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आज जब विश्व की तकरीबन तमाम भाषाओं के साथ-साथ, हिंदी तथा अंग्रेज़ी दोनों ही भाषाएं सूचना तकनीक और विश्व बाज़ार के अनियंत्रित विकास की अवश्यंभावी परिणति के रूप में शब्दों के अर्थ और अपनी विश्वसनीयता तेजी से खो रही हैं, जब हिंदी को दरकिनार कर, अंग्रेज़ी में लिखने-पढने, उसी संस्कृति में पलने-बढने की एक होड़-सी मची हुई है, जब पहले से ही प्रताड़ित-उपेक्षित हमारी अपनी भाषा और जीवन-शैली भी बाज़ार की बंधक बन चुकी है, यह देखना-सुनना काफी दिलचस्प होगा कि 'ब्रिटिश राज' में अंग्रेज़ी शासकों का एक बहुत बड़ा तबका भारत में अपने लंबे प्रवास के दौरान यहां की संस्कृति से इस हद तक प्रभावित था कि उसने न केवल भारतीय वेश-भूषा और संपूर्ण भारतीय जीवन-शैली को अपना रखा था, बल्कि भारतीय भाषाओं में उन्होंने रचनाएं भी लिखीं। इतना ही नहीं, हिंदी-उर्दू में लिखने वाले कई अंग्रेज़ लेखकों ने अपने नाम तक भारतीय शैली और परंपरा के अनुरूप रखे।
यहां प्रस्तुत यह आलेख, दरअसल, इस विषय पर एक ऐतिहासिक प्रस्थान-विंदु के रूप में देखा जा सकता है। इस संदर्भ में पाठकों के साथ हमारे विमर्श का एक विंदु यह हो सकता है कि हमारी भाषा और संस्कृति के प्रति इतने संवेदनशील और उदार हमारे उपनिवेशकों ने हिंदी-उर्दू के अतिरिक्त किन अन्य भारतीय भाषाओं में रचनात्मक लेखन किया। और यह भी कि हमारी जीवन-शैली के प्रति, हमारी भाषा-संस्कृति के प्रति इस हद तक उनकी संवेदनशीलता एवं उदारता को उनकी उत्कट औपनिवेशिक महत्वाकांक्षा की पृष्ठभूमि में हम किस तरह परिभाषित-व्याख्यायित कर सकते हैं।
यह आलेख पढने के बाद शायद आप इन विंदुओं पर कुछ प्रकाश डाल सकें। इन्हीं अपेक्षाओं के साथ यहां प्रस्तुत है धर्मयुग ( 4 जुलाई, 1976 ) में प्रकाशित राजेश्वरप्रसाद नारायण सिंह का यह सूचनापरक एवं अत्यंत रोचक आलेख।
- योगेंद्र कृष्णा
यहां प्रस्तुत यह आलेख, दरअसल, इस विषय पर एक ऐतिहासिक प्रस्थान-विंदु के रूप में देखा जा सकता है। इस संदर्भ में पाठकों के साथ हमारे विमर्श का एक विंदु यह हो सकता है कि हमारी भाषा और संस्कृति के प्रति इतने संवेदनशील और उदार हमारे उपनिवेशकों ने हिंदी-उर्दू के अतिरिक्त किन अन्य भारतीय भाषाओं में रचनात्मक लेखन किया। और यह भी कि हमारी जीवन-शैली के प्रति, हमारी भाषा-संस्कृति के प्रति इस हद तक उनकी संवेदनशीलता एवं उदारता को उनकी उत्कट औपनिवेशिक महत्वाकांक्षा की पृष्ठभूमि में हम किस तरह परिभाषित-व्याख्यायित कर सकते हैं।
यह आलेख पढने के बाद शायद आप इन विंदुओं पर कुछ प्रकाश डाल सकें। इन्हीं अपेक्षाओं के साथ यहां प्रस्तुत है धर्मयुग ( 4 जुलाई, 1976 ) में प्रकाशित राजेश्वरप्रसाद नारायण सिंह का यह सूचनापरक एवं अत्यंत रोचक आलेख।
- योगेंद्र कृष्णा
