यह अत्यंत खेद की बात है कि किसी कवि, कलाकार या लेखक को उसके क़द से ज़्यादा बड़ा या बौना साबित करने की गैर-साहित्यिक सक्रियता आज हमारे साहित्य-समय, विशेषकर कविता-समय को रेखांकित कर रही है। आश्चर्य नहीं कि साहित्य-सत्ता के गलियारे में ऐसे गोपन पैमाने और औज़ार गढे जा रहे हैं जो किन्हीं खास अपनों की रचनात्मक कमजोरियों, विचलनों, अयोग्यताओं की सुरक्षा और किन्हीं सशक्त प्रतिद्वंद्वियों की रचनात्मक ख़ूबियों, प्रतिभाओं पर मारक प्रहार करने की क्षमता से लैस हो।
असद जैदी की पुस्तक सामान की तलाश की समीक्षा के बहाने एक तरफ़ जो आक्रामक तेवर और दूसरी तरफ़ जो बचाव की अतिवादी मुद्रा अपनाई गई वह इन्हीं हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन का एक रूपक प्रस्तुत करती है।
असद जैदी की पुस्तक से सुविधानुसार कुछ कविताओं का चयन कर उनका कुपाठ प्रस्तुत करने और फौरी निष्कर्ष के तौर पर उन्हें एक सांप्रदायिक कवि प्रमाणित करने की दिशा में की गई कोशिशें, तथा दूसरी ओर उनके बचाव में आए समीक्षकों द्वारा उन्हें एक महान कवि से थोड़ा ही कमतर आंकने की क़वायद अंतत: इन विद्रूप हथियारों की नाकामयाबी की ही कथा कहती हैं।
प्रस्तुत आलेख में यह देखने की कोशिश की गई है कि कवि के रूप में असद जैदी, दरअसल इन दो प्रक्षेपित अतियों के बीच आखिर किस पायदान पर, कहां खड़े हैं, तथा इस विवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं और ये किन गैर-साहित्यिक और अनाम दिशाओं की ओर संकेत करती हैं।
हमारा स्पष्ट मानना है कि संभव है असद जैदी उतने बड़े कवि न हों जितना कि उन्हें एक कवि के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश की गई है, लेकिन निस्संदेह वे किसी भी दृष्टिकोण से सांप्रदायिक कवि नहीं हैं--वे हमारे समय और समाज के एक महत्वपूर्ण और ज़रूरी कवि हैं।
असद जैदी की पुस्तक सामान की तलाश की समीक्षा के बहाने एक तरफ़ जो आक्रामक तेवर और दूसरी तरफ़ जो बचाव की अतिवादी मुद्रा अपनाई गई वह इन्हीं हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन का एक रूपक प्रस्तुत करती है।
असद जैदी की पुस्तक से सुविधानुसार कुछ कविताओं का चयन कर उनका कुपाठ प्रस्तुत करने और फौरी निष्कर्ष के तौर पर उन्हें एक सांप्रदायिक कवि प्रमाणित करने की दिशा में की गई कोशिशें, तथा दूसरी ओर उनके बचाव में आए समीक्षकों द्वारा उन्हें एक महान कवि से थोड़ा ही कमतर आंकने की क़वायद अंतत: इन विद्रूप हथियारों की नाकामयाबी की ही कथा कहती हैं।
प्रस्तुत आलेख में यह देखने की कोशिश की गई है कि कवि के रूप में असद जैदी, दरअसल इन दो प्रक्षेपित अतियों के बीच आखिर किस पायदान पर, कहां खड़े हैं, तथा इस विवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं और ये किन गैर-साहित्यिक और अनाम दिशाओं की ओर संकेत करती हैं।
हमारा स्पष्ट मानना है कि संभव है असद जैदी उतने बड़े कवि न हों जितना कि उन्हें एक कवि के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश की गई है, लेकिन निस्संदेह वे किसी भी दृष्टिकोण से सांप्रदायिक कवि नहीं हैं--वे हमारे समय और समाज के एक महत्वपूर्ण और ज़रूरी कवि हैं।
योगेंद्र कृष्णा
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कविता किसी सर्वानुमति का एजेंडा नहीं है
ओम निश्चल
इन दिनों सामान की तलाश की समीक्षा के बहाने असद जैदी पर सांप्रदायिक होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। उन पर जनसत्ता के 11 मई 2008 अंक में प्रकाशित राजेन्द्र उपाध्याय की समीक्षा को आधार बनाते हुए 29 जून 2008 के जनसत्ता में ही कविता में आरी तारी शीर्षक प्रतिक्रिया लिख कर कृष्ण कल्पित ने असद जैदी के पक्ष में एक मुहिम छेड़ी है। राजेन्द्र उपाध्याय की समीक्षा सामान का बोझ के शीर्षक से ही असद जैदी के प्रति अवमानना का इजहार होता है, इसलिए जाहिर है कि समीक्षा में उन्हीं अंशों, कविताओं को उद्धरणीय माना गया जिनमें असद जैदी ने हिंदी संस्थाओं को किसी न किसी तरह कविताओं की विषयवस्तु बनाते हुए उन पर हिंदूकरण की अवधारणाएं चस्पा की हैं। इससे किसी को शायद ही गुरेज हो कि असद जैदी अच्छे कवियों में शुमार किए जाते रहे हैं, उन्हें मंगलेश डबराल और उनके समकालीन बराबर तरजीह भी देते रहे हैं। यह और बात है कि मंगलेश की हाई ओपीनियन के बावजूद असद न तो कभी बड़े सम्मान के भागी बने न ही कविता की मुख्य धारा में चर्चित हुए।
असद जैदी रघुवीर सहाय की छाया में पले-पुसे हैं। एक खास तरह की वक्रता के वे धनी भी हैं किन्तु इस संग्रह की समीक्षा करते हुए उपाध्याय ने उन पर मुसलमानी नजरिये से हिंदू संस्कृति, हिंदू संस्थाओं का मजाक उड़ाने का आरोप लगाया है। सामान की तलाश में एक अंश है--'यह उस सत्तावन की याद है जिसे पोंछ डाला था एक अखिल भरतीय भद्रलोक ने/अपनी अपनी गद्दियों पर बैठे बंकिमों और अमीचंदों और हरिश्चंद्रों और उनके वंशजों ने / जो खुद एक बेहतर गुलामी से ज्यादा कुछ नहीं चाहते थे/ जिस सन सत्तावन के लिए सिवा वितृष्णा या मौन के कुछ नहीं था मूलशंकरों, शिवप्रसादों, नरेन्द्रनाथों, ईश्वरचंद्रों, सैयद अहमदों, प्रताप नारायणों, मैथिलीशरणों और रामचंद्रों के मन में / और हिंदी के भद्र साहित्य में जिसकी पहली याद सत्तर अस्सी साल के बाद सुभद्रा ही को आई।' राजेन्द्र उपाध्याय ने कुछ और उदाहरण दे कर अन्यत्र हिंदू सांसद, हिंदी साहित्य सम्मेलन को हिंदू साहित्य सम्मेलन, विश्व हिंदी सम्मेलन को निखिल हिंदू सम्मेलन और नागरी प्रचारिणी सभा को हिंदू जाति परिषद कहने के कवि के तौर तरीकों को एक सांप्रदायिक झुकाव के वशीभूत माना है तथा कवि की संकीर्णता पर उंगली उठाई है। दरअसल सामान की तलाश एक बड़े आयाम और आयतन की कविता बन सकती थी। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि कवि रामचंद्रों, मूलशंकरों, मैथिलीशरणों इत्यादि को किस रूप में देखता है, बेशक यह प्रथमदृष्टअया हमें विचलित कर दे। विडंबना है कि कविता के अर्थगौरव को अलक्षित और अवमूल्यित करते हुए इसे सांप्रदायिक नजरिये से लिखी एक मुसलमान कवि की कविता के रूप मे देखा जा रहा है। यह कविता की परख के लिए विकसित संस्कारित दृष्टि का इस्तेमाल है। यही कविता यदि देवीप्रसाद मिश्र ने लिखी होती तो शायद इतना बवाल नहीं होता। हालांकि उनकी मुसलमान कविता को लेकर भी अभिधा के रथी आलोचकों, पाठकों को काफी असुविधा हुई थी।
कविता और कला की दुनिया में सेंसर्स नहीं चलते। हां धार्मिक उन्माद को न्योता देने वाली टिप्पणियों से बच कर भी अच्छी कविता लिखी जा सकती है। ऐसा नही है कि कवियों ने कभी संकीर्णतावादी शक्तियों को बख्शा हो। कविता के मुहावरे में अंट सकने वाली जितनी भी धारदार चोटें हो सकती हैं कवियों ने की हैं। मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय की फटकार यत्र-तत्र कविता में दिखती है जहां वे राजनेताओं, बुद्धिजीवियों और साहित्यिकों को बुरी तरह आड़े हाथों लेते हैं। सब चुप साहित्यिक चुप…कहने वाले मुक्तिबोध और हिंदी को दुहाजू की बीबी कहने वाले रघुवीर सहाय से बड़ा आलोचक अपने समय का कौन हो सकता है। याद आता है नागरी प्रचारिणी सभा को ही लक्ष्य कर लिखी ज्ञानेन्द्रपति की कविता का अंश है: हा हिंदी हा हिंदी करता हिंदी का दोमुंहा छलिया। नागरी प्रचारिणी सभा क्या मात्र कुछ लोगों के स्वार्थ-पूर्ति का संसाधन नही बन गयी है। रामचंद्र शुक्ल की प्रतिमा को लेकर लिखी अपनी एक अन्य कविता से वे शुक्ल जी के परिजनों के कोपभाजन बने हैं। विष्णुकांत शास्त्री के जमाने में जब उत्तरप्रदेश में सांस्कृतिक सभाओं की अचानक बाढ़-सी आ गयी थी, तब ज्ञानेन्द्र ने एक कविता लिखी थी: उनये हैं सांसकृतिक मेघ विद्युत्गर्भ। कबीर के बहाने बौद्धिक तिजारत करने बाले भी उनकी कविता के निशाने पर रहे--ज्ञान बूकते अभिमान थूकते प्रोफेसर…। विष्णु नागर की कविता बेचारों का हिंदू राष्ट्र पढ़ देखिए। इसे पढ़कर संघियों का खून न खौल जाए तो कहिए। अंत:करण को यह कविता हिला देती है। टोपी शुक्ला उपन्यास में राही मासूम रजा ने लिखा था, ऐसे नुरुल हसनों और रवीन्द्र भ्रमरों से युनिवर्सिटियां पटी पड़ी हैं। यही नहीं, मनमोहन की हमारा जातीय गौरव, कार्तिक स्नान व भारतीय संस्कृति जैसी कविता से गुजरते हुए हमें अपने जातीय गौरव के पतन और सांस्कृतिक क्षरण की अनुगूंजें कितनी साफ सुनाई देती हैं--कितना महान सांस्कृतिक दृश्य है कि / हत्याकांड सम्पन्न करने के बाद हत्यारा भीड़ भरे घाट पर आता है / और संस्कृत में धारावाहिक स्तोत्र बोलता हुआ/ रुकी हुई यमुना के रासायनिक जहर में / सौ मन दूध गिराता है। कविता के सच्चे अनुरागियों को इन कविताओं से कोई परेशानी नही हुई। किन्तु अचानक असद जैदी की कुछ कविताओं से कुछ समीक्षकों, आलोचकों को सांप्रदायवाद की गंध आने लगी है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वे मुसलमान हैं और हिंदू प्रतीकों को सवालों के दायरे में लाने की जु्र्रत की है। कबीर के शब्दों में कहने को जी करता है : मैं केहि समझावहुं ये सब जग अन्धा।
