राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर 1 अक्तूबर, 2008 को साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा पटना के तारामंडल सभागार में हिंदी काव्य-गोष्ठी आयोजित की गई। पूर्वाह्न 10 बजे से शाम 6 बजे तक कुल चार सत्रों में चली इस गोष्ठी में हिंदी के कई चर्चित वरिष्ठ एवं युवा कवि मंच पर एक साथ उपस्थित थे। यह काव्य गोष्ठी इस मायने में भी अभूतपूर्व थी कि छोटे-छोटे अंतराल के बीच लगभग 7 घंटे तक चली इस गोष्ठी में शुरू से अंत तक भारी संख्या में शहर एवं शहर के बाहर के साहित्य-प्रेमियों, कलाकारों, बु्द्धिजीवियों ने पूरी गंभीरता और तन्मयता के साथ अपनी उपस्थिति के साथ-साथ अपने अतिथि कवियों का उत्साह भी बनाए रखा। आज के असंवेदनशील होते समय में साहित्य के प्रति अरुचि और गहरी उदासीनता की लगातार आती खबरों के बीच बार-बार यह मह्सूस होता रहा कि जहां हम यह काव्य-पाठ सुन रहे हैं वहाँ "शहर अब भी संभावना है"।
वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी की अध्यक्षता में प्रारंभ हुए पहले सत्र में लीलाधर जगूड़ी के अतिरिक्त अनामिका, आलोक धन्वा, अष्टभुजा शुक्ल, शंभू बादल तथा संजय कुंदन ने अपनी कविताएं सुनाईं। दूसरे सत्र में अशोक वाजपेयी की अध्यक्षता में अशोक वाजपेयी के अतिरिक्त नरेश सक्सेना, अरुण कमल, मदन कश्यप, अरुणेश नीरन तथा रंजना जायसवाल की रचनाएं सुनी गईं। तीसरे सत्र में कैलाश वाजपेयी की अध्यक्षता में स्वयं उनकी कविताओं के अतिरिक्त नंदकिशोर आचार्य, ओम निश्चल, विमल कुमार, अनंत मिश्र तथा कमलेश की कविताएं सुनी गईं। अंतिम सत्र में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में ज्ञानेन्द्रपति, सत्यनारायण, रश्मिरेखा, शरद रंजन शरद तथा सुनीता जैन ने अपनी कविताएं सुनाईं।
पढी गईं ये कविताएं जितनी विविधताएं लिए हुई थीं, वे एक स्तर पर आकर उतनी ही एकात्म और एक-स्वर भी थीं। वे समकालीन जीवन और समाज के संकटों, अंतर्विरोधों और द्वंद्वों को अपनी पैनी बारीक दृष्टि से बेधती सुनाई पड़ीं। अपनी-अपनी विशिष्ट शैली, अंदाज और तेवर में सामाजिक विसंगतियां, प्रेम और मानवीय सरोकार कविताओं के केंद्रीय स्वर के रूप में बार-बार उभरते रहे।
पढी गई कुछ कविताएं हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :
अध:पतन
लीलाधर जगूड़ी
इतने बड़े अध:पतन की ख़ुशी
उन आंखों में देखी जा सकती है
जो टंगी हुई हैं झरने पर
ऊंचाई हासिल करके झरने की तरह गिरना हो सके तो हो जाए
गिरना और मरना भी नदी हो जाए
जीवन फिर चल पड़े
मज़ा आ जाएजितना मैं निम्नगा होऊंगा
और और नीचे वालों की ओर चलता चला जाऊंगा
उतना मैं अन्त में समुद्र के पास होऊंगा
जनसमुद्र के पास
इतने बड़े अध:पतन की ख़ुशी
उन आंखों में देखी जा सकती है
जो टंगी हुई हैं झरने पर
ऊंचाई हासिल करके झरने की तरह गिरना हो सके तो हो जाए
गिरना और मरना भी नदी हो जाए
जीवन फिर चल पड़े
मज़ा आ जाएजितना मैं निम्नगा होऊंगा
और और नीचे वालों की ओर चलता चला जाऊंगा
उतना मैं अन्त में समुद्र के पास होऊंगा
जनसमुद्र के पास
एक दिन मैं अपार समुद्र से उठता बादल होऊंगा
बरसता पहाड़ों पर, मैदानों में
तब मैं अपनी कोई ऊंचाई पा सकूंगा
उजली गिरावट वाली दुर्लभ ऊंचाईकोई
बरसता पहाड़ों पर, मैदानों में
तब मैं अपनी कोई ऊंचाई पा सकूंगा
उजली गिरावट वाली दुर्लभ ऊंचाईकोई
कोई गिरना , गिरने को भी इतना उज्ज्वल बना दे
जैसे झरना पानी को दूधिया बना देता है.
जैसे झरना पानी को दूधिया बना देता है.
