Wednesday 23 April 2008

पत्रों के बहाने एक निर्मल-संस्मरण




निर्मल एक साथ

मेरे संबल और कमजोरी दोनों रहे हैं

योगेंद्र कृष्णा


निर्मल जी का जाना हमारे लिए एक युगबोध का अवसान है. इस अवसान से उपजे सन्नाटे की चीख हमें वर्षों बाद शायद तब सुनाई पड़े जब हम अपने छद्म, अपनी चालाकियों, अपनी कृत्रिमताओं और स्वयं अपने ही द्वारा विरूपित अपनी छवियों को पहचानने की क्षमता अर्जित कर लें.

ऐसे बीहड़ और अराजक समय में जब कि जीवन के सारे आयाम, सारे अनुशासन और इसलिए साहित्य भी, छद्म आकांक्षाओं, कृत्रिम सरोकारों, जटिलताओं और दांव-पेंच से निरंतर आक्रांत हैं--ऐसी प्रतिकूलताओं में शायद हमें अधिक जरूरत आज निर्मल वर्मा जैसी शख्सियतों की थी, जो हमारे लिए एक नैतिक संबल बन कर हमें आगे भी यह बता सकतीं कि जटिल से जटिलतर, क्रूर से क्रूरतर होते मानव-विरोधी इस समय में भी व्यक्ति अपनी सारी अस्मिताओं, लेखकीय स्वायत्तता और सम्मान के साथ जीने और मरने की कला कैसे साध सकता है.

लेकिन हमें छोड़ जाते हुए शायद निर्मल यही सलाह दे गए हैं कि साहित्य अन्य अनुशासनों से बहुत अलग है -- वहां कोई सीधा रास्ता निर्दिष्ट सत्य की ओर नहीं जाता, वहां अपने ही मन के अंधेरे गलियारों में भटकना पड़ता है. यहां यदि पैर लड़खड़ाते हैं तो कोई ऐसा संबल नहीं जो आपको संभाल सके. यदि संबल की तलाश हो, तो हमें साहित्य की शरण में नहीं जाना चाहिए -- वहां संदेह और भी सघन होगा, अंधेरा और भी अंधकारपूर्ण, तृष्णा और भी अधिक तृष्णाकुल. साहित्य में हम अपना सत्य केवल अस्तित्व के चरम छोर पर जाकर ही पा सकते हैं और चूंकि दुनियावी सुविधाओं के बीच हम वहां जाने का खतरा नहीं उठाना चाहते, साहित्य यह जोखिम हमारे लिए उठाता है. इसलिए हमें यह गर्व नहीं करना चाहिए कि हम साहित्य को कुछ देते हैं. हम जो कुछ लिखते हैं एक तरह से इस ऋण से उऋण होने का विनम्र प्रयास करते हैं, जो हमने होमर, व्यास, शेक्सपियर और तुलसीदास, दॉस्तोयवस्की और तॉल्सतॉय जैसे लेखकों से प्राप्त किया है. क्या हम कभी कल्पना कर सकते हैं कि उन्होंने जो दुनियाएं हमारे लिए रची हैं उनके बिना हमारी यह दुनिया कैसा अंतहीन मरुस्थल बन जाती?

और देखते ही देखते हमें पता भी नहीं चला कब हम एक और ऋण के बोझ से दब गए-- निर्मल वर्मा ने हमारे लिए जो एक अनूठी, अविस्मरणीय दुनिया रची है उस ऋण के बोझ से.

आग्रहों और दुराग्रहों की शिकार हमारी पीढ़ी के अधिकतर लोग, जो अन्य लेखकों के साथ-साथ निर्मल को भी पढ़ कर प्रौढ़ हुए हैं और उनके प्रभाव में अपनी आंतरिक दुनियाओं को बनते-संवरते और विकसित होते हुए देखा है, शायद सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा सकें लेकिन मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं कि निर्मल की इस दुनिया ने (और मेरे लिए निजी तौर पर उनकी सहज आत्मीयता और स्नेह ने भी) मेरी संवेदना को जो नया क्षितिज और विस्तार, सूक्ष्मता और परिष्कार दिया है, उसके बिना शायद मैं अपने परिवेश, अपने अस्तित्व, अपने आत्म-संघर्षों को उस रूप में नहीं समझ पा रहा होता, उस दृष्टि से नहीं देख पा रहा होता, जिस रूप में और जिस दृष्टि से इन्हें समझने और देख पाने की स्थिति में आज मैं स्वयं को पाता हूं.