असद जैदी के बचाव में लिखी अपनी टिप्पणी में कृष्ण कल्पित भी खासा भावावेश के शिकार हुए हैं। यही कारण है कि वे समीक्षक को कमजर्फ और हिंदू समीक्षक या कूड़मगज समीक्षक कहने से अपने को बरज नहीं पाते। असहमतियों के खिलाफ लामबंद होने की यह अदा ठीक नहीं है। कृष्ण कल्पित का प्रतिरोध भी प्रकटत: केवल जनसत्ता की टिप्पणी के प्रति नहीं, प्रगतिशील आलोचक कर्मेन्दु शिशिर की द पब्लिक एजेंडा में छपी टिप्पणी के प्रत्युत्तर में व्यक्त किया गया है, जिसमें कर्मेन्दु असद की कविता की गहराई में उतरने के बजाय कुछ गिनी चुनी कविताओं में हिंदी-हिंदू प्रत्ययों को लेकर व्यक्त टिप्पणियों के आधार पर उन्हें सांप्रदायिकता के कटघरे में लेने की कोशिश करते हैं। किन्तु असद से भी ज्यादा उनका गुस्सा मंगलेश डबराल के प्रति प्रकट हुआ है क्योंकि कदाचित उनकी दृष्टि में उन्होंने असद जैदी की कद से ज्यादा तारीफ कर दी है। सामान की तलाश के ब्लर्ब में मंगलेश ने असद जैदी की कविताओं की विशेषताओं को लक्षित किया है और जैसा कि होता आया है ब्लर्ब में महनीयता का ज्ञापन ही होता है । वह कोई सच्ची आलोचना तो होती नहीं। लिहाजा मंगलेश ने भी असद को एक बड़ा और विलक्षण कवि कहने के मोह का संवरण नहीं किया है। लेकिन पहल की टिप्पणी में मंगलेश ने भी सामान की तलाश कविता को इस नाते ही ज्यादा तरजीह दी है कि 1857 को लेकर समकालीन कविता में यह एक पहली बड़ी कोशिश थी जो डेढ़ सौ साल पहले एक ऐतिहासिक और अद्वितीय भारतीय विद्रोह से पैदा हुए सवालों को हमारे वर्तमान के संकट से जोड़ती, उस पुरानी लड़ाई को आज की लड़ाई के रूप में पहचानती थी और एक दूसरी गुलामी के लिए तैयार हमारी सरकार की आलोचना भी करती थी। यह बड़ी कविता भले न हो। तिस पर कर्मेन्दु का कहना यह कि मंगलेश की फितरत रही है कि वे समकालीनों में जिस कवि को मारना चाहते हैं उसका परचम ऐसी ही अतिरंजित प्रशंसाओं से फहराते हैं।
कर्मेन्दु शिशिर प्रगतिशील धड़े के आलोचक हैं और गलत नहीं तो प्रगतिशीलता के कवच कुंडल से लैस समीक्षक ही ऐसे हो सकते हैं जो कविता संग्रह में कविता कहां है देखने की बजाय हिंदी और हिंदू कहां कहां और कितनी बार उद्धृत हुआ है या वह विचारधारा की कसौटी पर कितनी खरी है, इसका खतियान लेकर बैठ जाते हैं। मेरा कहना यह है कि कुछ इनी गिनी कविताओं में हिंदूवादी शक्तियों पर प्रहार के बावजूद असद जैदी का कवित्व अलक्षित नहीं किया जा सकता। पर यह देखना भी लाजमी है कि क्या वे जितना पोलिटकली लाउड हैं, उतना ही पोलिटिकली करेक्ट भी हैं। क्योंकि एक जमाना ही राजनीतिक रुझान वाली कविताओं का रहा है पर तब भी कवियों की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाए गए। तो क्या यह प्रचार पाने का कोई हथकंडा है जिससे गिन गिन कर हिंदी संस्थाओं को हिंदू संस्थान बताकर या ब्राह्मणवाद की गाय को लतिया कर बरसों से ठंडे बस्ते मे पड़े कवि की शख्सियत को विमर्श के दायरे में लाया जा सके।
जो भी हो, इधर साहित्य में मनमुटाव और धड़ेबंदियां बढ़ी हैं। चुपचाप कविता लिख रहे लोग न साहित्य अकादेमी पुरस्कार की दौड़ में होते हैं न किसी पुरस्कार की जूरी में। न ही वे कविता को प्रचार या विमर्श के केंद्र में लाने के लिए किसी संगठित किस्म की बयानबाजी का रास्ता अख्तियार करते हैं। तो क्या असद जैदी की उद्भावना में छपी सामान की तलाश कविता को पहल में दुबारा प्रकाशित करा कर उस पर मंगलेश की विस्तृत टिप्पणी का प्रकाशन किसी संगठित किस्म के प्रचार का उपक्रम है क्योंकि इस टिप्पणी के प्रकाशन से असद का कद निश्चय ही बढ़ा है जो उनके ही समकालीनों को कदाचित रास नही आ रहा हो। अचरज नहीं कि द पब्लिक एजेंडा में कर्मेन्दु शिशिर की टिप्पणी छाप कर पत्रिका के साहित्य संपादक और कवि पंकज सिंह ने किसी भीतरी मनोमालिन्य का हिसाब चुकता किया हो। यानी संगठित प्रचार का बदला संगठित दुष्प्रचार से लिया गया हो। यानी मंगलेश जो कह रहे हैं वह ब्रह्मा की लकीर नहीं है। उस पर नेपथ्य से गोलंदाजी कर असद को धूलिस्नात किया जा सकता है---और कर्मेन्दु की टिप्पणी यही काम करती है। बस चाबुक जरा जोर से पड़ा है। इससे कम से कम दिल्ली के साहित्यिक गलियारें में चल रहे शीतयुद्ध की भनक तो मिलती ही है जो कविता के किसी बृहत्तर अर्थात के संधान की बजाय ऐसे दुष्प्रचार से कविता के अंत:करण और कवि-व्यक्तित्व को लहूलुहान करने में ज्यादा दिलचस्पी लेता है।
अब कृष्ण कल्पित की टिप्पणी पर गौर करें जो उन्होंने जनसत्ता में लिखी है। असद जैदी को लेकर उनका संताप यह है कि असद को कविता का सुटेबल ब्वाय होने के बावजूद आज तक कोई पुरस्कार नहीं मिला। कुछ पुरस्कार तो उनके मित्रगण ही तय करते रहे हैं और अब तक अगर उनका नाम किसी सूची में नहीं आ सका तो इसके लिए कौन जिम्मेवार है। और फिर क्या पुरस्कार ही किसी कवि-लेखक का अंतिम लक्ष्य है। मैं नहीं समझता कि असद को इससे कोई फर्क पड़ता है। साहित्य अकादेमी की दौड़ में अभी विष्णु खरे, चंद्रकांत देवताले, विजेन्द्र, कितने ही बड़े कवि मौजूद हैं। इन्हें न भी मिले अकादेमी पुरस्कार तो इनका कद कहां किससे छोटा है। क्या केवल पुरस्कार मिलने-भर से वीरेन डंगवाल चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे और विजेन्द्र से बड़े हो जाते हैं। कतई नहीं। यह दरअसल श्रेणीकरण की सामंती और सांस्थानिक प्रवृत्ति का ही परिचायक है। पुरस्कार न मिलने और अपने एक ही संग्रह के बावजूद नरेश सक्सेना और आलोक धन्वा बड़े कवि हैं, इसमें संदेह नहीं। पुरस्कार आज जिस तरह से जोड़-तोड़ का प्रतिफल बन गए हैं, उससे अचरज नहीं कि संजीदा कवियों को धकिया कर संगठित संपर्कों के कवि पुरस्कार हथिया लें। ऐसा होता रहा है, ऐसा होता रहेगा। बकौल फिराक, लेने से ताजोतख्त मिलता है/ मांगे से भीख तक नहीं मिलती।
कृष्ण कल्पित यह भूल जाते हैं कि कविता एक सूक्ष्म विधा है। गद्यकार जिसे अपने तर्कों-कसौटियों पर घिस कर अपनी बात कहता है, कवि उसे अपनी संवेदना की सूक्ष्म तूलिका से रचता-उकेरता है। कविता में 1857 को लेकर असद जैदी की जो चिंताएं हैं उन्हें वे गद्य में कहते तो बेहतर होता। पर तब बात हवा में उछाल कर कवि की मासूम मुद्रा अपनाई नही जा सकती थी। गद्य में आपको तर्कों से लैस होना पड़ता है, आधार खड़े करने पड़ते हैं। और तब असद जैदी भी हिंदी की संस्थाओं पर हिंदू संस्थाओं का लेबल चस्पा कर या मैथिलीशरणों, रामचंद्रों, मूलशंकरों, शिवप्रसादों, नरेन्द्रनाथों, ईश्वरचंद्रों, सैयद अहमदों, प्रताप नारायणों, को सवालिया कठघरे में खड़े कर बिना तर्क के अपनी बात मनवा नहीं सकते थे। जाहिर है गद्य का काम तर्क से चलता है तो कविता का काम संवेदना से--और संवेदना को संवेदना से ही समझा जा सकता है। अब भावुक होकर भले ही कह लें कि सत्तर-अस्सी साल बाद सुभद्राकुमारी चौहान को 1857 की याद आई किन्तु सुभद्रा कुमारी चौहान को कवि मानते हुए आज के कवियों को लज्जा आती है। इतिहास गवाह है कि इसी दिल्ली में शील के कवि-कद को नकारने वाली पीढ़ी आज भी मौजूद है जो उन्हें कवि मानना तो दूर, उनकी शोक सभा तक में शरीक नहीं हुई। कल्पित का कहना कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अपने समय के एक अत्यंत महत्वपूर्ण कवि को हिंदी कविता के परिसर में उसकी उचित जगह देने को तैयार नहीं हैं, उचित नहीं है। अच्छे कवियों को कविता परिसर में दाखिल होने के लिए याचना नही करनी पड़ती, वे जाति, धर्म और भाषा बंधन को तोड़ कर अपनी शख्सियत का लोहा मनवा लेते हैं। रही बात इस कवि-चिंता की कि एक दिन इस दुनिया से उर्दू बोलने वालों का सफाया हो जाएगा बेबुनियाद है। यह अगर मुसलमानों की ओर इशारा है तो भी और उर्दू की ओर है तो भी। यह चिंता होती तो उर्दू के जाने माने शायर मुनव्वर राणा यह न कहते : लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कराती है / मैं उर्दू में गजल पढ़ता हूं हिंदी मुस्कराती है।
कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू। कवि निरंकुश होता है। इसीलिए आचार्य क्षेमेन्द्र ने कवियों को वैयाकरणों यानी आलोचकों से बचने की सलाह दी थी। असद जैदी को यह हक है कि वे हिंदी संस्थाओं के क्षरण को, देश में उभरते ब्राह्मणवाद को, हिंदूवाद को, सांप्रदायिक शक्तियों की कारगुजारियों को अपने नजरिये से देखें। उन्हें हक है कि अपने समय के धीरोदात्त मान लिए गए महापुरुषों, लेखकों, राजनीतिज्ञों को कठघरे में खड़ा करें क्योंकि कोई भी व्यक्ति सवालों से परे नहीं है। कविता में किसी संकीर्णता के वशीभूत होकर बड़ी बात नहीं कही जा सकती। जैदी से ज्यादा कौन जानता है कि बाबरी ध्वंस के परिप्रेक्ष्य में हिंदी में कितनी ही कविताएं लिखी गयीं और उन कविताओं की बुनियादी पीड़ा क्या है। सांप्रदायिकता के उभार के विरुद्ध कवियों ने हमेशा आवाज बुलंद की है तथा उसे व्यापक जनसमर्थन मिला है । क्या हम सांप्रदायिकता के उभार के परिप्रेक्ष्य में नरेश सक्सेना की कविता छह दिसंबर भूल सकते हैं। बाबरी ध्वंस के बहाने लिखी कुंवर नारायण की कविता अयोध्यया 1992 भूल सकते हैं। क्या गुजरात त्रासदी को लेकर लिखी देवीप्रसाद मिश्र की कविता जो पीवै नीर नयना को और मंगलेश डबराल की कविता गुजरात के मृतक का बयान को भूला जा सकता है। और मैं नहीं मानता कि जो कवि सांप्रदायिकता के खिलाफ लिखी कविताओं का दस बरस जैसा संचयन संपादित करता है, वह सांप्रदायिक भावना के वशीभूत हो सकता है। यह हो सकता है कि उसने अपनी बात कहने के लिए गलत विधा अपना ली हो। जो बात उसे एक बड़े निबंध में कहनी चाहिए थी, उसने उसे कविता में कह दिया है।
चंद बातें कविता और हिंदी समाज पर। अभी समाज इतना वयस्क नहीं हुआ है कि वह कविता को उसके सही परिप्रेक्ष्य में पकड़ सके। केदारनाथ सिंह ने कहा ही है कि इतनी गर्द भर गई है दुनिया में / कि हमें खरीद लाना चाहिए एक झाड़ू /और आत्मा के गलियारों के लिए चलाना चाहिए दीर्घ एक स्वच्छता अभियान। कविता अंत:करण की चीज है। न वह शुद्ध अंत:करण से लिखे बिना अच्छी बन सकती है न शुद्ध अंतकरण से पढ़े बिना उसका मर्म समझा जा सकता है। असद जैदी की कविता के साथ यही हुआ है। उनकी कविताओं को लेकर जिस तरह की लठैती चल रही है, ब्लाग पर उन्हें सांप्रदायिक ठहराने के लिए ब्लागर्स ताल ठोंक चुके हैं, उससे कविता की सच्ची समझ का रास्ता खुलता नहीं दीखता। कितनी अजीब बात है कि बमुश्किल चार-पांच कविताओं को आधार बना कर उनके पूरे संग्रह के अर्थगौरव को अलक्षित कर दिया गया है। कृष्ण कल्पित का समीक्षकों को कूड़मगज कहना भी असहमति का अनादर करना है। कविता किसी सर्वानुमति का एजेंडा नहीं है। असद की कविता से कोई असहमत हो या सहमत, यह उसकी रुचि पर निर्भर है, क्योंकि भिन्नरुचिहिलोक:। किन्तु आलोचना पर अपनी सतही समझ का मुलम्मा चढ़ाने से बाज आना चाहिए। कवियों और आलोचकों दोनों को अपना विजन बड़ा करने के लिए बड़े मुद्दों से टकराने की जरूरत है, फुलझड़ियों से काम नहीं चलने वाला। बकौल वसीम बरेलवी:
छोटी-छोटी बातें करके बड़े कहां बन पाओगे
संकरी गलियों से निकलो तो खुली सड़क पर आओगे।
ओम निश्चल
इन दिनों सामान की तलाश की समीक्षा के बहाने असद जैदी पर सांप्रदायिक होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। उन पर जनसत्ता के 11 मई 2008 अंक में प्रकाशित राजेन्द्र उपाध्याय की समीक्षा को आधार बनाते हुए 29 जून 2008 के जनसत्ता में ही कविता में आरी तारी शीर्षक प्रतिक्रिया लिख कर कृष्ण कल्पित ने असद जैदी के पक्ष में एक मुहिम छेड़ी है। राजेन्द्र उपाध्याय की समीक्षा सामान का बोझ के शीर्षक से ही असद जैदी के प्रति अवमानना का इजहार होता है, इसलिए जाहिर है कि समीक्षा में उन्हीं अंशों, कविताओं को उद्धरणीय माना गया जिनमें असद जैदी ने हिंदी संस्थाओं को किसी न किसी तरह कविताओं की विषयवस्तु बनाते हुए उन पर हिंदूकरण की अवधारणाएं चस्पा की हैं। इससे किसी को शायद ही गुरेज हो कि असद जैदी अच्छे कवियों में शुमार किए जाते रहे हैं, उन्हें मंगलेश डबराल और उनके समकालीन बराबर तरजीह भी देते रहे हैं। यह और बात है कि मंगलेश की हाई ओपीनियन के बावजूद असद न तो कभी बड़े सम्मान के भागी बने न ही कविता की मुख्य धारा में चर्चित हुए।
असद जैदी रघुवीर सहाय की छाया में पले-पुसे हैं। एक खास तरह की वक्रता के वे धनी भी हैं किन्तु इस संग्रह की समीक्षा करते हुए उपाध्याय ने उन पर मुसलमानी नजरिये से हिंदू संस्कृति, हिंदू संस्थाओं का मजाक उड़ाने का आरोप लगाया है। सामान की तलाश में एक अंश है--'यह उस सत्तावन की याद है जिसे पोंछ डाला था एक अखिल भरतीय भद्रलोक ने/अपनी अपनी गद्दियों पर बैठे बंकिमों और अमीचंदों और हरिश्चंद्रों और उनके वंशजों ने / जो खुद एक बेहतर गुलामी से ज्यादा कुछ नहीं चाहते थे/ जिस सन सत्तावन के लिए सिवा वितृष्णा या मौन के कुछ नहीं था मूलशंकरों, शिवप्रसादों, नरेन्द्रनाथों, ईश्वरचंद्रों, सैयद अहमदों, प्रताप नारायणों, मैथिलीशरणों और रामचंद्रों के मन में / और हिंदी के भद्र साहित्य में जिसकी पहली याद सत्तर अस्सी साल के बाद सुभद्रा ही को आई।' राजेन्द्र उपाध्याय ने कुछ और उदाहरण दे कर अन्यत्र हिंदू सांसद, हिंदी साहित्य सम्मेलन को हिंदू साहित्य सम्मेलन, विश्व हिंदी सम्मेलन को निखिल हिंदू सम्मेलन और नागरी प्रचारिणी सभा को हिंदू जाति परिषद कहने के कवि के तौर तरीकों को एक सांप्रदायिक झुकाव के वशीभूत माना है तथा कवि की संकीर्णता पर उंगली उठाई है। दरअसल सामान की तलाश एक बड़े आयाम और आयतन की कविता बन सकती थी। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि कवि रामचंद्रों, मूलशंकरों, मैथिलीशरणों इत्यादि को किस रूप में देखता है, बेशक यह प्रथमदृष्टअया हमें विचलित कर दे। विडंबना है कि कविता के अर्थगौरव को अलक्षित और अवमूल्यित करते हुए इसे सांप्रदायिक नजरिये से लिखी एक मुसलमान कवि की कविता के रूप मे देखा जा रहा है। यह कविता की परख के लिए विकसित संस्कारित दृष्टि का इस्तेमाल है। यही कविता यदि देवीप्रसाद मिश्र ने लिखी होती तो शायद इतना बवाल नहीं होता। हालांकि उनकी मुसलमान कविता को लेकर भी अभिधा के रथी आलोचकों, पाठकों को काफी असुविधा हुई थी।
कविता और कला की दुनिया में सेंसर्स नहीं चलते। हां धार्मिक उन्माद को न्योता देने वाली टिप्पणियों से बच कर भी अच्छी कविता लिखी जा सकती है। ऐसा नही है कि कवियों ने कभी संकीर्णतावादी शक्तियों को बख्शा हो। कविता के मुहावरे में अंट सकने वाली जितनी भी धारदार चोटें हो सकती हैं कवियों ने की हैं। मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय की फटकार यत्र-तत्र कविता में दिखती है जहां वे राजनेताओं, बुद्धिजीवियों और साहित्यिकों को बुरी तरह आड़े हाथों लेते हैं। सब चुप साहित्यिक चुप…कहने वाले मुक्तिबोध और हिंदी को दुहाजू की बीबी कहने वाले रघुवीर सहाय से बड़ा आलोचक अपने समय का कौन हो सकता है। याद आता है नागरी प्रचारिणी सभा को ही लक्ष्य कर लिखी ज्ञानेन्द्रपति की कविता का अंश है: हा हिंदी हा हिंदी करता हिंदी का दोमुंहा छलिया। नागरी प्रचारिणी सभा क्या मात्र कुछ लोगों के स्वार्थ-पूर्ति का संसाधन नही बन गयी है। रामचंद्र शुक्ल की प्रतिमा को लेकर लिखी अपनी एक अन्य कविता से वे शुक्ल जी के परिजनों के कोपभाजन बने हैं। विष्णुकांत शास्त्री के जमाने में जब उत्तरप्रदेश में सांस्कृतिक सभाओं की अचानक बाढ़-सी आ गयी थी, तब ज्ञानेन्द्र ने एक कविता लिखी थी: उनये हैं सांसकृतिक मेघ विद्युत्गर्भ। कबीर के बहाने बौद्धिक तिजारत करने बाले भी उनकी कविता के निशाने पर रहे--ज्ञान बूकते अभिमान थूकते प्रोफेसर…। विष्णु नागर की कविता बेचारों का हिंदू राष्ट्र पढ़ देखिए। इसे पढ़कर संघियों का खून न खौल जाए तो कहिए। अंत:करण को यह कविता हिला देती है। टोपी शुक्ला उपन्यास में राही मासूम रजा ने लिखा था, ऐसे नुरुल हसनों और रवीन्द्र भ्रमरों से युनिवर्सिटियां पटी पड़ी हैं। यही नहीं, मनमोहन की हमारा जातीय गौरव, कार्तिक स्नान व भारतीय संस्कृति जैसी कविता से गुजरते हुए हमें अपने जातीय गौरव के पतन और सांस्कृतिक क्षरण की अनुगूंजें कितनी साफ सुनाई देती हैं--कितना महान सांस्कृतिक दृश्य है कि / हत्याकांड सम्पन्न करने के बाद हत्यारा भीड़ भरे घाट पर आता है / और संस्कृत में धारावाहिक स्तोत्र बोलता हुआ/ रुकी हुई यमुना के रासायनिक जहर में / सौ मन दूध गिराता है। कविता के सच्चे अनुरागियों को इन कविताओं से कोई परेशानी नही हुई। किन्तु अचानक असद जैदी की कुछ कविताओं से कुछ समीक्षकों, आलोचकों को सांप्रदायवाद की गंध आने लगी है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वे मुसलमान हैं और हिंदू प्रतीकों को सवालों के दायरे में लाने की जु्र्रत की है। कबीर के शब्दों में कहने को जी करता है : मैं केहि समझावहुं ये सब जग अन्धा।
