चर्चित इराकी कवि अहमद अब्देल सारा बगदाद की अल-मुतनबी स्ट्रीट पर काव्य-पाठ करते हुए। यहां 6 मार्च, 2007 को एक कार बम विस्फोट में तीन लोग मारे गए थे। एक समय यह इलाका किताबों की दूकानों और बौद्धिकों के अड्डों के लिए मशहूर था। बम विस्फोट के बाद से यहां टूटी-फूटी इमारतों और जली हुई किताबों-कागजों के बीच कई काव्य-पाठ हो चुके हैं। फोटो : अली अल सादी, सौजन्य : द गार्जियन
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इसके पहले कि कविता पुन: मानवीय
हो सके, इसे नृशंस होना सीखना होगा।
-- जे एम सिंज
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कविता / योगेन्द्र कृष्णा
(कवियों-बौद्धिकों के विरुद्ध एक गोपनीय शासनादेश)
देखते ही गोली दागो
ध्वस्त कर दो
कविता के उन सारे ठिकानों को
शब्दों और तहरीरों से लैस
सारे उन प्रतिष्ठानों को
जहां से प्रतिरोध और बौद्धिकता
की बू आती हो…
कविता अब कोई बौद्धिक विलास नहीं
रोमियो और जुलिएट का रोमांस
या दुखों का अंतहीन विलाप नहीं
यह बौद्धिकों के हाथों में
ख़तरनाक हथियार बन रही है…
यह हमारी व्यवस्था की गुप्त नीतियों
आम आदमी की आकांक्षाओं
और स्वप्नों के खण्डहरों
मलबों-ठिकानों पर प्रेत की तरह मंडराने लगी है
सत्ता की दुखती रगों से टकराने लगी है…
समय रहते कुछ करो
वरना हमारे दु:स्वप्नों में भी यह आने लगी है…
बहुत आसान है इसकी शिनाख्त
देखने में बहुत शरीफ
कुशाग्र और भोली-भाली है
बाईं ओर थोड़ा झुक कर चलती है
और जाग रहे लोगों को अपना निशाना बनाती है
सो रहे लोगों को बस यूं ही छोड़ जाती है…
इसलिए
कवियों, बौद्धिकों और जाग रहे आम लोगों को
किसी तरह सुलाए रखने की मुहिम
तेज़ कर दो…
हो सके तो शराब की भटि्ठयों
अफीम के अनाम अड्डों और कटरों को
पूरी तरह मुक्त
और उन्हीं के नाम कर दो…
सस्ते मनोरंजनों, नग्न प्रदर्शनों
और अश्लील चलचित्रों को
बेतहाशा अपनी रफ्तार चलने दो…
संकट के इस कठिन समय में
युवाओं और नव-बौद्धिकों को
कविता के संवेदनशील ठिकानों से
बेदखल और महरूम रखो…
तबतक उन्हें इतिहास और अतीत के
तिलिस्म में भटकाओ
नरमी से पूछो उनसे…
क्या दान्ते की कविताएं
विश्वयुद्ध की भयावहता और
यातनाओं को कम कर सकीं…
क्या गेटे नाज़ियों की क्रूरताओं पर
कभी भारी पड़े…
फिर भी यकीन न हो
तो कहो पूछ लें खुद
जीन अमेरी, प्रीमो लेवी या रुथ क्लगर से...
ताद्युश बोरोवस्की, कॉरडेलिया एडवार्डसन
या नीको रॉस्ट से
कि ऑश्वित्ज़, बिरकेनाऊ, बुखेनवाल्ड
या डखाऊ के भयावह यातना-शिविरों में
कविता कितनी मददगार थी!
