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हाल-फिलहाल हमारा नया स्तंभ है जिसके अंतर्गत आप हिंदी में प्रकाशित नई साहित्यिक कृतियों से रू-ब-रू हैं। हम चुनी हुई इन कृतियों का एक संक्षिप्त परिचय और उनमें से कुछ अंश भी प्रकाशित करेंगे। और साथ ही उन कृतियों पर हमारे जाने-माने, प्रखर समीक्षक ओम निश्चल अपनी बेबाक संक्षिप्त टिप्पणी प्रस्तुत करेंगे। हमें इस आयोजन पर आपकी राय की भी प्रतीक्षा रहेगी।
नई कृतियों की इस श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में यहाँ प्रस्तुत है चर्चित कवि-कथाकार उदय प्रकाश की पुस्तक अपनी उनकी बात।
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अपनी उनकी बात / उदय प्रकाश
वाणी प्रकाशन, २१ ऐ , दरियागंज
नई दिल्ली ११०००२
संस्करण : २००८
मूल्य : २९५ रु
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धारोष्ण दूध की -सी गरिमा
ओम निश्चल
उदय प्रकाश बहुत ही उर्वर, क्रियाशील और नवाचारों के हिमायती लेखकों में हैं, जिनकी कहानियों ने जितनी लोकिप्रियता हासिल की है, उतने ही विवाद भी न्यौते हैं। अस्सी के बाद उदयप्रकाश की कविता धीरे-धीरे एक नई उठान पाती गयी। जहां वे एक दौर में नींव की ईंट हो तुम दीदी जैसी भावप्रवण कविताओं के प्रणेता रहे हैं, वहीं धीरे-धीरे वक्त की दुश्वारियों की तेजाबी हकीकत की चोटों से लहूलुहान उदय की भाषा भी आक्रामक और तेजाबी होती गयी। रात में हारमोनियम उनकी कविता का ऐसा पड़ाव और मोड़ है, जहां वे अपने कवि की बेजोड़ सत्ता पहली बार स्थापित करते हैं, किन्तु पहचाने गए वे तिरिछ,छप्पन तोले की करधन, और अंत में प्रार्थना, वारेन हेस्टिंग्ज़ का सांड, रामसजीवन की प्रेम कथा, मोहन दास, मैंगोसिल व पीली छतरी वाली लड़की जैसी कहानियों से। राजेन्द्र यादव अक्सर उन्हें अपने कथा-टोले का बताते हुए कहते रहे कि भइया उदय तुम्हारा कुल गोत्र कहानीकारों का है, जबकि उदय बार बार अपने को बुनियादी रूप से कवि मानने पर अड़े रहे। बल्कि सच तो यह है कि उदय कविता, कहानी दोनों विधाओं के बड़े लेखक है।
जोखिम बर्दाश्त करने की हद तक प्रयोगवादी उदय की कहानियों पर मित्र लेखकों के जीवन प्रसंगों को थीम बना लेने के आरोप लगे तो विदेशी कहानियों के फार्मूले पर भी उनकी एकाधिक कहानी को चस्पां कर मौलिकता के सवाल उठाए गए। किन्तु सभी तीर उदय की संकल्पजीवी ताकत की अभेद्य दीवार से टकरा-टकरा कर लौट जाते रहे। उदय प्रकाश के साक्षात्कारों की एक किताब अभी हाल ही प्रकाशित हुई है--अपनी उनकी बात। अपनी बात में उनके साक्षात्कार हैं और उनकी बात में उनके द्वारा लिए गए तीन चुनिंदा साक्षात्कार। पहले खंड में उदय से बातचीत करने वालों में गौतम सान्याल, ओम निश्चल, अजित राय, संजय अरोड़ा, रमेश उपाध्याय, देवप्रकाश, त्रिनेत्र जोशी, उमाशंकरि चौधरी, सुभाष चंद्र मौर्य एवं दयाशंकर शुक्ल सागर शामिल हैं। दूसरे खंड में उदय ने पाक शायरा सुल्ताना मेहर, कोमल कोठारी व लोठार लुत्शे से बातचीत की है।