निर्मल जी की कई प्रारंभिक कहानियों की चर्चा कुछ विस्तार में करते हुए जब मैंने पहली बार उन्हें इसी आशय का एक खत लिखा तो वे अत्यंत भाव-विभोर हो उठे थे. और मैं आज भी उस क्षण का स्मरण कर रोमांच से भर उठता हूं जब स्नेहसिक्त उद्गारों से लबालब निर्मल जी का यह पहला पत्र मुझे मिला था.

मेरे पत्र लिखने के कुछ दिन पूर्व वे फणीश्वरनाथ रेणु व्याख्यानमाला की शुरुआत करने बिहार विधान परिषद आए थे, जहां उन्होंने साहित्य की परती परिकथा पर एक अतिशय भावप्रवण एवं अभिभूत कर देने वाला व्याख्यान दिया था और बड़ी संख्या में सभागार में उपस्थित साहित्य-प्रेमियों, पाठकों के उत्साह एवं विरल स्नेह तथा विधान परिषद के सभापति प्रो. जाबिर हुसेन के सहज-सहृदय आतिथ्य से स्वयं भी अभिभूत दिख रहे थे. पटना के साहित्यिक परिदृश्य में सचमुच यह एक यादगार घटना थी, जिसका जिक्र वरिष्ठ कवि तथा अंतरराष्ट्रीय हिंदी वि.वि. के तत्कालीन कुलपति अशोक वाजपेयी (जो इस अवसर पर यहां उपस्थित थे) ने भी जनसत्ता के अपने स्तंभ `कभी-कभार´ में इन शब्दों में किया था : `पिछले कई दशकों से सामाजिक अवबोध और जिम्मेदारी को अपना एकाधिकार मानने वाली शक्तियां अनेक मंचों से यह लगातार कहती रही हैं कि निर्मल वर्मा जैसे `व्यक्तिवादी´ और `कलावादी समाजविरोधी´ लेखक हिंदी की मुख्यधारा के अंग नहीं हैं, उन्हें न समाज की कोई समझ है और न ही समाज उन्हें पहचानता है. इस तरह के लांछनों की सच्चाई से दूरी को जानते हुए भी हमलोगों को अचरज हुआ जब 22 अप्रैल, 2000 को पटना के बिहार विधान परिषद सभागार में हम महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी वि.वि. द्वारा स्थापित फणीश्वरनाथ रेणु व्याख्यानमाला में निर्मल वर्मा द्वारा दिए गए पहले व्याख्यान `साहित्य की परती परिकथा´ के सिलसिले में पहुंचे. सभागार ठसाठस भरा था और बार-बार यह जाहिर होता रहा कि जगह कम पड़ रही है. परिषद के सभापति, अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक और उर्दू अदीब जाबिर हुसेन ने बड़ी सुरुचि और परिष्कृत संयम से संचालन किया. केंद्र में निर्मल वर्मा ही रहे और लोगों ने बहुत ध्यान से उनका व्याख्यान सुना. दो दिनों के पटना प्रवास में हमारे सामने यह बार-बार स्पष्ट हुआ कि बिहार की जो छवि इन दिनों रूढ़ हो गई है उससे बिलकुल अलग, बल्कि उसके प्रतिकूल, पटना में एक सक्रिय और सजग साहित्यिक संस्कृति है. उसमें पढ़ने का व्यसन, अपनी जिज्ञासाओं के समाधान पाने की ललक और अपने बड़े लेखकों के लिए सहज सम्मान है.