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बकौल अकबर इलाहाबादी, 'गाय मोटी नज़र आयी तो कसाई दौड़े', वास्को द' गामा ने जब हिंदुस्तान से लौट कर इस देश की दौलत का वर्णन किय तो यूरोप के उन देशों के लोग, जो व्यापार-विस्तार के लिए व्याकुल थे, भारत की ओर दौड़ पड़े। दरअसल वास्को द' गामा के पहले से ही यहां की दौलत की शोहरत सारे यूरोप में फैल चुकी थी। मार्लो ने अपने 'कार्थेज की रानी डिडो' नामक नाटक में एक पात्र के मुख से कहवाया भी था--'सोने के भारत से मैं गंगा का जल लेता आऊंगा।' गरज यह कि यह एक जबरदस्त धारणा थी, तमाम यूरोप में कि सोने से परिपूर्ण भारत ही कथाओं में निर्देशित 'एल डोराडो' है। अत: स्वाभाविक था कि वास्को द' गामा के मुख से इसके अपार धन की कथाएं सुन कर यूरोप के अर्थ-पिपासु इस देश की ओर दौड़ पड़ते।
सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने इस देश की भूमि पर कदम रखे, फिर आए डच और फ्रांसीसी। और अंत में अंग्रेज। व्यापार को लेकर इनके बीच वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। डचों के पांव पुर्तगालियों ने उखाड़े, अंग्रेजों ने बाकी दोनों--पुर्तगालियों और फ्रांसीसियों--के।
भारत के व्यापार क्षेत्र पर अंग्रेजों का एक प्रकार से एकाधिकार स्थापित हो गया। ब्रिटेन की सरकार से अनुमति प्राप्त कर भारत में व्यापार करने के लिए दो कंपनियों का निर्माण हुआ, जो आगे चलकर एक बन गईं--ईस्ट इंडिया कंपनी।
यों तो कंपनी ने अपनी पहली फैक्ट्री सूरत में लगाई, पर बाद में उसके व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र कलकत्ता ( जिसका निर्माण जॉब कार्नेक ने मछुओं के तीन गांव--कलिकाता, गोविंदपुर तथा सुतनती को मिलाकर किया था ) बन गया। मुर्शिदाबाद के नवाब की आंखों में यह बेतरह खटकता रहा। स्वाभाविक था कि ऐसी परिस्थिति में उनके साथ अंग्रेजों का संघर्ष चलता रहा, जिसकी पराकाष्टा प्लासी के युद्ध के रूप में हुई। इस युद्ध में क्लाइव की विजय के फलस्वरूप कलकत्ता अंग्रेजों का मुख्य अड्डा बन गया। गवर्नर जनरल से लेकर छोटे-बड़े अंग्रेजों का एक खासा समाज यहां गठित हो गया--एक ऐसा समाज जो अर्थ एवं यौन प्रधान समाज था।
सभी पैसा बनाने की फिक्र में और ऐशो-आराम में लगे थे। उनके चरित्र का यह आलम था कि कोई अपने मित्र तक पर विश्वास नहीं कर सकता था। गवर्नर जनरल सर वारेन हेस्टिंग्ज़ का सबसे परम मित्र था--इमहौफ नामक एक चित्रकार। पर उसकी पत्नी भी हेस्टिंग्ज़ के मोहपाश से बची न रह सकी और बाद में उसकी पत्नी बन गई। कंपनी के दफ़्तर में काम करने वाले ग्रैंड नामक एक व्यक्ति ने चन्दरनगर की एक परम सुंदरी युवती नोएल कथरीन से विवाह किया और उसे वह कलकत्ते ले आया। उसके आते ही उसकी सुंदरता ने कलकत्ते के तत्कालीन अंग्रेजी समाज में तहलका-सा मचा दिया। गवर्नर जनरल की कौंसिल के सबसे वरिष्ठ सदस्य सर फिलिप फ्रांसिस से लेकर साधारण अंग्रेज तक उस पर लट्टू हो गए। और अंत में ग्रैंड को सर फिलिप के कारण उससे वंचित होना पड़ा।
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नोएल कैथरीन