असद जैदी के बचाव में लिखी अपनी टिप्पणी में कृष्ण कल्पित भी खासा भावावेश के शिकार हुए हैं। यही कारण है कि वे समीक्षक को कमजर्फ और हिंदू समीक्षक या कूड़मगज समीक्षक कहने से अपने को बरज नहीं पाते। असहमतियों के खिलाफ लामबंद होने की यह अदा ठीक नहीं है। कृष्ण कल्पित का प्रतिरोध भी प्रकटत: केवल जनसत्ता की टिप्पणी के प्रति नहीं, प्रगतिशील आलोचक कर्मेन्दु शिशिर की द पब्लिक एजेंडा में छपी टिप्पणी के प्रत्युत्तर में व्यक्त किया गया है, जिसमें कर्मेन्दु असद की कविता की गहराई में उतरने के बजाय कुछ गिनी चुनी कविताओं में हिंदी-हिंदू प्रत्ययों को लेकर व्यक्त टिप्पणियों के आधार पर उन्हें सांप्रदायिकता के कटघरे में लेने की कोशिश करते हैं। किन्तु असद से भी ज्यादा उनका गुस्सा मंगलेश डबराल के प्रति प्रकट हुआ है क्योंकि कदाचित उनकी दृष्टि में उन्होंने असद जैदी की कद से ज्यादा तारीफ कर दी है। सामान की तलाश के ब्लर्ब में मंगलेश ने असद जैदी की कविताओं की विशेषताओं को लक्षित किया है और जैसा कि होता आया है ब्लर्ब में महनीयता का ज्ञापन ही होता है । वह कोई सच्ची आलोचना तो होती नहीं। लिहाजा मंगलेश ने भी असद को एक बड़ा और विलक्षण कवि कहने के मोह का संवरण नहीं किया है। लेकिन पहल की टिप्पणी में मंगलेश ने भी सामान की तलाश कविता को इस नाते ही ज्यादा तरजीह दी है कि 1857 को लेकर समकालीन कविता में यह एक पहली बड़ी कोशिश थी जो डेढ़ सौ साल पहले एक ऐतिहासिक और अद्वितीय भारतीय विद्रोह से पैदा हुए सवालों को हमारे वर्तमान के संकट से जोड़ती, उस पुरानी लड़ाई को आज की लड़ाई के रूप में पहचानती थी और एक दूसरी गुलामी के लिए तैयार हमारी सरकार की आलोचना भी करती थी। यह बड़ी कविता भले न हो। तिस पर कर्मेन्दु का कहना यह कि मंगलेश की फितरत रही है कि वे समकालीनों में जिस कवि को मारना चाहते हैं उसका परचम ऐसी ही अतिरंजित प्रशंसाओं से फहराते हैं।
कर्मेन्दु शिशिर प्रगतिशील धड़े के आलोचक हैं और गलत नहीं तो प्रगतिशीलता के कवच कुंडल से लैस समीक्षक ही ऐसे हो सकते हैं जो कविता संग्रह में कविता कहां है देखने की बजाय हिंदी और हिंदू कहां कहां और कितनी बार उद्धृत हुआ है या वह विचारधारा की कसौटी पर कितनी खरी है, इसका खतियान लेकर बैठ जाते हैं। मेरा कहना यह है कि कुछ इनी गिनी कविताओं में हिंदूवादी शक्तियों पर प्रहार के बावजूद असद जैदी का कवित्व अलक्षित नहीं किया जा सकता। पर यह देखना भी लाजमी है कि क्या वे जितना पोलिटकली लाउड हैं, उतना ही पोलिटिकली करेक्ट भी हैं। क्योंकि एक जमाना ही राजनीतिक रुझान वाली कविताओं का रहा है पर तब भी कवियों की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाए गए। तो क्या यह प्रचार पाने का कोई हथकंडा है जिससे गिन गिन कर हिंदी संस्थाओं को हिंदू संस्थान बताकर या ब्राह्मणवाद की गाय को लतिया कर बरसों से ठंडे बस्ते मे पड़े कवि की शख्सियत को विमर्श के दायरे में लाया जा सके।
जो भी हो, इधर साहित्य में मनमुटाव और धड़ेबंदियां बढ़ी हैं। चुपचाप कविता लिख रहे लोग न साहित्य अकादेमी पुरस्कार की दौड़ में होते हैं न किसी पुरस्कार की जूरी में। न ही वे कविता को प्रचार या विमर्श के केंद्र में लाने के लिए किसी संगठित किस्म की बयानबाजी का रास्ता अख्तियार करते हैं। तो क्या असद जैदी की उद्भावना में छपी सामान की तलाश कविता को पहल में दुबारा प्रकाशित करा कर उस पर मंगलेश की विस्तृत टिप्पणी का प्रकाशन किसी संगठित किस्म के प्रचार का उपक्रम है क्योंकि इस टिप्पणी के प्रकाशन से असद का कद निश्चय ही बढ़ा है जो उनके ही समकालीनों को कदाचित रास नही आ रहा हो। अचरज नहीं कि द पब्लिक एजेंडा में कर्मेन्दु शिशिर की टिप्पणी छाप कर पत्रिका के साहित्य संपादक और कवि पंकज सिंह ने किसी भीतरी मनोमालिन्य का हिसाब चुकता किया हो। यानी संगठित प्रचार का बदला संगठित दुष्प्रचार से लिया गया हो। यानी मंगलेश जो कह रहे हैं वह ब्रह्मा की लकीर नहीं है। उस पर नेपथ्य से गोलंदाजी कर असद को धूलिस्नात किया जा सकता है---और कर्मेन्दु की टिप्पणी यही काम करती है। बस चाबुक जरा जोर से पड़ा है। इससे कम से कम दिल्ली के साहित्यिक गलियारें में चल रहे शीतयुद्ध की भनक तो मिलती ही है जो कविता के किसी बृहत्तर अर्थात के संधान की बजाय ऐसे दुष्प्रचार से कविता के अंत:करण और कवि-व्यक्तित्व को लहूलुहान करने में ज्यादा दिलचस्पी लेता है।
अब कृष्ण कल्पित की टिप्पणी पर गौर करें जो उन्होंने जनसत्ता में लिखी है। असद जैदी को लेकर उनका संताप यह है कि असद को कविता का सुटेबल ब्वाय होने के बावजूद आज तक कोई पुरस्कार नहीं मिला। कुछ पुरस्कार तो उनके मित्रगण ही तय करते रहे हैं और अब तक अगर उनका नाम किसी सूची में नहीं आ सका तो इसके लिए कौन जिम्मेवार है। और फिर क्या पुरस्कार ही किसी कवि-लेखक का अंतिम लक्ष्य है। मैं नहीं समझता कि असद को इससे कोई फर्क पड़ता है। साहित्य अकादेमी की दौड़ में अभी विष्णु खरे, चंद्रकांत देवताले, विजेन्द्र, कितने ही बड़े कवि मौजूद हैं। इन्हें न भी मिले अकादेमी पुरस्कार तो इनका कद कहां किससे छोटा है। क्या केवल पुरस्कार मिलने-भर से वीरेन डंगवाल चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे और विजेन्द्र से बड़े हो जाते हैं। कतई नहीं। यह दरअसल श्रेणीकरण की सामंती और सांस्थानिक प्रवृत्ति का ही परिचायक है। पुरस्कार न मिलने और अपने एक ही संग्रह के बावजूद नरेश सक्सेना और आलोक धन्वा बड़े कवि हैं, इसमें संदेह नहीं। पुरस्कार आज जिस तरह से जोड़-तोड़ का प्रतिफल बन गए हैं, उससे अचरज नहीं कि संजीदा कवियों को धकिया कर संगठित संपर्कों के कवि पुरस्कार हथिया लें। ऐसा होता रहा है, ऐसा होता रहेगा। बकौल फिराक, लेने से ताजोतख्त मिलता है/ मांगे से भीख तक नहीं मिलती।
कृष्ण कल्पित यह भूल जाते हैं कि कविता एक सूक्ष्म विधा है। गद्यकार जिसे अपने तर्कों-कसौटियों पर घिस कर अपनी बात कहता है, कवि उसे अपनी संवेदना की सूक्ष्म तूलिका से रचता-उकेरता है। कविता में 1857 को लेकर असद जैदी की जो चिंताएं हैं उन्हें वे गद्य में कहते तो बेहतर होता। पर तब बात हवा में उछाल कर कवि की मासूम मुद्रा अपनाई नही जा सकती थी। गद्य में आपको तर्कों से लैस होना पड़ता है, आधार खड़े करने पड़ते हैं। और तब असद जैदी भी हिंदी की संस्थाओं पर हिंदू संस्थाओं का लेबल चस्पा कर या मैथिलीशरणों, रामचंद्रों, मूलशंकरों, शिवप्रसादों, नरेन्द्रनाथों, ईश्वरचंद्रों, सैयद अहमदों, प्रताप नारायणों, को सवालिया कठघरे में खड़े कर बिना तर्क के अपनी बात मनवा नहीं सकते थे। जाहिर है गद्य का काम तर्क से चलता है तो कविता का काम संवेदना से--और संवेदना को संवेदना से ही समझा जा सकता है। अब भावुक होकर भले ही कह लें कि सत्तर-अस्सी साल बाद सुभद्राकुमारी चौहान को 1857 की याद आई किन्तु सुभद्रा कुमारी चौहान को कवि मानते हुए आज के कवियों को लज्जा आती है। इतिहास गवाह है कि इसी दिल्ली में शील के कवि-कद को नकारने वाली पीढ़ी आज भी मौजूद है जो उन्हें कवि मानना तो दूर, उनकी शोक सभा तक में शरीक नहीं हुई। कल्पित का कहना कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अपने समय के एक अत्यंत महत्वपूर्ण कवि को हिंदी कविता के परिसर में उसकी उचित जगह देने को तैयार नहीं हैं, उचित नहीं है। अच्छे कवियों को कविता परिसर में दाखिल होने के लिए याचना नही करनी पड़ती, वे जाति, धर्म और भाषा बंधन को तोड़ कर अपनी शख्सियत का लोहा मनवा लेते हैं। रही बात इस कवि-चिंता की कि एक दिन इस दुनिया से उर्दू बोलने वालों का सफाया हो जाएगा बेबुनियाद है। यह अगर मुसलमानों की ओर इशारा है तो भी और उर्दू की ओर है तो भी। यह चिंता होती तो उर्दू के जाने माने शायर मुनव्वर राणा यह न कहते : लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कराती है / मैं उर्दू में गजल पढ़ता हूं हिंदी मुस्कराती है।
कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू। कवि निरंकुश होता है। इसीलिए आचार्य क्षेमेन्द्र ने कवियों को वैयाकरणों यानी आलोचकों से बचने की सलाह दी थी। असद जैदी को यह हक है कि वे हिंदी संस्थाओं के क्षरण को, देश में उभरते ब्राह्मणवाद को, हिंदूवाद को, सांप्रदायिक शक्तियों की कारगुजारियों को अपने नजरिये से देखें। उन्हें हक है कि अपने समय के धीरोदात्त मान लिए गए महापुरुषों, लेखकों, राजनीतिज्ञों को कठघरे में खड़ा करें क्योंकि कोई भी व्यक्ति सवालों से परे नहीं है। कविता में किसी संकीर्णता के वशीभूत होकर बड़ी बात नहीं कही जा सकती। जैदी से ज्यादा कौन जानता है कि बाबरी ध्वंस के परिप्रेक्ष्य में हिंदी में कितनी ही कविताएं लिखी गयीं और उन कविताओं की बुनियादी पीड़ा क्या है। सांप्रदायिकता के उभार के विरुद्ध कवियों ने हमेशा आवाज बुलंद की है तथा उसे व्यापक जनसमर्थन मिला है । क्या हम सांप्रदायिकता के उभार के परिप्रेक्ष्य में नरेश सक्सेना की कविता छह दिसंबर भूल सकते हैं। बाबरी ध्वंस के बहाने लिखी कुंवर नारायण की कविता अयोध्यया 1992 भूल सकते हैं। क्या गुजरात त्रासदी को लेकर लिखी देवीप्रसाद मिश्र की कविता जो पीवै नीर नयना को और मंगलेश डबराल की कविता गुजरात के मृतक का बयान को भूला जा सकता है। और मैं नहीं मानता कि जो कवि सांप्रदायिकता के खिलाफ लिखी कविताओं का दस बरस जैसा संचयन संपादित करता है, वह सांप्रदायिक भावना के वशीभूत हो सकता है। यह हो सकता है कि उसने अपनी बात कहने के लिए गलत विधा अपना ली हो। जो बात उसे एक बड़े निबंध में कहनी चाहिए थी, उसने उसे कविता में कह दिया है।
चंद बातें कविता और हिंदी समाज पर। अभी समाज इतना वयस्क नहीं हुआ है कि वह कविता को उसके सही परिप्रेक्ष्य में पकड़ सके। केदारनाथ सिंह ने कहा ही है कि इतनी गर्द भर गई है दुनिया में / कि हमें खरीद लाना चाहिए एक झाड़ू /और आत्मा के गलियारों के लिए चलाना चाहिए दीर्घ एक स्वच्छता अभियान। कविता अंत:करण की चीज है। न वह शुद्ध अंत:करण से लिखे बिना अच्छी बन सकती है न शुद्ध अंतकरण से पढ़े बिना उसका मर्म समझा जा सकता है। असद जैदी की कविता के साथ यही हुआ है। उनकी कविताओं को लेकर जिस तरह की लठैती चल रही है, ब्लाग पर उन्हें सांप्रदायिक ठहराने के लिए ब्लागर्स ताल ठोंक चुके हैं, उससे कविता की सच्ची समझ का रास्ता खुलता नहीं दीखता। कितनी अजीब बात है कि बमुश्किल चार-पांच कविताओं को आधार बना कर उनके पूरे संग्रह के अर्थगौरव को अलक्षित कर दिया गया है। कृष्ण कल्पित का समीक्षकों को कूड़मगज कहना भी असहमति का अनादर करना है। कविता किसी सर्वानुमति का एजेंडा नहीं है। असद की कविता से कोई असहमत हो या सहमत, यह उसकी रुचि पर निर्भर है, क्योंकि भिन्नरुचिहिलोक:। किन्तु आलोचना पर अपनी सतही समझ का मुलम्मा चढ़ाने से बाज आना चाहिए। कवियों और आलोचकों दोनों को अपना विजन बड़ा करने के लिए बड़े मुद्दों से टकराने की जरूरत है, फुलझड़ियों से काम नहीं चलने वाला। बकौल वसीम बरेलवी:
छोटी-छोटी बातें करके बड़े कहां बन पाओगे
संकरी गलियों से निकलो तो खुली सड़क पर आओगे।
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34 comments:
yogendrji maine post padh kr yh anubhaw kiya ki aap paripekshya ko sahi-sahi samajhne ki koshish kr rhe hain...omji wiwaad nhin, kavitaon ka mulyankan apekshit tha aapse...bhrhaal...
om ji,karmendu ji ne josawal uthaye hai-1857 aur dushari kavita per.use aapne gol ker unko sandigdh bna rahe hai.meri samajh se bat we halke dhng se nahi ker rahe hai.vaise aap vikhyat aalochak hai mai to mamulisa.khud ko bra banne me dushri ke likhe per aese hi tippni likhi jane ka chalan hai.kavi,dilli
अन्यथा न लेंगे, कोइ तीसरा आयाम इस आलेख से भी नहीं खुल रहा है ? सांख्यिकीय गणना कुछ ज्यादा ही हो गयी जो कि हो ही रही है. कुछ कविताओं के पाठ खोलेने की पहल ही शायद "प्रक्षेपित अतियों के बीच" कोई नयी बात हो सकती है.
blog sampadk aur om ji ne bare hi kayede mauke ka labh uthaya hai.hindu sansad,urdu ki hatya ka hindi per aarop aur 1857 per karmenduji ka uthaya buniyadi mahtwa ka sawal--sab per lipa poti ker aapne unko bhi ochha bnayahai. apne ko uper uthane es tarike per kisi ne thik likha hai.vaise aap ka blog gambhir lagta hai.diwaker.varansi
om nischal ne santulit likha hai.lekin ve badi safai se ek bindu ko gayab kar gaye jis par itna maha-bharat macha hua hai.karmendu ne bahas ki hai ki jis trak se zaidi sahab hndu sansad ko apne katghare me late hai kya usi trak se ek muslim sansad ko katghare me nahi liya ja sakta?yah asad ki rajnitik samajh ka mamla bhi banta hai.yadi dono baat saman hai yo phir kavita ka shirshak' hindu sansad 'hi dene ka auchitya kya tha?yah buniyadi bahas hai .om is baat par mera agyan door kare to mujhe khushi hogi.
-Ram shanker chuhan ,jhansi
यदि तुलसी दास की एक पंक्ति के एक शब्द को पकड़ कर सारी मुख्य धारा की आलोचना आज तक उन्हें नारी निंदक या नारी विरोधी या यह या वह कह कर गरियाती आ सकती है तो यहाँ तो पुलिंदे के पुलिंदे हैं.
गालियाँ सदा व सारी हिंदू को. तथा हिंदू को गाली देने वाले, विरोध करने वाले, रा मटेरियल समझने वाले, हिंदू निंदक, हिंदू विरोधी (या बस नॉन हिंदू भी हुआ तो भी काफी है),सब के सब महान लेखक, तत्वदर्शी, अर्थान्वितिसमन्वित, व्यंजनावृद्ध, काव्य सौष्ठव से लबरेज ही होते हैं. और उन्हें या इस रास्ते या उस रस्ते से महाकवि के सिंहासन पर आरूढ़ करवाया जाना ही चाहिए. कभी आप करवाएँ, कभी ये करवाएँ , कभी वे करवाएँ. सब प्रायोजित आलोचना के खेल में रस ले रहे हैं व साजिशों को अंजाम दे रहे हैं . असल बात भले ही गोली-सी सटक लें बिन पानी बिन नून. कौन यहाँ गर्दन पकड़ने आने वाला है.
एक सीधी -सी बात यह न कवि समझने को तैयार है न उसकी दुकान के बैनर लगाने वाले, की भी लेखक के लिखे का अर्थ लगाने में पाठक सक्षम है. सारा का सारा शोध किसी एक तत्त्व को कैसे निकाल कर (रचनाकार के लेखन से) माखन सा ऊपर तिरा देता है. यह तो पाठ विश्लेषण है . कोई बाहर से आरोपित- प्रत्यारोपित पाठ थोड़े है कि कवि महोदय या उनके चेले चमटे कुलबुलाने लगें या विश्लेषक को गरियाते धकियाते पाठ के स्पष्टीकरण देने लगें या विश्लेषण के औजार भी ख़ुद उपलब्ध करवाने लगें.
सब के सब लगे है पूरी साहित्यिक परम्परा को आँय-बाँय धता बताने वाले की महानता के गुणगान व स्पष्टीकरण में. धिक्कार है ऐसी आलोचना धारा को. name dropping से हर कोई ख़ुद को महान प्रमाणित करने में लगा है.
भावना काम कर रही है. बकौल एक शायर-- दाबिरे हश्र मेरा नाम ए पामाल न देख, इसमेँ कई पर्दानशीनोँ के भी नाम आते हैँ. न असद जैदी इन टोटकोँ से महान बनने वाले हैँ, न कोई मँगलेश उन्हेँ महान बना सकते हैँ. सच्चे हितैशी होते मँगलेश तो कभी तो कहा होता भाई इस पुरस्कार का हक़दार मैँ नहीँ, असद जैदी हैँ. अपने लिये सारे पुरस्कार और असद को झुनझना. वह हिँदु लेखकोँ, हिँदी सँस्थाओँ की कब तक गाये-बजाये. असद ने मँगलेश के लिये जितना किया है, मँगलेश उसका रिण उतार रहे हैँ. रही बात कर्मेँदु शिशिर की तो उनका भी लेना देना असद की कविता से उतना नई है, जितना मँगलेश से है. असद केवल माध्यम बने हैँ बस्. असद और मँगलेश के लिये अपमान की ज़मीन मुहैय्या कराने का काम तो पँकज सिंघ ने किया है. क्योँकि उन्हेँ तो अपनी पत्रिका की टी आर पी बढानी थी. आब बारी होगी असद को कवि ठहराने की तो इस काम मे भी मँगलेश के बनारसी और देहलवी शिश्य लग गये होँगे. और कर्मेँदु तो मोर्चे पर तैनात ही हैँ. वे भी एक श्वेतपत्र तैयार करने मेँ लगे होँगेँ. इन कविता हितैशियोँ से भगवान बचाये
ओम निश्चल जी का नज़रिया बेहद सँतुलित है. इस सँग्राम मेँ किसी बहुत पुराने मनोमालिन्य की हीन भावना काम कर रही है. बकौल एक शायर-- दाबिरे हश्र मेरा नाम ए पामाल न देख, इसमेँ कई पर्दानशीनोँ के भी नाम आते हैँ. न असद जैदी इन टोटकोँ से महान बनने वाले हैँ, न कोई मँगलेश उन्हेँ महान बना सकते हैँ. सच्चे हितैशी होते मँगलेश तो कभी तो कहा होता भाई इस पुरस्कार का हक़दार मैँ नहीँ, असद जैदी हैँ. अपने लिये सारे पुरस्कार और असद को झुनझना. वह हिँदु लेखकोँ, हिँदी सँस्थाओँ की कब तक गाये-बजाये. असद ने मँगलेश के लिये जितना किया है, मँगलेश उसका रिण उतार रहे हैँ. रही बात कर्मेँदु शिशिर की तो उनका भी लेना देना असद की कविता से उतना नई है, जितना मँगलेश से है. असद केवल माध्यम बने हैँ बस्. असद और मँगलेश के लिये अपमान की ज़मीन मुहैय्या कराने का काम तो पँकज सिंघ ने किया है. क्योँकि उन्हेँ तो अपनी पत्रिका की टी आर पी बढानी थी. आब बारी होगी असद को कवि ठहराने की तो इस काम मे भी मँगलेश के बनारसी और देहलवी शिश्य लग गये होँगे. और कर्मेँदु तो मोर्चे पर तैनात ही हैँ. वे भी एक श्वेतपत्र तैयार करने मेँ लगे होँगेँ. इन कविता हितैशियोँ से भगवान बचाये.
