हाल-फिलहाल हमारा नया स्तंभ है जिसके अंतर्गत आप हिंदी में प्रकाशित नई साहित्यिक कृतियों से रू-ब-रू हैं। हम चुनी हुई इन कृतियों का एक संक्षिप्त परिचय और उनमें से कुछ अंश भी प्रकाशित करेंगे। और साथ ही उन कृतियों पर हमारे जाने-माने, प्रखर समीक्षक ओम निश्चल अपनी बेबाक संक्षिप्त टिप्पणी प्रस्तुत करेंगे। हमें इस आयोजन पर आपकी राय की भी प्रतीक्षा रहेगी।
नई कृतियों की इस श्रृंखला में अबतक आप अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश की नई कृतियों के अंश और उनपर ओम निश्चल की टिप्पणी पढ चुके हैं। इसकी अगली कड़ी के रूप में यहाँ प्रस्तुत है चर्चित कवि लीलाधर जगूड़ी की पुस्तक ख़बर का मुंह विज्ञापन से ढका है।
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खबर का मुंह विज्ञापन से ढका है
लीलाधर जगूड़ी
वाणी प्रकाशन,
21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य: 125 रुपये
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वाणी प्रकाशन,
21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य: 125 रुपये
संकलन से कुछ कविताएं
गरीब वेश्या की मौत
कल-पुर्जों की तरह थकी टांगें, थके हाथ
उसके साथ
जब जीवित थी
लग्गियों की तरह लंबी टांगें
जूतों की तरह घिसे पैर
लटके होठों के आस-पास
टट्टुओं की तरह दिखती थी उदास
तलवों में कीलों की तरह ठुके सारे दुख
जैसे जोड़-जोड़ को टूटने से बचा रहे हों
उखड़े दांतों के बिना ठुकी पोपली हंसी
ठक-ठकाया एक-एक तन्तु
जन्तु के सिर पर जैसे
बिन बाए झौव्वा भर बाल
दूसरे का काम बनाने के काम में
जितनी बार भी गिरी
खड़ी हो जा पड़ी किसी दूसरे के लिए
अपना आराम कभी नहीं किया अपने शरीर में
दाम भी जो आया कई हिस्सों में बंटा
बहुतों को वह दूर से
दुर्भाग्य की तरह मजबूत दिखती थी
खुशी कोई दूर-दूर तक नहीं थी
सौभाग्य की तरह
कोई कुछ कहे, सब कर दे
कोई कुछ दे-दे, बस ले-ले
चेहरे किसी के उसे याद न थे
दीवार पर सोती थी
बारिश में खड़े खच्चर की तरह
ऐसी थकी पगली औरत की भी कमाई
ठग-जवांई ले जाते थे
धूप बत्तियों से घिरे
चबूतरे वाले भगवान को देखकर
किसी मुर्दे की याद आती थी
सदी बदल रही थी
सड़क किनारे उसे लिटा दिया गया था
अकड़ी पड़ी थी
जैसे लेटे में भी खड़ी हो
उस पर कुछ रुपए फिंके हुए थे अंत में
कुछ जवान वेश्याओं ने चढाए थे
कुछ कोठा चढते उतरते लोगों ने
एक बूढा कहीं से आकर
उसे अपनी बीवी की लाश बताया था
एक लावारिस की मौत से
दूसरा कुछ कमाना चाहता था
मेहनत की मौत की तरह
एक स्त्री मरी पड़ी थी
कल-पुर्जों की तरह
थकी टांगें, थके हाथ
उसके साथ अब भी दिखते थे
बीच ट्रैफिक
भावुकता का धंधा करने वाला
अथक पुरुष विलाप जीवित था
लगता है दो दिन लाश यहां से हटेगी नहीं।
एक ख़बर
अकसर
आतंकवादी सड़कों के किनारे गन्ने के खेतों में छिप जाते हैं
इसलिए गन्ना जलवाया जा रहा है
रामदीन कुछ गहरे डूबकर बोला
--गन्ना महंगा गुड़ बन जाए, मंहगी चीनी बन जाए
गन्ने को कीड़ा लग जाए
इसी तरह का रोग है कि गन्ने में आतंकवादी छिप जाए
सुलहदीन बोला
--अचरज नहीं कि पीपल वाले भूत से ज्यादा
गन्ने से डर लग जाए
मातादीन बोला--गन्ने से उगता है उद्यम
और हर उद्यम में जा छिपता है आतंकवादी
रामदीन भी पलट कर बोला
--पर अगर आलू के बराबर हो गए आतंकी
गोली बारूद आलुओं में से चलने लगे
मान लीजिए वे अरहर में छिप जाएं
धान में छिप जाएं
सारे अन्न-क्षेत्र में आतंकी ही आतंकी हों
वे अड़ जाएं और इतने बढ जाएं
कि साग भाजियों में भी कीड़ों की तरह पड़ जाएं
तब भाई मातादीन हम अपना क्या-क्या जलाएंगे ?
