
रमेशचंद्र शाह
दूर देखती आंखें :
अनुवाद में बारीक मानवीय संवेदनाएं
योगेन्द्र कृष्णा
रमेशचंद्र शाह उन गिने-चुने सम्मानित-पुरस्कृत वरिष्ठ साहित्यकारों में से एक हैं जिनके रचनाकर्म में बारीक अनुभूतियां केंद्रीय भूमिका में होती हैं. विशेषकर काव्य विधा में ये बारीक संवेदनाएं अर्थवत्ता के कई-कई स्तरों पर उद्घाटित होती हैं, जिन्हें हम अपनी-अपनी संवेदनशीलता एवं आस्वाद-क्षमता के आधार पर अलग-अलग स्तरों पर पकड़ पाते हैं. क्या यही कारण नहीं है कि वर्षों पूर्व पढ़ी गई कोई उत्कृष्ट कृति बाद के वर्षों में पढ़े जाने पर पहले से कहीं अधिक स्तरों पर खुलती प्रतीत होती हैं? यह बात गद्य से कहीं अधिक काव्य के संदर्भ में महसूस की जाती रही है.
काव्यानुवाद में मूल संवेदनाओं की बारीकियों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित कर पाना मूल रचनाकर्म से भी कहीं अधिक गंभीर, चुनौतीपूर्ण एवं जोखिम भरा कर्म है. रमेशचंद्र शाह ने विश्व कविता संचयन दूर देखती आंखें की कविताओं के अनुवाद में, बल्कि पुनर्सृजन में, यह जोखिम बखूबी उठाया है. हिंदी में बहुत कम ऐसे काव्यानुवाद पढने को मिले हैं जिनमें मूल कविताओं के आंतरिक लय को भी अक्षुण्ण रखने का सफल प्रयास दिखता हो. कवि के इस संचयन पर कुछ लिखने में मुझे इसलिए भी समय की कुछ छूट लेनी पड़ गई कि मैं हिंदी में अनूदित इनमें से अधिकतर कविताओं को, विशेषकर आसानी से उपलब्ध ब्रिटिश कविताओं को मूल में पढ़ना चाहता था. इसलिए भी कि साहित्य की किसी भी विधा में अनुवाद की समीक्षा मूल रचना को बिना पढ़े शायद संभव नहीं है.
संभव है कविता के कुछ सुधी पाठक दूर देखती आंखें की कविताओं से पूर्व से परिचित हों. क्योंकि इनमें से अधिकतर कविताएं पहली बार विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं. लेकिन आज एक जगह संकलित होने के बाद इन कविताओं ने अगर एक खास प्रकार की तारतम्यता एवं नैरन्तर्य हासिल कर ली हैं तो यह आकिस्मक नहीं है. विभिन्न देशों से अनुवाद के लिए इन कविताओं--जिनमें ब्रिटिश, कोरियाई, श्रीलंकाई एवं जापानी कविताएं शामिल हैं--के चयन में एक आंतरिक प्रवाह और संगति दिखती है. बाहर से, स्थूल एवं भौगोलिक स्तर पर, अलग-थलग दिखती इन रचनाओं में बारीक मानवीय संवेदना एवं ऊष्मा की एक सार्वभौमिक अंतर्धारा शुरू से अंत तक प्रवाहित है. और सभ्यताओं-संस्कृतियों के आर-पार जातीं ये कविताएं सिर्फ दूर ही नहीं, गहराई में भी देखती हैं.