यहीं, इसी अवसर पर, मिलने वालों की भीड़ में, पहली बार निर्मल जी से मेरी एक बहुत ही संक्षिप्त और औपचारिक मुलाकात हुई थी, एक ऐसी मुलाकात जिसे निर्मल जैसे बड़े लेखक के लिए याद रखना भी शायद मुश्किल होता.

मैंने अभी अपने जिस पहले पत्र का जिक्र किया उसमें उन्हें मैंने यह भी लिखा था कि साक्ष्य (साहित्य अंक) में छपी अपनी कहानी `पार्श्र्वकथन´ पर उनकी स्पष्ट और सच्ची राय जान कर मुझे काफी संतोष होगा, विशेषकर कहानी की कमजोरियों के बारे में जान कर, जिससे कि मैं उनका मूल्यवान, रचनात्मक मार्गदर्शन पाकर आगे अपनी कमजोरियों के निराकरण की दिशा में प्रयास कर सकूं. उनका जो जवाब आया आपके सामने है :



दिल्ली
15.11.2000

प्रिय योगेंद्र जी,

आपका स्नेहपूर्ण पत्र मिला। धन्यवाद।

आपने जो कुछ मेरी कहानियों के संबंध में लिखा, वह आपकी संवेदनशील लेखकीय दृष्टि और सहृदयता का ही परिचय देता है।

पटना में बिताए दो अविस्मरणीय दिन आंखों के सामने घूम गए, आपका पत्र पढ़ते हुए। शायद ही किसी शहर के पाठकों, साहित्य-प्रेमियों ने मेरे प्रति इतनी स्नेहसिक्त उदारता प्रगट की हो, जितना पटना में मुझे मिली। यह संयोग नहीं है कि जयप्रकाश जी और रेणु-- बिहार की दो महान विभूतियां-- मेरी प्रेरणा के सतत स्रोत रहे हैं।

साक्ष्य की प्रति मुझे मिल गई थी, जिसके लिए आभारी हूं। आपकी कहानी पढ़ कर मन बहुत उद्वेलित हुआ था-- अस्पताल का इतना बीहड़ और पीड़ायुक्त विवरण मेरे लिए इसलिए भी इतना जीवित था, क्योंकि इन्हीं दिनों मैं भी कुछ दिन अस्पताल में रह कर लौटा था। पिता का चरित्र यदि कम नाटकीय और अधिक स्पष्ट होता, तो शायद अधिक विश्वसनीय बन पड़ता। अस्पताल का वातावरण जितना अधिक प्रभावित करता है, उतना पिता-पुत्र के संबंध नहीं, जो कुहासे में ही छिपे रहते हैं। किंतु यह एक सचमुच सशक्त रचना बन पड़ी है, इसमें कोई संदेह नहीं।

साक्ष्य में कविताओं का पक्ष कहानियों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है। मुझे विशेष रूप से अरुण कमल और ज्ञानेंद्रपति की कविताएं बहुत अच्छी लगीं। संस्मरण में नंद किशोर नवल का `पटना परिदृश्य´ बेजोड़ है, बेहद पठनीय और अनेक दिलचस्प तफसीलों से भरा हुआ। नागार्जुन के चरित्र के विभिन्न पहलू बहुत अच्छी तरह उभर कर आए हैं। नवल जी को इन सब पर एक पुस्तक लिखनी चाहिए-- उन्हें मेरी बधाई दीजिए।

और तो विशेष कुछ नहीं। जाबिर हुसैन साहब को मेरा प्रणाम दें।

सस्नेह,

आपका,

निर्मल वर्मा



इस बीच मैं निर्मल वर्मा का अंतिम उपन्यास अंतिम अरण्य पढ़ गया था--एक बार नहीं, कई बार. उपन्यास की संवेदनात्मक बारीकियों से मैं बेहद प्रभावित था. उन्हें लिखे अपने दूसरे पत्र में मैंने उन्हें इस उपन्यास पर अपनी प्रतिक्रिया विस्तार में भेजी थी, जो कुछ इस प्रकार थी :

उपन्यास के सारे चरित्र एक धुरी पर घूमते हुए जीवन के एक खास मुकाम पर आ कर जैसे ठहर-से गए हैं. बावजूद इसके वे जितने ठहर-से गए हैं उससे कहीं अधिक अपने ही भीतर की यात्रा पर निकल पड़े जान पड़ते हैं. अपने आत्म की तलाश में. अपने जिए क्षणों, न जी सके क्षणों के सुख-दुख, पछतावों, निर्णीत-अनिर्णीत क्षणों के बीच के शाश्वत द्वंद्व और यंत्रणाओं को एक बार फिर से अपने ही भीतर, अपने से दूर छिटक कर देखते हुए.