प्राचीन संस्कृति को अंतिम बुके
पारंपरिक भारतीय कलियों और फूलों की खुशबुएं
पांडवों की तरह स्वर्गारोहण की सदिच्छा से हिमालय की
ओर चली गई हैं। क्योंकि जिन फूलों का भारतीयकरण
किया गया है उनमें गजब की बेशर्मी, हठधर्मी और बिना
खुशबू की कई दिन लंबी ताज़गी है
फिर भी गांधी मैदान में केवल एक दिन की राजनीति में
लगभग पांच क्विंटल पारंपरिक भारतीय खुशबूदार
फूल कुचले गए। धार्मिक कारणों से छ: हज़ार टन फूल
नदियों में बहाए गए। मांगलिक अवसरों पर
जिन हज़ारों फूलों की बलि दी गई, उनके विसर्जन
की भी कोई ठीक-ठाक व्यवस्था नहीं देखी मैंने
फूलों की अंतिम उपयोगिता हमारी खुशहाली और
आनंद में कुचले जाने की है। हमारा जन्म-मरण
और समर्पण, पुष्प श्रृंगार और पुष्प संहार के बिना
अधूरा है
हो सकता है दस हज़ार टन से कुछ अधिक भारतीय फूल
इस साल सामाजिक या आर्थिक कारणों से नष्ट या सार्थक
हुए हों। फिर भी भारत के मूल माली फूलों पर नहीं
अपनी माली हालत पर रोए। उनके चारों ओर मक्खियां
भिनभिनाती रहीं। मधुमक्खियां दूर कहीं अपना शोक-
गीत गाती रहीं अशोक की तरह
पारंपरिक भारतीय फूलों के बिना अब कहां जाएंगी ये
मधुमक्खियां? क्योंकि एक मधुमक्खी एक ग्राम शहद
बनाने के लिए लगभग पांच हज़ार प्रकार के फूलों पर
मधुकरी करने जाती है। बीस हज़ार प्रजाति की भारतीय
मधुमक्खियां उदास हैं। इतनी सारी उदासी प्रतिदिन
तेरह हज़ार किलोग्राम शहद का नुकसान कर डालती है
यानि हर बसंत में इक्कीस लाख रुपए की प्रतिदिन हानि…
सखि बसंत आया
सोटों जैसे खिले हुए निर्गंध बुके लाया।
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कविता : छटपटाते मन का विश्रामालय
ओम निश्चल
लीलाधर जगूड़ी के हाल ही आए संग्रह खबर का मुंह विज्ञापन से ढका है की कविताएं, उनकी ही नहीं, हिंदी कविता के सांचे और ढांचे से बिल्कुल अलग नजर आती हैं। कविता में यह विरल लीक जगूड़ी ने खुद के बलबूते खींची है जो अब एक अकेले कवि की परंपरा बनती जा रही है, और यह अच्छी बात है।
खबर का मुंह विज्ञापन से ढका है में आज का ज्वलंत परिदृश्य रेखांकित हुआ है। हमारे समय की सच्चाई को निरावृत करने की बेहद काव्यात्मक कोशिश का परिणाम है यह कविता। भिखारी समस्या पर केंद्रित जुर्माना कविता वास्तव में संग्रह की उपलब्धि है, जिसमें धैर्यधनी भिखारी से लेकर लोगों की करुणा के किवाड़ तोड़ते खुद के दया और सुनने वाले के लिए शर्म पैदा करते भिखारियों की पूरी जमात का दृष्टांत मिल जाता है। एक सुअर आख्यान के रूप में रची यह कविता संभवत: हिंदी कविता परिसर में अकेली कविता होगी जो भिखारियों के आचरण का इतना बारीक विश्लेषण करती है। और तो और, जमाने में होते बदलाव से उनकी कविता अत्यंत वाकिफ एवं चौकस दिखती है। सौ गलियों वाला बाजार विपणन की नई से नई तकनीक के परिणामों का खुलासा है। समाज में तब्दीली की कछुआ रफ्तार विज्ञापन युग के रणनीतिकारों को स्वीकार्य नहीं है, जिन्होंने ठीक से साक्षर भी न हुए समाज को विज्ञापनों से बदल डालने का बीड़ा उठा लिया है। फलत: पानी के संकट से जूझते समाज में लहरें पैदा करने की तरकीबों को अंजाम देने का काम जिस बखूबी चल रहा है, उसमें अचरज नहीं कि स्त्री किसी