आगामी अंकों में इस स्तंभ के अंतर्गत हम इन पुस्तकों पर चर्चा करेंगे :
- उससे पूछो जया जादवानी
- कवि एकादश संपादक : लीलाधर मंडलोई / अनिल जनविजय
- कवि ने कहा श्रृंखला के अंतर्गत विष्णु खरे एवं विष्णु नागर
- एक ब्रेक के बाद अलका सरावगी
- यकीन की आयतें आशुतोष दुबे
- सेज पर संस्कृत मधु कांकरिया
- कवि परंपरा प्रभाकर श्रोत्रिय
- शम्म हर रंग में कृष्ण बलदेव वैद
- अंतिम पक्ति में नीलेश रघुवंशी
- दानापानी लीलाधर मंडलोई
- याज्ञवल्क्य से बहस सुमन केशरी
- आमीन आलोक श्रीवास्तव
- वाजश्रवा के बहाने कुंवर नारायण
- निर्मल वर्मा के स्त्री विमर्श वंदना केंगरानी
- भया कबीर उदास उषा प्रियंवदा
- फुटपाथ पर कुर्सी कात्यायनी
- चलते तो अच्छा था असगर वजाहत
- धरती ने कहा फिर कुबेर दत्त
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हृदय की हथेली
पुष्पिता
राधाकृष्ण प्रकाशन,
7/31, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-2
संस्करण : 2008
मूल्य रु 250 रुपये
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पुष्पिता
प्रकाशित पुस्तकें : शब्द बनकर रहती हैं ॠतुएं, अक्षत, गोखरू, सूरीनाम, कथा सूरीनाम, कविता सूरीनाम, कैरेबियन देशों में हिंदी शिक्षा और सूरीनाम, हिंदी परिषद का इतिहास, ईश्वराशीष, दोस्ती की चाह (अनुवाद), हिंदी एवं शब्द-शक्ति त्रैमासिक पत्रिकाओं की संस्थापक संपादक।
राष्ट्रीय हिंदी अकादमी द्वारा अंतरराष्ट्रीय अज्ञेय साहित्य सम्मान (2002), राष्ट्रीय हिंदी सेवा अवार्ड-सूरीनाम (2003), यू के हिंदी समिति द्वारा एल एम सिंघवी अंतरराष्ट्रीय कविता सम्मान (2004), कैरेबियाई हिंदी संस्थान की संस्थापक निदेशक (2003), सातवां विश्व हिंदी सम्मेलन (सूरीनाम) संयोजन।
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संपर्क : प्रो0 पुष्पिता अवस्थी, डायरेक्टर ऑफ हिंदू युनिवर्स सेंटर, पी ओ बॉक्स 1080, 1810 के बी अल्कमार, द नीदरलैंड्स
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हृदय की हथेली से चुनी हुई कुछ कविताएं
समर्पण
प्रेम
हर जन्म में
पुनर्जन्म लेना चाहता है!
समर्पण को सौंपती हूं
अपना समर्पण
पुनर्जन्म के लिए!
ईश्वरानंद
मैं तुम्हारे प्रेम का धान्य हूं
और तुम
हृदय का विश्वास
तुम्हारी स्मृति-कुठले में
संचित उपजाए अन्न की तरह हूं
अपनी अंत:सलिला में
रूपवान मछली की तरह
तैरने देना चाहते हो मुझे।
तुम जीना चाहते हो मुझमें
प्रेम का सौंदर्य
और मैं पाना चाहती हूं
सौंदर्य-सुख!