राम शँकर चौहान जी, हिँदू साँसद का अर्थ उन साँसदोँ से है जो गर्व से कहो हम हिँदू हैँ वाली कोटि के हैँ. हिँदू यहाँ एक लाक्षणिक प्रयोग है. इसका अभिप्राय सभी साँसदोँ से नही है. --ओम निश्चल
Om ji ne ek zaroori tippanni likhii hain. main unse sahmat hoon. jald hee vistaar se likhta hoon.
piyush daiya
Om ji-aapne chauhan ji ke utter me jo kutark rakha hai, usse yah to saf hai ki aapka paksh kya hai aur khna khare hai.tab nishpkshta ki nautanki kis liye.sidhe-sishe karmendu ji se aap aur blog sampadak aapna hisab chukale.karmendu ji jardast sahas aur tak ke sath sabki bolti band ker di hai.aap log jor tor karte rahe. R.K.Singh jaunpur
aaj ek jankar aaye hai to bat darj kra raha.aapne phone per kha ki mai dosti nibha rha aesa karna galat bhi nahi.aapne dusru jagah mere paksh me likhne ki bat bhi kahi.mai to 4 bate avinash ko likhi thi aapko email kiya tha.kayde se aapko wah bate deni chahiye.mai gut me n rahta hu n hi gut bnata hu.mast jeev hu.n der n lobh jo sahi lgta hai likhta hu.sath aur virod ke chakker me nahi parta.ab bhi mai khud ko sahi hi samajh rha hu siway masjid wali kavita ke jis per aaderniya vishnu khare ji ne niji email me ek vindu sujhaya tha.aap dosdi jarur nibhaye eska fayda hi hoga.
om ji, agar karmendu ji ki bat sahi hai to aap apne dosto-dushmno ki soochi bhi darj ker de.aap aur aapke blog sampadk ne karmendu ji ki chhavi dang se khrab ki aur sachmuch aapni nispaksh bnali.aap longo ka koi niji sihab hai to thik varna karmendu ji ne abhoot poorv sahas ka parichay de hi diya hai.ab jisko lipa poti karni hai karta rahe.B.K.Panday Allahabad
pichale kuch dinon se Asad zaidi ki kavitao ko lekar jis tarah ki galat aur oot-patang vyakhyaen aa rahi hain, vah dekh kar mujhe gahra afsos hua hai. Asad zaidi ki ek kavita 'Hindu sansad'par karmendu ji ne jaise aarop lagaye hain vah mujhe kavi ke saath kuch zyadti hoti lag rahi hai.Is kavita ke neeche se yadi ham kavi ka nam nikal den to kya yah kavita ham me se koi bhi nahi likh raha hota?.sirf Asad ek minority community se hai isliye usase yah apeksha karna ki vah muslim sansad par bhi vaisi kavita kyo nahi likhta ya usane kavita ka shirshak "Hindu sandsad "hi kyo diya hai - yah ek bilkul galat aur anti-literary approach hai.aisi galat aur nasanjhi se bhari vyakhyayen sahitya ke kisi bhi gambhir pathak ko mis guide karti hain.kavi ko poora haq hai vah chahe jis par kavita likhe aur apne experience ko samne laye. Asad agar ek hindu fasicst sansad par kavita likhate hain to yah kaise sabit ho gaya ki ve communal hain?kya unhone kahin par bhi muslim sansad ki taraf daari ki hai?mere khayal me communal ve tab hote jab ve hindu sansad ko cricise kar rahe hote aur usi samay muslim sansad ko defend kar rahe hote.kya itni mamooli si baat bhi ham nahi samajh pate hain?
ek rachanakar ko poora haq hai ,azadi hai, ki vah chahe jis vishay par likhe ,aap use dictate nahi kar sakte ki is par likh aur us par mat likh.jo uske experience ka dayra hoga ,vah usi par to likhega. ek pathak ke roop me aap keval yah dekhne ka liye swatantra hain ki uska anubhav kitna gahra hai?yadi uske anubhav me aapko taqat nazar nahi aati to beshaq reject kar dijiye uska creation ,lekin ishwar ke liye use dictate mat kariye.uski aazadi mat cheeniye.yadi literature me ham padhe -likhe log bhi is tarah ka approach rakhne lage to yah bahut bhayanak baat hohi.ek bahut bada samaj to vaise hi communal devide ki giraft me aa chuka hai.asad ko poora adikaar hai ki vah 'hindu sansad" aur keval hindu sansad par hi apne ko focus kare.
Ek kavi me aur ek journalist me yahi buniyaadi farq hota hai ki ek journalist dono or ke tathyon ko dete hue apni report ko objective aur santulit banata hai , jabki lekhak ka kaam subjective aur experienced base hota hai .we always judge the quality of a creation by the depth of its experience not as how much the experience is exhaustive.and for that matter let me repeat the famous saying of great thinker Kant that every creative experience is a half truth. there is no ultimate truth in literature.
Dosto, yah ho sakta hai ki "Hindu sansad' kavita likhte hue ve sirf ek paktch ki baat ,yani half-truth likh rahe hon lekin iske bavjood unki branding nahi ki ja sakti.when he is writing on hindu politician he is not justifying a muslim politician .please , as a reader don't over-step yuor limits.when he is writing on a 'Hindu Sansad' he is not trying to make out that all hindus are like that.
Don't you know that when lot of hindu writers migrated from pakistan after partion , that had all the bitter experiences of sufferings at the hands of muslim politicians over there?they wrote lot of poems and short stories criticising muslim fundamentalist forces. Does it mean that they were writing against muslims?Does it mean they were communal writers?Did we asked them to write on hindu communal forces also? while it was a fact that fanatics were active on both the sides.So in this sense all literature expresses only half-truths.
The whole second world war literature is available on the sufferings of jews community..Do we ask why these jews writers are not writing about the shortcomings of their own community?Or do we say that these second world war poets were anti-Germens?So plese don't derive such easy and convenient conclusions in literature.
Asad ho sakta hai ki bahut sadharan kavi hi hon aur apne kuch mitro dwara bevajah uchale ja rahe hon.Aap unki kavita ki quality par baat kariye. lekin unhe communal poet kahna main samajhta hoon ek bahut badi naadani ki baat hai aur kahi yah bhi darshati hai ki hamare sarokaar literature se hain hi nahi .aur ham ek gandi rajniti kar rahe hain. bas main itna hi kahna chahta hoon. yah bhi ho sakta hai meri yah samajh bilkul galat ho.
-Anand
pichale kuch dinon se Asad zaidi ki kavitao ko lekar jis tarah ki galat aur oot-patang vyakhyaen aa rahi hain, vah dekh kar mujhe gahra afsos hua hai. Asad zaidi ki ek kavita 'Hindu sansad'par karmendu ji ne jaise aarop lagaye hain vah mujhe kavi ke saath kuch zyadti hoti lag rahi hai.Is kavita ke neeche se yadi ham kavi ka nam nikal den to kya yah kavita ham me se koi bhi nahi likh raha hota?.sirf Asad ek minority community se hai isliye usase yah apeksha karna ki vah muslim sansad par bhi vaisi kavita kyo nahi likhta ya usane kavita ka shirshak "Hindu sandsad "hi kyo diya hai - yah ek bilkul galat aur anti-literary approach hai.aisi galat aur nasanjhi se bhari vyakhyayen sahitya ke kisi bhi gambhir pathak ko mis guide karti hain.kavi ko poora haq hai vah chahe jis par kavita likhe aur apne experience ko samne laye. Asad agar ek hindu fasicst sansad par kavita likhate hain to yah kaise sabit ho gaya ki ve communal hain?kya unhone kahin par bhi muslim sansad ki taraf daari ki hai?mere khayal me communal ve tab hote jab ve hindu sansad ko cricise kar rahe hote aur usi samay muslim sansad ko defend kar rahe hote.kya itni mamooli si baat bhi ham nahi samajh pate hain?
ek rachanakar ko poora haq hai ,azadi hai, ki vah chahe jis vishay par likhe ,aap use dictate nahi kar sakte ki is par likh aur us par mat likh.jo uske experience ka dayra hoga ,vah usi par to likhega. ek pathak ke roop me aap keval yah dekhne ka liye swatantra hain ki uska anubhav kitna gahra hai?yadi uske anubhav me aapko taqat nazar nahi aati to beshaq reject kar dijiye uska creation ,lekin ishwar ke liye use dictate mat kariye.uski aazadi mat cheeniye.yadi literature me ham padhe -likhe log bhi is tarah ka approach rakhne lage to yah bahut bhayanak baat hohi.ek bahut bada samaj to vaise hi communal devide ki giraft me aa chuka hai.asad ko poora adikaar hai ki vah 'hindu sansad" aur keval hindu sansad par hi apne ko focus kare.
Ek kavi me aur ek journalist me yahi buniyaadi farq hota hai ki ek journalist dono or ke tathyon ko dete hue apni report ko objective aur santulit banata hai , jabki lekhak ka kaam subjective aur experienced base hota hai .we always judge the quality of a creation by the depth of its experience not as how much the experience is exhaustive.and for that matter let me repeat the famous saying of great thinker Kant that every creative experience is a half truth. there is no ultimate truth in literature.
Dosto, yah ho sakta hai ki "Hindu sansad' kavita likhte hue ve sirf ek paktch ki baat ,yani half-truth likh rahe hon lekin iske bavjood unki branding nahi ki ja sakti.when he is writing on hindu politician he is not justifying a muslim politician .please , as a reader don't over-step yuor limits.when he is writing on a 'Hindu Sansad' he is not trying to make out that all hindus are like that.
