असद जैदी प्रसंग
इति विवादाय नम:
ओम निश्चल
विद्या विवादाय धनम्मदाय, शक्ति: परेषां परपीड़नाय।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।
जीवन बहुत छोटा है। जीवनाशय बहुत विराट। असद जैदी विवाद को हम पतन के अपकर्ष की ओर नहीं, उदात्त के उत्कर्ष की ओर ले जाएं, यही अभीष्ट है। अत: इस विवाद को हम विवादियों के बीच ही छोड़ कर आगे बढ़ते हैं।
अपने आलेख में मैंने साहित्य के अन्तर्कलह का एक गवाक्ष-भर खोला था, भीतर अनेक तहखाने हैं और तहखानों के भीतर से उठती हुई सड़ांध। जिस कवित विवेक और जीवन विवेक की प्रतिश्रुतियों के लिए हम बने हैं, उसकी कोई बौद्धिक और मानवीय प्रतिच्छाया यदि हमारे भीतर नहीं है तो जरूर इसके उत्तरदायी हम हैं। जहां शब्दों की साखियां हमारे बहसतलब उन्माद में निष्करुण हो उठें, जहां नवजागरण के पहरुए अपने कलरव को भगवती जागरण के कोलाहल में बदल देने के अभिलाषी हों, जहां कुंवर नारायण के शब्दों में सिर्फ मुठभेड़ हो या भेड़ियाधसान, भेड़ या फिर भेड़िया हो जाता इन्सान, जहां कथ्य की रिक्तियों को तदर्थ प्रत्याख्यानों से भरने की कवायद चल रही हो, जहां शब्द संरचनाओं के बीच की निरभ्र खाली जगहों को वर्ग पहेलियों की तरह हल करने की हड़बड़ी हो, वहां कुंवर नारायण की पंक्तियां मन को यह कह कर आश्वस्त करती हैं--
तुम लिख कर मिटा देना मुझे।
मैं लिख कर सिद्ध करता रहूंगा।
असद जैदी पर हमले के बहाने हिंदी की तथाकथित बहुप्रचारित उदारता और सहिष्णुता की धज्जियां उड़ चुकी हैं। फिर भी जंग का गर्दो-गुबार अभी माहौल में तरोताजा है। तट पर हूं पर तटस्थ नहीं--के खयाल से बहस में विनम्र विमर्श के लिए आया था। पर बात हस्तक्षेप से पदक्षेप तक जा पहुंची है। टिप्पणियों के आंगन में तमाम अनाम लोगों ने नाना रूप धर कर मोर्चे संभाल लिए हैं। लेकिन इसमें संशय नहीं कि इस समूचे विवाद की सीवनें उधड़ चुकी हैं। लोगों के मनोमालिन्य पर पड़ी धूल छंट चुकी है। अपना काम केवल इतना ही था, कोई फैसला देना नहीं। पर देख कर हैरत हुई कि समाज में भले ही नवजागरण कभी आया हो, साहित्य में अभी उसका उन्मेष होना शेष है। अपने दुख और विक्षोभ को मैं अपने आलेख में रख सका तो केवल कुंवर जी की इन पंक्तियों के भरोसे कि--
कोई दुख
मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं
वही हारा जो लड़ा नहीं।
मुझे हिंदी विवेक पर पूरा भरोसा है। उसकी निगाह हमारे अंत:करण के चप्पे-चप्पे पर है। मैं तो बस पाकिस्तानी शायर मजहर बुखारी के शब्दों में यही कहूंगा--
छोड़ दे कुछ नहीं है रंजिश में।
आ मेरे साथ खेल बारिश में।
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हाल-फिलहाल : 6
हाल-फिलहाल स्तंभ के अंतर्गत आप साहित्य की दुनिया में नये प्रकाशनों से रू-ब-रू हैं। हमारे इस स्तंभ में अबतक आप अशोक वाजपेयी, उदयप्रकाश, लीलाधर जगूड़ी, पुष्पिता तथा गीताश्री की पुस्तकों पर ओम निश्चल की टिप्पणी पढ चुके हैं। इस श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत है हमारे समय के अत्यंत महत्वपूर्ण वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण की पुस्तक वाजश्रवा के बहाने ।
---------------------------------------------------------इति विवादाय नम:
ओम निश्चल
विद्या विवादाय धनम्मदाय, शक्ति: परेषां परपीड़नाय।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।
जीवन बहुत छोटा है। जीवनाशय बहुत विराट। असद जैदी विवाद को हम पतन के अपकर्ष की ओर नहीं, उदात्त के उत्कर्ष की ओर ले जाएं, यही अभीष्ट है। अत: इस विवाद को हम विवादियों के बीच ही छोड़ कर आगे बढ़ते हैं।
अपने आलेख में मैंने साहित्य के अन्तर्कलह का एक गवाक्ष-भर खोला था, भीतर अनेक तहखाने हैं और तहखानों के भीतर से उठती हुई सड़ांध। जिस कवित विवेक और जीवन विवेक की प्रतिश्रुतियों के लिए हम बने हैं, उसकी कोई बौद्धिक और मानवीय प्रतिच्छाया यदि हमारे भीतर नहीं है तो जरूर इसके उत्तरदायी हम हैं। जहां शब्दों की साखियां हमारे बहसतलब उन्माद में निष्करुण हो उठें, जहां नवजागरण के पहरुए अपने कलरव को भगवती जागरण के कोलाहल में बदल देने के अभिलाषी हों, जहां कुंवर नारायण के शब्दों में सिर्फ मुठभेड़ हो या भेड़ियाधसान, भेड़ या फिर भेड़िया हो जाता इन्सान, जहां कथ्य की रिक्तियों को तदर्थ प्रत्याख्यानों से भरने की कवायद चल रही हो, जहां शब्द संरचनाओं के बीच की निरभ्र खाली जगहों को वर्ग पहेलियों की तरह हल करने की हड़बड़ी हो, वहां कुंवर नारायण की पंक्तियां मन को यह कह कर आश्वस्त करती हैं--
तुम लिख कर मिटा देना मुझे।
मैं लिख कर सिद्ध करता रहूंगा।
