Friday 19 September 2008

एक अभिनेत्री के संस्मरण


एंटन चेखव

द सी गल की प्रथम प्रस्तुति

एम एम चिताउ
अलेग्जैंन्ड्रिन्स्की थिएटर के रंगमंच पर चेखव के द सी गल की प्रस्तुति तक अनेक युवा नाटककार अंतत: नाटक में नए स्वर की आवश्यकता महसूस कर रहे थे, लेकिन इस आवश्यकता की सम्यक समझ थिएटर दर्शकों में अभी विकसित नहीं हुई थी। जहां तक थिएटर आयोजकों, जो रूसी थिएटर के मामले में लगभग उदासीन बने रहते थे, का प्रश्न है, अन्वेषणों में उनकी कोई खास रुचि नहीं थी।

मुझे याद है पी पी ग्नेडिच द्वारा 1880 या 1881 में लिखा गया नाटक डार्कनेस, जो इस तरह के नए स्वर की दिशा में पहला प्रयास था, कभी मंचित भी नहीं हो सका : मंचन के लिए इसे अयोग्य माना गया।

जैसा कि सभी जानते हैं, ए पी चेखव का पहला महत्वपूर्ण नाटक जो अलेग्जैंड्रिन्स्की थिएटर के रंगमंच पर प्रस्तुत हुआ वह ईवानोव था। यह नाटक देवीदोव के लिए लाभप्रद साबित हुआ। इसमें रंगकर्मियों के अभिनय अद्भुत थे, और नाटक को भारी सफलता मिली थी। निस्संदेह अभिनेताओं ने नाटक के परिवर्तनकारी नए स्वर को सही रूप में संप्रेषित किया था और दर्शकों ने उसे स्वीकार किया था। हालांकि, चेखव के दूसरे नाटक, द सी गल को इसी थिएटर में भारी असफलता झेलनी पड़ी। इसके प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कई कारण थे।

द सी गल का चयन वाई आई लेवकिएवा ने अपने लाभ-प्रदर्शन (बेनिफिट परफॉरमेंस) के लिए किया था। रंग-दर्शकों ने उन्हें हमेशा कॉमेडी की भूमिका में देखा था, और एक मनोरंजक शाम बिताने की उम्मीद में वे नाटक देखने आए थे। उनकी इस उम्मीद की एक वज़ह चेखव की विनोदप्रिय `चेखोन्ते´ वाली छवि भी थी।

नेपथ्य में पहले से ही इस बात की चर्चा थी कि द सी गल `सर्वथा नए स्वर´ में लिखा गया नाटक है। यह बात एक ओर जहां रंगकर्मियों की दिलचस्पी का हिस्सा बन रही थी, वहीं दूसरी तरफ़ उनमें आशंकाएं भी पैदा कर रही थी, हालांकि ये आशंकाएं इस बात से कमज़ोर पड़ रही थीं कि स्वयं नाटककार इस नाटक को पढ़ने वाले हैं, और यह उम्मीद बंधती थी कि वे इन अन्वेषणों को समझने में हमारी मदद करेंगे।

नाटक की भूमिकाएं स्वयं ए एस सुवोरिन ने बांटी थीं। एम जी सवीना को नीना जरेचनाया की भूमिका अदा करनी थी। ड्यूझिकोवा की भूमिका में अरकाडिना, अबारोनोवा की भूमिका में पोलिना आंद्रयेव्ना तथा माशा की भूमिका में स्वयं मैं थी। पुरुषों की मुख्य भूमिकाएं देवीदोव, वारलामोव, अपोलोंस्की तथा साजोनोव को दी गई थीं।

अभिनेताओं के लिए निर्धारित जगह, फोयर, पर हमलोग नाटक के पाठ के लिए एकत्र हुए। केवल सवीना और लेखक अनुपस्थित थे। सवीना ने सूचना भेजी थी कि वह अस्वस्थ हैं। बहरहाल, वहां उपस्थित रंगकर्मियों की दिलचस्पी सवीना की अनुपस्थिति में नहीं, बल्कि स्वयं लेखक की उपस्थिति और उनके पाठ में थी।

बहुत देर तक हमलोगों ने धैर्यपूर्वक इंतज़ार किया। फिर हमलोग हर मिनट पर घड़ी देखने लगे, और सभी लोग जब इंतज़ार करते थक गए तो उनके बीच थिएटर से जुड़ी गप्पें शुरू हो गईं। अंत में मुख्य सूत्रधार, वाई पी कारपोव उपस्थित हुए और उन्होंने हमें सूचना दी कि चेखव ने मास्को से तार भेज कर ख़बर दी है कि वे नाटक के पाठ के लिए नहीं आ पाएंगे। इस समाचार ने सबों को निराश किया। कारपोव ने तब प्रोंप्टर, कोरनेव को नाटक का पाठ करने को कहा।