वस्तुत: कैथरीन अनुभवी औरत थी, अपनी सुंदरता का उसने पूरा फायदा उठाया और इंगलैंड होते हुए फ्रांस जा पहुंची और वहां नेपोलियन के सबसे विश्वस्त मंत्री टेलेरां को अपने आकर्षण जाल में फांसा और उनकी पत्नी बन गई। प्रिंसेस कैथरीन के नाम से विख्यात हो कर काफ़ी दिनों तक वह फ्रांस की एक परम प्रभावशाली नारी बनी रही। यहां तक कि नेपोलियन जैसा दुर्द्धर्ष व्यक्तित्व वाला व्यक्ति भी उसके प्रभाव से अपने को अलग न रख सका।
और गैंड ? वह कलकत्ता त्याग कर बिहार चला गया। हेस्टिंग्ज़ ने उस पर कृपा कर के उसे उत्तर बिहार के उस जिले का कलक्टर बना दिया, जहां का मैं रहने वाला हूं। पैसे के लोभ का वह भी संवरण न कर सका। कलक्टरी के साथ-साथ निजी रूप से वह नील का व्यापार भी करने लगा और अंत में उसे दोनों ही चीजों से हाथ धोने पड़े--कंपनी की नौकरी से और नील के व्यापार से भी।
जुआ एक तीसरी ऐसी लत थी, जिससे कलकत्ते के अंग्रेजों में शायद ही कोई बचा होगा।
बकौल अकबर इलाहाबादी, 'गाय मोटी नज़र आयी तो कसाई दौड़े', वास्को द' गामा ने जब हिंदुस्तान से लौट कर इस देश की दौलत का वर्णन किय तो यूरोप के उन देशों के लोग, जो व्यापार-विस्तार के लिए व्याकुल थे, भारत की ओर दौड़ पड़े। दरअसल वास्को द' गामा के पहले से ही यहां की दौलत की शोहरत सारे यूरोप में फैल चुकी थी। मार्लो ने अपने 'कार्थेज की रानी डिडो' नामक नाटक में एक पात्र के मुख से कहवाया भी था--'सोने के भारत से मैं गंगा का जल लेता आऊंगा।' गरज यह कि यह एक जबरदस्त धारणा थी, तमाम यूरोप में कि सोने से परिपूर्ण भारत ही कथाओं में निर्देशित 'एल डोराडो' है। अत: स्वाभाविक था कि वास्को द' गामा के मुख से इसके अपार धन की कथाएं सुन कर यूरोप के अर्थ-पिपासु इस देश की ओर दौड़ पड़ते।
सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने इस देश की भूमि पर कदम रखे, फिर आए डच और फ्रांसीसी। और अंत में अंग्रेज। व्यापार को लेकर इनके बीच वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। डचों के पांव पुर्तगालियों ने उखाड़े, अंग्रेजों ने बाकी दोनों--पुर्तगालियों और फ्रांसीसियों--के।
भारत के व्यापार क्षेत्र पर अंग्रेजों का एक प्रकार से एकाधिकार स्थापित हो गया। ब्रिटेन की सरकार से अनुमति प्राप्त कर भारत में व्यापार करने के लिए दो कंपनियों का निर्माण हुआ, जो आगे चलकर एक बन गईं--ईस्ट इंडिया कंपनी।
यों तो कंपनी ने अपनी पहली फैक्ट्री सूरत में लगाई, पर बाद में उसके व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र कलकत्ता ( जिसका निर्माण जॉब कार्नेक ने मछुओं के तीन गांव--कलिकाता, गोविंदपुर तथा सुतनती को मिलाकर किया था ) बन गया। मुर्शिदाबाद के नवाब की आंखों में यह बेतरह खटकता रहा। स्वाभाविक था कि ऐसी परिस्थिति में उनके साथ अंग्रेजों का संघर्ष चलता रहा, जिसकी पराकाष्टा प्लासी के युद्ध के रूप में हुई। इस युद्ध में क्लाइव की विजय के फलस्वरूप कलकत्ता अंग्रेजों का मुख्य अड्डा बन गया। गवर्नर जनरल से लेकर छोटे-बड़े अंग्रेजों का एक खासा समाज यहां गठित हो गया--एक ऐसा समाज जो अर्थ एवं यौन प्रधान समाज था।