आपके कथाशिल्प में ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव्स एवं बिंबों-संकेतों का विन्यास इतना सघन और अनायास है कि अमूर्त कल्पनाएं और जीवन-दर्शन भी दृश्यों में ढल गए प्रतीत होते हैं.

अन्ना जी, मुरलीधर, डाक्टर सिंह जैसे पार्श्र्व-किरदार स्वयं अपने बारे में बंद रह कर भी मेहरा साहब और मिसिज मेहरा को केंद्र में विन्यस्त करते हुए खोलते हैं. मिसिज मेहरा मरी नहीं हैं, ठहर गई हैं. पूरे वातावरण में उनकी ठहरी हुई उपस्थिति जिंदा पात्रों से कम मुखर नहीं है. उनके जीवन का जितना हिस्सा कब्र में दफ्न है उससे कहीं अधिक वे जिंदा पात्रों के जीवन में बंटी हुई दिखती हैं. उनके मन का अदम्य हिस्सा बन कर, अदृश्य में दृश्य का आभास देती हुई, उनके मौन को भरती हुई, उपन्यास में एक प्रकार की सूक्ष्म लेकिन गहन संवेदना की अंतरधारा शुरू से अंत तक प्रवाहित है. मैं इस उपन्यास को अन्ना कैरेनिना और मादाम बावेरी जैसी विश्व की क्लासिक कृतियों के समकक्ष रखना चाहूंगा.

इस पत्र के साथ मैंने अपनी एक ताजा अप्रकाशित कहानी भी उनके मंतव्य के लिए भेजी थी. कहानी पर उनकी टिप्पणी प्राप्त होने के बाद मुझे उसे अंतिम रूप देना था. निर्मल जी के मंतव्य के बाद यह कहानी दुबारा लिखी गई, जो लोकायत के 28 फरवरी, 2005 अंक में मौन संलाप शीर्षक से छपी, जिस पर पाठकों के कई प्रशंसापूर्ण पत्र जब मुझे मिले और वरिष्ठ आलोचक परमानंद श्रीवास्तव ने कथाक्रम (अप्रैल-जून, 2005) के अपने स्तंभ में जब टिप्पणी की कि `मौन संलाप´ अदृश्य सीढ़ियों में उतरती है और अंतर्वस्तु को अर्थवान बना जाती है. कहानी में स्वप्न और यथार्थ की साभिप्राय आवाजाही है, तो मुझे सचमुच संतोष हुआ कि कहानी की कच्ची प्रति पर निर्मल जी की टिप्पणी के आलोक में इस पर दुबारा काम करना सचमुच कितना सार्थक रहा.


वाई ए 1, सहविकास
68, इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली 92
19.1.2001

प्रिय योगेंद्र जी,
आपका स्नेहपूर्ण पत्र मिला था। इस दौरान मुझे दो-तीन बार दिल्ली के बाहर जाना पड़ा, अत: आपको शीघ्र न लिख सका।

आपने अंतिम अरण्य पर जो कुछ लिखा, वह मेरे लिए बहुत मूल्यवान है। सबसे अधिक प्रसन्नता की बात यह है, कि आपकी संवेदनशील दृष्टि ने उपन्यास के मर्म को पकड़ा है. आपने बहुत सुंदर, सटीक ढंग से उपन्यास के विभिन्न पात्रों की अंत:प्रक्रियाओं का विवरण दिया है। किसी कथाकृति के विशिष्ट संसार में कैसे प्रवेश किया जाता है--आपका पत्र इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। क्या हमारे समीक्षक कभी इतनी सूक्ष्मता से किसी कृति के सत्य को उद्घाटित करने की संवेदनात्मक दृष्टि अर्जित कर सकेंगे?