ब्रांड की पहचान बन चुकी है, देह को दरी के रूप में विपणनयोग्य बनाने की कार्रवाई चल रही है । आज के विपणनकारों व कारपोरेट सौदागरों के लिए विचार-विनिमय वस्तु विनिमय की सीढी भर है। चवन्नी भर ढकी लड़कियां अठन्नी भर मूड बोने के लिए हैं और बिना बीमे की मौतें आर्थिक हानि के नमूने के रूप में देखी जा रही हैं। मीडिया और विज्ञापकों की परस्परता ने एक ऐसे अतियथार्थवाद को जन्म दिया है जो सचाई से कोसों दूर है, यानी ऐसे युग में ही यह कहा और बर्दाश्त किया जा सकता है कि -- इस कंपनी की साड़ियां स्त्रियों को आत्महत्या से बचाती हैं। बकौल कवि, वे चुपचाप हर चीज में घुस गए / पहाड़ में, रेत में, खेत में और अभिप्रेत में। वे घास और काई की तरह स्वाभाविक लगने के बजाय जंग की तरह स्वाभाविक लग रहे थे।
जगूड़ी की कविता न तो पारंपरिक कविता की लीक और लय पर चलती है न आजमाए हुए बिम्ब-प्रतीकों का अवलंब ग्रहण करती है। यह कवित-विवेक के अपने खोजे-रचे प्रतिमानों और सौंदर्यधायी मानदंडों पर टिकी है। रीति, रस, छंद और अलंकरण के दिखावटी सौष्ठव से परे यह आधुनिक जन-जीवन में खिलती प्रवृत्तियों, उदारताओं, मिथ्या मान्यताओं, व्याधियों, किंवदन्तियों, क्रूरताओं का खाका खीचती है। इसमें बरते गए शब्द आधुनिकता के स्वप्न और संघर्ष की पारस्परिक रगड़ से उपजे हैं। पर्यावरण को ये कविताएं चिंताओं और सरोकारों के नए धरातल से देखती हैं। इनमें सब कुछ के लुट जाने का और लुटते हुए को बचा लेने का हाहाकारी शोर और रोर नहीं है। क्रूरताओं और हिंसा के चितेरों को ये कविताएं चेतावनियां नहीं देतीं क्योंकि ये जानती हैं--यह काम कवि का नहीं, व्यवस्था और प्रशासन का है। जिस तरह प्रशासन और कानून के जिम्मे एक स्वच्छ नागरिक पर्यावरण का निर्माण है, इन कविताओं का काम नागरिकता के विरुद्ध होते पर्यावरण की शिनाख्त है, कविता को रिपोर्ट की शक्ल देना नहीं। हां, इनका काम खबर में छिपी कविता को निकाल लेना है। पलटवार और एक खबर -- खबरों के अंबार से ही निकाली गयी कविताएं हैं। मनुष्य के भीतर छिपी पशुता और पशुओं के भीतर छिपी मनुष्यता का प्रतिशत ज्ञात कर लेना जैसे इनका ध्येय हो -- और ऐसी स्थिति में ही टुनकीबाई और गरीब वेश्या की मौत जैसी कविताएं जन्म लेती हैं।
बेशक, दुनिया का सबसे बड़ा रचनात्मक झूठ एक कवि ही लिख सकता है, किन्तु रचनात्मकता में जमीनी हकीकत भी वही बोता है। फूलों की खेती और उदासी, तथा प्राचीन संस्कृति को अंतिम बुके जैसी कविताएं लिख कर जगूड़ी ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि वे रचनात्मकता के उत्खनन में अभी बूढ़े नहीं दिखते। उन्हें किसानी तथा देश के अर्थतंत्र की पूरी समझ है। वे देश के मालियों की माली हालत और मधुमिक्खयों को मधुकरी (जीविका) के मौलिक अधिकार का मामला कविता की संसद में उठा कर यह जताते हैं कि जो कुछ भी उनकी कविता बना रही है, उसका सामाजिक खराबियों से कोई न कोई संबंध अवश्य है। जगूड़ी का यह सारा काव्यात्मक उपक्रम भाषा की एक-जैसी किटप्लाई तैयार करने के विरुद्ध अपने देशी रंदे के इस्तेमाल से एक ऐसी काव्यभाषा रचना या पाना है जो किसी स्थापित भाषा के अदेखे-अ-सुने को प्रकट करने के लिए गूंगे कारीगर के अंदाजे-बयां जैसा हो। तभी शायद कविता भी छटपटाते मन का विश्रामालय बन सके।