सभी पैसा बनाने की फिक्र में और ऐशो-आराम में लगे थे। उनके चरित्र का यह आलम था कि कोई अपने मित्र तक पर विश्वास नहीं कर सकता था। गवर्नर जनरल सर वारेन हेस्टिंग्ज़ का सबसे परम मित्र था--इमहौफ नामक एक चित्रकार। पर उसकी पत्नी भी हेस्टिंग्ज़ के मोहपाश से बची न रह सकी और बाद में उसकी पत्नी बन गई। कंपनी के दफ़्तर में काम करने वाले ग्रैंड नामक एक व्यक्ति ने चन्दरनगर की एक परम सुंदरी युवती नोएल कथरीन से विवाह किया और उसे वह कलकत्ते ले आया। उसके आते ही उसकी सुंदरता ने कलकत्ते के तत्कालीन अंग्रेजी समाज में तहलका-सा मचा दिया। गवर्नर जनरल की कौंसिल के सबसे वरिष्ठ सदस्य सर फिलिप फ्रांसिस से लेकर साधारण अंग्रेज तक उस पर लट्टू हो गए। और अंत में ग्रैंड को सर फिलिप के कारण उससे वंचित होना पड़ा।
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नोएल कैथरीन
वस्तुत: कैथरीन अनुभवी औरत थी, अपनी सुंदरता का उसने पूरा फायदा उठाया और इंगलैंड होते हुए फ्रांस जा पहुंची और वहां नेपोलियन के सबसे विश्वस्त मंत्री टेलेरां को अपने आकर्षण जाल में फांसा और उनकी पत्नी बन गई। प्रिंसेस कैथरीन के नाम से विख्यात हो कर काफ़ी दिनों तक वह फ्रांस की एक परम प्रभावशाली नारी बनी रही। यहां तक कि नेपोलियन जैसा दुर्द्धर्ष व्यक्तित्व वाला व्यक्ति भी उसके प्रभाव से अपने को अलग न रख सका।
और गैंड ? वह कलकत्ता त्याग कर बिहार चला गया। हेस्टिंग्ज़ ने उस पर कृपा कर के उसे उत्तर बिहार के उस जिले का कलक्टर बना दिया, जहां का मैं रहने वाला हूं। पैसे के लोभ का वह भी संवरण न कर सका। कलक्टरी के साथ-साथ निजी रूप से वह नील का व्यापार भी करने लगा और अंत में उसे दोनों ही चीजों से हाथ धोने पड़े--कंपनी की नौकरी से और नील के व्यापार से भी।
जुआ एक तीसरी ऐसी लत थी, जिससे कलकत्ते के अंग्रेजों में शायद ही कोई बचा होगा।
नवाबी ज़िंदगी का आकर्षण और शौकीनमिजाजी
मुगलों के पतन तथा उनके प्रभाव के साथ-साथ अंग्रेज़ सारे भारत में फैलते गए। उनमें से जो दौलतमंद बन गए थे, उन्होंने जगह-जगह अपनी जमींदारियां भी कायम कर लीं और वे नवाबों का-सा जीवन व्यतीत करने लगे। कलकत्ता में खास तौर पर सभी बड़-बड़े पैसे और ओहदे वाले अंग्रेज़ रहन-सहन में पूरी तरह नवाबों की नकल करने लगे और उनकी मेम साहिबाएं बेगमों की। एक-एक के बीसों खानसामे, मेम साहिबाओं की दर्जनों बांदियां होतीं, जो दिन में हर दो घंटों पर उनके हुक्के भरती थीं। साहब बहादुर ऑफिस से लौट कर आरामकुर्सी पर लेट जाते और हुक्के पीते रहते। पार्टियों में अगर जाते तो उनके हुक्का-बरदार हुक्का ले कर उनके साथ-साथ चला करते थे।
दिल्ली के आसपास कई अंग्रेज़ जमींदारियां कायम कर के समंतशाही जीवन व्यतीत करने लगे। उन्होंने अपनी सेना तक बना ली। इनमें सरघना की बेगम समरू तथा कैप्टेन एसकिनर, जो सिकंदर साहब के नाम से विख्यात थे, की जमींदारियां खासी बड़ी थीं। इनकी वार्षिक आय लाखों में थीं। सिकंदर साहब पूरे नवाब थे। उनके यहां आए दिन महफिलें हुआ करती थीं, जिनमें दिल्ली की एक- से-एक हसीन तवायफें बुलाई जातीं, शराब की नदी बह चलती। उनके फब्बारों से महफिल जगमगा उठती थी।