असद जैदी पर हमले के बहाने हिंदी की तथाकथित बहुप्रचारित उदारता और सहिष्णुता की धज्जियां उड़ चुकी हैं। फिर भी जंग का गर्दो-गुबार अभी माहौल में तरोताजा है। तट पर हूं पर तटस्थ नहीं--के खयाल से बहस में विनम्र विमर्श के लिए आया था। पर बात हस्तक्षेप से पदक्षेप तक जा पहुंची है। टिप्पणियों के आंगन में तमाम अनाम लोगों ने नाना रूप धर कर मोर्चे संभाल लिए हैं। लेकिन इसमें संशय नहीं कि इस समूचे विवाद की सीवनें उधड़ चुकी हैं। लोगों के मनोमालिन्य पर पड़ी धूल छंट चुकी है। अपना काम केवल इतना ही था, कोई फैसला देना नहीं। पर देख कर हैरत हुई कि समाज में भले ही नवजागरण कभी आया हो, साहित्य में अभी उसका उन्मेष होना शेष है। अपने दुख और विक्षोभ को मैं अपने आलेख में रख सका तो केवल कुंवर जी की इन पंक्तियों के भरोसे कि--
कोई दुख
मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं
वही हारा जो लड़ा नहीं।
मुझे हिंदी विवेक पर पूरा भरोसा है। उसकी निगाह हमारे अंत:करण के चप्पे-चप्पे पर है। मैं तो बस पाकिस्तानी शायर मजहर बुखारी के शब्दों में यही कहूंगा--
छोड़ दे कुछ नहीं है रंजिश में।
आ मेरे साथ खेल बारिश में।
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हाल-फिलहाल : 6
हाल-फिलहाल स्तंभ के अंतर्गत आप साहित्य की दुनिया में नये प्रकाशनों से रू-ब-रू हैं। हमारे इस स्तंभ में अबतक आप अशोक वाजपेयी, उदयप्रकाश, लीलाधर जगूड़ी, पुष्पिता तथा गीताश्री की पुस्तकों पर ओम निश्चल की टिप्पणी पढ चुके हैं। इस श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत है हमारे समय के अत्यंत महत्वपूर्ण वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण की पुस्तक वाजश्रवा के बहाने ।

आज के हिंदी साहित्यिक परिदृश्य को दूर तक प्रभावित करने वाले विशिष्ट कवि कुंवर नारायण इन दिनों दिल्ली में रहते हैं। हाल ही उनकी कविताओं का द्विभाषिक चयन नो अदर वर्ल्ड शीर्षक से रूपा, नई दिल्ली से आया है। कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद उनके सुपुत्र अपूर्व नारायण ने किए हैं उनका पता है : एच 1544, चितरंजन पार्क, नई दिल्ली 110019, फोन : 011-26272508
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वाजश्रवा के बहाने
कुंवर नारायण
भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया,
लोदी रोड, नई दिल्ली-110003
मूल्य 160 रुपये
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वाजश्रवा के बहाने से कुछ चुने हुए काव्यांश
एक
पिता से गले मिलते
आश्वस्त होता नचिकेता कि
उनका संसार अभी जीवित है।
कुंवर नारायण
भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया,
लोदी रोड, नई दिल्ली-110003
मूल्य 160 रुपये
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वाजश्रवा के बहाने से कुछ चुने हुए काव्यांश
एक
पिता से गले मिलते
आश्वस्त होता नचिकेता कि
उनका संसार अभी जीवित है।
उसे अच्छे लगते वे घर
जिनमें एक आंगन हो
वे दीवारें अच्छी लगतीं
जिन पर गुदे हों
किसी बच्चे की तुतलाते हस्ताक्षर,
यह अनुभूति अच्छी लगती
कि मां केवल एक शब्द नहीं,
एक सम्पूर्ण भाषा है,
अच्छा लगता
बार-बार कहीं दूर से लौटना
अपनों के पास,
उसकी इच्छा होती
कि यात्राओं के लिए
असंख्य जगहें और अनन्त समय हो
और लौटने के लिए
हर समय हर जगह अपना एक घर
(पिता से गले मिलते)
दो
मृत्यु इस पृथ्वी पर
जीव का अंतिम वक्तव्य नहीं है
किसी अन्य मिथक में प्रवेश करती
स्मृतियों अनुमानों और प्रमाणों का
लेखागार हैं हमारे जीवाश्म।
परलोक इसी दुनिया का मामला है।
जो सब पीछे छूट जाता
उसी सबका
उसी माला से किंवदन्ती-पाठ।
एक अथक कथावाचक है समय
ढीठ उपदेशक है कालचक्र
दुहराता पिछले पाठ
लिखता कुछ नए पृष्ठ
जीवन का महाग्रंथ
एक संकलन के प्रारूप में नत्थी
पिता-पुत्र दृष्टान्त की
असंख्य चित्रावलियां।
एक सच्चा पश्चाताप--एक प्रायश्चित
एक हार्दिक क्षमायाचना से भी
परिशुद्ध की जा सकती है
भूलचूक की पिछली जमीन,
एक वापसी के सौभाग्य से भी
मनाया जा सकता है
एक नए संवत्सर का शु्भ पर्व,
एक सुलह की शपथ
हो सकती है पर्याप्त संजीवनी
कि आंखें मलते हुए उठ बैठे
एक नया जीवन-संकल्प
और लिपट जाए गले से
एक दुर्लभ अपनत्व की पुन:प्राप्ति
यहां से भी शुरू हो सकता है
एक उपरान्त जीवन--
पूर्णाहुति के बिल्कुल समीप
बची रह गयी
किंचित् श्लोक बराबर जगह में भी
पढ़ा जा सकता है
एक जीवन-संदेश
कि समय हमें कुछ भी
अपने साथ ले जाने की अनुमति नहीं देता,
पर अपने बाद
अमूल्य कुछ छोड़ जाने का
पूरा अवसर देता है।
(उपरान्त जीवन)
तीन
तुम्हें खोकर मैंने जाना
हमें क्या चाहिए-कितना चाहिए
क्यों चाहिए सम्पूर्ण पृथ्वी ?