आपकी कहानी पढ़ी। वह एक बहुत खामोश कहानी है, न कहने में भी छोटी स्पेस में बहुत कुछ कहती है. फिर भी एक तरह का असंतोष आखीर में छोड़ जाती है--अपनी समस्त भाषाई सुंदरता के बावजूद। शायद यह असंतोष कथ्य की अस्पष्टता के कारण उपजता है। पिछली कहानी की तरह यहां भी संबंधों की दुनिया कुहरे में ढकी रहती है। आपको परिवेश के यथार्थ को अधिक ठोस, अधिक प्रमाणिक बनाने का प्रयास करना चाहिए। भाषा की पारदर्शिता बहुत सम्मोहित करती है किंतु पात्रों की भावनात्मक दुनिया में प्रवेश करने के लिए वह ही काफी नहीं है। फिलहाल मैं इतना ही कह सकता हूं।

आशा है आप सानंद होंगे। नए वर्ष की शुभकामनाएं,

आपका,
निर्मल वर्मा



उनके इस पत्र से प्रोत्साहित होकर, अंतिम अरण्य पर लिखी अपनी टिप्पणी को पर्याप्त विस्तार देकर इस उपन्यास पर मैंने एक स्वतंत्र समीक्षात्मक आलेख लिखा, जिसकी एक प्रति अपने पत्र के साथ यह अनुरोध करते हुए मैंने निर्मल जी को भेजी कि इस पर मुझे उनका मार्गदर्शन चाहिए, और यह कि इस पर अपनी प्रतिक्रिया के साथ मुझे यह भी बताने की कृपा करें कि इसे किस पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेजना श्रेयस्कर होगा. इसके पूर्व मैंने उन्हें अपनी काव्य-पुस्तक खोई दुनिया का सुराग भी भेजी थी और इस पर भी मुझे उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार था.

निर्मल जी की प्रतिक्रिया प्राप्त हो जाने के बाद मैंने इस आलेख को वागर्थ में प्रकाशनार्थ भेज दिया, जो इसके जुलाई, 2001 अंक में अंतिम अरण्य : आंतरिक दुनियाओं का पारदर्शी यथार्थ शीर्षक से प्रकाशित हुआ. इस पर मुझे पाठकों-लेखकों के अनेक पत्र प्रशंसा में प्राप्त हुए. इनमें से चार-पांच पत्रों की छाया-प्रतियां अपने पत्र के साथ मैंने निर्मल जी को भी भेजीं, जिन्हें पढ़ कर उन्हें एक प्रकार की आश्वस्ति और संतोष का अनुभव हुआ था, जो जवाब में आए उनके पत्र में साफ झलकता है.

वागर्थ में प्रकाशित इस आलेख के अंत में प्रकाशक के पते की जगह मेरा पत्राचार का पता छप गया था. इस भ्रम की वजह से पाठकों के पत्रों में कई अनुरोध-पत्र मुझे इस आशय के भी मिले कि वे यह पुस्तक मंगवाना चाहते हैं और मैं इसकी व्यवस्था कर दूं. ऐसे सभी पत्र-लेखकों को पत्र लिख कर मुझे स्थिति का खुलासा करना पड़ा. बाद में मेरे अनुरोध पर वागर्थ ने भी `भूल-सुधार´ प्रकाशित किया था. ये सारी बातें मैंने निर्मल जी को भी अपने पत्र में बताई थीं.