बाद में जब राजा राममोहन राय के प्रयासों के फलस्वरूप ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अंग्रेज़ी शिक्षा का आरंभ किया तो इंगलैंड से खासी बड़ी सख्या में पढे-लिखे सुसंस्कृत जनों का आगमन हुआ और उसी समय इंडियन सिविल सर्विस का गठन भी। इन लोगों के आने से वातावरण में प्रचुर परिवर्तन हुआ। अंग्रेज़ों में काफी ऐसे लोग पैदा हुए, जो भारतीय संस्कृति की ओर भी आकर्षित हुए तथा फारसी-उर्दू-हिंदी बोलना ही नहीं, इनका अध्ययन और इनमें काव्य रचना की भी उन्होंने शुरुआत की। प्राचीन पुस्तकों में पचासों ऐसे अंग्रेज़ स्त्री-पुरुषों के नाम पाए जाते हैं, जिन्हें उर्दू और हिंदी में काव्य-रचना का शौक था। खास तौर पर वे शेर और दोहे लिखा करते थे। यहां बनगी रूप में उनकी कुछ रचनाएं आपके पेशे-नजर हैं।
एटा जिले के बैरन गार्डनर का परिवार एक प्रसिद्ध सामंत परिवार था, जिसने कई अच्छे-अच्छे शायर पैदा किए। कई महिलाओं ने शायरी की भी। इनमें सबसे मशहूर हुईं--एलेन क्रिश्चियाना गार्डनर, जो रकिया सुल्ताना बेगम के नाम से प्रसिद्ध थीं। उनका एक शेर पढें :
तुझे कसम है खुदा की,
जो जुल्म से बाज आए,
कमाल मुझको है मश्के-सितम
खुदा की कसम।
इसी परिवार के एक दूसरे सदस्य सुलेमान शिकोह गार्डनर ने भी, जिनका तखल्लुस 'फना' था, सुंदर रचनाएं की हैं। उनका एक शेर है :
पूछता क्या है ऐ 'फना' तेरे
कौन से शेर इंतखाब नहीं।
जोसेफ बेंसले भी 'फना' नाम से ही लिखा करते थे, हिंदी और उर्दू--दोनों ही भाषाओं में उनकी दखल थी। हिंदी की उनकी एक रचना है :
मन ज्ञानी, मन मूरख, मन बहके-बहकाबे,
मन बहकाबे बात में और मन ही बात बतावे।
मन मोहन मन में रहे, मन मूरख कहिं और,
बानो बादर आंधरौ ढूंढत ठौर-कठोर।
जार्ज शोर उर्दू के शायर ही नहीं, पक्के नवाब थे, जिनकी वेश-भूषा आदि सभी चीजों में पूरी नवाबी थी। पूरी नफासत। उनके फारसी कलामों के छह दीवान ही उपलब्ध हैं। इसके अलावा उनकी आध्यात्मिक रचनाओं का भी एक संग्रह है। उनका जन्म 1823 में अलीगढ में हुआ था। शादी हुई आगरे में एक सुसंस्कृत परिवार में जन्मी मेरियाना से। ऊपर से उन्होंने मुगल जान और रमजानो नाम की दो तवायफें रख छोड़ी थीं। हद दर्जे के शौकीनमिजाज थे वे, और साथ-साथ संगीत-प्रेमी भी। होली के बहुत से गीत, ठुमरियां, दादरा और भजन भी लिखे थे। उनके एक शेर पर गौर करें :
मस्ते-शराबे-इश्क नहीं आता होश में,
गाफिल कभी न जानिए इस होशियार को।
बेंजामिन डेविड मौंटरीज 'दाग' देहलवी के शागिर्द थे। उनके साथ दस साल गुजारे थे। दाग के मरने पर उन्होंने लिखा था :
एक दाग था सो वह भी तो मुजतर गुजर गया,
बाकी रहा है कौन अब हिंदोस्तान में।
कलकत्ते की मशहूर गायिका गौहर जान का नाम आपने अवश्य सुना होगा। याद आती है मुझे एक महफिल की, जिसमें गौहर जान ने केवल एक दादरा डेढ घंटे में गाया था और समा बांध दिया था। वह एक आंग्ल माता-पिता की संतान थी। उनकी मां भी कुशल शायर थीं। उन्होंने बड़ी सुंदर गजलें लिखी थीं, जिन्हें गौहर जान अकसर गाया करती थीं।