विभिन्न देशों की कुछ कविताओं के उद्धरण यहां दृष्टव्य हैं जो विषय की विविधता के बावजूद मूल संवेदना में कितनी जीवनोन्मुख एवं एकात्म दिखती हैं :
टहल रहे हम साथ आज, मैं, मेरी बिटिया
कितनी उजली पकड़ हाथ की उसके पूरे
मेरी इस उंगली पर
आजीवन आलोक-वलय यह
इस हड्डी के गिर्द करूंगा अनुभव मैं, जब
हो जाएगी बड़ी--आज से दूर, कि जैसे
दूर देखती आंखें उसकी अभी, आज ही
(अपनी बेटी के लिए / स्तेफान स्पेंडर)
रात यहां चुपचाप पड़ी है घर में
जहां पुरानी सभी आहटें, भूली बिसरी
निश्चल पड़ी हुई हैं जैसे किसी झील में डूबे पत्ते
बेकाबू है रात वही, पर बाहर
(जाड़े की एक रात / टोमास ट्रांसटोमर)
छाया है भारी शरीर से
चलते हैं हम इसीलिए तो, सिर लटकाए
गाते हुए गीत आदमी की चीजों के
नमक लहू में घोल, आंसुओं में भी शक्कर
प्यार आदमी से करना है सबसे अधिक अकेला होना
(पीड़ा का त्यौहार / चांग ह्यांग जांग)
जब तक उगा नहीं है वह दिन
जाना ही है मुझे छोड़ कर तुम्हें यहां पर
क्योंकि अंधेरे कोने में उस तंग गली के
इंतजार करते वे मेरा--जाना ही होगा अब मुझको
उनकी आग बुझाने
(एक अनाथ बालिका के प्रति / डब्लू ए अबेसिंघे)
इन कविताओं से गुजरते हुए हम एक ओर जहां अपने जीवन की आंतरिक दुनियाओं के यथार्थ और उनकी कोमलताओं से रू-ब-रू होते हैं, वहीं दूसरी ओर लौकिक जीवन की स्थूल हकीकतों से भी टकराते हैं. जीवन को सही अर्थों में जीने के लिए आवश्यक सच्चे प्रेम, सौन्दर्य और भावोन्माद की ऊष्माएं यहां अपने सारे उपादानों के साथ मौजूद हैं. यहां आकाश और तारे तथा स्वप्न और आकांक्षाएं ही नहीं, देह और देहातीत सुख-दुख की स्मृतियों के बारीक रेशे तथा आकाश और पृथ्वी में खुलती खिड़कियां भी हैं.
उजली रेत पर साथ-साथ लेटे
हम देखा किए देर तक
ढलती हुई सांझ को...
(उत्सव / कोलिन फॉल्क)
सुबह-सुबह चिड़ियां आके भंग कर देती हैं
हमारा आलिंगन
कुछ इस तरह आती हैं वे पेश हमारे साथ
मानो हम बच्चे हों--निहायत अबोध
जैसे उन्हें पता हो कि इसका अंत होना है
आखिरकार आंसुओं में...
(सुबह-सुबह / ह्यूगो विलियम्स)
जैसे धूप-तपा पत्थर हो भरा मुट्ठी में
खड़ा पेड़ के नीचे गोताखोर गगन का.
भंवरजाल को चीर मृत्यु के आर-पार भी
क्या प्रकाश का छत्र तनेगा उस के ऊपर?
(जाड़े की एक रात / टोमास ट्रांसटोमर)
संकलन की इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें पढ़ते हुए हमें क्षण भर के लिए भी यह अहसास नहीं होता कि हम इन्हें अनुवाद में पढ़ रहे हैं--इस हद तक कि अगर ये कविताएं हमारे सामने अनुवाद के रूप में नहीं परोसी गई होतीं तो हम इन्हें मूल कविताओं की तरह पढ़ रहे होते.
विदेशी भाषा में रची गई किसी कविता को पढ़ कर उसे अपनी भाषा में अनूदित करने की प्रेरणा कब और क्यों होती है? यह कैसा मानव-मर्म है जो सभ्यताओं-संस्कृतियों के आर-पार कौंध जाता है और इसी कारण हमारी अपनी आवाज में, हमारी अपनी बोली-बानी में भी प्रगट होने की मांग करता है? इन प्रश्नों के संदर्भ में बहुत सारे कारण गिनाए जा सकते हैं, लेकिन अगर दूर देखती आंखें के संदर्भ में इन प्रश्नों को देखा जाए तो यह इन रचनाओं को कवि-अनुवादक द्वारा आत्मसात करने की प्रक्रिया भर नहीं प्रतीत होती, बल्कि इससे भी बहुत दूर, भावप्रवण एवं प्रांजल आत्माभिव्यक्ति तक जाती रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में कौंधती है. शायद इसलिए भी अनुवाद इतना जीवंत और रचनात्मक रूप से मौलिक बन पाया है.