उदय हमारे समय के सर्वाधिक नाराज लेखकों में हैं। उनकी बातचीत से उनकी शाश्वत नाराजगी की झलक मिलती है। उनकी बातों से पता चलता है कि हिंदी आलोचना खु्शामद, जुगाड़ और प्रचार के लिए किया जाने वाला थर्ड रेट प्रोपेगंडा है। इसके बदले वे पाठकों को संवेदना का सच्चा शेयर-होल्डर मानते हैं। नौकरशाह लेखकों के अभ्युदय को वे एक सोशल सिंड्रोम की तरह मानते हैं। एक बातचीत में वे कहते हैं, मेरे पास न तो कोई नौकरी है, न किसी राजनीतिक दल की सदस्यता है, न कोई परिचय पत्र है, सिर्फ राशनकार्ड के अलावा कोई दूसरी अस्मिता नहीं है। एक मुलाकात में मेरे कहने पर कि उदय जी आपको लोग कहानी का उस्ताद मानते हैं, वे कहते हैं, ओम जी, मैं उस्ताद कतई नहीं हूं। हिंदी में इस उस्तादी का बड़ा नकारात्मक अर्थ है। मैं तो तमाम उस्तादों का शिकार और विक्टिम हूं। उदय इन साक्षात्कारों में सत्तावानों के शील को चुनौती देते हुए साहित्य में व्याप्त भाई भतीजावाद, गिरोहबंदी, पुरस्कारों की तुच्छ राजनीति, आयातित अवधारणाओं के बल पर आतंक पैदा करते आलोचकों, पाखंडी संस्कृति-कर्मियों और अपनी कहानियों का अल्प-पाठ का या कुपाठ करने वालों को आड़े हाथो लेते हैं। उदय से मिलते हुए बहुधा लगता है कि हम सत्ता-व्यवस्था के सताए हुए एक लेखक से मिल रहे हैं, किन्तु पूर्णकालिक फ्रीलांसर होते हुए भी उदय किसी दैन्य के मारे नहीं हैं। उनके स्वाभिमान का कद बहुत ऊंचा है जिस पर कोई भी खरोंच उन्हें बर्दाश्त नहीं है। बातचीत के दौरान कभी वे आवेश में आ जाते हैं, कभी बहुत स्थिर हो उठते हैं। उनके जैसे बहुपठित लेखक हिंदी में इने-गिने हैं। गौतम सान्याल से बातचीत काफी रोचक और उनकी चित्तवृत्तियों की स्कैनिंग करने वाली है। साक्षात्कार में छपी इन पंक्तियों के लेखक के साथ हुई बातचीत (कथा अपने समय में भाषा को लिखने का आख्यान है) की चर्चा भी काफी हुई है किन्तु कुछ लोगों की निगाह में उसमें अति मुखरता और आत्ममुग्धता की छाया ज्यादा है।
बातचीत से लेखक का मिजाज बोलता है। उदय प्रकाश के स्वभाव में आत्मीयता और अख्खड़ता दोनों है। नाराज हो जाएं तो चलती हुई बातचीत की सारी पटरियां उखाड़ दें और प्रसन्न रहें तो अध्ययन से मंजी हुई प्रतिभा के कपाट खुल पड़ें। मसलन, एक जगह कविता के नए प्रतिमान को उन्होंने आलोचना की चार प्रमुख पुस्तकों में शुमार किया है, जब कि दूसरी जगह यह कहते हुए इसकी धज्जियां बिखेर दी हैं कि शीतयुद्ध की बासी और व्यर्थ हो चुकी भाषा तथा अमेरिकी नव समीक्षकों की उधार ली हुई पदावली के सिवा इसमें क्या है। बातचीत के दौरान ऐसे आरोह-अवरोह खूब हैं जिनमें उदय की प्रतिभा का लोहा भी मानना पड़ता है और उनकी नाराजगी का तेवर भी समझ में आता है। उदय रौ में हों तो बेलिहाज बातचीत करते हैं--बिल्कुल दूध का दूध और पानी का पानी करने के अंदाज में। उसमें बेशक कुनैन-सी कड़वाहट हो, लेकिन तल में सच्चाई का अहसास भी रहता है। उनके निशाने पर वे लोग जरूर होते हैं, जिन्होंने आलोचना को अपनी खेती बना रखी है, हिंदी विभागों को चारागाह मान लिया है और जो तिकड़में और दोयम दर्जे की प्रतिभा के बलबूते बड़े-बड़े संस्थानों में शोभायमान हैं। हिंदी के दादुर पंडों के रूप में इस-उस के अंत-अंत की रट लगाते हुए पावर ग्रुप की तरह आपरेट कर रहे हैं।
