हाल-फिलहाल हमारा नया स्तंभ है जिसके अंतर्गत आप हिंदी में प्रकाशित नई साहित्यिक कृतियों से रू-ब-रू होंगे। हम चुनी हुई इन कृतियों का एक संक्षिप्त परिचय और उनमें से कुछ अंश भी प्रकाशित करेंगे। और साथ ही उन कृतियों पर हमारे जाने-माने, प्रखर समीक्षक ओम निश्चल अपनी बेबाक संक्षिप्त टिप्पणी प्रस्तुत करेंगे। हमें इस आयोजन पर आपकी राय की भी प्रतीक्षा रहेगी
इस बार की नई कृति है वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी की काव्य-पुस्तक दुख चिट्ठीरसा है ।
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दुख चिट्ठीरसा है
कवि : अशोक वाजपेयी
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन,
1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
नई दिल्ली 110 002
पहला संस्करण : 2008
पृष्ठ : 144
मूल्य : 175 रु.
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संकलन से कुछ कविताएं
कोई नहीं सुनता
कोई नहीं सुनता पुकार--
सुनती है कान खड़े कर
सीढियों पर चौकन्नी खड़ी बिल्ली,
जिसे ठीक से पता नहीं कि
डर कर भाग जाना चाहिए या
ठिठककर एकटक उस ओर देखना चाहिए।
कोई नहीं सुनता चीख़--
सुनती है खिड़की के बाहर
हरियाये पेड़ पर अचानक आ गई नीली चिड़िया,
जिसे पता नहीं कि यह चीख़ है
या कि आवाज़ों के तुमुल में से एक और आवाज़।
कोई नहीं सुनता प्रार्थना--
सुनती है अपने पालने में लेटी दुधमुंही बच्ची,
जो आदिम अंधेरे से निकलकर उजाले में आने पर
इतनी भौंचक है
कि उसके लिए अभी आवाज़
होने, न होने के बीच का सुनसान है।
गाढे अंधेरे में
इस गाढे अंधेरे में
यों तो हाथ को हाथ नहीं सूझता
लेकिन साफ़-साफ़ नज़र आता है :
हत्यारों का बढता हुआ हुजूम,
उनकी ख़ूंख़्वार आंखें,
उसके तेज़ धारदार हथियार,
उनकी भड़कीली पोशाकें
मारने-नष्ट करने का उनका चमकीला उत्साह,
उनके सधे-सोचे-समझे क़दम।
हमारे पास अंधेरे को भेदने की कोई हिकमत नहीं है
और न हमारी आंखों को अंधेरे में देखने का कोई वरदान मिला है।
फिर भी हमको यह सब साफ़ नज़र आ रहा है।
यह अजब अंधेरा है
जिसमें सब कुछ साफ़ दिखाई दे रहा है
जैसे नीमरोशनी में कोई नाटक के दृश्य।
हमारे पास न तो आत्मा का प्रकाश है
और न ही अंतःकरण का कोई आलोक :
यह हमारा विचित्र समय है
जो बिना किसी रोशनी की उम्मीद के
हमें गाढे अंधेरे में गुम भी कर रहा है
और साथ ही उसमें जो हो रहा है
वह दिखा रहा है :
क्या कभी-कभार कोई अंधेरा समय रोशनी भी होता है?
यह विलाप नहीं है
यह विलाप नहीं है
एक नीरव प्रार्थना है
जो किसी देवता को संबोधित नहीं है :
उसमें कोई शब्द भी नहीं है कातर या व्याकुल,
वह एक दिग्हीन चीख़ है
किसी पक्षी की जो दूरदेस से लौटने पर पाता है
कि तिनका-तिनका जोड़कर बनाया उसका घोंसला
आंधी उड़ा ले गई है।
यह प्रार्थना है
जिसमें खारे पानी के क़तरे हैं
अपनी हर बूंद में बिलखते हुए
जिन्हें पता है कि उन्हें
अब अनदेखे और अकेले ही सूख जाना है।
यह सारी नमी को सोखते हुए
सब कुछ को ठूंठ में बदलने पर विलाप है।
यह ध्वस्त मंदिर के पिछवाड़े पड़े मलबे में दबी
भग्न मूर्ति के ऊपर रेंगती दीमकों की क़तार का विन्यास है :
यह चिथड़ों की तरह
तेज़ हवा में फड़फड़ाते
दुख के अवाक होते जाते शब्दों का बीहड़ संगीत है।
संसार में जहां कहीं भी आंसू झर रहा है
सिसकी या चीख़ है
वे सभी वही इस प्रार्थना की इबारत हैं।
यह विलाप नहीं है।
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जाने-पहचाने पदों-प्रत्ययों की आवाजाही के बीच
अपने शिखर रचतीं कविताएं
ओम निश्चल