अधिकतर उत्कृष्ट कविताएं अपने होने में ही अपनी सार्थकता अर्जित कर लेती हैं. उन्हें व्याख्यायित-रूपायित करना उनके होने को, उनके आस्वाद को सीमित करने, और कभी-कभी तो विरूपित करने जैसा उपक्रम हो जाता है. इसलिए कि अच्छी कविताओं का कोई अर्थात नहीं होता. और आप पाएंगे कि इस संकलन की भी अधिकांश कविताएं अपने होने के लिए किसी अर्थात पर निर्भर नहीं हैं. आलोचक एफ. आर. लीविस ने भी कहा था कि कविता में शब्द हमें सोचने के लिए या निर्णय सुनाने के लिए आमंत्रित नहीं करते, बल्कि वे छूने, टटोलने, स्पर्श करने, कुछ रचने के लिए बुलाते हैं. रमेशचंद्र शाह ने इन कविताओं के आमंत्रण को स्वीकार किया है, इन्हें छू कर, टटोल कर, स्पर्श कर कुछ अद्बुत रचा है. आप भी अब इन्हें अपनी भाषा में छू-टटोल सकते हैं.
प्यार नहीं कर सकते कविता को कविता से
किसे भला प्यार तब करोगे तुम कविता से?
कोई नहीं देखता है बर्फ को, जो गिरती है रात में
कोई नहीं चलता है उस पर : पगचापहीन
वह है वहां : नीरव, स्वच्छ
सुन्दर अपने आप में.
(कविता खाली कविता / चांग ह्यांग जांग)
-------------------------------------------------------
दूर देखती आंखें ( विश्व कविता से एक चयन )
अनुवाद : रमेशचंद्र शाह
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग, बीकानेर
पृष्ठ : 95
मूल्य : 125 रु. ( सजिल्द )
योगेन्द्र कृष्णा
रमेशचंद्र शाह उन गिने-चुने सम्मानित-पुरस्कृत वरिष्ठ साहित्यकारों में से एक हैं जिनके रचनाकर्म में बारीक अनुभूतियां केंद्रीय भूमिका में होती हैं. विशेषकर काव्य विधा में ये बारीक संवेदनाएं अर्थवत्ता के कई-कई स्तरों पर उद्घाटित होती हैं, जिन्हें हम अपनी-अपनी संवेदनशीलता एवं आस्वाद-क्षमता के आधार पर अलग-अलग स्तरों पर पकड़ पाते हैं. क्या यही कारण नहीं है कि वर्षों पूर्व पढ़ी गई कोई उत्कृष्ट कृति बाद के वर्षों में पढ़े जाने पर पहले से कहीं अधिक स्तरों पर खुलती प्रतीत होती हैं? यह बात गद्य से कहीं अधिक काव्य के संदर्भ में महसूस की जाती रही है.
काव्यानुवाद में मूल संवेदनाओं की बारीकियों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित कर पाना मूल रचनाकर्म से भी कहीं अधिक गंभीर, चुनौतीपूर्ण एवं जोखिम भरा कर्म है. रमेशचंद्र शाह ने विश्व कविता संचयन दूर देखती आंखें की कविताओं के अनुवाद में, बल्कि पुनर्सृजन में, यह जोखिम बखूबी उठाया है. हिंदी में बहुत कम ऐसे काव्यानुवाद पढने को मिले हैं जिनमें मूल कविताओं के आंतरिक लय को भी अक्षुण्ण रखने का सफल प्रयास दिखता हो. कवि के इस संचयन पर कुछ लिखने में मुझे इसलिए भी समय की कुछ छूट लेनी पड़ गई कि मैं हिंदी में अनूदित इनमें से अधिकतर कविताओं को, विशेषकर आसानी से उपलब्ध ब्रिटिश कविताओं को मूल में पढ़ना चाहता था. इसलिए भी कि साहित्य की किसी भी विधा में अनुवाद की समीक्षा मूल रचना को बिना पढ़े शायद संभव नहीं है.