जबकि उसका एक कोना बहुत है
देह-बराबर जीवन जीने के लिए
और पूरा आकाश खाली पड़ा है
एक छोटे-से अहं से भरने के लिए ?
दल और कतारें बना कर जूझते सूरमा
क्या जीतना चाहते हैं एक दूसरे को मार कर
जबकि सब कुछ जीता-
हारा जा चुका है
जीवन की अंतिम सरहदों पर ?
(तुम्हें खोकर मैंने जाना)
जिनमें एक आंगन हो
वे दीवारें अच्छी लगतीं
जिन पर गुदे हों
किसी बच्चे की तुतलाते हस्ताक्षर,
यह अनुभूति अच्छी लगती
कि मां केवल एक शब्द नहीं,
एक सम्पूर्ण भाषा है,
अच्छा लगता
बार-बार कहीं दूर से लौटना
अपनों के पास,
उसकी इच्छा होती
कि यात्राओं के लिए
असंख्य जगहें और अनन्त समय हो
और लौटने के लिए
हर समय हर जगह अपना एक घर
(पिता से गले मिलते)
दो
मृत्यु इस पृथ्वी पर
जीव का अंतिम वक्तव्य नहीं है
किसी अन्य मिथक में प्रवेश करती
स्मृतियों अनुमानों और प्रमाणों का
लेखागार हैं हमारे जीवाश्म।
परलोक इसी दुनिया का मामला है।
जो सब पीछे छूट जाता
उसी सबका
उसी माला से किंवदन्ती-पाठ।
एक अथक कथावाचक है समय
ढीठ उपदेशक है कालचक्र
दुहराता पिछले पाठ
लिखता कुछ नए पृष्ठ
जीवन का महाग्रंथ
एक संकलन के प्रारूप में नत्थी
पिता-पुत्र दृष्टान्त की
असंख्य चित्रावलियां।
एक सच्चा पश्चाताप--एक प्रायश्चित
एक हार्दिक क्षमायाचना से भी
परिशुद्ध की जा सकती है
भूलचूक की पिछली जमीन,
एक वापसी के सौभाग्य से भी
मनाया जा सकता है
एक नए संवत्सर का शु्भ पर्व,
एक सुलह की शपथ
हो सकती है पर्याप्त संजीवनी
कि आंखें मलते हुए उठ बैठे
एक नया जीवन-संकल्प
और लिपट जाए गले से
एक दुर्लभ अपनत्व की पुन:प्राप्ति
यहां से भी शुरू हो सकता है
एक उपरान्त जीवन--
पूर्णाहुति के बिल्कुल समीप
बची रह गयी
किंचित् श्लोक बराबर जगह में भी
पढ़ा जा सकता है
एक जीवन-संदेश
कि समय हमें कुछ भी
अपने साथ ले जाने की अनुमति नहीं देता,
पर अपने बाद
अमूल्य कुछ छोड़ जाने का
पूरा अवसर देता है।
(उपरान्त जीवन)
तीन
तुम्हें खोकर मैंने जाना
हमें क्या चाहिए-कितना चाहिए
क्यों चाहिए सम्पूर्ण पृथ्वी ?
जबकि उसका एक कोना बहुत है
देह-बराबर जीवन जीने के लिए
और पूरा आकाश खाली पड़ा है
एक छोटे-से अहं से भरने के लिए ?
दल और कतारें बना कर जूझते सूरमा
क्या जीतना चाहते हैं एक दूसरे को मार कर
जबकि सब कुछ जीता-
हारा जा चुका है
जीवन की अंतिम सरहदों पर ?
