तुर्गनेव और तोलस्तोय
दो महान हस्तियों के बीच की टकराहटें
तोलस्तोय के पुत्र इल्या तोलस्तोय के संस्मरण
दो महान हस्तियों के बीच की टकराहटें
तोलस्तोय के पुत्र इल्या तोलस्तोय के संस्मरण
अनुवाद : योगेंद्र कृष्णा

मेरे पिता और तुर्गनेव के बीच जो ग़लतफ़हमियां थीं, और जो 1861 में उनके बीच संपूर्ण अलगाव का सबब बनीं, उन सब को याद करना यहां मेरा प्रयोजन नहीं है. इस कहानी के वास्तविक वाह्य तथ्य सार्वजनिक हो चुके हैं, और उनका यहां पुन: उल्लेख करना आवश्यक नहीं है. (फेत, जिनके घर में इन दोनों के बीच झगड़ा हुआ था, ने अपने संस्मरण में इस बारे में विस्तार से लिखा है. तोलस्तोय ने तुर्गनेव की पुत्री के संदर्भ में नारीसुलभ उदारता पर दुराग्रहपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया था. तुर्गनेव ने आवेश में आकर उनके कान उमेठने की चेतावनी दी थी. इस पर तोलस्तोय ने उन्हें द्वंद्व-युद्ध के लिए ललकारा, और तुर्गनेव ने क्षमा-याचना कर ली.)
मेरा उद्देश्य इस सर्व-स्वीकृत धारणा से इतर कुछ तथ्यों पर प्रकाश डालना है, और यास्नाया पोल्याना में तुर्गनेव की मुलाक़ातों की चर्चा करने के पूर्व, इन दो नेक-दिल इंसान, जिनके बीच परस्पर सौहार्दपूर्ण संबंध रहे, के बीच निरंतर मतभेद के वास्तविक कारणों को मैं यथासंभव पूरी तरह स्पष्ट करना चाहता हूं--ऐसे मतभेद जो अंतिम रूप से उनके बीच झगड़े एवं परस्पर चुनौतियों के कारण बने.
जहां तक मैं जानता हूं, मेरे पिता को अपने संपूर्ण जीवन-काल में कभी किसी अन्य व्यक्ति के साथ कोई गंभीर मतभेद नहीं हुआ. और तुर्गनेव ने 1865 में मेरे पिता को अपने पत्र में लिखा : ``आज तक केवल तुम ही एक ऐसे शख्स हो, जिसके साथ मैं ग़लतफ़हमियों का शिकार हुआ हूं.´´
मेरे पिता जब भी ईवान सर्जेयेविच के साथ अपने झगड़े का ज़िक्र करते, वे इसका सारा दोष स्वयं पर ले लेते. झगड़े के तुरंत बाद, तुर्गनेव ने पत्र लिख कर मेरे पिता से क्षमा-याचना की थी, और इस झगड़े में अपनी भूमिका को कभी सही ठहराने की कोशिश नहीं की.
तब ऐसा क्यों था--तुर्गनेव के ही शब्दों में--कि उनके और मेरे पिता के `नक्षत्र आकाश में निर्बंध विद्वेष के साथ गतिमान रहे´ ?
इस संदर्भ में मेरी बहन, तात्याना ने अपने आलेख, `तुर्गनेव´, जो 2 फरवरी, 1908 को `नोवोये व्रेम्या´ के परिशिष्ट में प्रकाशित हुआ था, में जो लिखा वह इस प्रकार है :
इनके बीच साहित्यिक प्रतिद्वंद्विता के सारे प्रश्न मुझे नितांत अप्रासंगिक लगते हैं. मेरे पिता के साहित्यिक करियर की शुरुआत से ही, तुर्गनेव उनकी प्रखर प्रतिभा को स्वीकार करते थे, और उन्होंने उनके साथ कभी प्रतिद्वंद्विता की बात नहीं सोची. उस क्षण से ही, जब 1854 में उन्होंने कोलबासिना को लिखा था कि, ``अगर ईश्वर ने उसे आयु दी, तो मुझे पूरा विश्वास है कि वह हम सभी को अचंभित कर देगा,´´ तुर्गनेव मेरे पिता की रचनाओं को दिलचस्पी के साथ पढ़ते रहे, और कभी उनकी प्रशंसा करते नहीं थके.