संभव है कविता के कुछ सुधी पाठक दूर देखती आंखें की कविताओं से पूर्व से परिचित हों. क्योंकि इनमें से अधिकतर कविताएं पहली बार विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं. लेकिन आज एक जगह संकलित होने के बाद इन कविताओं ने अगर एक खास प्रकार की तारतम्यता एवं नैरन्तर्य हासिल कर ली हैं तो यह आकिस्मक नहीं है. विभिन्न देशों से अनुवाद के लिए इन कविताओं--जिनमें ब्रिटिश, कोरियाई, श्रीलंकाई एवं जापानी कविताएं शामिल हैं--के चयन में एक आंतरिक प्रवाह और संगति दिखती है. बाहर से, स्थूल एवं भौगोलिक स्तर पर, अलग-थलग दिखती इन रचनाओं में बारीक मानवीय संवेदना एवं ऊष्मा की एक सार्वभौमिक अंतर्धारा शुरू से अंत तक प्रवाहित है. और सभ्यताओं-संस्कृतियों के आर-पार जातीं ये कविताएं सिर्फ दूर ही नहीं, गहराई में भी देखती हैं.
विभिन्न देशों की कुछ कविताओं के उद्धरण यहां दृष्टव्य हैं जो विषय की विविधता के बावजूद मूल संवेदना में कितनी जीवनोन्मुख एवं एकात्म दिखती हैं :
टहल रहे हम साथ आज, मैं, मेरी बिटिया
कितनी उजली पकड़ हाथ की उसके पूरे
मेरी इस उंगली पर
आजीवन आलोक-वलय यह
इस हड्डी के गिर्द करूंगा अनुभव मैं, जब
हो जाएगी बड़ी--आज से दूर, कि जैसे
दूर देखती आंखें उसकी अभी, आज ही
(अपनी बेटी के लिए / स्तेफान स्पेंडर)
रात यहां चुपचाप पड़ी है घर में
जहां पुरानी सभी आहटें, भूली बिसरी
निश्चल पड़ी हुई हैं जैसे किसी झील में डूबे पत्ते
बेकाबू है रात वही, पर बाहर
(जाड़े की एक रात / टोमास ट्रांसटोमर)
छाया है भारी शरीर से
चलते हैं हम इसीलिए तो, सिर लटकाए
गाते हुए गीत आदमी की चीजों के
नमक लहू में घोल, आंसुओं में भी शक्कर
प्यार आदमी से करना है सबसे अधिक अकेला होना
(पीड़ा का त्यौहार / चांग ह्यांग जांग)
जब तक उगा नहीं है वह दिन
जाना ही है मुझे छोड़ कर तुम्हें यहां पर
क्योंकि अंधेरे कोने में उस तंग गली के
इंतजार करते वे मेरा--जाना ही होगा अब मुझको
उनकी आग बुझाने
(एक अनाथ बालिका के प्रति / डब्लू ए अबेसिंघे)
इन कविताओं से गुजरते हुए हम एक ओर जहां अपने जीवन की आंतरिक दुनियाओं के यथार्थ और उनकी कोमलताओं से रू-ब-रू होते हैं, वहीं दूसरी ओर लौकिक जीवन की स्थूल हकीकतों से भी टकराते हैं. जीवन को सही अर्थों में जीने के लिए आवश्यक सच्चे प्रेम, सौन्दर्य और भावोन्माद की ऊष्माएं यहां अपने सारे उपादानों के साथ मौजूद हैं. यहां आकाश और तारे तथा स्वप्न और आकांक्षाएं ही नहीं, देह और देहातीत सुख-दुख की स्मृतियों के बारीक रेशे तथा आकाश और पृथ्वी में खुलती खिड़कियां भी हैं.
उजली रेत पर साथ-साथ लेटे
हम देखा किए देर तक
ढलती हुई सांझ को...
