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शम'अ हर रंग में
कृष्ण बलदेव वैद
राजकमल प्रकाशन
नई दिल्ली
मूल्य : ३२५ रु
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शम' अ हर रंग में से कुछ अंश
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- कल शाम और रात बारिश होती रही। हवा में सर्दियों की आखिरी खुनकी और बहार की पहली ताजगी है। पेड़ और पत्थर और नए उठते हुए मकान नहाए हुए नजर आते हैं। उजले उजले। सैर के दौरान एक कहानी का खयाल कौंधा। आज कल रेडियो के लिए भी काफी बकवास लिख रहा हूं--नाटक, झलकियां।
चाहता हूं कोई गजब की चीज लिखूं। फिर सोचता हूं चाहने से कुछ नहीं होगा, जो होगा लिखने से ही होगा।
- जिस दिन कुछ पंक्तियां लिख लूं जी कुछ शांत हो जाता है, जिस दिन कुछ न लिखूं जी का हैजान बढ़ जाता है, लेकिन हैजान वाला दिन भी बिल्कुल बुरा नहीं होता क्योंकि उस दिन आत्मनिरीक्षण के दौरान तरह तरह के खयाल आते रहते हैं, जिनमें से कुछ नए और अच्छे भी होते हैं।
- दिल्ली जल रही है। सिखों को पकड़ पकड़ कर जलाया जा रहा है। इस पागलपन का जवाब पंजाब में दिया जाएगा और फिर उसका जवाब कहीं और। दिल्ली से फोन आया था कि हम वहां चले जाएं। मैं चाहता हूं कि यहीं रहें। मन करता है कोई मुझे गोली मार दे।
मुझे अपना वह सपना याद आ रहा है--आज से कुछ दिन पहले का--जिसमें मैंने बहुत मारकाट देखी थी। - कल जैनेन्द्र निराला सृजन पीठ के मेहमान थे। एक गोष्ठी हुई। परसों ही फैसला हुआ, मेरी एक मौज में। बैठक गहरी और प्रभावपूर्ण। जैनेन्द्र गुफ्तार के गाजी हैं। उनकी जबान में रस है, विचारों में सफाई है, बातों में गहराई है। इस उम्र में दो घंटे बोल गए। कहीं कोई खुश्की नहीं थी। सवाल जवाब का सिलसिला भी चला।
- आज सागर में हूं। इस वक्त कमरे में अकेला हूं और सुखी हूं। यहां अशोक के साथ आया। सफर योजनाओं को समर्पित रहा। कविता गोष्ठी में औरतें एक तरफ बैठीं, मर्द दूसरी तरफ। कविताएं सब सात्विक--प्रेम, परिवार, घास-फूस, चिड़िया--लेकिन माहौल बुरा नहीं था।
त्रिलोचन जी के साथ जो वक्त गुजरा अच्छा था। केदारनाथ सिंह पीकर प्यारे से बन गए थे। उसका बचपन की तारीफ कर रहे थे, गुजरा हुआ जमाना को तमस से बेहतर बता रहे थे। प्रबोध कुमार के साथ भी पहली बार स्वाभाविक बात हुई। - काला कोलाज की चार समीक्षाएं मैंने देखी हैं। चारों में समीक्षक की परेशानी साफ झलकती है। परेशानी का कारण यह नजर आता है कि समीक्षक उपन्यास को न समझ पाने का बदला मुझसे लेना चाहता है लेकिन खुल कर मेरी मरम्मत का मजम्मत नहीं कर पाता क्योंकि एक तो मेरी उम्र के कारण और दूसरे इस संशय के कारण कि कसूर शायद मेरा नहीं, उसी की नासमझी का है। ये चारों समीक्षक जवान हैं। मेरे समकालीन खामोश हैं, खामोश ही रहेंगे।
निर्मल ने वत्सलनिधि के एक आयोजन में तीन भाषण दिए। मैं गैरहाजिर रहा। मेरी दलील: अगर वह मुझसे परहेज करता है तो मैं उससे परहेज क्यों न करुं ! - कुछ औरतों के जिस्म से यह दावत भाप की तरह उठती रहती है: आओ, मेरे अंदर आराम करो, ऐश करो, कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा, मेरे अंदर एक हरा भरा बागीचा है, तुम उसमें खेलो कूदो, ऊधम मचाओं, जब थक जाओ तो सो जाओ, तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी, मुझे कोई तकलीफ नही होगी, मैं अपना काम करती रहूंगी, तुम मेरे बागीचे को सींचते रहो, कभी कभी मैं देख लिया करुंगी कि तुम अपना काम बखूबी कर रहे हो या नहीं।
( शम'अ हर रंग में से उद्धृत )
समकालीन सोहबतों की बेहतरीन गवाहियां
ओम निश्चल