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डा0 ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059 फोन: 09955774115
ईमेल: omnishchal@yahoo.co.in omnishchal@gmail.com
ओम निश्चल
लीलाधर जगूड़ी के हाल ही आए संग्रह खबर का मुंह विज्ञापन से ढका है की कविताएं, उनकी ही नहीं, हिंदी कविता के सांचे और ढांचे से बिल्कुल अलग नजर आती हैं। कविता में यह विरल लीक जगूड़ी ने खुद के बलबूते खींची है जो अब एक अकेले कवि की परंपरा बनती जा रही है, और यह अच्छी बात है।
खबर का मुंह विज्ञापन से ढका है में आज का ज्वलंत परिदृश्य रेखांकित हुआ है। हमारे समय की सच्चाई को निरावृत करने की बेहद काव्यात्मक कोशिश का परिणाम है यह कविता। भिखारी समस्या पर केंद्रित जुर्माना कविता वास्तव में संग्रह की उपलब्धि है, जिसमें धैर्यधनी भिखारी से लेकर लोगों की करुणा के किवाड़ तोड़ते खुद के दया और सुनने वाले के लिए शर्म पैदा करते भिखारियों की पूरी जमात का दृष्टांत मिल जाता है। एक सुअर आख्यान के रूप में रची यह कविता संभवत: हिंदी कविता परिसर में अकेली कविता होगी जो भिखारियों के आचरण का इतना बारीक विश्लेषण करती है। और तो और, जमाने में होते बदलाव से उनकी कविता अत्यंत वाकिफ एवं चौकस दिखती है। सौ गलियों वाला बाजार विपणन की नई से नई तकनीक के परिणामों का खुलासा है। समाज में तब्दीली की कछुआ रफ्तार विज्ञापन युग के रणनीतिकारों को स्वीकार्य नहीं है, जिन्होंने ठीक से साक्षर भी न हुए समाज को विज्ञापनों से बदल डालने का बीड़ा उठा लिया है। फलत: पानी के संकट से जूझते समाज में लहरें पैदा करने की तरकीबों को अंजाम देने का काम जिस बखूबी चल रहा है, उसमें अचरज नहीं कि स्त्री किसी ब्रांड की पहचान बन चुकी है, देह को दरी के रूप में विपणनयोग्य बनाने की कार्रवाई चल रही है । आज के विपणनकारों व कारपोरेट सौदागरों के लिए विचार-विनिमय वस्तु विनिमय की सीढी भर है। चवन्नी भर ढकी लड़कियां अठन्नी भर मूड बोने के लिए हैं और बिना बीमे की मौतें आर्थिक हानि के नमूने के रूप में देखी जा रही हैं। मीडिया और विज्ञापकों की परस्परता ने एक ऐसे अतियथार्थवाद को जन्म दिया है जो सचाई से कोसों दूर है, यानी ऐसे युग में ही यह कहा और बर्दाश्त किया जा सकता है कि -- इस कंपनी की साड़ियां स्त्रियों को आत्महत्या से बचाती हैं। बकौल कवि, वे चुपचाप हर चीज में घुस गए / पहाड़ में, रेत में, खेत में और अभिप्रेत में। वे घास और काई की तरह स्वाभाविक लगने के बजाय जंग की तरह स्वाभाविक लग रहे थे।
जगूड़ी की कविता न तो पारंपरिक कविता की लीक और लय पर चलती है न आजमाए हुए बिम्ब-प्रतीकों का अवलंब ग्रहण करती है। यह कवित-विवेक के अपने खोजे-रचे प्रतिमानों और सौंदर्यधायी मानदंडों पर टिकी है। रीति, रस, छंद और अलंकरण के दिखावटी सौष्ठव से परे यह आधुनिक जन-जीवन में खिलती प्रवृत्तियों, उदारताओं, मिथ्या मान्यताओं, व्याधियों, किंवदन्तियों, क्रूरताओं का खाका खीचती है। इसमें बरते गए शब्द आधुनिकता के स्वप्न और संघर्ष की पारस्परिक रगड़ से उपजे हैं। पर्यावरण