जीवन का विलक्षण आनन्द-प्रेम
धर्म के लिए ईश्वरानंद है जो।
हथेली
प्रणय
हथेली में रखा हुआ
मधु-पुष्प है
साथ उड़ान की शक्ति
रचता है--
शब्दों में
पृथ्वी का कोमलतम स्पर्श
सारी क्रूरताओं के विरूद्ध।
ओठों पर शंख
काग़ज़ पर शब्द
जैसे
ओठों पर शंख।
मेरा मन
तुम्हारी स्मृतियों की
जीवन्त पुस्तक।
ईश्वर ने
हम दोनों में
बचाया है--प्रेम
और हम दोनों ने
प्रेम में ईश्वर…।
चुपचाप
आंखों के भीतर
आंसुओं की नदी है।
पलकें मूंदकर
नहाती हैं आंखें।
अपने ही आंसुओं की नदी में
दुनिया से थक कर।
ओठों के अन्दर
उपवन है,
जीते हैं--ओठ
चुप होकर स्मृति
प्यास से जल कर
एकाकीपन की आग में।
हृदय की वसुधा में
प्रणय का निर्झर नियाग्रा है
मेरे लिए ही झरता हुआ…।
आकाशगंगा
तुम्हारे बिना
समय--नदी की तरह
बहता है--मुझमें।
मैं नहाती हूं--भय की नदी में
जहां डसता है--अकेलेपन का सांप
कई बार।
मन-माटी को बनाती हूं--पथरीला
तराशकर जिसे तुमने बनाया है मोहक
सुख की तिथियां
समाधिस्थ होती हैं--
समय की माटी में।
अपने मौन के भीतर
जीती हूं--तुम्हारा ईश्वरीय प्रेम
चुप्पी में होता है
तुम्हारा सलीकेदार अपनापन।
अकेले के अंधेरेपन में
तुम्हारा नाम ब्रह्मांड का एक अंग
देह की आकाशगंगा में तैर कर
आंखें पार उतर जाना चाहती हैं
ठहरे हुए समय से मोक्ष के लिए।
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ओम निश्चल
स्त्री-पुरुष संबंधों की जब-जब चर्चा होती है, प्रेम उसके केंद्र में होता है। सारी की सारी संबंधहीनता प्रेम के अभाव के कारण है। प्रवासी भारतीय कवयित्री पुष्पिता का कविता संसार भी एक तरफ प्रेम की प्रफुल्ल अनुभूतियों से भरा है तो दूसरी तरफ उसमें उदासियों का एक ऐसा कोना भी है जो कवयित्री के शब्दों को आंखों की कोरों की तरह सजल बनाए रखता है। तमाम अभाव दशाओं को साधने वाली पुष्पिता की कविताओं में कैरेबियन देशों की प्रकृति, स्वदेश की स्मृतियां तथा देह और मन की अनेक अंतश्छवियां भरी हैं। सूरीनाम में कई वर्ष गुजारने के बाद हालैंड में प्रवास करने वाली पुष्पता के यहां प्रेम, प्रकृति, मानव-स्वभाव और स्त्री-मन की अंतरंग अनुभूतियों को अत्यंत ऋजु और बिंदास-भाव से व्यक्त किया गया है।
शब्द बन कर रहती हैं ऋतुएं, अक्षत और ईश्वराशीष के बाद हृदय की हथेली से पुष्पिता अवस्थी ने प्रणय, प्रतीक्षा, विरह, आतुरता, समर्पण और आराधना की लौकिक अनुभूतियों को लोकेषणा के संकरे दायरे से बाहर निकाल कर जैसे एक आध्यात्मिक सिहरन में बदल दिया है। 'आंसू दुनिया के लिए आंख का पानी है लेकिन तुम्हारे लिए दुख की आग है'--कहते हुए कवयित्री ने प्रबंधन-पटु समय में प्रेम की एक सरल रेखा खींचनी चाही है। उसके यहां प्रेम के रूपक नहीं हैं, प्रणय का पिघलता ताप है, आंखों की चौखट में विश्वास की अल्पना है, अन-जी आकांक्षाओं की प्यास है, प्रेम का धन-धान्य है, स्मृति के कुठले में संजोए अन्न की तरह अतीत का वैभव है। अचरज नहीं कि कवयित्री खुद यह कहती है--'इन कविताओं की व्यंजना आकाश की तरह निस्सीम है और आकाशगंगा की तरह अछोर भी। इनके अंदर की यात्रा मन के रंगों-रचावों की यात्रा है, रस-कलश की छलकन है। सृजन के राग का आरोहण और कृत्रिमता के तिमिर का तिरोहण है।'