(तुम्हें खोकर मैंने जाना)
चार
कुछ इस तरह भी पढ़ी जा सकती है
एक जीवन-दृष्टि-
कि उसमें विनम्र अभिलाषाएं हों
बर्बर महत्वाकांक्षाएं नहीं,
वाणी में कवित्व हो
कर्कश तर्क-वितर्क का घमासान नहीं,
कल्पना में इंद्रधनुषों के रंग हों
ईर्ष्या द्वेष के बदरंग हादसे नहीं,
निकट सम्बंधों के माध्यम से
बोलता हो पास-पड़ोस
और एक सुभाषित, एक श्लोक की तरह
सुगठित और अकाट्य हो
जीवन-विवेक।
(पुन: एक की गिनती से)
कुछ इस तरह भी पढ़ी जा सकती है
एक जीवन-दृष्टि-
कि उसमें विनम्र अभिलाषाएं हों
बर्बर महत्वाकांक्षाएं नहीं,
वाणी में कवित्व हो
कर्कश तर्क-वितर्क का घमासान नहीं,
कल्पना में इंद्रधनुषों के रंग हों
ईर्ष्या द्वेष के बदरंग हादसे नहीं,
निकट सम्बंधों के माध्यम से
बोलता हो पास-पड़ोस
और एक सुभाषित, एक श्लोक की तरह
सुगठित और अकाट्य हो
जीवन-विवेक।
(पुन: एक की गिनती से)
पांच
कल सुबह भी खिलेगा
इसी सूरजमुखी खिड़की पर
फूल-सा एक सूर्योदय
फैलेगी घर में
सुगन्ध-सी धूप
चिड़ियों की चहचहाटें
लाएंगी एक निमन्त्रण
कि अब उठो-आओ उड़ें
बस एक उड़ान भर ही दूर है
हमारे पंखों का आकाश।
एक फड़फड़ाहट में
समा जाएगा
सारी उड़ानों का सारांश!
और फिर भी
बचा रह जाएगा हर एक के लिए
नयी-नयी उड़ानों का
उतना ही बड़ा आकाश
जैसा मुझे मिला था!
एक महावन हो जाएगा
मन
उसमें एक अन्य ही जीवन होगा
यह विस्थापन,
कोई दूसरा ही मैं होगा
अपना यह दूसरापन
वन में भी जीवन है
जैसे जीवन में भी वन!
यह पटाक्षेप नहीं है
केवल दृश्य-परिवर्तन।
(अपना यह 'दूसरापन')
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कल सुबह भी खिलेगा
इसी सूरजमुखी खिड़की पर
फूल-सा एक सूर्योदय
फैलेगी घर में
सुगन्ध-सी धूप
चिड़ियों की चहचहाटें
लाएंगी एक निमन्त्रण
कि अब उठो-आओ उड़ें
बस एक उड़ान भर ही दूर है
हमारे पंखों का आकाश।
एक फड़फड़ाहट में
समा जाएगा
सारी उड़ानों का सारांश!
और फिर भी
बचा रह जाएगा हर एक के लिए
नयी-नयी उड़ानों का
उतना ही बड़ा आकाश
जैसा मुझे मिला था!
एक महावन हो जाएगा
मन
उसमें एक अन्य ही जीवन होगा
यह विस्थापन,
कोई दूसरा ही मैं होगा
अपना यह दूसरापन
वन में भी जीवन है
जैसे जीवन में भी वन!
यह पटाक्षेप नहीं है
केवल दृश्य-परिवर्तन।
(अपना यह 'दूसरापन')
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ओम निश्चल की टिप्पणी
वाजश्रवा के बहाने अतीत-वापसी
आत्मजयी की कड़ी में ही एक विदग्ध और कालजयी कृति
पिछले दिनों कविता में जो महत्वपूर्ण घटित हुआ वह है वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण के काव्य वाजश्रवा के बहाने का प्रकाशन। आगामी 19 सितंबर, 2008 को कुंवर जी 82वें वर्ष में प्रवेश करेंगे। यह काव्य न केवल वाजश्रवा के अंत:करण का उद्घाटन है बल्कि जीवन विवेक और कवित विवेक को पुरस्कृत करने की एक काव्याभिलाषा भी है।
हिंदी में बहुत कम किन्तु अत्यंत अर्थवान लिखकर कुंवर नारायण ने साहित्यिक दुनिया में विशेष हलचल पैदा की है। उनके काव्य के वैचारिक प्रवाह में नैतिकता की धीमी और तरल आहट सु्नाई पड़ती है तो एक ऐसी परिपक्व और सयानी समझ भी दिखती है जो जीवनानुभवों का सार आयत्त करती हुई हमारे पुराने मिथकीय संसार का भी नए अर्थों में पुनराविष्कार करती है। आज से लगभग आधी सदी पहले मृत्यु की आंच को बेहद निकट से महसूस करने वाले कुंवर नारायण ने नचिकेता के प्रश्नाकुल मन के निथरे अंत:करण को आत्मजयी में व्यक्त किया था। यम से जीवन का वरदान पाकर लौटै नचिकेता में यदि आत्मजयी होने का भाव प्रबल है तो उसके प्रति अकारण कुपित हो कर निष्करुण होने का क्षोभ पिता वाजश्रवा में कम नहीं रहा है। कुंवर नारायण के ही शब्दों में, आत्मजयी में यदि मृत्यु की ओर से जीवन को देखा गया है तो वाजश्रवा के बहाने में जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की एक कोशिश है।
