवता, वीरेन्द्र कुमार जैन की लोकोत्तरता, सुमन की ऐहिकता और अज्ञेय की वैयक्तिकता के वे एक साथ परिपोषक और समर्थक दिखते हैं। ऐसा नहीं लगता कि इन सभी कवियों में मुक्तिबोध और निराला की सत्ता कुछ अलग और अद्वितीय है। को बड़ छोट कहत अपराधू वाले भाव से भरे श्रोत्रिय की आलोचना दरअसल उच्चादर्शो से भरे जीवन-मूल्यों की ही खोज है। कवि परम्परा:तुलसी से त्रिलोचन शीर्षक से तुलसी और त्रिलोचन की अवधी-संवेदना मुखर हो उठती है। यह दूसरे शब्दों में उनकी परंपरा-प्रियता का ही इजहार है। त्रिलोचन ने लिखा है, हिंदी की कविता उनकी कविता है जिनकी साँसों को आराम नहीं था और जिन्होंने सारा जीवन लगा दिया कल्मष को धोने में समाज के। श्रोत्रिय की आलोचना भीसाहित्‍यिक गलियारे में चलाया जाने वाला स्वच्छता अभियान है, जिसे उन्होंने संजीदगी से अंजाम दिया है। गौरतलब यह भी कि अशोक वाजपेयी जिस अकृतज्ञ हिंदी समाज को लेकर अक्सर विक्षुब्धता का इजहार करते रहते हैं, श्रोत्रिय के यहाँ कवियों के प्रति यह कृतज्ञता प्रचुर मात्रा में मौजूद है।
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