लेवकिएवा, जो कभी हतोत्साहित नहीं होती थी, ने द सी गल में अपना प्रदर्शन नहीं किया। लेकिन अपनी प्रतिभा के अनुरूप एक हल्की-फुल्की कॉमेडी का प्रदर्शन उसने संध्या समापन के तौर पर किया। हालांकि नाटक के पाठ के दौरान वह उपस्थित थीं और स्वयं को यह सांत्वना दे चुकी थीं कि नाटक का पूर्वाभ्यास स्वयं चेखव कराएंगे और उस दौरान हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे, क्योंकि थिएटर के प्रोड्यूसर के रूप में उनका कोई मुकाबला नहीं था।

नाटक के नए स्वर या उसके मर्म को समझने के संदर्भ में कोरनेव द्वारा नाटक का पाठ हमारी कोई मदद नहीं कर सका। तब हमलोगों ने इसे पढ़ने के लिए घर ले जाने की पेशकश की।

कालांतर में, मास्को आर्ट थिएटर में द सी गल के प्रदर्शन की जब मैंने प्रशंशा की थी तो मुझे यह प्रतीत हुआ था कि इसके मूल पाठ में पर्याप्त परिवर्तन कर इसे रंगमंच के अनुकूल बनाया गया है। शायद मैं ग़लत थी। प्रश्न नाटक के पाठ और प्रस्तुतकर्ताओं का नहीं, बल्कि हमारे कमज़ोर प्रदर्शन का था।

नाटक के पूर्वाभ्यास आरंभ हुए। नाटककार अभी भी मास्को से नहीं पहुंचे थे। सवीना की अस्वस्थता ज़ारी रही, और जरेचनाया की भूमिका सहायक प्रस्तुतकर्ता पोल्याकोव द्वारा पढ़ी गई।

दूसरे पूर्वाभ्यास तक भी नाटककार नहीं पहुंचे थे, और सवीना, जिसने भी थिएटर में अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं की थी, नीना की भूमिका करने की इच्छुक नहीं थी, हालांकि वह अरकाडिना की भूमिका करना चाह्ती थी। जरेचनाया की भूमिका कोमीसारजेव्स्काया को दी गई। नाटक की भूमिका में की गई प्रत्येक तब्दीली निश्चित तौर पर हमारे अभ्यास पर ख़ेदजनक प्रभाव छोड़ती थी जबकि नाटक की तैयारी के लिए हमें केवल सात पूर्वाअभ्यास करने थे। हालांकि इस मामले में किया गया यह परिवर्तन बेहतरी के लिए था। कोमीसारजेव्स्काया पूर्वाभ्यास के लिए आईं और सवीना की जगह लेने ड्यूझिकोवा भी उपस्थित हुईं। नाटक का पूर्वाभ्यास ज़ारी रखने में सहयोग करने के लिए यह लगनशील, ईमानदार और बेहतरीन अभिनेत्री वास्तविक अदाकारा के आने तक डमी की भूमिका भी अदा करने के लिए तैयार थी। हालांकि, वह बहुत उपयोगी साबित नहीं हो सकी क्योकि यह अनुमान लगा पाना या दूसरे कलाकारों को यह बता पाना सचमुच असंभव था कि सवीना अपनी भूमिका का निर्वाह किस तरह करेंगी। प्रस्तुतकर्ताओं द्वारा दिए गए निर्देशों के अलावा देवीदोव ने भी हममें से कुछ कलाकारों को कुछ निर्देश दिए थे। लेकिन प्रस्तुतकर्ताओं को स्वयं भी अभी नाटककार द्वारा दिए जाने वाले निर्देशों का इंतज़ार था, क्योंकि अपनी प्रखर प्रतिभा के बावजूद, देवीदोव के लिए भी नाटक के नए स्वर को सही-सही पकड़ पाना असंभव हो रहा था।

केवल कोमीसारजेव्स्काया ने इतनी कलात्मकता के साथ नीना जरेचनाया के चरित्र-निरूपण में सफलता प्राप्त की थी कि हमेशा आशा से भरपूर रहने वाली लेवकिएवा की बड़ी-बड़ी आंखों में चमक आ गई थी, और अंगुलियों के संपूर्ण फैलाव के साथ अपना हाथ उठाते हुए उसने मुझे अपनी उम्मीदों के बारे में इन शब्दों में बताया था : वेरा फ्योदोरोव्ना नीना के किरदार में से कुछ तो रच ही लेगी, सबुश्का स्थानीय गायिका (प्राइमाडोना) की भूमिका में अद्भुत रहेगी----कि नाटक का पूर्वाभ्यास शायद दुआओं के साथ अपनी परवाज़ पर है, लेकिन एंटन पैवलोविच इसे अंतिम रूप में संवारेंगे।