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कृष्ण बलदेव वैद को हिंदी कथाकारों के बीच अपनी अलग तरह की भाषा, किस्सागोई और अपने अलग अंदाजे बयां के लिए जाना जाता है। अभी अभी कृष्णा सोबती के साथ हुई उनकी बातचीत की किताब सोबती वैद संवाद खासा चर्चा में रही है। उपन्यासों में वे उसका बचपन, बिमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां के लिए विशेष रूप से जाने गए तो नर-नारी और एक नौकरानी की डायरी पर पाठको-आलोचकों की खासी सराहना मिली। उपन्यास के पाठगत ढांचे में परिवर्तन कर उसे नयी रंगत देने का काम हिंदी जगत में अकेले वैद ने किया है। कवयित्री पत्नी चंपा वैद के साहचर्य ने उन्हें एक बौद्धिक दाम्पत्य से बांधा है तो देश विदेश में फैले तमाम लेखकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों ने अपनी संगत से वैद को समृद्ध और स्मृतिवान बनाया है।
ख्वाब है दीवाने का के बाद वैद की डायरी की दूसरी किस्त शम'अ हर रंग में नाम से हाल ही में आई है। ख्वाब है दीवाने का में विदेश प्रवास की रंगत है तो शम'अ हर रंग में में दिल्ली, खंडाला, रानीखेत, बम्बई, हैदराबाद, चंडीगढ़, भोपाल, सागर, मांडू, उज्जैन, पंचमढ़ी, खजुराहो के साथ टोकियो, सेनडिएगो, अमरीका, शिकागो, राचेस्टर, ब्रायन व टेक्साज में अस्थायी तौर पर बिताए दिनों की यादें हैं। 1954 से 1990 के दरम्यान फैली इस डायरी को हालांकि वैद अटपटी अधिक मानते हैं, चटपटी कम। लेकिन डायरी के इंदराज बताते हैं कि इनमें उनके और उनके समकालीनों की सोहबतों की बेहतरीन गवाहियां दर्ज हैं।
शादी के बाद लेखकीय जीवन में हुई उथल पुथल के साथ एक मुद्दत के बाद दिल्ली फिर आने पर पुनर्वास और समायोजन की जो दिक्कतें पेश आती हैं, उनसे वैद को भी गुजरना पड़ा है। बेटी की पैदाइश, उसकी किलकारियों और कवयित्री पत्नी की सार-संभाल उन्हें कठिन दौर से उबरने में मदद करती है। लिखने की उधेड़बुन और रचना प्रक्रिया के तमाम अहसासात को वैद ने यहां समेटा है। मौसम के तापमान को हिसाब में लेते हुए कभी वे महसूस करते हैं कि मौसम गुनगुना है, कभी हवा में सर्दियों की आखिरी खुनकी और बहार की पहली ताजगी उन्हें छूती है और वे कह उठते हैं--चाहता हूं कि कोई गजब की चीज लिखूं। लेकिन जोश हंडिया के उबाल की तरह आता है, फिर बैठ जाता है और फिर वही उदास और ठहरे हुए लम्हे--खाली खाली से। वे कहते हैं, पिछले कई दिनों सिर्फ घास छील और खा रहा हूं। कभी वे कहते, आज सुबह से मन हरामी है और कभी यह कि आज मन का अमन कुछ बहाल हुआ है। यही वही दौर है जब वे उसका बचपन लिख रहे थे।
वैद ने यहां अपने समकालीनों के हवाले खूब दिए हैं। अनेक विदेशी लेखकों के अलावा जे स्वामीनाथन, रमेशचंद्र शाह, सोमदत्त, अशोक वाजपेयी, विजयमोहन सिंह, निर्मल वर्मा, शिवमंगल सिंह सुमन, कुमार गंधर्व, अख्तरउल ईमान, अयप्प पाणिक्कर, ब व कारन्त, फजल ताबिश, कुमार शाहानी, रामकुमार, कृष्णा सोबती, मणि कौल, शिवानी, इरा पांडे, जैनेन्द्र, केदारनाथ सिंह, अज्ञेय, इला डालमिया इत्यादि से मुलाकातों के बहुतेरे संदर्भ यहां हैं। एक जगह निर्मल वर्मा के मुस्कराते हुए चेहरे की उपमा उन्होंने खिलने की कोशिश करते टेढ़े बूढ़े कमल से दी है। निर्मल के बारे में वे लिखते हैं, वह खुदगर्ज और खुदपरस्त तो है ही, बेईमान भले ही न हो। अशोक वाजपेयी के बारे में आकलन है कि उनका अफसराना अंदाज कभी कभी कुछ ज्यादा नुमायां हो जाता है। रमेशचंद्र शाह उन्हें सहज नहीं दिखते। जैनेन्द्र उनकी नजर में गुफ्तार के गाजी हैं। उनकी जबान में रस है, विचारों में सफाई है और बातों में गहराई। विजयमोहन सिंह में चिंगारी नहीं, आंच है। केदारनाथ सिंह उन्हे पीकर प्यारे-से लगते हैं। जैनेन्द्र बनावट के बावजूद खुले लगते हैं तो वात्स्यायन बनावट के कारण बंद। वे लिखते हैं, अज्ञेय के गद्य में तमाम अच्छे गुण हैं लेकिन रूह गायब रहती है। अयप्प पाणिक्कर में उन्हें अदाकाराना चतुराई नजर आती है। शमशेर की मुस्कराहट में शरारत और शर्मीलेपन का संगम उन्हें सुहाना लगता है।