(उत्सव / कोलिन फॉल्क)
सुबह-सुबह चिड़ियां आके भंग कर देती हैं
हमारा आलिंगन
कुछ इस तरह आती हैं वे पेश हमारे साथ
मानो हम बच्चे हों--निहायत अबोध
जैसे उन्हें पता हो कि इसका अंत होना है
आखिरकार आंसुओं में...
(सुबह-सुबह / ह्यूगो विलियम्स)
जैसे धूप-तपा पत्थर हो भरा मुट्ठी में
खड़ा पेड़ के नीचे गोताखोर गगन का.
भंवरजाल को चीर मृत्यु के आर-पार भी
क्या प्रकाश का छत्र तनेगा उस के ऊपर?
(जाड़े की एक रात / टोमास ट्रांसटोमर)
संकलन की इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें पढ़ते हुए हमें क्षण भर के लिए भी यह अहसास नहीं होता कि हम इन्हें अनुवाद में पढ़ रहे हैं--इस हद तक कि अगर ये कविताएं हमारे सामने अनुवाद के रूप में नहीं परोसी गई होतीं तो हम इन्हें मूल कविताओं की तरह पढ़ रहे होते.
विदेशी भाषा में रची गई किसी कविता को पढ़ कर उसे अपनी भाषा में अनूदित करने की प्रेरणा कब और क्यों होती है? यह कैसा मानव-मर्म है जो सभ्यताओं-संस्कृतियों के आर-पार कौंध जाता है और इसी कारण हमारी अपनी आवाज में, हमारी अपनी बोली-बानी में भी प्रगट होने की मांग करता है? इन प्रश्नों के संदर्भ में बहुत सारे कारण गिनाए जा सकते हैं, लेकिन अगर दूर देखती आंखें के संदर्भ में इन प्रश्नों को देखा जाए तो यह इन रचनाओं को कवि-अनुवादक द्वारा आत्मसात करने की प्रक्रिया भर नहीं प्रतीत होती, बल्कि इससे भी बहुत दूर, भावप्रवण एवं प्रांजल आत्माभिव्यक्ति तक जाती रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में कौंधती है. शायद इसलिए भी अनुवाद इतना जीवंत और रचनात्मक रूप से मौलिक बन पाया है.
अधिकतर उत्कृष्ट कविताएं अपने होने में ही अपनी सार्थकता अर्जित कर लेती हैं. उन्हें व्याख्यायित-रूपायित करना उनके होने को, उनके आस्वाद को सीमित करने, और कभी-कभी तो विरूपित करने जैसा उपक्रम हो जाता है. इसलिए कि अच्छी कविताओं का कोई अर्थात नहीं होता. और आप पाएंगे कि इस संकलन की भी अधिकांश कविताएं अपने होने के लिए किसी अर्थात पर निर्भर नहीं हैं. आलोचक एफ. आर. लीविस ने भी कहा था कि कविता में शब्द हमें सोचने के लिए या निर्णय सुनाने के लिए आमंत्रित नहीं करते, बल्कि वे छूने, टटोलने, स्पर्श करने, कुछ रचने के लिए बुलाते हैं. रमेशचंद्र शाह ने इन कविताओं के आमंत्रण को स्वीकार किया है, इन्हें छू कर, टटोल कर, स्पर्श कर कुछ अद्बुत रचा है. आप भी अब इन्हें अपनी भाषा में छू-टटोल सकते हैं.
प्यार नहीं कर सकते कविता को कविता से
किसे भला प्यार तब करोगे तुम कविता से?
कोई नहीं देखता है बर्फ को, जो गिरती है रात में
कोई नहीं चलता है उस पर : पगचापहीन
वह है वहां : नीरव, स्वच्छ
सुन्दर अपने आप में.