अलेक्जेंडर हीथरले गालिब के शिष्य नवाब जैनुल आबदीन आरिफ के शागिर्दों में थे और एक लॉर्ड परिवार में जन्में थे। वे अपनी उर्दू शायरी का एक दीवान अपने पीछे छोड़ गए। उनका एक शेर है :
याद अपना आ गया कशांन-ए-वीरान हमें,
चलते-फिरते हम जो जा निकले बयाबान की तरफ।
और अब अंत में अर्नी 'फर्हत' नामक एक शायरा के दो शेरों को भी देखें :
जरा मुस्किरा कर छिड़क दो नमक तुम,
कि मुंह जख्म का बेमजा हो रहा है।
शिकश्ता खातिरी है 'फर्हत' साकी में कुछ ऐसी,
बहुत मिलती है टूटे जाम से सूरत मेरे दिल की।
मुगलों के पतन तथा उनके प्रभाव के साथ-साथ अंग्रेज़ सारे भारत में फैलते गए। उनमें से जो दौलतमंद बन गए थे, उन्होंने जगह-जगह अपनी जमींदारियां भी कायम कर लीं और वे नवाबों का-सा जीवन व्यतीत करने लगे। कलकत्ता में खास तौर पर सभी बड़-बड़े पैसे और ओहदे वाले अंग्रेज़ रहन-सहन में पूरी तरह नवाबों की नकल करने लगे और उनकी मेम साहिबाएं बेगमों की। एक-एक के बीसों खानसामे, मेम साहिबाओं की दर्जनों बांदियां होतीं, जो दिन में हर दो घंटों पर उनके हुक्के भरती थीं। साहब बहादुर ऑफिस से लौट कर आरामकुर्सी पर लेट जाते और हुक्के पीते रहते। पार्टियों में अगर जाते तो उनके हुक्का-बरदार हुक्का ले कर उनके साथ-साथ चला करते थे।
दिल्ली के आसपास कई अंग्रेज़ जमींदारियां कायम कर के समंतशाही जीवन व्यतीत करने लगे। उन्होंने अपनी सेना तक बना ली। इनमें सरघना की बेगम समरू तथा कैप्टेन एसकिनर, जो सिकंदर साहब के नाम से विख्यात थे, की जमींदारियां खासी बड़ी थीं। इनकी वार्षिक आय लाखों में थीं। सिकंदर साहब पूरे नवाब थे। उनके यहां आए दिन महफिलें हुआ करती थीं, जिनमें दिल्ली की एक- से-एक हसीन तवायफें बुलाई जातीं, शराब की नदी बह चलती। उनके फब्बारों से महफिल जगमगा उठती थी।
बाद में जब राजा राममोहन राय के प्रयासों के फलस्वरूप ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अंग्रेज़ी शिक्षा का आरंभ किया तो इंगलैंड से खासी बड़ी सख्या में पढे-लिखे सुसंस्कृत जनों का आगमन हुआ और उसी समय इंडियन सिविल सर्विस का गठन भी। इन लोगों के आने से वातावरण में प्रचुर परिवर्तन हुआ। अंग्रेज़ों में काफी ऐसे लोग पैदा हुए, जो भारतीय संस्कृति की ओर भी आकर्षित हुए तथा फारसी-उर्दू-हिंदी बोलना ही नहीं, इनका अध्ययन और इनमें काव्य रचना की भी उन्होंने शुरुआत की। प्राचीन पुस्तकों में पचासों ऐसे अंग्रेज़ स्त्री-पुरुषों के नाम पाए जाते हैं, जिन्हें उर्दू और हिंदी में काव्य-रचना का शौक था। खास तौर पर वे शेर और दोहे लिखा करते थे। यहां बनगी रूप में उनकी कुछ रचनाएं आपके पेशे-नजर हैं।
एटा जिले के बैरन गार्डनर का परिवार एक प्रसिद्ध सामंत परिवार था, जिसने कई अच्छे-अच्छे शायर पैदा किए। कई महिलाओं ने शायरी की भी। इनमें सबसे मशहूर हुईं--एलेन क्रिश्चियाना गार्डनर, जो रकिया सुल्ताना बेगम के नाम से प्रसिद्ध थीं। उनका एक शेर पढें :
