सन्मति
क्या फ़र्क पड़ता है इससे
अयोध्या में पद की जगह कोई सबद गाए
दूर ननकाना साहब में कोई मतवाला
जपुजी छोड़ कव्वाली ले कर जाए
फ़र्क तो इस बात से भी नहीं पड़ता
हम बाला और मरदाना से पूछ सकें
नानक के बोलों पर गुलतराशी करने वाले
इकतारा थामे उन दोनों के हाथ
अकसर सुर छेड़ते वक़्त
खुसरो और कबीर के घर क्यों घूम आते हैं
फ़र्क तो आज यह भी कहीं नहीं दिखता
बात-बात में रदीफ काफ़िया मिलाने वाले
हर चीज़ का फ़र्क पहचानने वाले
शायद ही झगड़ते हों कभी इसलिए
राम की पहुंच डागुरों की हवेली
और खां साहब की बंदिशों तक क्यों है
और क्यों बैजू से लेकर आज तक
बावरी होने वाली कला की
नई से नई पीढी भी
आगे बढकर सबसे पहले
रहीम और रसखान से दोस्ती करती है।
सूर्य-वसंत
सूर्य अगर फूल होता
फिर पंखुड़ी होती आग
इस तरह हर फूल का
होता प्रकाश
और हर प्रकाश का
अपना रंग
ऐसे में जब-जब
जीवन में आता वसंत
हमें लगता
ढेरों सूर्य खिले हैं रंग भरे
और नाउम्मीदी की दिशा भी
उम्मीद की आग से
धधक उठी है एकबारगी।
वृद्ध होना
छीजता जाता है फूलों से पराग
भीतर का आलोक ढंक लेता सात आसमान
कम होती जाती दुनिया में भरोसे की जगह
उदारता एकाएक आंधी के वेग से चली आती
घर के अंदर रहने
खेल-खेल में टूटते चले गए बचपन के खिलौने से
ज्यादा बड़ी नहीं रहती भूल-गलतियां
कुम्हलाया हुआ दिन हर रोज दरवाजे पर आकर
बताता है अब कुछ होने वाला नहीं है
दुःख यातना और दर्द की कॉपी के पन्ने
कई बार तह खुलने से ढीले और मौसम के रंग
सुग्गों की हरियाली से भी ज़्यादा चटख़ होते जाते हैं
वृद्ध होना
दरअसल ईख का पकना है
बूंद-बूंद बटोरा गया अनुभव
जड़ से कलगी तक भिन जाता जीवन-रस में।
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कलाओं में गहरी रुचि रखने वाले हिन्दी कवि, सम्पादक और संगीत अध्येता यतीन्द्र मिश्र के अबतक तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। ड्योढी पर आलाप विशेष चर्चित रहा। साथ ही, इन्होंने शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी पर हिंदी में एक पुस्तक लिखी है। हाल ही में प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मान सिंह पर इनकी एक पुस्तक देवप्रिया प्रकाशित हुई है। भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार, तथा हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार से सम्मानित।
इन दिनों सहित पत्रिका के संपादन से संबद्ध।
संपर्क : राज सदन, अयोध्या : 224123
मोबाइल : 09415047710
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क्या फ़र्क पड़ता है इससे
अयोध्या में पद की जगह कोई सबद गाए
दूर ननकाना साहब में कोई मतवाला
जपुजी छोड़ कव्वाली ले कर जाए
फ़र्क तो इस बात से भी नहीं पड़ता
हम बाला और मरदाना से पूछ सकें
नानक के बोलों पर गुलतराशी करने वाले
इकतारा थामे उन दोनों के हाथ
अकसर सुर छेड़ते वक़्त
खुसरो और कबीर के घर क्यों घूम आते हैं
फ़र्क तो आज यह भी कहीं नहीं दिखता
बात-बात में रदीफ काफ़िया मिलाने वाले
हर चीज़ का फ़र्क पहचानने वाले
शायद ही झगड़ते हों कभी इसलिए
राम की पहुंच डागुरों की हवेली
और खां साहब की बंदिशों तक क्यों है
और क्यों बैजू से लेकर आज तक
बावरी होने वाली कला की
नई से नई पीढी भी
आगे बढकर सबसे पहले
रहीम और रसखान से दोस्ती करती है।
सूर्य-वसंत
सूर्य अगर फूल होता
फिर पंखुड़ी होती आग
इस तरह हर फूल का
होता प्रकाश
और हर प्रकाश का
अपना रंग
ऐसे में जब-जब
जीवन में आता वसंत
हमें लगता
ढेरों सूर्य खिले हैं रंग भरे
और नाउम्मीदी की दिशा भी
उम्मीद की आग से
धधक उठी है एकबारगी।
वृद्ध होना
छीजता जाता है फूलों से पराग
भीतर का आलोक ढंक लेता सात आसमान
कम होती जाती दुनिया में भरोसे की जगह
उदारता एकाएक आंधी के वेग से चली आती
घर के अंदर रहने
खेल-खेल में टूटते चले गए बचपन के खिलौने से
ज्यादा बड़ी नहीं रहती भूल-गलतियां
कुम्हलाया हुआ दिन हर रोज दरवाजे पर आकर
बताता है अब कुछ होने वाला नहीं है
दुःख यातना और दर्द की कॉपी के पन्ने
कई बार तह खुलने से ढीले और मौसम के रंग
सुग्गों की हरियाली से भी ज़्यादा चटख़ होते जाते हैं
वृद्ध होना
दरअसल ईख का पकना है
बूंद-बूंद बटोरा गया अनुभव
जड़ से कलगी तक भिन जाता जीवन-रस में।
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कलाओं में गहरी रुचि रखने वाले हिन्दी कवि, सम्पादक और संगीत अध्येता यतीन्द्र मिश्र के अबतक तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। ड्योढी पर आलाप विशेष चर्चित रहा। साथ ही, इन्होंने शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी पर हिंदी में एक पुस्तक लिखी है। हाल ही में प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मान सिंह पर इनकी एक पुस्तक देवप्रिया प्रकाशित हुई है। भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार, तथा हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार से सम्मानित।
इन दिनों सहित पत्रिका के संपादन से संबद्ध।
संपर्क : राज सदन, अयोध्या : 224123
मोबाइल : 09415047710
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2 comments:
बहुत खूब
अच्छी कविताएं हैं. यतींद्र और आप को भी बधाई.
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