1856 में उन्होंने ड्रझनिन को लिखा :
``इस अंगूरी के किण्वन के बाद जो शराब तैयार होगी, वह देवताओं के पीने लायक होगी.´´
1857 में उन्होंने पोलोंस्की को लिखा :
``यह शख्स बहुत आगे जाएगा, और अपने पीछे गहरी छाप छोड़ जाएगा.´´
बावजूद इसके, किसी प्रकार, ये दोनों आपस में सामंजस्य स्थापित नहीं कर सके. मेरे पिता को लिखे तुर्गनेव के पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि अपने परिचय के आरंभिक दिनों से ही इनके बीच ग़लतफ़हमियां बराबर पैदा होती रहीं, जिन्हें पाटने तथा भूलने का प्रयास वे निरंतर करते रहे, लेकिन कुछ समय के अंतराल पर ये ग़लतफ़हमियां पुन:, कभी दूसरे रूप में भी, प्रकट हो जातीं, जिससे नए स्पष्टीकरण और तालमेल की आवश्यकता पड़ जाती.
1856 में तुर्गनेव ने मेरे पिता को लिखा :
तुम्हारा पत्र पहुंचने में कुछ समय लग गया, मेरे अज़ीज़ ल्यॉफ निकोलायेविच. पत्र के प्रारंभ में मैं यह कहना चाहता हूं कि पत्र भेजने के लिए मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूं. तुम्हारे प्रति मेरा प्यार, और तुम्हारी मित्रता का मूल्य मेरे लिए कभी खत्म नहीं होगा, हालांकि, शायद मेरी ग़लती की वजह से, हममें से किसी को भी लंबे समय तक, दूसरे की उपस्थिति में अजीबोग़रीब अहसास से गुज़रना पड़े... मैं समझता हूं कि तुम स्वयं इस स्थिति का कारण जानते हो. तुम अकेले शख्स हो जिसके साथ मैं ग़लतफ़हमियों का शिकार हुआ हूं.
इसकी वजहें इस तथ्य में निहित हैं कि मैं तुम्हारे साथ केवल मैत्री-संबंध तक सीमित रहने के लिए कभी तैयार नहीं था. मैं हमेशा इससे और आगे तथा और गहराई में जाना चाहता था, लेकिन इसकी कोशिश मैंने अत्यंत फूहड़ तरीके से की. मैंने तुम्हें उत्तेजित और परेशान कर दिया, और जब मैंने अपनी ग़लती देखी, तो शायद जल्दबाज़ी में अपने हाथ वापस खींच लिए, और इसी कारण हमारे रिश्ते में `खाई´ पैदा हुई.