दिल्ली
21.5.2001


प्रिय योगेंद्र जी,

आपका पत्र मिला। मैं पिछले दिनों देश के बाहर था, अत: आपके पत्र का उत्तर शीघ्र न दे सका। मुझे विलंब के लिए गहरा अफसोस है।

आपकी काव्य पुस्तक मिल गई थी। उसे पढ़ना बहुत अच्छा भी लगा, किंतु हर रचना के बारे में अपनी प्रतिक्रिया भेजना संभव नहीं हो पाता।

आपका अंतिम अरण्य पर आलेख बहुत सुंदर और भाव-प्रवण है। यदि आप चाहें, तो इसे कलकत्ता से निकलने वाली पत्रिका वागर्थ में भेज सकते हैं। जहां तक मेरा ख्याल है, अभी तक उसमें अंतिम अरण्य की कोई समीक्षा नहीं छपी है। आप इच्छानुसार इसे किसी दूसरी पत्रिका में भी भेज सकते हैं। लेख इतना विचारशील है कि इसे हर पत्रिका का संपादक प्रकाशित करना चाहेगा।

आशा है, आप सानंद हैं।

सस्नेह,

आपका
निर्मल वर्मा




दिल्ली
1 अगस्त, 2001

प्रिय योगेंद्र जी,

आपका पत्र मिला। अंतिम अरण्य पर आपकी समीक्षा वागर्थ में दुबारा पढ़ी, और इस बार पहली बार से भी अधिक भावप्रवण, प्रांजल और प्रभावशाली जान पड़ी। आपकी समीक्षा पर जो प्रशंसापूर्ण पत्र आए, उन्हें पढ़ कर सचमुच बहुत प्रसन्नता हुई। हिंदी जगत में अब सुदूर कोनों में साहित्य के मर्मज्ञ पारखी पाए जा सकते हैं, यह इन पत्रों से स्पष्ट है।

आपने पत्र लेखकों को राजकमल का पता लिख दिया, इसके लिए आभारी हूं। आश्चर्य है, श्रोत्रिय जी ऐसी भूल कैसे कर सकते थे? मुझे खुशी है, आपने पत्र लिख कर स्पष्टीकरण कर दिया।

आशा है आप हमेशा की तरह सृजनरत होंगे। शुभकामनाओं के साथ,


आपका,
निर्मल वर्मा

गगन जी को आपकी शुभकामनाएं दे दी है.


दिल्ली
21.3


प्रिय योगेंद्र जी,

आपका पत्र और काव्य पुस्तक मिली। आपकी कविताएं धीरे-धीरे पढ़ रहा हूं, और उनमें से कुछ बहुत अच्छी भी लगी हैं। मुझे खेद है, कि मैं आपको पुस्तक की प्राप्ति सूचना शीघ्र नहीं दे सका।

आशा है, आप सानंद होंगे।

सस्नेह,
निर्मल वर्मा



वाई ए 1 सहविकास, 68 इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन
पटपड़गंज, दिल्ली 92
21.4.2003


प्रिय योगेंद्र जी,

आपका पत्र मिल गया था। इस बीच मुझे जरेवी जाना पड़ा, जहां भारतीय साहित्य पर एक विचार गोष्ठी आयोजित हुई थी। इसी कारण आपको यह पत्र इतने विलंब से लिख रहा हूं।

आशा है, अब तक आप नए घर में रस-बस गए होंगे।

आपकी कविता पढ़ी, अच्छी लगी। और आजकल क्या लिख पढ़ रहे हैं?

आपका स्वास्थ्य कैसा है? उसका ध्यान रखें। सस्नेह,


आपका,
निर्मल वर्मा


जर्मनी के मेरे एक मित्र, जो निर्मल वर्मा के साथ मेरे पत्राचार के बारे में जानते थे, ने एक दिन फोन पर मुझे बताया कि अंतिम अरण्य का अनुवाद जर्मन में हो रहा है लेकिन इसके केंद्रीय विषय `मृत्यु´ के कारण इस अनुवाद-प्रोजेक्ट में कुछ अवरोध उत्पन्न हो गया है. मैंने जब उन्हें बताया कि यह विषय को अतिसरलीकृत कर देखने की प्रवृत्ति से पैदा हुआ भ्रम है, उपन्यास का विषय मृत्यु नहीं जीवन है, तो उन्होंने इस विंदु पर मेरी विस्तृत राय जाननी चाही. मैंने उन्हें बताया कि अंतिम अरण्य पर मेरी एक समीक्षा प्रकाशित है जो इसी अवधारणा पर केंद्रित है. फिर उनके अनुरोध पर मैंने इसकी एक प्रति उन्हें जर्मनी भेजी. बाद में जब मुझे सूचना मिली कि मेरी यह समीक्षा जर्मन अनुवादक को उनकी कठिनाइयों से उबारने में सहायक हुई तो सचमुच मुझे काफी प्रसन्नता हुई.