बहरहाल, हाल-फिलहाल आई साक्षात्कार की ढेरों पुस्तकों के बीच उदय के साथ हुई ये वार्ताएं बहस और जिरह की सर्वाधिक गर्मजोशी से भरी हैं। हम इन्हें वैष्णवन की वार्ता मानने की भूल न करें, लेकिन इनमें जगह-ब-जगह समाए उदय के सात्विक क्रोध के झाग को तनिक हटा कर देखें तो ताजा दुहे गए दूध की-सी धारोष्ण गरिमा यहां विद्यमान है।
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डा ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059
मोबाइल: 09955774115 ईमेल: omnishchal@yahoo.co.in /
omnishchal@gmail.com
ओम निश्चल
उदय प्रकाश बहुत ही उर्वर, क्रियाशील और नवाचारों के हिमायती लेखकों में हैं, जिनकी कहानियों ने जितनी लोकिप्रियता हासिल की है, उतने ही विवाद भी न्यौते हैं। अस्सी के बाद उदयप्रकाश की कविता धीरे-धीरे एक नई उठान पाती गयी। जहां वे एक दौर में नींव की ईंट हो तुम दीदी जैसी भावप्रवण कविताओं के प्रणेता रहे हैं, वहीं धीरे-धीरे वक्त की दुश्वारियों की तेजाबी हकीकत की चोटों से लहूलुहान उदय की भाषा भी आक्रामक और तेजाबी होती गयी। रात में हारमोनियम उनकी कविता का ऐसा पड़ाव और मोड़ है, जहां वे अपने कवि की बेजोड़ सत्ता पहली बार स्थापित करते हैं, किन्तु पहचाने गए वे तिरिछ,छप्पन तोले की करधन, और अंत में प्रार्थना, वारेन हेस्टिंग्ज़ का सांड, रामसजीवन की प्रेम कथा, मोहन दास, मैंगोसिल व पीली छतरी वाली लड़की जैसी कहानियों से। राजेन्द्र यादव अक्सर उन्हें अपने कथा-टोले का बताते हुए कहते रहे कि भइया उदय तुम्हारा कुल गोत्र कहानीकारों का है, जबकि उदय बार बार अपने को बुनियादी रूप से कवि मानने पर अड़े रहे। बल्कि सच तो यह है कि उदय कविता, कहानी दोनों विधाओं के बड़े लेखक है।
जोखिम बर्दाश्त करने की हद तक प्रयोगवादी उदय की कहानियों पर मित्र लेखकों के जीवन प्रसंगों को थीम बना लेने के आरोप लगे तो विदेशी कहानियों के फार्मूले पर भी उनकी एकाधिक कहानी को चस्पां कर मौलिकता के सवाल उठाए गए। किन्तु सभी तीर उदय की संकल्पजीवी ताकत की अभेद्य दीवार से टकरा-टकरा कर लौट जाते रहे। उदय प्रकाश के साक्षात्कारों की एक किताब अभी हाल ही प्रकाशित हुई है--अपनी उनकी बात। अपनी बात में उनके साक्षात्कार हैं और उनकी बात में उनके द्वारा लिए गए तीन चुनिंदा साक्षात्कार। पहले खंड में उदय से बातचीत करने वालों में गौतम सान्याल, ओम निश्चल, अजित राय, संजय अरोड़ा, रमेश उपाध्याय, देवप्रकाश, त्रिनेत्र जोशी, उमाशंकरि चौधरी, सुभाष चंद्र मौर्य एवं दयाशंकर शुक्ल सागर शामिल हैं। दूसरे खंड में उदय ने पाक शायरा सुल्ताना मेहर, कोमल कोठारी व लोठार लुत्शे से बातचीत की है।