को ये कविताएं चिंताओं और सरोकारों के नए धरातल से देखती हैं। इनमें सब कुछ के लुट जाने का और लुटते हुए को बचा लेने का हाहाकारी शोर और रोर नहीं है। क्रूरताओं और हिंसा के चितेरों को ये कविताएं चेतावनियां नहीं देतीं क्योंकि ये जानती हैं--यह काम कवि का नहीं, व्यवस्था और प्रशासन का है। जिस तरह प्रशासन और कानून के जिम्मे एक स्वच्छ नागरिक पर्यावरण का निर्माण है, इन कविताओं का काम नागरिकता के विरुद्ध होते पर्यावरण की शिनाख्त है, कविता को रिपोर्ट की शक्ल देना नहीं। हां, इनका काम खबर में छिपी कविता को निकाल लेना है। पलटवार और एक खबर -- खबरों के अंबार से ही निकाली गयी कविताएं हैं। मनुष्य के भीतर छिपी पशुता और पशुओं के भीतर छिपी मनुष्यता का प्रतिशत ज्ञात कर लेना जैसे इनका ध्येय हो -- और ऐसी स्थिति में ही टुनकीबाई और गरीब वेश्या की मौत जैसी कविताएं जन्म लेती हैं।
बेशक, दुनिया का सबसे बड़ा रचनात्मक झूठ एक कवि ही लिख सकता है, किन्तु रचनात्मकता में जमीनी हकीकत भी वही बोता है। फूलों की खेती और उदासी, तथा प्राचीन संस्कृति को अंतिम बुके जैसी कविताएं लिख कर जगूड़ी ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि वे रचनात्मकता के उत्खनन में अभी बूढ़े नहीं दिखते। उन्हें किसानी तथा देश के अर्थतंत्र की पूरी समझ है। वे देश के मालियों की माली हालत और मधुमिक्खयों को मधुकरी (जीविका) के मौलिक अधिकार का मामला कविता की संसद में उठा कर यह जताते हैं कि जो कुछ भी उनकी कविता बना रही है, उसका सामाजिक खराबियों से कोई न कोई संबंध अवश्य है। जगूड़ी का यह सारा काव्यात्मक उपक्रम भाषा की एक-जैसी किटप्लाई तैयार करने के विरुद्ध अपने देशी रंदे के इस्तेमाल से एक ऐसी काव्यभाषा रचना या पाना है जो किसी स्थापित भाषा के अदेखे-अ-सुने को प्रकट करने के लिए गूंगे कारीगर के अंदाजे-बयां जैसा हो। तभी शायद कविता भी छटपटाते मन का विश्रामालय बन सके।
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डा0 ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059 फोन: 09955774115
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6 comments:
नियाजे -इश्क की ऐसी भी एक मंजिल है ।
जहाँ है शुक्र शिकायत किसी को क्या मालूम । ।
जगूड़ी जी की कविताओं पर यह भी अच्छा लेख है. ओम जी और आप, दोनों का आभार. ओम जी ने 'जुर्माना' और 'सौ गलियों वाला बाज़ार' का जिक्र किया है. योगेंद्र जी, इन दोनों को भी ब्लॉग पर मुहैया करा दें, तो अच्छा लगेगा. ये दोनों कविताएं मैंने नहीं पढ़ी हैं.
आपकी यह सीरिज़ अच्छी चल रही है.
अच्छा आलेख और सुन्दर कविताएं. मैं संग्रह के पहुंचने की प्रतीक्षा में हूं.
आपको साधुवाद!
ग़रीब वेश्या की मौत, पढ़ने के बाद नज़र धुंधला गई, देर तक के लिए। क्या कहूं....।
गीत जी, अशोक जी, शायदा जी और तरुण जी, आप सब का बहुत-बहुत आभार।
गीत जी, जगूडी जी की कविता 'जुर्माना' मैं आपको बहुत जल्द उपलब्ध करा रहा हूं, लेकिन 'सौ गलियों वाला बाज़ार' कविता लंबी (आठ पृष्ठों में) होने के कारण अभी तुरंत उपलब्ध नहीं करा पा रहा हूं।
ati uttam
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