इस बीच मैं दिल्ली गया था, और निर्मल जी से मिलने सीधे उनके अपार्टमेंट, सहविकास भी पहुंचा. गेट पर ही सुरक्षा गार्ड ने बताया कि वे घर पर नहीं हैं, कुछ देर पहले उन्हें बाहर निकलते देखा है. शाम के छ:-सात बजे होंगे, दीवाली के ही आस-पास का कोई दिन था, वर्ष 2003. गार्ड ने फिर भी मेरा नाम पूछ कर इंटरकॉम पर निर्मल जी के घर सूचना दी--जोगेन्दर किश्ना आया है--और फोन मेरे हाथ में दे दिया. मैंने संशोधन किया कि मैं पटना से योगेंद्र कृष्णा, निर्मल जी से मिलना चाहता हूं. उधर से एक बहुत ही शालीन और परिष्कृत आवाज आई--निर्मल जी तो अभी घर पर नहीं हैं, आप सुबह में फोन पर बात कर लें. मैंने पूछा कि आप कौन बोल रही हैं, तो जवाब आया, मैं उनकी पत्नी बोल रही हूं. मैंने उनका अभिवादन किया और उनसे उनके घर का फोन नंबर लेकर वापस आ गया. तात्कालिक राहत की बात सिर्फ इतनी थी कि मैं पटपड़गंज में ही ठहरा हुआ था. सुबह में फोन पर निर्मल जी से बातें हुईं, फोन उठाते ही उन्होंने बताया कि मेरा पत्र उन्हें मिल गया है. मैंने उन्हें बताया कि मिलना चाहता हूं इसलिए फोन किया था, तो थोड़े संकोच के साथ बहुत धीमे और संयत स्वर में आवाज आई--अभी तो मुझे अस्पताल जाना है, आप शाम में देख लें, नहीं सुबह में ही ठीक रहेगा. मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि कई प्रकार की जांच के लिए उन्हें अस्पताल जाना पड़ता है. दूसरे दिन सुबह मैंने उन्हें पुन: फोन किया लेकिन उस दिन भी वे अस्पताल निकलने की तैयारी में थे और दुर्भाग्यवश दूसरे ही दिन मुझे पटना लौटना था.

तीन-चार दिनों के दिल्ली प्रवास में, शहर की निपट उदासीनता और वहां के लोगों की रोजमर्रे की मशीनी आपाधापी ने मुझे काफी निराश किया था और मैं एक प्रकार की उदासी और खालीपन के अहसास के साथ पटना लौटा था. निर्मल जी को लिखे अपने पत्र में मैंने जर्मन अनुवाद के प्रसंग में तो विस्तार से उन्हें बताया ही था, दिल्ली के अपने अप्रीतिकर अनुभवों की भी चर्चा कर दी थी, जो, बाद में मुझे लगा, शायद नहीं करनी चाहिए थी.



दिल्ली
5 नवंबर, 2004

प्रिय योगेंद्र जी,

आपका पत्र मिला. मुझे नहीं मालूम था कि आप जब पिछली बार दिल्ली आए थे, तो आपका अनुभव इतना कटु और अप्रीतिकर रहा था. यहां के लोग काफी आक्रामक और रूखे हो सकते हैं, इस बारे में हमें भी--जो यहां रहते हैं--बार-बार याद दिलाया जाता है!