Don't you know that when lot of hindu writers migrated from pakistan after partion , that had all the bitter experiences of sufferings at the hands of muslim politicians over there?they wrote lot of poems and short stories criticising muslim fundamentalist forces. Does it mean that they were writing against muslims?Does it mean they were communal writers?Did we asked them to write on hindu communal forces also? while it was a fact that fanatics were active on both the sides.So in this sense all literature expresses only half-truths.
The whole second world war literature is available on the sufferings of jews community..Do we ask why these jews writers are not writing about the shortcomings of their own community?Or do we say that these second world war poets were anti-Germens?So plese don't derive such easy and convenient conclusions in literature.
Asad ho sakta hai ki bahut sadharan kavi hi hon aur apne kuch mitro dwara bevajah uchale ja rahe hon.Aap unki kavita ki quality par baat kariye. lekin unhe communal poet kahna main samajhta hoon ek bahut badi naadani ki baat hai aur kahi yah bhi darshati hai ki hamare sarokaar literature se hain hi nahi .aur ham ek gandi rajniti kar rahe hain. bas main itna hi kahna chahta hoon. yah bhi ho sakta hai meri yah samajh bilkul galat ho.
-Anand
हंगामा है क्यूं बरपा
उर्फ सर्वत्र विराजमान एक चिरकुटई
साधो।
कविता जैसी विधा को जब पहले से ही पाठकों का टोटा हो तब असद जैदी ने केवल हिंदी हिंदू का विलाप कर क्या असहिष्णु शक्तियों को चारा नहीं डाला है या यह बाकायदा रणनीति हो कि वैसे बड़े कवियों में शुमार भले न हुए, तीन-तीन संग्रह अकारथ चले गए जबकि भाई लोग दूसरे संग्रह पर ही अकादेमी पुरस्कार झपट ले गए तो चलो कुछ हिन्दी-हिन्दू कर लें। नहीं तो क्या असद जैदी नोखे के कवि हैं जो पहली बार बगावत पर उतारू हुए हैं और ये भी किसी भारतेन्दु, रामचंद्र शुक्ल के न सही, सर सैयद अहमद के तो वंशज हैं ही । पूर्वजों के किए धरे पर क्या संताप और क्या दुरभिमान
पर सच तो यह है चचा असद जैदी बलि के बकरे की तरह जिबह हुए हैं। अब शालीनता को अलविदा कह चुके लोग उन पर फैसला देंगे। एक अकेले मुसलमान कवि को फिर हिन्दुओं की जमात ने घेरा है, जैसे मकबूल को देवी देवताओं के तथाकथित हिन्दू एजेंटों ने घेर लिया था।
उधर पंकज सिंह को देखिए। उनके संग्रह जैसे पवन पानी पर बेनामी टिप्पणी मंगलेश ने क्या डूब कर लिखी थी, वैसे ही जैसे असद पर। मंगलेश डबराल ने सविता सिंह (पंकज सिंह की पत्नी) के पहले कविता संग्रह अपने जैसा जीवन का ब्लर्ब भी लिखा, उससे भी ज्यादा डूब कर, जिसका सिला पंकज सिंह ने उन्हें क्या दिया। पहला तो यह काम कि पब्लिक एजेंडा हाथ आते ही फिलहाल पत्रिका जैसी किसी सत्ता से महरूम मंगलेश को लाइन पर कैसे लगाया जाए। एक ही बैच के शमशेर सम्मान विजेता पंकज सिंह और कर्मेन्दु शिशिर की पटना में भेंट के बाद यह रणनीति परवान चढ़ी। यानी गोले बारूद यही दोनो बिहारी भाइयों ने बिछाए।
खैर… मंगलेश के लिए जिसके इतने अहसान पंकज सिंह पर हैं, उन पंकज सिंह जी का कथन देखिए--इसी की (सामाजिक कलावाद) एक किस्म का वह अकर्मण्य दुखवाद है जिसे अन्याय देख कर निगाह नीचे झुका लेना (मंगलेश के वाक्य पर उपहासात्मक रवैया अपनाते हुए) जीने का सुरक्षित और आसान तरीका लगता है। मध्य वर्ग में यथास्थिति के हताश स्वीकार और आत्मग्रस्तता की निरन्तर बढ़ती प्रवृत्तियों से चालित-पोषित ऐसी कविता का प्रतिनिधि रूप मंगलेश डबराल के यहां दिखायी देता है। कशीदाकारी की तरह उस कविता में अंधकार के बेलबूटे हैं, रोमानीपन की जमीन है और अंतिम प्रभाव में संवेदना को अवसन्न करता प्रतिगामी शैथिल्य है। हिन्दी में ऐसों का सामाजिक कलावाद खासी दिलचस्प चीज है, जिसे सावधानी और अधिक विस्तृत विश्लेषण में देखा जाना चाहिए। उनकी नीयत को उनके उस प्रयास में परखा जाना चाहिए, जहां दुर्दशाओं का वर्णन कुछ इस तरह किया जाता है मानो उनके अलावा यथार्थ और कुछ है ही नहीं। ऐसों के यहां शोक और रुदन का जो स्थायी भाव है वह मुझे चिंतित करता है। यही नहीं, वे आके कहते हैं---अंधकार और रुदन के गायक ये सामाजिक कलावादी मुझे खतरनाक किस्म के गैर-जिम्मेदार लोग जान पड़ते हैं। ---यह है पंकज सिंह की कृतज्ञता। जिन्होंने इसी इन्टरव्यू में कुलीन लेखकों की सुदीर्घ संगत में अपनी दीक्षा का बखान किया है। अब इनसे पूछे कि भाई ऐसों में और कौन-कौन हैं, बताना क्यों भूल गए या बताना नहीं चाहते। संकट 1857 की व्याख्या या अपपठन का नहीं है, संकट यह है कि बहनापा खत्म होते ही एक स्त्री को दूसरी स्त्री छिनाल लगने लगती है। उसका सतीत्व देखा नहीं जाता। आज मंगलेश बुरे हैं, कल इन्हीं के साथ पंकज सिंह की गलबाही थी। आज बुरे हो गए तो कर्मेन्द्रु के साथ हमारा बिहार तुम्हारा बिहार खेल रहे हैं।
तो साधो, शायद याद हो, अखिलेश ने एक लेख का टाइटिल दिया था, सर्वत्र विराजमान एक चिरकुटई साहित्य में इन दिनों वही हो रहा है। साहित्य इस चिरकुटई से बाहर कब निकलेगा?
इसी हमारा बिहार तुम्हारा बिहार ने रवीन्द्र कालिया और विजय कुमार की अभी हाल में ही ऐसी तैसी की है। अब असद जैदी और मंगलेश की बारी है। ब्लॉग तो अब वह रामझरोखा है जिस पर बैठकर हम सभी मुजरा देख रहे हैं। इन बुद्धिजीवियों को कौन बतए कि ब्लॉग पर अनाम जनमत जुटाने से कुछ नहीं होने वाला। सच कहें तो रूढ अर्थों में साम्प्रदायिक न तो असद हैं, न मंगलेश, न कर्मेंदु ही, हां लेखकों के अपने-अपने समुदाय फल-फूल रहे हैं। पंकज और कर्मेंसु का अपना समुदाय है तो असद और मंगलेश का भी। इस तरह इन समुदायों में साम्प्रदायिकता के लक्षण घर करते जा रहे हैं। लखकों में इस तरह घर करती इस तथाकथित फिरकापरस्ती ने साहित्य की समरसता में विष घोल दिया है। किसी ने क्या खूब कहा है--
अभी तो मुल्क में फिरकापरस्ती बाकी है
मरें ये लोग तो हिन्दोस्तान खुशबू दे।
-कुमार नवीन
ई-मेल : nvnkmr@rediffmail.com
yah bat kyo kahi ja rahi hai ki karmenji ne khrab kavita ki charcha janboojh ker ki. jab manlesh ji ne chhapi kavita per khas taur per yah kahte huye tippani ki kee 1857 per edhar vipul matra me chhpa ek jagah yah kavita bhari. karmendu ji ne sabse behtar kavita ko samne rakhker sawal uthaye.aap sablog bar bar lipa poti karte rahe. karmendu ji ko anurag vats se lekar om nishal ji tak talwar bhnjte rahe usne jiski gardan katni thi wah to kat gayi.gardan asad ki nahi manlesh ji ki kati. ese aur jo likhe we to jante hi haiki chot kitni marm vedhi hai.karmendu per ab jisko jo kahna hai kahta rahe.Muzaffer khan
om ji,maine to avinash ji ko bheje email jisme sirf 4 sawal the aapko bhej diya tha.utter tha to dete.yah sab halkapan aap kyo dikha rahe?jabshamsher samman huaa tha to aap jitni der pankaj ji ke sath rahe utni der bhi mai nahi rha.shashank ji aur arun kamal rahe. we hi vida bhi kiye.vishwa pustak mele me 7 din rha dilli.ek bar bhi nahi sath baitha.manlesh ji ya pankaj ji sab bare long hai.jab aap jaise log ghas nahi dalte to we log to mahan hai hi.lekin aap apni soch aur pravirti ke anusar likh diye ki maine unke sath mil ker yah kiya wah kiya.her saptah dilli jaker yahi sab tai kar karte hai kya?sawal ka koi utter nahi hai to aay bayy aarop lga ker samajh liye karmendu ji se kam bher nibat liya.etne se dilli ke kavita chaudhariyo ke good book me aaya ja sakta hai.thege per gut aur thenge per fut.jab tak sahi jameen hogi tab tak mera koi kuchh nahi ker sakta.galat hone per manlesh to manlesh aapke jaisa bhi kya koi chhatr bhi nirutter ker dega.n mujhe prasidhi ki darkar n kisi lobh ki.ndarta hu n dabta hu.jisse sawal poochha jarha wahi jawab de sakta hai to de.varna titihariya khud gandgi faila per dosh samne wale per marhti rahegi.