प्रेम के उद्दाम आदिम संगीत से होती--प्रेम का गान करने और उसका मान रखने वाले कवियों--कालिदास, जयदेव, विद्यापति और घनानंद की परंपरा की ही धात्री पुष्पिता फिर एक बार प्रणय के पारावार में संतरण करना चाहती हैं, अपनी गंगा में प्रिय की यमुना को जीते हुए कृष्ण को राधा-भाव और राधा को कृष्ण भाव में जीते हुए देखना चाहती हैं। उनकी पदावलियों में अनुरक्त और विदग्ध अनुभवों---दोनों की उमगती कसक भरी है, रचने वाले के भीतर जैसे अकेलेपन की पिघलती मोमबत्ती। शब्दों के ताप में प्रणय की तपश्चर्या है, प्रेम को पृथ्वी की पहली और अंतिम चाहत की तरह महसूस करने की उत्कंठा है। प्यार की पवित्र जाह्नवी को दिनोदिन मैला कर रहे समय के बावजूद देह की आकाशगंगा में तैर कर आंखें पार उतर जाना चाहती हैं ठहरे हुए समय से मोक्ष के लिए। इन कविताओं का सलीकेदार अपनत्व मन पर एक ऐसी छाप छोड़ता है जैसे इन अनु्भूतियों के साथ पढ़ने वाला भी सहयात्रा कर रहा हो।
पुष्पिता की प्रेम कविताओं का विन्यास अपने समकालीनों से बहुत अलग है। उनकी ही एक कविता पुनर्जन्म का सुख की पंक्तियां कहती हैं, 'सारी स्तब्ध गति के बावजूद / मैं उस तरह नहीं चल रही / जैसे दुनिया दौड़ रही है / क्योंकि मैं जानती हूं/ जहां गति बहुत होती है / वहां गहराई नहीं होती है बहुत।' यह जो अलग-सा होना, दिखना और चलना है, यह जो गति नहीं, गहराई की चिंता करना है, यही पुष्पिता की कविताओं की ताकत है। केदारनाथ सिंह की एक पंक्ति है--'इस समय सड़क पर चल रहा कोई भी व्यक्ति मेरा समकालीन नहीं है।' इस वाक्य की रोशनी में पुष्पिता की कविताएं ठीक से समझी जा सकती हैं। उन्हें गति नहीं, गहराई की परवाह है, शब्द नहीं, संवेदना की परवाह है, तभी तो उनकी लेखनी से देह-कुसुम और देह की चाक से जैसी कविताएं फूटती हैं---शिशु-जन्म की कल्पना, उत्सवता और कामना से भरी। एक भिन्न किस्म की नवता-नवीनता का आस्वाद है इन कविताओं में--अधरों ने शब्दों से बनायी है अल्पना और धड़कनों ने प्रतीक्षा की लय में गाए हैं--बिल्कुल नए गीत--एक तरल, सजल संवेदना जैसे हृदय की हथेली पर रची हुई हो।
पुष्पिता ने बनारस से कविता-यात्रा शुरू की थी। प्रणय की प्रकृत माधुरी का आस्वाद भी यहां उन्होंने चखा था। एक आतुर, आकुल और कविता-कला के लिए समर्पित मन लिए वे अपनी कल्पनाओ में प्रेम का ही घर बनाती रहीं और प्रेम की राह में रोड़े अटकाने वाली परिस्थितियों का सामना भी किया। स्त्री जीवन में प्रेम की असंभवता को उन्होंने अपने अनुभवों के तईं ही जाना बूझा और प्रेम के बदले मिलने वाले संताप, पुरुष-वर्चस्व के घटाटोप में घुट कर जीने वाली स्त्री की वेदना को गहरे तक महसूस किया। एक ठियां से दूसरी ठियां बदलती और प्रेम में बार-बार ठगी जाने वाली स्त्री-संवेदना भी उनके यहां घनीभूत है। तथापि, प्रेम-कविताओं के लिए उनके मन का एक कोना आज भी उसी तरह सजल और करुण है।
यह केवल एक कथन भर नहीं है कि प्यार से अधिक कोमल और रेशमी कुछ नहीं बचा है पृथ्वी पर जीने के लिए। और संग्रह की आखिरी कविता नदी में नाव में तो जैसे कवयित्री की रचना-प्रक्रिया का समूचा सत्व समाया हुआ है--थोड़ा-सा धैर्य, थोड़ा-सा मौन, थोड़ी-सी आस्था, थोड़ी-सी आकांक्षा, थोड़े-से स्वप्न, थोड़ी-सी ध्वनियां और इन सब ने रचे हैं कुछ अनरचे शब्द। कहना न होगा कि पुष्पिता की ये कविताएं उस भाव-संसार और उन भाव-दशाओं का ज्ञापन-उद्घाटन हैं जिनके बिना मनुष्य-चित्त के भीतरी सौंदर्य को परख पाना संभव नहीं है। जिसके भीतर प्रेम की थोड़ी-सी भी नमी बची है, उसे ये कविताएं हृदय की हथेली से थपकियां देंगी--जीवन के एक नए आलोक-आश्वस्ति की तरफ ले जाएंगी--अपना बना लेंगी।
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डा- ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-११००५९ फोन: 09955774115



4 comments:
कोशिश कीजिये कि साहित्य की गन्दगी ब्लॉग में न आने पाये, वरना आज के जो लोकप्रिय ब्लोगर हैं, उनकी भविष्यवाणी सच हो जायेगी.