आधा चांद मांगता है पूरी रात
नरेश सक्सेना
पूरी रात के लिए मचलता है
आधा समुद्र
आधे चांद को मिलती है पूरी रात
आधी पृथ्वी की पूरी रात
आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है
पूरा सूर्य
आधे से अधिक
बहुत अधिक मेरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ लोग
आधे वस्त्रों से ढांकते हुए पूरा तन
आधी चादर में फैलाते हुए पूरे पांव
आधे भोजन से खींचते पूरी ताकत
आधी इच्छा से जीते पूरा जीवन
आधे इलाज की देते पूरी फीस
पूरी मृत्यु
पाते आधी उम्र में।
आधी उम्र, बची आधी उम्र नहीं
बीती आधी उम्र का बचा पूरा भोजन
पूरा स्वाद
पूरी दवा
पूरी नींद
पूरा चैन
पूरा जीवन
पूरे जीवन का पूरा हिसाब हमें चाहिए
हम नहीं समुद्र, नहीं चांद, नहीं सूर्य
हम मनुष्य, हम--
आधे चौथाई या एक बटा आठ
पूरे होने की इच्छा से भरे हम मनुष्य।
पूरी रात के लिए मचलता है
आधा समुद्र
आधे चांद को मिलती है पूरी रात
आधी पृथ्वी की पूरी रात
आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है
पूरा सूर्य
आधे से अधिक
बहुत अधिक मेरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ लोग
आधे वस्त्रों से ढांकते हुए पूरा तन
आधी चादर में फैलाते हुए पूरे पांव
आधे भोजन से खींचते पूरी ताकत
आधी इच्छा से जीते पूरा जीवन
आधे इलाज की देते पूरी फीस
पूरी मृत्यु
पाते आधी उम्र में।
आधी उम्र, बची आधी उम्र नहीं
बीती आधी उम्र का बचा पूरा भोजन
पूरा स्वाद
पूरी दवा
पूरी नींद
पूरा चैन
पूरा जीवन
पूरे जीवन का पूरा हिसाब हमें चाहिए
हम नहीं समुद्र, नहीं चांद, नहीं सूर्य
हम मनुष्य, हम--
आधे चौथाई या एक बटा आठ
पूरे होने की इच्छा से भरे हम मनुष्य।
गाढे अंधेरे में
अशोक वाजपेयी
इस गाढे अंधेरे में
यों तो हाथ को हाथ नहीं सूझता
लेकिन साफ़-साफ़ नज़र आता है :
हत्यारों का बढता हुआ हुजूम,
उनकी ख़ूंख़्वार आंखें,
उसके तेज़ धारदार हथियार,
उनकी भड़कीली पोशाकें
मारने-नष्ट करने का उनका चमकीला उत्साह,
उनके सधे-सोचे-समझे क़दम।
इस गाढे अंधेरे में
यों तो हाथ को हाथ नहीं सूझता
लेकिन साफ़-साफ़ नज़र आता है :
हत्यारों का बढता हुआ हुजूम,
उनकी ख़ूंख़्वार आंखें,
उसके तेज़ धारदार हथियार,
उनकी भड़कीली पोशाकें
मारने-नष्ट करने का उनका चमकीला उत्साह,
उनके सधे-सोचे-समझे क़दम।
हमारे पास अंधेरे को भेदने की कोई हिकमत नहीं है
और न हमारी आंखों को अंधेरे में देखने का कोई वरदान मिला है।
फिर भी हमको यह सब साफ़ नज़र आ रहा है।
और न हमारी आंखों को अंधेरे में देखने का कोई वरदान मिला है।
फिर भी हमको यह सब साफ़ नज़र आ रहा है।
यह अजब अंधेरा है
जिसमें सब कुछ साफ़ दिखाई दे रहा है
जैसे नीमरोशनी में कोई नाटक के दृश्य।
जिसमें सब कुछ साफ़ दिखाई दे रहा है
जैसे नीमरोशनी में कोई नाटक के दृश्य।
हमारे पास न तो आत्मा का प्रकाश है
और न ही अंतःकरण का कोई आलोक :
यह हमारा विचित्र समय है
जो बिना किसी रोशनी की उम्मीद के
हमें गाढे अंधेरे में गुम भी कर रहा है
और साथ ही उसमें जो हो रहा है
वह दिखा रहा है :
क्या कभी-कभार कोई अंधेरा समय रोशनी भी होता है?
और न ही अंतःकरण का कोई आलोक :
यह हमारा विचित्र समय है
जो बिना किसी रोशनी की उम्मीद के
हमें गाढे अंधेरे में गुम भी कर रहा है
और साथ ही उसमें जो हो रहा है
वह दिखा रहा है :
क्या कभी-कभार कोई अंधेरा समय रोशनी भी होता है?



3 comments:
Yogendra ji,
Shabdsrijan ko dekhaa..aur parhaa bhee..Patna main saahityaa kee goonj ke baare mein jaankar sukhad anubhooti huee..Is prayas ke liye badhaayee..
Main bhee jald hee Patna aane ka man bana rahee hoon..shaayad chatt ke aas-paas aanaa hoga.. Shabdsrijan ke liye shubhkaamnaayein..
Vartika Nanda
Head- Programming
Sahara India Media
Priy yogendraji
namaskar
Ye jankar mujhe bahut hi khushi hui ki aaplog etni achhi sahityik gatividhiyan Patna me chala rahe hain.Mai bhi Patna se hi hun aur ye sab sunkar bahut khushi hoti hai.Mai agle varsh vaha aaungi to aapse milna chahungi
kusum
kusumsinha2000@yahoo.com
ye aapne achha kiya. Vaise dilli mein Dinkar par MURLI MANOHAR JOSHI ke netritav mein NAMVAR SINGH bhi ek goshthi mein DINKAR ko yaad kar aaye hain
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