आपने अंतिम अरण्य के जर्मन में अनुवाद होने के संबंध में जिस विवाद की चर्चा की, उसे पढ़ कर काफी अजीब लगा. जर्मन लोग--योरप वासियों की तरह--मृत्यु के काफी निकट रह चुके हैं--स्वयं उनके साहित्य में एक ऐतिहासिक अनुभव के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक विमर्श का भी मृत्यु एक सनातन विषय रही है. आश्चर्य का दूसरा कारण यह था कि इस उपन्यास का जर्मन अनुवाद तुबिंगन वि.वि. के एक इंडोलॉजिस्ट ने पहले से ही आरंभ कर रखा है. पिछली बार (दो वर्ष पूर्व) जब मैं जर्मनी गया था तो उनसे मिला भी था. आपने जिस प्रोजेक्ट के बारे में लिखा है, उसके अंतर्गत कौन से व्यक्ति उपन्यास का अनुवाद कर रहे हैं, कृपया उनका नाम लिख सकते हैं?

नंदकिशोर आचार्य के संकलन में अनेक उत्कृष्ट लेख स्थानाभाव के कारण नहीं जा सके. मुझे दु:ख है उन्होंने आपके लेख को अपनी पुस्तक में सम्मिलित नहीं किया.

आशा है, आप सानंद हैं.

सस्नेह,

आपका,
निर्मल वर्मा

आज निर्मल जी के नहीं रहने के बाद, अपने भीतर अचानक व्याप गए एक बुझे-बुझे, खाली-खाली से अहसास के साथ, जब मैं उनके उपन्यास अंतिम अरण्य पर एक बार पुन: विचार करता हूं तो शिद्दत से यह महसूस होता है कि उपन्यास के मुख्य किरदार मेहरा साहब के बहाने निर्मल जी इस उपन्यास में कहीं अपनी ही मृत्यु की आहटों का ताना-बाना तो नहीं बुन रहे थे. और शायद ऐसा ही था-- गर्म राख के भीतर उंगलियां डाल कर... अपने से दूर छिटक कर... तिया के साथ वे अपनी ही अस्थियां तो चुन रहे थे.

निर्मल एक साथ मेरे संबल और कमजोरी दोनों रहे हैं. संबल की बात तो मैं पहले भी कर चुका हूं. हां, कमजोरी इसलिए कि वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य के बरअक्स, मैंने उनकी अनूठी शख्सियत को अपने दिल में इंसान से कहीं ज्यादा ऊंचा दर्जा दे रखा है. अब इस पर, मेरे प्रिय लेखकों में से एक, और निर्मल जी के ही समकालीन राजेन्द्र यादव जी, यदि मुझे यह सलाह दे डालें कि वे देवता नहीं हैं, तो शायद मैं इतना ही कह सकूं कि, मैंने कब कहा!

पल-प्रतिपल के मार्च, २००६ अंक से साभार

2 comments:

Uday Prakash said...

आज ३० मई को पहली बार निर्मल जी पर आपके इस आलेख को पूरा पढ गया. अपनी खामोशियों में भी बहुत कुछ कहता हुआ. किसी लेखक के साथ इतने संलग्नतापूर्वक अपने संबंधों को समय के गुज़रने के बावज़ूद बनाये रखना और उसे बहुत सांसारिक ही नहीं भावनात्मक स्तर पर भी 'निभाना' हमारे वक्त में विरल होता गया है. मुझे बार-बार अभी हाल में ही पढी गयी, वाल्टर बेजामिन पर उनके एक दोस्त द्वारा लिखी गयी 'स्टोरी आफ़ अ फ्रेण्डशिप' की याद आती रही.
बधाई. इसे और आगे बढाएं...संभवत: उनकी रचनाओं और विचारों पर अपनी व्याख्याओं के साथ-साथ मिलाते हुए. ऐसे में यह एक नयी चीज़ होगी.

योगेंद्र कृष्णा said...

बहुत-बहुत आभार उदय जी, आशा है आप शिकागो की अपनी यात्रा से अबतक लौट चुके होंगे। यह भी उम्मीद है कि वहां की सुखद और सृजनात्मक स्मृतियां आप जल्द ही कहीं सिलसिलेवार सहेजेंगे, जिसकी कुछ झलकियां आपने वहां रहते हुए भी हमें दिखाई हैं।

मैंने अपनी एक पुस्तक आपको गाजियावाद, दिल्ली के पते पर भेजी है, मिली हो तो कृपया बताएंगे।

 
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