Sunday 29 June 2008

कविता में पुनर्जन्म


हाल-फ़िलहाल स्तंभ की पिछली प्रविष्टि में हमने पुष्पिता की कविताओं की पुस्तक हृदय की हथेली पर चर्चा की थी। स्तंभ की शर्तों के अनुरूप, पुस्तक से कुछ कविताएं और ओम निश्चल की टिप्पणी भी प्रस्तुत की गई थी। एक पाठक को यह प्रविष्टि बहुत नागवार गुजरी और उन्होंने इसकी भरपूर निंदा की। उन्होंने तत्परता से यह भी सलाह दे डाली कि 'कोशिश कीजिए कि साहित्य की गंदगी ब्लॉगों में न आने पाए' आदि-आदि।

पुष्पिता की कविताओं के संदर्भ में उन्होंने लिखा कि उन्हें एक भी कविता पसंद नहीं आई और यह कि ये बहुत बुरी कविताएं हैं। और सबसे अहम बात जो उन्होंने लिखी वह यह कि 'पुनर्जन्म' शब्द का इस्तेमाल कविता में होना ही क्यों चाहिए।

असहमतियों का हम स्वागत करते हैं। पसंद और नापसंद की अभिव्यक्ति के लिए भी कोई पाठक पूरी तरह स्वतंत्र है। लेकिन 'पुनर्जन्म' शब्द पर उनकी टिप्पणी के संदर्भ में मुझे अपनी बात आपसे साझा करना आवश्यक प्रतीत हुआ।

हर कविता अपने लोकतांत्रिक मूल्यों में सांस लेती है। कविता का भी अपना एक लोकतंत्र है। हमारी व्यक्तिगत अभिरुचियां, आस्वाद-क्षमता, हमारे जीवन के जेन्विन या छद्म सरोकार, हमारी काव्य-संवेदनाएं--हमारे विवेक, हमारी समझ और हमारी संवेदनशीलता की सीमाएं तय करती हैं… कविता में कौन-से शब्द आने चाहिए और कौन-से नहीं, यह कविता के बाहर तय नहीं होते। यह निर्णय किसी कवि के लिए स्वयं उसकी कविता करती है। अभिव्यक्त होती संवेदनाएं या अनुभूतियां कविता में स्वयं के लिए शब्द ढूंढ लेती हैं…कविता में शब्दों के चयन की रचनात्मक एवं स्वाभाविक इस प्रक्रिया में हम अलग से कोई हस्तक्षेप नहीं करते। ऐसा हस्तक्षेप करना ही, दरअसल, साहित्य की गंदगी में शामिल होने जैसा उपक्रम होगा।

इसलिए, 'पुनर्जन्म' शब्द कविता में आना ही क्यों चाहिए जैसे अतिवाद और कविता की इंजीनियरिंग में हमारा विश्वास कतई नहीं है। कविता की ऐसी इंजीनियरिंग की ही परिणति है कि आज पूरी तरह कृत्रिम, प्लास्टिक की कविताएं भी रची जा रही हैं।

सदियों से स्वयं कविता भी 'पुनर्जन्म' लेती रही हैं। हमारे पीछे छूट गया कविता-समय वर्तमान में नए रूपाकार, नए मुहावरों, नई शैली में अवतरित होता रहा है। अनेक कवियों ने पुनर्जन्म की अवधारणा का उपयोग अपनी कविताओं में बखूबी किया है। हम अपने पाठकों को याद दिलाने के लिए, उदाहरणस्वरूप, चर्चित कवि कुंवर नारायण की कविता ये शब्द वही हैं एवं चर्चित कवि-कथाकार उदय प्रकाश की कविता पैसा का एक प्रासंगिक अंश यहां प्रकाशित कर रहे हैं, जिनमें पुनर्जन्म शब्द की गहरी अर्थ-व्याप्तियां अपनी संपूर्ण स्वाभाविक उर्वरता के साथ अभिव्यक्त हुई हैं।


ये शब्द वही हैं

कुंवर नारायण

यह जगह वही है
जहां कभी मैंने जन्म लिया होगा
इस जन्म से पहले

यह मौसम वही है
जिसमें कभी मैंने प्यार किया होगा
इस प्यार से पहले

यह समय वही है
जिसमें मैं बीत चुका हूँ कभी
इस समय से पहले

वहीं कहीं ठहरी रह गयी है एक कविता
जहां हमने वादा किया था कि फिर मिलेंगे

ये शब्द वही हैं
जिनमें कभी मैंने जिया होगा एक अधूरा जीवन
इस जीवन से पहले।


पैसा

उदय प्रकाश


नए जनमे बच्चे की तरह
वह मेरी हथेली पर गिरा

किसी महत्वपूर्ण घटना की तरह था
उसका गिरना मेरी हथेलियों पर
मैंने मुटि्ठयों में उसे जोरों से भींच लिया

वह वहीं था अपनी गुनगुनी आंच में
मेरे दिमाग तक रेंगता
फिर से नया, अद्भुत और अभूतपूर्व
जैसे--पुनर्जन्म --मैंने कहा …

(लंबी कविता का एक अंश)

3 comments:

rashmi bhargava said...

re birth is truth. As the death is again a cruel reality .Poetry defines its transparent language through life ,the formation of this revolves in between these two realities ,so the word `PUNARJANMA`is used correctly ,and wonderfully carved in the poems of Dr. pushpita Awasthi ,`Hridya ki Hatheli` ,the texture ,colour shades,all came through directly from the heart ,as the poetess lived these poems RASHMI BHARGAVA MOBILE 09929487597

Nidhi Shrivastava, M P said...

Yogendraji, kavita me punarjanm ek atyant sargarbhit tippani hai kisi pathak ki laparvah, anargal pralap jaisi tippani ke bahane. Apne aap me bilkul mukammal aur niruttar kar dene wali tippani. Main bhi ispar bahut kuchh kahana chahati thi, lekin ab kahane ki jaroorat nahin rahi. Darasal, blogon ki duniya me bahut kam jagah hai jahan sanjida aur sarthak kuchh ho raha hai. Pathakon ki aisi duragrahpurn tippaniyan is baat ka praman hai ki blogon ki duniya mein ve ek prakar ki arajakta kayam rakhana chahate hain, kyonki gambhir logon ke aane se unhen apane astitva par khatara najar aane lagata hai.

sidheshwer said...

बहुत खूब साहब.
क्या बात है. कहां-कहां भटकता रहा .इस ब्लाग पर पहले क्यों नहीं आया.

 
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