बहुतों की यह उत्सुकता और चिंता थी कि `मंच के भीतर मंच´ पर नीना जरेचनाया के एकालाप पर अलेग्जैंड्रिंस्की थिएटर के दर्शकों की प्रतिक्रिया क्या होगी, और जिसे न कि सिर्फ़ नए स्वर में लिखा गया था बल्कि यह नाट्य-कला में कुछ अत्याधुनिक शिल्प की मांग करता था।

नेपथ्य के हमारे हास्य-कलाकारों ने इसे पहले ही अपनी शैली और मिज़ाज में ढाल लिया था।

कोमीसारजेव्स्काया अपनी कोशिशों में क़ामयाब रही थीं। उन्होंने इस एकालाप का आग़ाज अपनी बेहतरीन गहरी आवाज़ से कीं--धीरे-धीरे अपने स्वर को उठाती हुई और श्रोताओं का ध्यान अपने स्वर के आकर्षक आरोह-अवरोह पर केंद्रित करती हुईं। फिर स्वर को नीचे गिराती हुई--एक फुसफुसाहट में तब्दील होती आवाज़, और इस एकालाप का अंत जब इस जुमले से हुआ, 'समस्त जीव अपने दुखद कालचक्र पूरा कर मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं´, तो अंतिम शब्द के उच्चारण तक उसका स्वर बिल्कुल क्षीण हो गया था। और यह सारा प्रभाव उसकी अच्छी आवाज़ और स्वर के आरोह-अवरोह पर निर्भर था। संवाद की इस पुरानी तकनीक, जिसमें भावप्रवणता का उपयोग किया जाता है, से बहुत लोग अवगत हैं, बहुतों ने इसका अध्ययन किया है, लेकिन बहुत कम लोग हैं जो इतनी उदात्तता के साथ इसका इस्तेमाल कर पाएंगे।

कंबल वाले दृश्य का निर्वाह कोमीसारजेव्स्काया सफलतापूर्वक नहीं कर पाई थीं, वह दृश्य विश्वसनीय नहीं बन पाया था, और यह बात प्रदर्शन के दौरान स्पष्ट हो गई थी : दर्शकों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया का इज़हार ठहाके के विस्फोट से किया था।

तीसरे पूर्वाभ्यास के लिए जब मैं अपने ड्रेसिंग-रूम में पहुंची तो वहां मुझे अपनी मुख्य दर्ज़ी (कॉस्टूमियर) से मुलाक़ात हुई, जिसके साथ मैंने माशा की भूमिका के लिए थिएटर के पोशाक-कक्ष से अपने लिए पोशाक का चुनाव किया था और उसमें कुछ संशोधन करने के लिए उससे कहा था। वह उदासीन दिखी, और जब मैंने उसे उस पोशाक की फिटिंग आदि जल्दी करने को कहा तो मैं चकित रह गई जब उसने घोषणा की कि `मारिया गैव्रीलोव्ना (सवीना) ने इस पोशाक को अपने लिए बिल्कुल सही पाया है और वह इसी ड्रेस में प्रदर्शन करने जा रही हैं। फिर बाद में जब संभव होगा तो इसमें संशोधन कर दिया जाएगा।

बात मेरी समझ में तब आई जब स्वयं लेवकिएवा वहां आईं। वह परेशान दिख रही थी, हालांकि यह उसके स्वभाव का हिस्सा नहीं था। उन्होंने मुझे बताया कि दरअसल सवीना ने द सी गल को समझा नहीं है और अरकाडिना तथा नीना जरेचनाया की भूमिकाएं वे अस्वीकार चुकी हैं, लेकिन बावजूद इसके लेवकिएवा के साथ अपनी पुरानी दोस्ती की खाातिर उन्होंने लाभ-प्रदर्शन के लिए माशा की भूमिका करने की पेशकश की है, और पुन: दूसरी बार भी वे यह किरदार निभाएंगी, और तब यह भूमिका मुझे दी जाएगी। आज मैं अपना पूर्वाभ्यास ज़ारी रखूंगी लेकिन शेष पूर्वाभ्यास मारिया गैव्रीलोव्ना करेंगी।