तुझे कसम है खुदा की,
जो जुल्म से बाज आए,
कमाल मुझको है मश्के-सितम
खुदा की कसम।
इसी परिवार के एक दूसरे सदस्य सुलेमान शिकोह गार्डनर ने भी, जिनका तखल्लुस 'फना' था, सुंदर रचनाएं की हैं। उनका एक शेर है :
पूछता क्या है ऐ 'फना' तेरे
कौन से शेर इंतखाब नहीं।
जोसेफ बेंसले भी 'फना' नाम से ही लिखा करते थे, हिंदी और उर्दू--दोनों ही भाषाओं में उनकी दखल थी। हिंदी की उनकी एक रचना है :
मन ज्ञानी, मन मूरख, मन बहके-बहकाबे,
मन बहकाबे बात में और मन ही बात बतावे।
मन मोहन मन में रहे, मन मूरख कहिं और,
बानो बादर आंधरौ ढूंढत ठौर-कठोर।
जार्ज शोर उर्दू के शायर ही नहीं, पक्के नवाब थे, जिनकी वेश-भूषा आदि सभी चीजों में पूरी नवाबी थी। पूरी नफासत। उनके फारसी कलामों के छह दीवान ही उपलब्ध हैं। इसके अलावा उनकी आध्यात्मिक रचनाओं का भी एक संग्रह है। उनका जन्म 1823 में अलीगढ में हुआ था। शादी हुई आगरे में एक सुसंस्कृत परिवार में जन्मी मेरियाना से। ऊपर से उन्होंने मुगल जान और रमजानो नाम की दो तवायफें रख छोड़ी थीं। हद दर्जे के शौकीनमिजाज थे वे, और साथ-साथ संगीत-प्रेमी भी। होली के बहुत से गीत, ठुमरियां, दादरा और भजन भी लिखे थे। उनके एक शेर पर गौर करें :
मस्ते-शराबे-इश्क नहीं आता होश में,
गाफिल कभी न जानिए इस होशियार को।
बेंजामिन डेविड मौंटरीज 'दाग' देहलवी के शागिर्द थे। उनके साथ दस साल गुजारे थे। दाग के मरने पर उन्होंने लिखा था :
एक दाग था सो वह भी तो मुजतर गुजर गया,
बाकी रहा है कौन अब हिंदोस्तान में।
कलकत्ते की मशहूर गायिका गौहर जान का नाम आपने अवश्य सुना होगा। याद आती है मुझे एक महफिल की, जिसमें गौहर जान ने केवल एक दादरा डेढ घंटे में गाया था और समा बांध दिया था। वह एक आंग्ल माता-पिता की संतान थी। उनकी मां भी कुशल शायर थीं। उन्होंने बड़ी सुंदर गजलें लिखी थीं, जिन्हें गौहर जान अकसर गाया करती थीं।
अलेक्जेंडर हीथरले गालिब के शिष्य नवाब जैनुल आबदीन आरिफ के शागिर्दों में थे और एक लॉर्ड परिवार में जन्में थे। वे अपनी उर्दू शायरी का एक दीवान अपने पीछे छोड़ गए। उनका एक शेर है :
याद अपना आ गया कशांन-ए-वीरान हमें,
चलते-फिरते हम जो जा निकले बयाबान की तरफ।
और अब अंत में अर्नी 'फर्हत' नामक एक शायरा के दो शेरों को भी देखें :
जरा मुस्किरा कर छिड़क दो नमक तुम,
कि मुंह जख्म का बेमजा हो रहा है।
शिकश्ता खातिरी है 'फर्हत' साकी में कुछ ऐसी,
बहुत मिलती है टूटे जाम से सूरत मेरे दिल की।



5 comments:
सचमुच बहुत दिलचस्प और ज्ञानवर्धक आलेख। आपका शुक्रिया ।
रोचक रहा यह लेख पढ़ना..
भाई योगेन्द्र जी, शब्दसृजन का पाठक को अपनी ओर खींचने के पीछे शायद बड़ा कारण यह है कि आपका मैटर बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक होता है। साथ ही नवीनता लिए हुए भी। आपका यह खोजपरक आलेख भी इसी बात की गवाही दे रहा है। बहुत अच्छा लेख है। बधाई।
धन्यवाद इस बढ़िया आलेख को पढ़वाने के लिए.
Good Article.
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