om nischal ji ,
nischal nahi,NISCHHAL ji banana zyada zaroori hai.Aap is baat par sochiye ki aaj kavita ki is patli gali ka 'Mangloo dada' ya kavita corporation ka M.D.unhe kyon kaha ja raha hai? yah unki shakti ka hi ek pramaan hai.unhone ek sochi samjhi sazish ke tahat Asad ke sangrah ki kamjor kavitaon ko anupaat se zyada uchala ,vivaad ki bhoomika bana di aur lo, is sangrah ko pitva diya.yah kitna bada khel tha.asad bechare muh tapte rah gaye hain.is sangrah ki behtar kavitaon par charcha ka mahoul hi nahi banane diya gaya hai.aur yah sab unke dwara kitne bholepan ke saath kiya gaya hai.isase pahle ve apne ek aur varshon ke nikat mitra Viren Dangwal ko samay se pahle akademy purskaar dilva kar unki sarvjanik fazihat karva chuke hain.Dangwal puruskrat hokar bhi apmanit hue the.Vah kitna bhayavah drishya tha-inki kisi "karun" kavita ki tarah hi.samkaalino me apne se kai guna behtar kavi Rajesh joshi.Arun kamal aur Uday prakash ke prati ye ek gahari kuntha aur heen bhavna rakhte hain.pankaj singh,vishnu nagar ya vijay kumar ke jab achche kavita -sangrah pichale dino aaye to hamare ye mahapurush achanak aur bhi zyada gahari heen bhavna me jakad gaye. Uday prakash ko to inhone keval "kathakaar" ke khne me daal rakha hai aur vijay kumar ko keval "aalochak" ke khane me.saare avrodh door karte huye ye apne liye maidan ekdam saaf rakhte hain. apne hi saathi Narendra jain, Ibbaar rabbi,Devi prasad mishra aur Leela dhar Mandloi ki pichale varshon me likhi gayi mahatvapoorn kavitaon ka kya koi bhi zikra aapne inke muh se kabhi suna hai?inki koi bhi chrcha ve karna hi nahi chahte. kyonki inka one-point karykram yahi hai ki kavita ke rangmanch par keval inka ek -patriy abhinay ,(solo perfomance) chalta rahe .keval inki bansi bajti rahe.ya doosare shbdon me ,kavita ki is go-shala me jugali karte hue ye akele hi rambhaate rahen.inki is asurkha -granthi ke tamam udahran hain.aaj delhi se jabalpur,ayodhya se chandigarh,aur jullundher se banaras tak inki khoob utha-patak chalti rahati hai aur sab is baat ko dekh rahe hain,khoob jante hain.aur dheere dheere ye ek vidushak kavi bante ja rahe hain.aaj bhi inke ird-gird bahut se masoom babloo,bahut saare pyare mrag-shaavak aur bahut saare dudh-muhen shishu jama hain ,kyonki inka ek aabha-mandal bana hua hai .par kal ve sab bhi nischay hi inke paas se bhaag jayenge.yah samay bahut chaalak aur kroor hai.Is dour me aisa hi "mahan" kavi paida hoga .vah Amir khan ka koi divya -raag bhi sunega aur saathi kaviyon ki hatya karne ke naye naye shadyantra bhi rachata rahega.usi tarah jaise Hitler ke fascist sainik Bithovan ki mahan symphony sunte the aur nihathhe logon par goliyan daagne nikal padate the.Bazaar - sanskriti ko ab aisi hi "advitiya pratibhao" ki zaroorat hai. ye vahan khoob saphal hain kyonki ye "karun" bhi hain aur "zalim' bhi--dono baaten ek saman anupaat me.
-Rakesh Verma,Motihari.Bihar
हमारा स्पष्ट मानना है कि संभव है असद जैदी उतने बड़े कवि न हों जितना कि उन्हें एक कवि के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश की गई है, लेकिन निस्संदेह वे किसी भी दृष्टिकोण से सांप्रदायिक कवि नहीं हैं--वे हमारे समय और समाज के एक महत्वपूर्ण और ज़रूरी कवि हैं।
सहमत.
==============
डा. चन्द्रकुमार जैन
राकेश वर्मा जी आपकी भावना से काफी हद तक सहमत हूँ. आप विचारवान व्यक्ति हैँ. आपकी बातोँ मेँ सचाई है. पर सच्ची कविता के लिये मैँ किसी मँगलेश या अन्य आलोचक के पास नही जाता. खुद पढ कर देख्ता हूँ. ऐसा नही होता तो कैलाश वाजपेयी मेरे अनन्य कवियोँ मे न होते, क्योँकि इन कवियोँ आलोचकोँ की सूची मे वे तो कही नही हैँ. लिहाजा भाई ज्यादा सेंटीमेंटल होने की जरूरत नही है.. हिंदी विवेक सारी कारगुजारियोँ को देख रहा हूँ--ओम निश्चल
rakesh verma ki tippani ko padh kar ek shok laga hai.mai disturb ho gaya hoo..mai ab tak samjhta raha ki asad ko aise badha chadha kar project karne ka mamla sirf dosti ka mamla hai.iske peeche itna gahra shadyantra ho sakta hai yah to ab samjh me aa raha hai.rakesh ki baato me dam lag raha hai.om bhi unse sahmat dikhayi de rahe hai.
baap re. yakin nahi ho raha.hamara sahitykar kaha pahunch chuka hai. aise sahity me aag lage.
devendra trivedi
navin ji,
dilli ke baher bhi kavi lekhak behter kam ker rahe hai jinki haisiyat manlesh asad se kam nahi. dilli ki sankirnta baki bhi samajh rahe hai.bra chhata to bad me kijiyega pahle likhe ko parhne ki aadt daliye.laithait ban kar karmendu ya kisi ka ek bal bhi terha nahi kar sakte.
yogendra ji,om ji-----aaplongo bari chalaki se manlesh ka bachav kiya.dikhaya ki bhich ki line le rahe hai magar aapne karmendu ke uthaye sawalo ko darkinar ker lafango ke ek chhor per use rakh diya.niji badla lene ka aur dilli me sampark gahra karne ka yah ghatiya tareeka hai.karmendu ne jabar dast prahar kiya aur manlesh ki aesi mitti palid ki,jisme unka ahnkar dhool me mil gya.koi jawab nahi de rha hai .hai hi nahi to gali di ja rahi hai.esse karmendua ka kuchh nahi ukharne wala.karte rahe.BHOJPUR KA DILLIVASI
mahanubhav ji
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ab to esko htaeye?karmendu ki 1857 per shandar pustak aayi hai,use parhiye.manlesh ji titihario ko chhor ker ghar me ghus gaye.apni bolti band ho gayi to english putro ki god me sharan le rahe.wha we mahfooj hai.ab aap log nautanki band kijiye.dost hai karmendu ka.
Is Samooche prakaran me karmendu ko wakai mirchee lagi hai ki wah vibhinn naamon se apne baal ke pradarshan par utar aaya hai,jise wah kah rahaa hai ki koi balbanka nahi kar sakta. are nange luchhon ka koi kya bal banka karega.Ramvilas sharma se mal uda kar wah teesmarkhan banane chala hai.uska dimaagi diwaliapan sidhh ho chuka hai.aisi dhamkiyan dekar wah mahaan nahi ban jayega.chor ki daadhi me tinka hota hai.uski dadhi me to jharu nazar aa rahaa hai.din raat chhtpata raha hai.jis tis ko email kar shaanubhuti jutane me lagaa hai.--Irshad alam,
lucknow
Priya bhai sahab
pahali mail adhuri chali gai...aapko aaj phone laga raha tha par mila naheen. bahut dinon se bbat karne ka man tha..aaj shabd srijan par aapka Asad Jaidi vivad par lekh parh kar bahut achha laga. aapne bahut mahatavpuran prashan udhaye hain..
aapka
S.R.Harnot
098165 66611
is tarah ki lalkarne vali mudrayen dono taraf se galat hain. karmendu ji aapka kaam hai.kripya samjhe ki sahityik vimarsh is tarah se nahi hone chahiye. aur yah bhi socha jana chahiye ki dilli ke in kuch namdhari kaviyon ki sadandh poore sahityik drashy ko kyo itna pradooshit kar rahi hai?
is prasang ne sahityik vimarsh ko sharmshaar kar diyaa hai.karmendu ji hathhe se ukhar chuke hain,yah sanket to unke samarthak de hi rahe hain.karmendu ka yah likhna ki manglesh dabral logon ko atiranjit prshanshaa se maar dete hain,yah unki ranneeti hai.Aur unke maare se bhi na mare to wah karmendu shishir ki tippni se mar jaayega. kya yahi hai poetic justice. karmendu ki english kamjor hai to mohalla wale kya karen.isme manglesh ko gariyane ki kya jaroorat.
kaisa saahityik paridrishya hai.
Ek tatasth paathak
bhai ab band karo yah saari bakvaas
अब हमसे रहा नहीं जाता, सारी बात आपको बता ही दें। हम कर्मेन्दु जी के पुराने दोस्त हैं। अनामबिहारी मिश्रा हमारा छद्मनाम है। जानने वाला देखकर समझ जायेगा। हम इसलिए इहाँ कूदे हैं कि कर्मा की हालत हमसे देखी नहीं जाती। दिन रात दीवानावार ई-मेल ई-मेल ई-मेल। अब उसके लिये ई-मेल, मेल, फीमेल सब भेद मिट चुके हैं।
इन दो तीन ब्लाग पर अधिकतर बेनामी टिप्पणियाँ और "वाहवाह-शाबाश-कमाल कर दिया पटना के शेर" जैसे रिस्पांस खुद कर्मेन्दु ही लिख लिख कर भेज रहा है: न नींद नैना, न अंग चैना वाली बात है। भाषा, मुहावरा, शब्दावली सब कुछ एक सा ही है। कल्पनाशीलता का अकाल पड गया है। दोस्त तुम जरूर पुराने हो, पर कर्मेन्दु, पटना में तुमसे पहले इतना दलिद्दर नहीं दिखाई पडा था।
अरे भलेमानस, क्या पटना शहर में तुम्हारा एक भी दोस्त नहीं जो तुम्हारी सहायता कर सके? तुमको इतनी जाली टिप्पणियाँ अनामस्वामी बनकर, या छद्मनाम धर कर स्वयं लिखनी पडें, कितनी दुखद बात है। तुम महा कंजूस तो मशहूर हो ही। भाडे पर लिखने वाले तुम्हें कोसते हैं क्योंकि तुमने उनका भी बडा शोषण किया हुआ है। आजकल बेरोजगारी का हाल क्या है तुम जानते ही हो। कुछ तो स्थानीय संसाधनों का उपयोग करो।
लगता है पंकज सिंह भी तुमसे मुँह फेरने वाले हैं। अपने जंजालों में जो फंसे हैं। विमलवा भी जब चाहे मुँह फेर लेता है।
और दुष्ट ब्लाग वासियो, तमाशा देखने वालो, अविनाशियो, कर्मेन्दु को आराम कर लेने दो। कल उसे देखकर हम भी घबरा गए। लगता है बीमार पडने वाला है।
अनामबिहारी मिश्रा
manglesh ji ko karmendu ji se apne dusht karm ke liye sarvjanik mafi mang leni chahiye. mafi mang lene se ve chote nahi ho jayenge aur yah dukhad prasang bhi samapt hoga.
karmendu ji ko jo likhna tha,manlesh jo ko jo likhna tha nam sahit likhe.unki english kamjor hai blog per type karne nahi aata.jo aata hai wah kiya.magarganda to anam walo ne kiya.dono chup hai.om ji to aachhi bhasha likhte the.we bhi tmtmaker anambihari mishra ki khol me thooth aur gali per utar aaye.we dono chup hai to baki bhi bakbak band kare.
antim pathak
achha huaa jo aapne eska ant kiya.
anambihari ji ki ghatiya tipnni se suprimo rajnit wali gandh mili.shishir ji ne nam se asad manlesh ji ka virodh kiya hi tha to nam we kyo chhupate?maine khud kai bar likha hai.fir unhone ne 1857 per kitab hi likhi hai to we kyo bahas se darne lage.khud gandi tippni likhker unka viridh kiya jarha hai.yah shudha charitrahanan ka mamla hai.band karne ke liye dhanyabad.SNAMBIHARI JHA
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