अशोक वाजपेयी एक साथ दुख-सुख, कामना और विरक्ति के कवि है। व्यग्रताओं और विचलनों से भरी उनकी कविता के अनेक संस्करण हैं। उसमें जहां दुख के अवाक् होते शब्दों का बीहड़ संगीत है, वहीं ओस-सी द्रवित, किसलय-सी कोमल कल्पना का रमणीय पाठ भी। दुख चिट्ठीरसा है में अशोक वाजपेयी अज्ञेय का अनुगमन करते हुए कहते हैं--सुख की तो याद भी दुख देती है। याद रहे अज्ञेय ने ऐसा कोई घर आपने देखा है में लिखा है, जहां सुख है वहीं हम चटक कर टूट जाते हैं बारम्बार/जहां दुखता है वहां पर एक सुलगन पिघला कर हमें फिर से जोड़ देती है।
बुढ़ापे की ओर बढ़ते अशोक के काव्यचिंतन में यों तो जानी पहचानी रूढ़ियां पहचान में आ जाती हैं फिर भी प्रौढ़ि की दृष्टि से अशोक अपनी कलात्मकता के शिखर पर हैं। मुक्तिबोध व श्रीकांत वर्मा जैसे कवियों के सान्निध्य में रहे अशोक वाजपेयी के यहां सफलता विफलता, ऐश्वर्य-अकिंचनता, कामना-वीतराग, उम्मीदी-नाउम्मीदी की लहरें उठती-गिरती रहीं हैं। हालांकि मोहभंग के मस्तूल वैसे नजर नही आते, जैसे मुक्तिबोध और श्रीकांत वर्मा में।
दुख सर्जनात्मकता की आधारभूमि है। दुखों ने मुक्तिबोध को मांजा, श्रीकांत वर्मा को संवारा, शमशेर को ताकत दी और अज्ञेय को यह कहने पर सहमत किया कि दुख सबको मांजता है। अशोक की आसक्तियों को जिस तरह दैहिक देदीप्यता में घटा कर अवमूल्यित किया गया है, देह और गेह के चालू फलसफे के कवि होने का खिताब देते हुए उनके कविता के घनत्व को अलक्षित किए जाने की चेष्टाएं हुई हैं, वे कविता की सैद्धांतिकी से कम, वैयक्तिक अवमानना से कहीं अधिक परिचालित हैं। अब तक कविता के परिसर में नए उकेरे रचे गए कितने ही बिम्ब, रूपक और ध्वनियां हैं जो अशोक के यहॉं पहली बार प्रकट हुए हैं। किन्तु शास्त्र को अलविदा कह कर शस्त्र भांजने वाले आलोचकों को ये खूबियां नहीं दीख पड़ेंगी।
इस संग्रह में अशोक वाजपेयी की अनेक मूल्यवान कविताएं हैं। साधारण की एक गाथा, पांच कविताएं तथा कई ख्यात कवियों की पंक्तियों पर आधारित कविताएं। ग्यारह प्रेम कविताओं की लगभग सभी कड़ियां ध्यातव्य हैं। उनकी कविताएं अपना एक संसार, एक भिन्न आबोहवा निर्मित करती चलती हैं। इसलिए उनमें प्रवेश करने का धीरज चाहिए। तुरत फुरत हाथ लगने वाले सुभाषितों, उद्धरणों से वे नहीं समझे जा सकते। उनमें बहुतेरे अंतर्द्वंद्व और अंतर्विरोध हैं। अच्छे शब्दों का विपुल भंडार है, जाने पहचाने पदों-प्रत्ययों की आवाजाही भी बहुत होती है, पर उन्हीं के बीच उनकी कविता अपने शिखर भी रचती है। देवताओं और पूर्वजों को तो आप उनकी कविता से बहिष्कृत नहीं कर सकते, वे हैं और रहेंगे, किन्तु राग और विराग दोनों किस्म की कविताओं की गहरी पारी खेलने वाले अशोक को अभी भी भाषा में रचती-मथती-भेदती और कौंधती अंतर्ध्वनियों में ही महसूस किया जा सकता है। उनकी कविता दरअसल भाषा का अध्यात्म है। फिर भी वे महज शब्दों की शोभायात्रा के कवि नहीं हैं। शमशेर के इस कथन में उनका आज भी भरोसा है: शब्द का परिष्कार स्वयं ही दिशा है। दुख चिट्ठीरसा है की कविताओं की अनुगूंज देर तक बनी रहने वाली अनुगूंज है, इसमें संदेह नहीं।
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संपर्क : डा॰ ओम निश्चल, जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059
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1 comments:
achchha rahega ji. kam se kam nyi kitaabon ke baare men jaankari to milti rahegi.
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