जनश्रुति है कि वाजश्रवा ने विश्वविजय के निमित्त यज्ञ करने की ठानी थी, किन्तु यज्ञ में भी वे ब्राह्मणों को बूढ़ी कमजोर व रुग्ण गायें ही दान में देने पर अड़े थे। बालक नचिकेता के एतराज करने पर क्रुद्ध वाजश्रवा ने उसे मृत्यु का शाप दे दिया। फलत: नचिकेता को पिता की आज्ञा के अनुसार यम के घर जाना पड़ा। तीन दिनों बाद घर लौटने पर वहां नचिकेता को देख यम ने उसके आने की वजह पूछी और जानना चाहा कि इन तीन दिनों में उसने क्या-क्या खाया। नचिकेता ने कहा, पहले दिन प्रजा खाई, दूसरे दिन पशु तथा तीसरे दिन सुकृत। उसके मार्मिक उत्तर से अभिभूत हो यम ने नचिकेता को तीन वरदान दिए। मृत्यु से निर्भय नचिकेता की वापसी पर अपने अशुभ क्रोध से गहरे विक्षुब्ध वाजश्रवा विस्मय से भर जाते हैं--उनके भीतर पश्चाताप, पछतावे और क्षमाभाव की मिली-जुली चेतना सांस लेती है। उधर न तो अपनी वापसी का कोई दंभ नचिकेता में दिखता है और न ही अपने क्रोध को अतिवादी छोरों पर ले जाकर जीने की कोशिश वाजश्रवा में नजर आती है। पिता-पुत्र के संबंधों में एक सहज संगति है, कवि के शब्दों में उसमें मार्मिक समझौते और सुंदर सुलहें भी हैं।
बड़े लेखक की निगाह जहां एक तरफ अपनी परंपरा से ओझल नहीं होती वहीं दूसरी तरफ समकालीनता के कैनवस पर वह मिथकों को पुनर्जीवित करता है और परखता है कि पुराने मूल्य वस्तुत: हमारे लिए कितने मूल्यवान हैं। रामविलास शर्मा इसका एक बड़ा उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी परंपरा से होते हुए मार्क्सवाद के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन-अनुशीलन में जीवन भले ही खपा दिया हो, अपने उत्तर-जीवन में वे जिस तरह वैदिक अध्ययन की ओर लौटे थे, उससे इस समझ को बल मिलता है कि सच्चे और बड़े लेखक की जड़ें जितनी परंपरा में रहती हैं, उतनी ही समकालीनता में। इतिहास और मिथक की धूल-धक्कड़ साफ कर अपने समय के कालुष्य को भारती ने अंधायुग में व्यंजित किया तो श्रीकांत वर्मा ने मगध में इतिहास और मिथकों के बहाने अपने समय-विवेक पर तीखी टिप्पणियां कीं। इसी तरह, वाजश्रवा के बहाने उपनिषदों-मिथकों पर पड़ी धूल पोछना अतीतोन्मुखी होना नहीं है, बल्कि उन जीवन-मूल्यों में भरोसा टिकाना है जो आज के दौर में कहीं अधिक अहमियत और प्रासंगिकता रखते हैं।
पाठ पर जाएं तो इस काव्य के पहले खंड 'नचिकेता की वापसी' में वाजश्रवा के भीतर जीवन की प्रसन्नमुखता का आहवान है, अहंकार के विलोपन की आश्वस्ति है, जीवन की ओर लौटने की मनुहार भरी टेर है--लौट आओ प्राण पुन: हम प्राणियों के बीच। कोई हलचल है जिससे उसका खालीपन भर उठता है, उसे औसत असफलताओं-भरे अपने कई-कई जीवन याद आते हैं। उसे लगता, वह एक कृतार्थ पिता भी हो सकता है और एक पुत्र की उदासी भी--जैसे अपनी नियति का भोक्ता और द्रष्टा दोनो हो। उसके चेहरे पर लौटते जीवन का सवेरा है। फिर उसे एक जीवन याद आता है जब वह सोचता है--मृत्यु से कहीं अधिक निर्मम हो सकता है अक्सर जीवन का तर्क। स्मृतिशिलाओं से ज्यादा जरूरी है शिलान्यास और वह संकल्प की पहली ईंट उठाने को उद्यत हो उठता। कई बार लगता, दुनिया मिल गयी पर जल्दी ही भ्रम टूटता। सुदूर अतीत की स्मृतियां उसका पीछा करतीं। पिता से गले मिलते नचिकेता को अपने पिता का संसार जीवन्त हो उठा दिखता। यह अनु्भूति अच्छी लगती कि मां केवल एक शब्द नहीं एक सम्पूर्ण भाषा है। उसकी इच्छाओं में यात्राओं की उड़ानें होतीं, अनंत समय की चाहत और विश्रांति का एक ठौर होता--अपना एक घर।
दूसरे खंड वाजश्रवा के बहाने में वाजश्रवा के विदग्ध जीवन का सायंकाल व्यंजित है। 