कवि ऑडेन से कहो… लुई मैकनीस से कहो…
वर्ड्सवर्थ और कीट्स से कहो
कि कविता के बारे में
उनकी स्थापनाएं कितनी युगांतकारी हैं…
पोएट्री मेक्स नथिंग हैपेन…
ब्यूटि इज़ ट्रुथ, ट्रुथ ब्यूटि…
पोएट्री इज़ स्पॉन्टेनियस ओवरफ्लो ऑफ पावरफुल फ़ीलिंग्स…
मीनिंग ऑफ अ पोएम इज़ द बीइंग ऑफ अ पोएम…
बावजूद इसके कि कविता के बारे में
महाकवियों की ये दिव्य स्थापनाएं
पूरी तरह निरापद और कालजयी हैं
घोर अनिश्चितता के इस समय में
हम कोई जोखिम नहीं उठा सकते…
कविता को अपना हथियार बनाने वालों
कविता से आग लगाने वालों
शब्दों से बेतुका और अनकहा कहने वालों
को अलग से पहचानो…
और देखते ही गोली दागो…




14 comments:
अनकही को क्या ख़ूब कहा आपने . अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर.
इसलिए
कवियों, बौद्धिकों और जाग रहे आम लोगों को
किसी तरह सुलाए रखने की मुहिम
तेज़ कर दो…
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इस मुहिम के खिलाफ़
बहुत ज़रूरी मुहिम है
आपकी यह रचना.
बेहद प्रभावशाली.
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शुभकामनाएँ
डा.चंद्रकुमार जैन
शुक्रिया संजय पटेल जी और चंद्रकुमार जैन जी, बहुत-बहुत आभार।
Apki patrika ka naya ank adbhut hai. Baghdad ke vidhvans ki tasvir ke saath milkar apaki kavita vilakshan prabhav chhodati hai. Iss vaishvik chetana ko banaye rakhen, jo prarambh se hi apaki patrika ki vishishtata bhi hai. Jagudi ji ki kavitayen bhi bahut achhi hain, phir uspar Om ji ki tippani ka bhi kya kahna.
Aap sab ko dheron badhaiyan.
Nidhi Shrivastav, M.P.
निधि जी आपका भी बहुत-बहुत आभार।
अभी कुछ ही हफ़्ते पहले मैने कीर्ति जैन द्वारा निर्देशित नाटक 'बगदाद बर्निंग* देखा था. हालांकि वह अमेरिकी कब्जे के बाद वहां रह रहे मूल नागरिकों के, जो एक तरफ़ कट्टरपंथी उग्र मज़हबियों और दूसरी तरफ़ विदेशी आक्रांताओं के दो-दो पाटों के बीच जी रहे हैं.
लेकिन इस कविता की अर्थव्याप्ति तो बहुत बडी है. हमारे समय की तमाम सत्ता-संरचनाओं की हिंसा और उत्पीडन के प्रतिरोध को प्रगट करने वाली इस कविता को प्रस्तुत करने के लिये योगेंद्र जी बधाई.
बहुत-बहुत आभार उदय जी, सादर आभार।
योगेंद्र जी, बग़दाद की गलियों वाला दृश्य दिल को कंपकंपाता है। शब्दसृजन दिनोदिन निखरता जा रहा है। मेरी बधाई स्वीकारें……
मेजर रतन, जयपुर
Yogendra ji, Tasvir sachmuch bahut kuchh bol rahi hai, lekin us prishthabhumi me tasvir se bhi kahin adhik apaki kavita bol rahi hai. Atyant prabhavshali, aur sashakt pratirodh ki kavita ke liye meri badhayi swikaren.
--Ranjana Khare, Varanasi
कठिन वक्त के लिए एक जरूरी कविता। बधाई।
योगेन्द्र जी, बहुत अच्छी कविता है, बधाई……बहुत-बहुत बधाई।
अनिल विभाकर
कवितएं तेवर और धार के साथ आई हैं, ब्लॉग समृद्ध हो उठा है, वाई के दा आपसे बहुत उम्मीद है…
आभार! योगेंद्र जी, जिस दौर में हम कविताएं लिख रहे हैं, उसमें हमारी अपनी स्थिति और संदर्भ हमारी कविताओं के रूप, संरचना और द्रिष्टि को निर्धारित कर रहे हैं. क्या यही वह कारण नहीं है कि आपकी और मेरी कविता के भीतर की बेचैनी एक है. यह कठिन ही नहीं, एक निर्णायक दौर भी है. कला और राजनीति, दोनों के लिए.
Baghdad prasang par aapki yah kavita marmik hai.
Niranjan Shrotriya
09827007736
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