उदय हमारे समय के सर्वाधिक नाराज लेखकों में हैं। उनकी बातचीत से उनकी शाश्वत नाराजगी की झलक मिलती है। उनकी बातों से पता चलता है कि हिंदी आलोचना खु्शामद, जुगाड़ और प्रचार के लिए किया जाने वाला थर्ड रेट प्रोपेगंडा है। इसके बदले वे पाठकों को संवेदना का सच्चा शेयर-होल्डर मानते हैं। नौकरशाह लेखकों के अभ्युदय को वे एक सोशल सिंड्रोम की तरह मानते हैं। एक बातचीत में वे कहते हैं, मेरे पास न तो कोई नौकरी है, न किसी राजनीतिक दल की सदस्यता है, न कोई परिचय पत्र है, सिर्फ राशनकार्ड के अलावा कोई दूसरी अस्मिता नहीं है। एक मुलाकात में मेरे कहने पर कि उदय जी आपको लोग कहानी का उस्ताद मानते हैं, वे कहते हैं, ओम जी, मैं उस्ताद कतई नहीं हूं। हिंदी में इस उस्तादी का बड़ा नकारात्मक अर्थ है। मैं तो तमाम उस्तादों का शिकार और विक्टिम हूं। उदय इन साक्षात्कारों में सत्तावानों के शील को चुनौती देते हुए साहित्य में व्याप्त भाई भतीजावाद, गिरोहबंदी, पुरस्कारों की तुच्छ राजनीति, आयातित अवधारणाओं के बल पर आतंक पैदा करते आलोचकों, पाखंडी संस्कृति-कर्मियों और अपनी कहानियों का अल्प-पाठ का या कुपाठ करने वालों को आड़े हाथो लेते हैं। उदय से मिलते हुए बहुधा लगता है कि हम सत्ता-व्यवस्था के सताए हुए एक लेखक से मिल रहे हैं, किन्तु पूर्णकालिक फ्रीलांसर होते हुए भी उदय किसी दैन्य के मारे नहीं हैं। उनके स्वाभिमान का कद बहुत ऊंचा है जिस पर कोई भी खरोंच उन्हें बर्दाश्त नहीं है। बातचीत के दौरान कभी वे आवेश में आ जाते हैं, कभी बहुत स्थिर हो उठते हैं। उनके जैसे बहुपठित लेखक हिंदी में इने-गिने हैं। गौतम सान्याल से बातचीत काफी रोचक और उनकी चित्तवृत्तियों की स्कैनिंग करने वाली है। साक्षात्कार में छपी इन पंक्तियों के लेखक के साथ हुई बातचीत (कथा अपने समय में भाषा को लिखने का आख्यान है) की चर्चा भी काफी हुई है किन्तु कुछ लोगों की निगाह में उसमें अति मुखरता और आत्ममुग्धता की छाया ज्यादा है।
बातचीत से लेखक का मिजाज बोलता है। उदय प्रकाश के स्वभाव में आत्मीयता और अख्खड़ता दोनों है। नाराज हो जाएं तो चलती हुई बातचीत की सारी पटरियां उखाड़ दें और प्रसन्न रहें तो अध्ययन से मंजी हुई प्रतिभा के कपाट खुल पड़ें। मसलन, एक जगह कविता के नए प्रतिमान को उन्होंने आलोचना की चार प्रमुख पुस्तकों में शुमार किया है, जब कि दूसरी जगह यह कहते हुए इसकी धज्जियां बिखेर दी हैं कि शीतयुद्ध की बासी और व्यर्थ हो चुकी भाषा तथा अमेरिकी नव समीक्षकों की उधार ली हुई पदावली के सिवा इसमें क्या है। बातचीत के दौरान ऐसे आरोह-अवरोह खूब हैं जिनमें उदय की प्रतिभा का लोहा भी मानना पड़ता है और उनकी नाराजगी का तेवर भी समझ में आता है। उदय रौ में हों तो बेलिहाज बातचीत करते हैं--बिल्कुल दूध का दूध और पानी का पानी करने के अंदाज में। उसमें बेशक कुनैन-सी कड़वाहट हो, लेकिन तल में सच्चाई का अहसास भी रहता है। उनके निशाने पर वे लोग जरूर होते हैं, जिन्होंने आलोचना को अपनी खेती बना रखी है, हिंदी विभागों को चारागाह मान लिया है और जो तिकड़में और दोयम दर्जे की प्रतिभा के बलबूते बड़े-बड़े संस्थानों में शोभायमान हैं। हिंदी के दादुर पंडों के रूप में इस-उस के अंत-अंत की रट लगाते हुए पावर ग्रुप की तरह आपरेट कर रहे हैं।