`आखिर यह कैसा पूर्वाभ्यास है!´ मैंने गुस्से में प्रतिकार किया। `चार शेष अभ्यास मुझसे छीन लिए गए हैं। सच तो यह है कि लाभ-प्रदर्शन इसलिए स्थगित नहीं किया जा सकता कि न कि सिर्फ नाटक की तैयारी पूरी नहीं हुई है, बल्कि इसलिए कि हमें पता ही नहीं कि इसकी तैयारी कैसे की जाए!´

मेरे इस बेतुके प्रलाप ने लेवकिएवा को इतना परेशान कर दिया था कि मैं अपनी ग़लती पर तत्काल लीपापोती कर अपने अंतिम पूर्वाभ्यास के लिए बाहर निकल आई।

अभी भी नाटककार का कोई अता-पता नहीं था। कुछ रंगकर्मी संयोजन की कमियों को लेकर उत्तेजित और निराश थे, जबकि अन्य इन बातों पर कोई ध्यान न देकर अपने मोरंजन में लग गए थे। इसका नतीज़ा यह निकला कि न केवल नए स्वर विकसित नहीं हो सके बल्कि इस परिस्थिति में पूर्वाभ्यास भी असंभव हो गया, और सब कुछ बिखरने लगा। केवल कोमीसारजेव्स्काया, जिन्होंने पहले ही से अपनी भूमिका पर पर्याप्त चिंतन-मनन कर रखा था, ने इस दौरान कुछ हासिल किया, और सबसे बड़ी बात, अपने किरदार के साथ उन्होंने तादात्म्य स्थापित कर लिया था। वे अपना किरदार करती रहीं और हर पूर्वाभ्यास के साथ उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया।

दूसरे दिन चूंकि मुझे पूर्वाभ्यास करना नहीं था इसलिए मैं नहीं गई। हालांकि उसी शाम कारपोव मुझसे मिलने आए और उन्होंने मुझसे कहा कि सवीना ने माशा की भूमिका भी छोड़ दी है, और पोल्याकोव ने पूर्वाभ्यास के दौरान मेरी भूमिका पढ़ी थी, और यह कि अब यह भूमिका मुझे वापस की जा रही है।

ऐसी अव्यवस्था और गड्डमड की स्थिति पहले कभी नहीं देखी गई!

अंतत: ए पी चेखव पहुंचे, और हमारे पूर्वाभ्यास में अंत तक बने रहे। लेकिन इस दौरान उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की, कोई निदेश नहीं दिया। संभवत: इसलिए कि तबतक किसी भी प्रकार के परिवर्तन के लिए काफ़ी विलंब हो चुका था, या पता नहीं किसी अन्य कारण से। पूर्वाभ्यास का कोई लाभ नहीं मिल रहा था और सभी हतोत्साहित होने लगे थे, लेकिन कोमीसारजेव्स्काया ने नीना की अपनी भूमिका में बेहतरी ज़ारी रखी। अबारिनोवा भी निराश नहीं थी, बल्कि यह समझते हुए कि नए स्वर का सुराग़ उनके हाथ लग गया है, उन्होंने हममें से अनेक रंगकर्मियों को पूरे विश्वास के साथ सलाह दी :

`मुख्य चीज़ है विषादपूर्ण स्वर में बोलना।´

फिर, उत्साहपूर्वक पूर्वाभ्यास करती हुई, वे ट्रेप्लेव को रुदन भरे स्वर में कहतीं :

`अच्छा, अब तुम एक प्रख्यात लेखक बन गए हो।´

लेवकिएवा, जो पारंपरिक नाट्य-शैली में प्रशिक्षित हुई थीं, यह सब समझने में पूरी तरह असमर्थ होतीं।

`लेकिन यह कितना अद्भुत है कि वह एक प्रख्यात लेखक बन गया है´, वे मुझसे फुसफुसातीं, `लेकिन तोशा (अबारिनोवा) क्यों इस तरह बात कर रही है जैसे उसे बता रही हो कि उसकी प्यारी आंट बीमार पड़ गई है!´

और अंत में अब मेरे पास कुछ बातें लाभ-प्रदर्शन के संदर्भ में ही कहने को रह गई हैं।

पर्दा उठने के ठीक पहले यह अफ़वाह फैलने लगी कि युवा वर्ग इस प्रदर्शन पर सीटी बजाएंगे और हूट करेंगे। अफ़वाह किधर से आई हमें पता नहीं, पर सभी लोगों की यह राय बनी कि चेखव युवाओं के बीच लोकप्रिय नहीं हैं क्योंकि चेखब की दिलचस्पी राजनीति में नहीं है और क्योंकि सुवोरिन से उनकी मित्रता है। इस अफ़वाह, जो अनर्गल ही क्यों न सही, का असर अधिसंख्य रंगकर्मियों के मूड पर भी पड़ा : नाटक अगर प्रस्तुति के पूर्व ही असफल होने को अभिशप्त हो तो किया ही क्या जा सकता था?