(कविता खाली कविता / चांग ह्यांग जांग)
-------------------------------------------------------
दूर देखती आंखें ( विश्व कविता से एक चयन )
अनुवाद : रमेशचंद्र शाह
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग, बीकानेर
पृष्ठ : 95
मूल्य : 125 रु. ( सजिल्द )
-------------------------------------------------------
रमेशचंद्र शाह
जन्म : 1937, अलमोड़ा
इलाहाबाद वि वि से बी एससी तथा आगरा से एम ए, पीएच डी
1997 में हमीदिया महाविद्यालय (भोपाल) से अंगरेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद दिसबर, 2000 तक निराला सृजनपीठ (भोपाल) के निदेशक रहे
जन्म : 1937, अलमोड़ा
इलाहाबाद वि वि से बी एससी तथा आगरा से एम ए, पीएच डी
1997 में हमीदिया महाविद्यालय (भोपाल) से अंगरेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद दिसबर, 2000 तक निराला सृजनपीठ (भोपाल) के निदेशक रहे
सम्मान-पुरस्कार : उपन्यास पूर्वापर भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, तथा गोबरगणेश हिंदी सस्थान उत्तर प्रदेश तथा मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा पुरस्कृत। मध्यप्रदेश सस्कृति विभाग द्वारा शिखर सम्मान तथा के के बिड़ला फ़ाउंडेशन द्वारा व्यास सम्मान।
उपन्यास : गोबरगणेश, किस्सा गुलाम, पूर्वापर, आखिरी दिन, पुनर्वास तथा आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू
कहानी संग्रह : जंगल में आग, मुहल्ले का रावण, मानपत्र, थिएटर, प्रतिनिधि कहानियां (राजकमल पेपरबैक)
कविता संग्रह : कछुए की पीठ पर, हरिश्चंद्र आओ, नदी भागती आई, प्यारे मुचकुंद को, देखते हैं शब्द भी अपना समय, चाक पर समय (प्रतिनिधि कविताओं का संचयन, वाग्देवी पाकेट बुक्स)
निबंध संग्रह : रचना के बदले, शैतान के बहाने, आडू का पेड़, पढते-पढते, स्वधर्म और कालगति तथा हिंदी की दुनिया में
यात्रा-संस्मरण : एक लंबी छांह
साक्षात्कार : मेरे साक्षात्कार
समालोचना : छायावाद की प्रासंगिकता, समानांतर, सबद निरंतर, वागर्थ, भूलने के विरुद्ध, वागर्थ का वैभव, जयशंकर प्रसाद, आलोचना का पक्ष, समय संवादी
नाटक : मारा जाई खुसरो, मटियाबुर्ज
अनुवाद : छंद और पक्षी (कैथलीन रैन की कविताओं का हिंदी रूपांतर)
अंगरेज़ी में
येट्स ऐंड एलिएट, पर्सपेक्टिव्ज़ आन इंडिआ, टुवड्ज़ अ फिलोसफी आव इमैजिनेशन : फोर लेक्चर्स डेलिवर्ड इन टेमेनोस एकेडमी, लंदन
येट्स ऐंड एलिएट, पर्सपेक्टिव्ज़ आन इंडिआ, टुवड्ज़ अ फिलोसफी आव इमैजिनेशन : फोर लेक्चर्स डेलिवर्ड इन टेमेनोस एकेडमी, लंदन
संपर्क : एम-4, निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल 462003



3 comments:
Yogendra ji,
Khubsurat samiksha . Turgnev aur Tolstoy par tippani nahi chhod paya tha technical problem ke karan, mail kiya tha aapse janana chaya tha ki voh aap padh paye the yaa nahi. Voh kai karano se important tha.
Chandel
भाई रूपसिंह चंदेल जी,
धन्यवाद, ई-मेल वाली आपकी टिप्पणी मैंने पढी थी । तुर्गनेव और तोलस्तोय के संदर्भ में वह टिप्पणी वाकई महत्वपूर्ण थी, इसलिए आपका वह पत्र मैंने अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर दिया था। शायद आपने गौर नहीं किया। पत्रिका के दाहिने कालम में सी-बोक्स के ठीक नीचे एक स्तंभ दिया है-आपके ई-मेल से । कृपया देख लेंगे ।
समीक्षा पढ़ कर मूल पुस्तक पढ़ने को मन हो आया है। भाई योगेन्द्र जी आप "शब्द सृजन" के माध्यम से नि:संदेह बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। विशेषकर अनुवाद को लेकर। बधाई !
Post a Comment