'उपरान्त जीवन' शीर्षक कविता खंड में वह कहता है : मृत्यु इस पृथ्वी पर जीवन का अंतिम वक्तव्य नहीं है। पूरी की पूरी कविता महज एक पाठ नहीं है, एक जीवन संदेश है कि समय हमें कुछ भी अपने साथ ले जाने की अनुमति नहीं देता, पर अपने बाद अमूल्य कुछ छोड़ जाने का पूरा अवसर देता है। वाजश्रवा के भीतर से पछतावे की अनुगूंज और उदासी के कुहासे से बाहर निकलने की प्रतिश्रुति सुनाई देती है : एक विषम पल में जाना है मैंने उसकी प्रलयंकर प्रगल्भता को / जब तुम्हें खोया / और एक पल में जाना है उसकी उदारता को / जब तुम्हें वापस पाया। वाजश्रवा कहता है--तुम्हें खोकर मैने जाना / हमें क्या चाहिए--कितना चाहिए क्यों चाहिए सम्पूर्ण पृथ्वी? जबकि उसका एक कोना बहुत है देह-बराबर जीवन जीने के लिए / और पूरा आकाश खाली पड़ा है / एक छोटे-से अहं से भरने के लिए? वाजश्रवा के बहाने कुंवर नारायण कवित-विवेक और जीवन-विवेक को भी नए सिरे से खंगालते हैं। वे कहते हैं--कुछ इस तरह भी पढ़ी जा सकती है एक जीवन-दृष्टि--कि उसमें विनम्र अभिलाषाएं हों, बर्बर महत्वाकांक्षाएं नहीं / वाणी में कवित्व हो / कर्कश तर्क-वितर्क का घमासान नहीं…और एक सुभाषित, एक श्लोक की तरह सुगठित और अकाट्य हो जीवन-विवेक।
कहना न होगा कि कठोपनिषद के आख्यान से अपने कवि कर्म की शुरुआत कुंवर जी ने जिस विदग्ध काव्य आत्मजयी से की थी, अपने उत्तर-जीवन के इस परिच्छेद में वे फिर एक बार कठोपनिषद के इसी प्रसंग के दूसरे मार्मिक पहलुओं की ओर लौटे हैं। नचिकेता की वापसी यदि वाजश्रवा को अपनी भूलचूक सुधारने का एक अमूल्य अवसर देता है तो वाजश्रवा के बहाने कुंवर नारायण अपने कृतित्व की एक विदग्ध, कालजयी और मूल्यवान रेखा खींचते हैं। वे यह सिद्ध करते हैं कि पृथ्वी को लूटने खसोटने की बर्बर महत्वाकांक्षा जितनी आज के सभ्य समाज में है, उतनी वैदिक मनुष्यों में न थी। इस तरह जैसे वे कहना चाहते हों--अतीत सदैव मुंह फेरने की चीज नहीं है, यह कई मायनों में अनुकरणीय भी है। वाजश्रवा के बहाने निश्चय ही क्लैसिकी गुणवत्ता से भरा काव्य है, जहां हर कविता खंड-काव्य का अविभाज्य अंश होते हुए भी स्वतंत्र कविता के रूप में अलग अलग वैशिष्ट्य एवं अनुभवों से मंडित है। यहां कुंवर नारायण के शिल्प, मितकथन और अर्थगौरव का वही जादू बरकरार है, जिसके लिए वे बरसों से जाने जाते रहे हैं।
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डा0 ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059 फोन: 09955774115
ईमेल : omnishchal@yahoo.co.in / omnishchal@gmail.com
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वाजश्रवा के बहाने अतीत-वापसी
आत्मजयी की कड़ी में ही एक विदग्ध और कालजयी कृति
पिछले दिनों कविता में जो महत्वपूर्ण घटित हुआ वह है वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण के काव्य वाजश्रवा के बहाने का प्रकाशन। आगामी 19 सितंबर, 2008 को कुंवर जी 82वें वर्ष में प्रवेश करेंगे। यह काव्य न केवल वाजश्रवा के अंत:करण का उद्घाटन है बल्कि जीवन विवेक और कवित विवेक को पुरस्कृत करने की एक काव्याभिलाषा भी है।
हिंदी में बहुत कम किन्तु अत्यंत अर्थवान लिखकर कुंवर नारायण ने साहित्यिक दुनिया में विशेष हलचल पैदा की है। उनके काव्य के वैचारिक प्रवाह में नैतिकता की धीमी और तरल आहट सु्नाई पड़ती है तो एक ऐसी परिपक्व और सयानी समझ भी दिखती है जो जीवनानुभवों का सार आयत्त करती हुई हमारे पुराने मिथकीय संसार का भी नए अर्थों में पुनराविष्कार करती है। आज से लगभग आधी सदी पहले मृत्यु की आंच को बेहद निकट से महसूस करने वाले कुंवर नारायण ने नचिकेता के प्रश्नाकुल मन के निथरे अंत:करण को आत्मजयी में व्यक्त किया था। यम से जीवन का वरदान पाकर लौटै नचिकेता में यदि आत्मजयी होने का भाव प्रबल है तो उसके प्रति अकारण कुपित हो कर निष्करुण होने का क्षोभ पिता वाजश्रवा में कम नहीं रहा है। कुंवर नारायण के ही शब्दों में, आत्मजयी में यदि मृत्यु की ओर से जीवन को देखा गया है तो वाजश्रवा के बहाने में जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की एक कोशिश है।