पूरी किताब वैद की अलमस्त शख्सियत की गवाही देती है। वैद ने यहां भोपाल के चित्र भी कई जगह टांके हैं। बकौल वैद--दिन में भोपाल धूल में लिपटा रहता है, रात को रोशनी में। झील पर समंदर का गुमान होता है, पहाड़ियों पर पहाड़ों का। आसमान शाम को कुछ देर के लिए एक विराट फूल में बदल जाता है। एक जगह उन्होंने वक्ताओं की तुलना बूढ़ी वेश्याओं से की है। उन्हें ऐसे प्रगतिशील लेखकों से शिकायत है जिनके लेखन में मार्क्सवादी दृष्टि का मुलम्मा चढ़ा होता है। औरतों की सुंदरता पर उनके ख्याल खुशवंत सिंह से कम बिंदास नहीं हैं। मसलन सुंदरता के लिए सेहतमंद होना ही ठीक नहीं है, कुछ नमकीन और सांवला होना भी जरूरी है। पर भोपाल को क्या कहें जहां उन्हें औरतें ठंडी और ठुकराई नजर आती हैं। उनके द्वारा रची कुछ उपमाएं, कुछ जुमले, कुछ ख्याल भी डायरी में दर्ज हैं और जगह-ब-जगह कुछ ख्वाब भी, जिनसे गुजरते हुए वैद के मनोजगत का बेहतरीन जायजा लिया जा सकता है। निर्मल के चलते अपना हाशिए में परिगणित किया जाना उन्हें जगह-ब-जगह खलता है।
डायरी वैद के पठन-पाठन का विस्तृत हवाला देती है। जिन किताबों को उन्होंने संदर्भित किया है, उनमें लेटर्स टू मिलेना (काफ्का), दि गोल्डेन बाउल (हेनरी जेम्स), द क्राफ्ट आफ फिक्शन (पर्सी लब्बक), ए बेंड इन दि रिवर (नायपाल), द अनबेयरेबल लाइटनेस आफ बींग (मिलान कुंदेरा), वन वे स्ट्रीट (वाल्टर वेन्यामिन), बिगिनिंग्स (एडवर्ड सईद), द ओरियंटलिज्म (एडवर्ड सईद), द गोल्डेन गेट (विक्रम सेठ), अमेरिका (काफ्का), द इम्मारलिस्ट (आंद्रे यीद), दाई हैंड, गेट एनार्क (नीरद सी चौधुरी) व अन्ना कारेनिना (तालस्ताय) प्रमुख हैं। इसके साथ साथ तमाम फिल्मों, नाटकों, नृत्य तथा संगीत समारोहों में शिरकत करने के हवाले भी यहां हैं। इस तरह सही मायने में एक पढ़ाकू बुद्धिजीवी होने का परिचय वे बराबर अपनी डायरी में देते हैं।
कहना न होगा कि निर्भय-निरगुन गाऊंगा की धुन उनके डायरी लेखन में झांकती है। वैसे डायरी और संस्मरणों में सच कितना होता है, यह वैद को भी पता है। वे लिखते हैं, डायरी के सच में झूठ कितना होता है, इसका जवाब देने का धैर्य मुझमें नहीं है। जो भी हो, डायरी में वैद की लेखकीय शख्सियत के कई अप्रकाशित कोने झांकते हैं। यहां हम उनके दोस्तों-समकालीनों की वह दुनिया भी देख पाते हैं, जहां वे बहस-मुबाहिसे में मुब्तिला होते रहे हैं और जिसके बिना वैद की दुनिया पूरी नहीं होती। अपनी बौद्धिक सोहबतों के लिए जाने जाने वाले वैद की इस डायरी को पढ़ना एक विरल और रोमांचक अनुभव से गुजरना है।
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4 comments:
आभार!!
yh stambh achha chal rha hai...vaid sahab ki diaries pr dhyan gaya, yh dekh-padhkar santosh hua...ye mahtwpurn diariyan alakshit ja rhi hain hindi me ekdam se...afsos hota hai ki hm in durlabh dastawezon ke sath aisa salook kyon kar rhe hain...sambhawtah aapko jaankari hogi ki vaid sahab ki diary ka teesra hissa sheeghr hi gyanpeeth se aa rha hai...
प्रिय योगेन्द्र जी,
हाल-फिलहाल के माध्यम से आप महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं. ओम निश्चल के विषय में पहले ही लिख चुका हूं. वह एक अच्छे आलोचक -समीक्षाक ,साक्षात्कारकर्ता और कवि हैं. कृष्ण बलदेव वैद की डायरी की समीक्षा पढ़कर अच्छा लगा.
चन्देल
is kitaab ka sirf sheershak achha hai jo GALIB ke ek sher se udaaya gaya hai. ise padhkar gahree niraasha hi hui. vaise isse ASHOK VAJPEYEE aur BALDEV VAID jaise logon kee mandlee ke tuchhepan jaroor saamne aate hain. durbhagy se yah dayree kisi bade vimarsh kee or nahi le jaati.
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