बहरहाल, हाल-फिलहाल आई साक्षात्कार की ढेरों पुस्तकों के बीच उदय के साथ हुई ये वार्ताएं बहस और जिरह की सर्वाधिक गर्मजोशी से भरी हैं। हम इन्हें वैष्णवन की वार्ता मानने की भूल न करें, लेकिन इनमें जगह-ब-जगह समाए उदय के सात्विक क्रोध के झाग को तनिक हटा कर देखें तो ताजा दुहे गए दूध की-सी धारोष्ण गरिमा यहां विद्यमान है।
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डा ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059
मोबाइल: 09955774115 ईमेल: omnishchal@yahoo.co.in /
omnishchal@gmail.com
ओम निश्चल





7 comments:
बहुत अच्छे. ये किताब पढ़ने की इच्छा है.
Bahut achha stambh hai Yogendra ji, Apaki yah patrika prarambh se hi bahut suruchipurn aur stariya sahitya prastut kar raha hai. main Uday Prakash ji ki kahaniyan padhti rahi hoon, aur unki samvedanapurn, prabhavshali bhasha-shaili ki kayal hoon. aunki pustak par atyant sundar, aur utani hi atmiya samiksha ke liye Om Nishchal ji ko meri badhai pahunchayen, aur patrika ke stariy, drishtipurn sampadan ke liye apko dher sari badhaiyan aur shabhkamnayen.
Nidhi Shrivastav, Madhya Pradesh
सर्वप्रथम तो उदय जी को पुस्तक के लिए बधाई. ओम निश्चल जी को भी आलेख के लिए आभार.
उदय जी के लेखन व धारणाओं,मत-विमत,लेखकीय व्यक्तित्व के पहलुओं आदि के बारे में पाठकों का परिचित होना रोचक है.
स्तम्भ जारी रहे.
बहुत-बहुत धन्यवाद गीत जी, निधि जी और कविता जी, स्तंभ पर आपकी राय के लिए आभार।
निधि जी, गीत जी और कविता जी, आपके अभिमत के लिये शुक्रिया. हमारी कोशिश होगी कि इस स्तँभ मेँ नये पुराने सभी लेखकोँ की महत्त्वपूर्ण, नयी लीक, शैली रचने वाली और बहसतलब किताबोँ की चर्चा अवश्य हो. इसमेँ नये किन्तु महत्त्वपूर्ण लेखकोँ पर हमारी पैनी नज़र रहेगी. इस सीरीज़ मेँ आगे ऐसे लेखकोँ से आप सब रू-ब-रू होँगे.--ओम निश्चल
हाल-फिलहाल प्रारंभ करने के लिए बधाई. ओम जी बहुत प्रतिभाशाली कवि-आलोचक हैं. आपने पुस्तकों पर टिप्पणी के लिए उनका चयन कर अच्छा कार्य किया है. आशा है इस स्तंभ के अंतर्गत अच्छी पुस्तकों के परिचय प्राप्त हो सकेगें, लेकिन उस अच्छी के चक्कर में वास्तव में ही अच्छी छूट न जांए और उनकी ही पुस्तकों की चर्चा की जाए जो चर्चा करवा लेने में सक्षम हैं .
सानंद हैं.
रूपसिंह चन्देल
Bhai Chandel ji,
Aisa nahi hoga. kintu acchi kitabon tak chahne par bhi pahunch na ho paye to wahan hamari vivashta hogi-Om Nishchal
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