जनश्रुति है कि वाजश्रवा ने विश्वविजय के निमित्त यज्ञ करने की ठानी थी, किन्तु यज्ञ में भी वे ब्राह्मणों को बूढ़ी कमजोर व रुग्ण गायें ही दान में देने पर अड़े थे। बालक नचिकेता के एतराज करने पर क्रुद्ध वाजश्रवा ने उसे मृत्यु का शाप दे दिया। फलत: नचिकेता को पिता की आज्ञा के अनुसार यम के घर जाना पड़ा। तीन दिनों बाद घर लौटने पर वहां नचिकेता को देख यम ने उसके आने की वजह पूछी और जानना चाहा कि इन तीन दिनों में उसने क्या-क्या खाया। नचिकेता ने कहा, पहले दिन प्रजा खाई, दूसरे दिन पशु तथा तीसरे दिन सुकृत। उसके मार्मिक उत्तर से अभिभूत हो यम ने नचिकेता को तीन वरदान दिए। मृत्यु से निर्भय नचिकेता की वापसी पर अपने अशुभ क्रोध से गहरे विक्षुब्ध वाजश्रवा विस्मय से भर जाते हैं--उनके भीतर पश्चाताप, पछतावे और क्षमाभाव की मिली-जुली चेतना सांस लेती है। उधर न तो अपनी वापसी का कोई दंभ नचिकेता में दिखता है और न ही अपने क्रोध को अतिवादी छोरों पर ले जाकर जीने की कोशिश वाजश्रवा में नजर आती है। पिता-पुत्र के संबंधों में एक सहज संगति है, कवि के शब्दों में उसमें मार्मिक समझौते और सुंदर सुलहें भी हैं।
बड़े लेखक की निगाह जहां एक तरफ अपनी परंपरा से ओझल नहीं होती वहीं दूसरी तरफ समकालीनता के कैनवस पर वह मिथकों को पुनर्जीवित करता है और परखता है कि पुराने मूल्य वस्तुत: हमारे लिए कितने मूल्यवान हैं। रामविलास शर्मा इसका एक बड़ा उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी परंपरा से होते हुए मार्क्सवाद के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन-अनुशीलन में जीवन भले ही खपा दिया हो, अपने उत्तर-जीवन में वे जिस तरह वैदिक अध्ययन की ओर लौटे थे, उससे इस समझ को बल मिलता है कि सच्चे और बड़े लेखक की जड़ें जितनी परंपरा में रहती हैं, उतनी ही समकालीनता में। इतिहास और मिथक की धूल-धक्कड़ साफ कर अपने समय के कालुष्य को भारती ने अंधायुग में व्यंजित किया तो श्रीकांत वर्मा ने मगध में इतिहास और मिथकों के बहाने अपने समय-विवेक पर तीखी टिप्पणियां कीं। इसी तरह, वाजश्रवा के बहाने उपनिषदों-मिथकों पर पड़ी धूल पोछना अतीतोन्मुखी होना नहीं है, बल्कि उन जीवन-मूल्यों में भरोसा टिकाना है जो आज के दौर में कहीं अधिक अहमियत और प्रासंगिकता रखते हैं।
पाठ पर जाएं तो इस काव्य के पहले खंड 'नचिकेता की वापसी' में वाजश्रवा के भीतर जीवन की प्रसन्नमुखता का आहवान है, अहंकार के विलोपन की आश्वस्ति है, जीवन की ओर लौटने की मनुहार भरी टेर है--लौट आओ प्राण पुन: हम प्राणियों के बीच। कोई हलचल है जिससे उसका खालीपन भर उठता है, उसे औसत असफलताओं-भरे अपने कई-कई जीवन याद आते हैं। उसे लगता, वह एक कृतार्थ पिता भी हो सकता है और एक पुत्र की उदासी भी--जैसे अपनी नियति का भोक्ता और द्रष्टा दोनो हो। उसके चेहरे पर लौटते जीवन का सवेरा है। फिर उसे एक जीवन याद आता है जब वह सोचता है--मृत्यु से कहीं अधिक निर्मम हो सकता है अक्सर जीवन का तर्क। स्मृतिशिलाओं से ज्यादा जरूरी है शिलान्यास और वह संकल्प की पहली ईंट उठाने को उद्यत हो उठता। कई बार लगता, दुनिया मिल गयी पर जल्दी ही भ्रम टूटता। सुदूर अतीत की स्मृतियां उसका पीछा करतीं। पिता से गले मिलते नचिकेता को अपने पिता का संसार जीवन्त हो उठा दिखता। यह अनु्भूति अच्छी लगती कि मां केवल एक शब्द नहीं एक सम्पूर्ण भाषा है। उसकी इच्छाओं में यात्राओं की उड़ानें होतीं, अनंत समय की चाहत और विश्रांति का एक ठौर होता--अपना एक घर।
दूसरे खंड वाजश्रवा के बहाने में वाजश्रवा के विदग्ध जीवन का सायंकाल व्यंजित है। 'उपरान्त जीवन' शीर्षक कविता खंड में वह कहता है : मृत्यु इस पृथ्वी पर जीवन का अंतिम वक्तव्य नहीं है। पूरी की पूरी कविता महज एक पाठ नहीं है, एक जीवन संदेश है कि समय हमें कुछ भी अपने साथ ले जाने की अनुमति नहीं देता, पर अपने बाद अमूल्य कुछ छोड़ जाने का पूरा अवसर देता है। वाजश्रवा के भीतर से पछतावे की अनुगूंज और उदासी के कुहासे से बाहर निकलने की प्रतिश्रुति सुनाई देती है : एक विषम पल में जाना है मैंने उसकी प्रलयंकर प्रगल्भता को / जब तुम्हें खोया / और एक पल में जाना है उसकी उदारता को / जब तुम्हें वापस पाया। वाजश्रवा कहता है--तुम्हें खोकर मैने जाना / हमें क्या चाहिए--कितना चाहिए क्यों चाहिए सम्पूर्ण पृथ्वी? जबकि उसका एक कोना बहुत है देह-बराबर जीवन जीने के लिए / और पूरा आकाश खाली पड़ा है / एक छोटे-से अहं से भरने के लिए? वाजश्रवा के बहाने कुंवर नारायण कवित-विवेक और जीवन-विवेक को भी नए सिरे से खंगालते हैं। वे कहते हैं--कुछ इस तरह भी पढ़ी जा सकती है एक जीवन-दृष्टि--कि उसमें विनम्र अभिलाषाएं हों, बर्बर महत्वाकांक्षाएं नहीं / वाणी में कवित्व हो / कर्कश तर्क-वितर्क का घमासान नहीं…और एक सुभाषित, एक श्लोक की तरह सुगठित और अकाट्य हो जीवन-विवेक।