जगूड़ी जी, उदय प्रकाश आदि तो ठीक हैं, अशोक जी भी एक हद तक... लेकिन निश्चलजी द्वारा बाबा, केदार, त्रिलोचन पर टिप्पणी की प्रतीक्षा है.. एक राह दिखा कर बरगलाना उचित नहीं है.
हर महिला मारीना त्स्वेतायेवा बनना चाहती है लेकिन वैसा जीवन जिया है क्या उसने?
सारी कवितायें मैंने पढीं लेकिन एक भी भावना ऐसी नहीं लगी जो मन को छू ले. बहुत बुरी कवितायें. और ये पुनर्जन्म जैसा शब्द कविताओं में इस्तेमाल ही क्यों होना चाहिए?
इसका मतलब यह है कि खाए-अघाए मूर्खों का तांडव यहाँ भी शुरू होने वाला है!!!!!!!!!!!!11
Pashpita ji ki kavitaen achhi lagin. Komal, gahare prem ke bhavon vali ye kavitaen man ko chhooti hain. Apka Haal Filhaal stambh kafi soochanaparak hai. Badhai.
Nidhi Shrivastava, MP
29 Jun 08, 14:25
sheodayal: aaj aapka blog dekha aur isi bahane Uday Prakash aur Avinash ke blog bhi dekhe. sach poochiye toh ab tak blog ki duniya se mera aparichay hi raha hai isiliye yeh anubhav kuch vishesh hai.Jo log aaj ki duniya me saahitya ke liye jagah ko lekar pareshaan rehte hain unke liye saahityik blogs ki phailti duniya aashwastikarak hai. Sach toh yah hai ki jab se manushya hai kavita uske saath hi lagi hui hai...Aapki drishti, shram aur srijanshilta aapke blog ko mahatwapurna banati hai.Aapki kavita kavita evam satta pratishthan ke beech ke dwandwa ko kalatmak dhang se abhivyakt karti hai...Jeevan me saahitya evam kavita kaa sthaan bana rahe iske liye zaroori hai ki kavita me jeevan ka vidroop hi nahin uska samoocha saundarya bhi prakhartam dhang se abhivyakti paye... Rajendra Rajan ki sadyaprakashit kavitaon ko Uday Prakash ke blog par isthaan mila hai. Mai swaym Rajendra ko unki in kavitaon ke liye phone par badhaai de chuka hoon aur aapse tatha Om Nischal se bhi is par charcha ki hai....Aapko
Meri shubhkaamnaiyen aur badhaai!!!!
विजय शंकर चतुर्वेदी की टिप्पणी पढ़कर दुख हुआ । किसी कवि की कविताएं पसंद आना या न आना उनका निजी मामला है । 'अशोक जी भी एक हद तक ठीक हैं', तो चतुर्वेदी जी बताएं कि वो हद क्या है । बाबा, केदार,त्रिलोचन पर टिप्पणी की फरमाईश की है आपने तो प्रतीक्षा करें, इसमें बरगलाने जैसी क्या बात है । ये तो कुछ ऐसे हुआ जैसे कोई विविध भारती पर किसी गाने की फरमाईश करे और गाना तुरन्त न बजने पर कुढ़ने, जलने जैसी टिप्पणियां करने लगे । मूर्खो का तांडव जैसे शब्द प्रयोग करने के पीछे शायद चतुर्वेदी जी की पत्रकारीय कुण्ठा ही है । चतुर्वेदी जी हिन्दी की भलाई के लिए ये बहुत जरूरी है कि आप जैसे हिन्दी के वरद पुत्र थोड़ा धैर्य रखें ।
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