यही वे परिस्थितियां थीं जिसमें द सी गल की शुरुआत हुई। दर्शकों ने इस नाटक को किस प्रकार लिया इसके बारे में उन लोगों ने बहुत कुछ लिखा है जिन्होंने इस तमाशे को देखा था। जहां तक मेरा सवाल है, मैं केवल इतना जोड़ना चाहूंगी कि, जहां तक मैं जानती हूं, अलेग्जैंड्रिन्स्की थिएटर के रंगमंच पर इतना बुरा प्रदर्शन पहले कभी नहीं हुआ था, और इसके पूर्व हमलोगों ने वाहवाही में कभी दर्शकों की ऐसी सिसकारियां और `रंगकर्मियों को मंच पर लाओ´ या `नाटककार को सामने लाओ´ जैसे नारों के सा सिसकारियों के विस्फोट नहीं सुने थे। रंगकर्मी अपनी असफलता से क्षुब्ध अंधकार में गुम हो गए थे। लेकिन सबों ने महसूस किया कि उस अंधकार में भी कोमीसारजेव्स्काया एक प्रकाश की तरह चमक रही थीं जब मंच पर आकर दर्शकों का झुक कर अभिवादन करने की उनकी बारी आई, और दर्शकों ने जब पूरे उत्साह के साथ उनका स्वागत किया। दर्शक, जो अपने मनोरंजन और जी भर हंसने के लिए एक हास्य अभिनेत्री के लाभ-प्रदर्शन देखने आए थे, को अगर `केलिको ब्लैंकेट´ (जैसा कि एक संस्मरण लेखक ने लिखा) दृश्य वाली कोमीसारजेव्स्काया के हास्यास्पद कारनामों पर हंसना पड़ा तो इसमें कोमीसारजेव्स्काया का कोई दोष नहीं था, क्योंकि नाटक के रूप में द सी गल का प्रदर्शन किसी भी स्थिति में दर्शकों के उत्सवी मूड को बदलने में कामयाब नहीं हो पाता।

मुझे स्मरण नहीं कि वह कौन-सा ऐक्ट था जिस दौरान मैं ड्रेसिंग रूम में आई और वहां लेवकिएवा को चेखव के साथ देखा। वह अपनी बड़ी-बड़ी आंखों में अपराध-बोध या सहानुभूति के भाव लिए चेखव को देख रही थीं और अपने हाथ से भी कोई संकेत नहीं कर रही थीं। चेखव अपना सिर झुकाए बैठे थे। केश का एक लट उनकी ललाट पर आ गिरा था, और उनका पैन्स-ने (नाक पर बैठने वाला चश्मा जिसे कान के सहारे की ज़रूरत नहीं होती) उनकी नाक पर कुछ टेढ़ा बैठा था…दोनों में से कोई भी कुछ बोल नहीं रहे थे। उनकी बगल में खड़ी मैं भी चुप थी। कुछ क्षण इस तरह गुज़रे, फिर चेखव अचानक खड़े हुए और बाहर निकल गए।

और वे केवल थिएटर से ही बाहर नहीं निकले, बल्कि सेंट पीटर्सबर्ग से भी चले गए।

नाटक की दूसरी प्रस्तुति के दौरान चमत्कारिक परिवर्तन हुआ : नाटक का अद्भुत स्वागत हुआ और लेखक तथा रंगकर्मियों को रंगमंच पर बुलाने की असंख्य मांगें गूंजीं। कोमीसारजेव्स्काया को जो उत्साहजनक सराहनाएं मिलीं उसकी बात तो छोड़ ही दें। बहरहाल, निस्संदेह दूसरी बार भी, हमारा प्रदर्शन पहली बार से कोई बेहतर नहीं था।
पेरिस, १९२६
अनुवाद : योगेन्द्र कृष्णा

1 comments:

Nidhi Shrivastava said...

Chekhov ke bare me yah sansmaran jitna rochak hai utna hi gambhir aur aitihasik mahatva ka bhi. Chekhov ke samay ke rangmanchiya anubhavon se seedha sakshatkar karata apka yah anuvad ek baar phir itna sadha hua aur paripakva hai ki lagta nahin anuvad padh rahi hoon.
Meri hardik badhai swikaren. Asha hai aise gambhir sahitya aap aage bhi padhvate rahenge.
Nidhi Shrivastava

 
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