कहना न होगा कि कठोपनिषद के आख्यान से अपने कवि कर्म की शुरुआत कुंवर जी ने जिस विदग्ध काव्य आत्मजयी से की थी, अपने उत्तर-जीवन के इस परिच्छेद में वे फिर एक बार कठोपनिषद के इसी प्रसंग के दूसरे मार्मिक पहलुओं की ओर लौटे हैं। नचिकेता की वापसी यदि वाजश्रवा को अपनी भूलचूक सुधारने का एक अमूल्य अवसर देता है तो वाजश्रवा के बहाने कुंवर नारायण अपने कृतित्व की एक विदग्ध, कालजयी और मूल्यवान रेखा खींचते हैं। वे यह सिद्ध करते हैं कि पृथ्वी को लूटने खसोटने की बर्बर महत्वाकांक्षा जितनी आज के सभ्य समाज में है, उतनी वैदिक मनुष्यों में न थी। इस तरह जैसे वे कहना चाहते हों--अतीत सदैव मुंह फेरने की चीज नहीं है, यह कई मायनों में अनुकरणीय भी है। वाजश्रवा के बहाने निश्चय ही क्लैसिकी गुणवत्ता से भरा काव्य है, जहां हर कविता खंड-काव्य का अविभाज्य अंश होते हुए भी स्वतंत्र कविता के रूप में अलग अलग वैशिष्ट्य एवं अनुभवों से मंडित है। यहां कुंवर नारायण के शिल्प, मितकथन और अर्थगौरव का वही जादू बरकरार है, जिसके लिए वे बरसों से जाने जाते रहे हैं।
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डा0 ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059 फोन: 09955774115
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8 comments:
असद जैदी की कविताओं पर टिप्पणि के लिये एक लिंक छोड रहा हूं, यदि न जंचे तो हटा दीजिये.
http://likhoyahanvahan.blogspot.com/2008/07/blog-post_22.html#links
आधी शताब्दी के बाद एक कवि फिर से एक पुराने सूत्र को जोड रहा है--यह कितनी अद्भुत बात है! पचास साल में तो आदमी अपने आप को भूल जाता है, कुछ और बन जाता है, और यहाँ एक कवि एक अधूरी कविता को पूरा करने का या उसे आगे बढाने का बीडा उठाता है। जीवन और रचना का इससे बडा affirmation क्या हो सकता है? कुँवर जी, तुम सलामत रहो हजार बरस, हर बरस के दिन हों पचास हजार!
साधारण सिंह
हमारे समय मे कुंवर जी जैसे कवि का होना सौभाग्य है. ओम निश्चल ने कुंवर जी के कवित्व को वाजश्रवा के बहाने रेखाँकित कर एक बदा उपकार किया है-खास तौर पर उन लोगोँ के लिये जो किसी वजह से पुस्तक चाह कर भी नही पढ सकते. कवितायेँ पढ कर ह्रिदय उद्वेलित हो उठा. आगामी जन्म दिन के लिये कवि को बहुत बहुत मुबरकवाद्.--कुमार नवीन्, चंदौसी/ पटना
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Kunwar naarayan ji ne is kavya ke bahaane jeevana ko naye sire se dekha hai. kavitaayen bahut achhi lagin.
Reviewer om nishchal ji ne is kitaab ko parhne ki lalak jaga di hai.gyanpith ne ise prakaashit kar nishchay hi stutya karya kiyaa hai--mahendra singh, kolkata
Om Nishchal ji, आपकी आलोचकीय टिप्पणियाँ गहन अध्ययन में तपे विश्वसनीय शब्द हैं। बधाई स्वीकारें।
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Balram Agarwal
www.jangatha.blogspot.com
om ji
aapne ek apriya mansikta se alag ker kunvar ji aesi kavitaye prhai jisse man badla.jis aster per karmendu ji ne bahas uthai ,swal khare kiye use jis astar per anambihari sajjan(?)le aaye the ki blog dekhna chhorna pra.ab kunvar ji man badal diaa.badhai
Achchhi post hai. Badhayi.
बहुत सार्थक...सकारात्मक
चिन्तन के नए आयाम
और सरोकारों की नई पड़ताल
पर एकाग्र प्रस्तुति.
समीक्षकीय दृष्टि अद्भुत है...आभार.
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन
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