लेकिन यह फूहड़ता मात्र स्थूल स्तर पर प्रकट है, इससे आगे नहीं, और अगर जब हम पुन: मिलें, और मेरी आंखों में तुम्हें वही पुरानी शरारत दिखे, तो मेरी बातों का विश्वास करो, इसकी वजह यह नहीं होगी कि मैं एक बुरा आदमी हूं. मैं तुम्हें भरोसा दिलाता हूं कि किसी और स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं है. शायद मैं यह भी जोड़ना चाहूं कि मैं उम्र में तुमसे काफ़ी बड़ा हूं, और मैं अलग रास्ते पर चला हूं..... हमारी विशिष्ट, तथाकथित `साहित्यिक´ रुचि के बाहर बहुत कम विषय हैं जिनसे हम दोनों का वास्ता है. तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व भविष्य की दिशा में हाथ फैलाए है, मेरा अतीत में निर्मित हुआ है. मेरे लिए तुम्हारा अनुसरण करना असंभव है. उसी तरह, तुम्हारे लिए भी मेरा अनुसरण करने का प्रश्न नहीं उठता. तुम मुझसे काफ़ी दूर अवस्थित हो, इसके अलावे, तुम अपने पैरों पर इतनी मज़बूती और दृढ़ता से खड़े हो कि तुम्हें किसी का शिष्य होने की जरूरत नहीं. मैं तुम्हें आश्वस्त कर सकता हूं कि मैंने तुम्हारे ऊपर कभी कोई दुर्भावना आरोपित नहीं की, मुझे कभी तुम्हारे ऊपर यह संदेह नहीं हुआ कि तुम साहित्यिक विद्वेष के शिकार हो. मुझे अक्सर ऐसा लगा है, अगर तुम मेरी इस बात को माफ़ कर सको, कि तुम्हारे पास सामान्य विवेक की कमी रही है, लेकिन अच्छाइयों की नहीं. तुम्हारी समझ इतनी पैनी है कि यह संभव नहीं कि तुम्हें इस बात का इल्म न हो कि हम दोनो में किसी के पास अगर दूसरे से ईर्ष्या करने का कारण है, तो निश्चय ही वह व्यक्ति तुम नहीं हो जिसके पास मुझसे ईर्ष्या करने का कारण हो.
आगामी वर्ष तुर्गनेव ने मेरे पिता को एक पत्र लिखा जो, मुझे लगता है, मेरे पिता के प्रति उनके दृष्टिकोण को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है :
तुम लिखते हो कि तुम्हें बेहद खुशी है कि तुमने मेरी राय नहीं मानी, और तुम एक विशुद्ध लेखक बन गए. मैं इस बात से इनकार नहीं करता, शायद तुम सही हो. फिर भी, मैं अपने मंद मस्तिष्क की कितनी भी मगज़मारी क्यों न कर लूं, मेरे लिए यह कल्पना करना मुश्किल है कि तुम अगर लेखक नहीं हो, तो आखिर हो क्या. सैनिक ? जमींदार ? दार्शनिक ? नए धार्मिक मत का संस्थापक ? लोक-सेवक ? व्यवसायी ?..... मेरी मुश्किलों का समाधान करो, और बताओ कि इनमें से कौन-सी धारणा सही है. मैं मजाक कर रहा हूं, लेकिन इन सब के बावजूद, अंतत: मैं तुम्हें अपने मार्ग पर हर तरह से अग्रसर देखना चाहता हूं.
मुझे लगता है कि तुर्गनेव ने, एक कलाकार के रूप में मेरे पिता की प्रखर साहित्यिक प्रतिभा के अतिरिक्त उनमें और कुछ नहीं देखा. वे उन्हें एक कलाकार और एक लेखक के अतिरिक्त कुछ और होने का अधिकार नहीं देना चाहते थे. किसी भी दूसरे क्षेत्र में उनकी सक्रियता से उन्हें जैसे तकलीफ़ पहुंचती थी, और वे उनसे नाराज़ हो जाते थे क्योंकि मेरे पिता ने उनकी राय नहीं मानी. वे मेरे पिता से बहुत बड़े थे. (तुर्गनेव तालस्ताय से दस वर्ष बड़े थे.) उन्हें अपनी प्रतिभा को मेरे पिता की प्रतिभा से कमतर आंकने में कोई संकोच नहीं था, लेकिन वे उनसे केवल एक चीज़ ज़रूर चाहते थे और वह यह कि वे अपने जीवन की सारी ऊर्जा साहित्यिक कार्यों को समर्पित करें. लेकिन यह क्या ! मेरे पिता उनकी उदारता और विनम्रता की कोई परवाह नहीं करते, उनकी राय नहीं सुनते और अपने उस मार्ग पर चलने की ज़िद पर अड़े होते जो उनकी फ़ितरत और अभिरुचि के अनुकूल होता. तुर्गनेव की अभिरुचियां एवं विशेषताएं मेरे पिता के बिलकुल प्रतिकूल थीं. प्रतिरोध जहां मेरे पिता को हमेशा प्रेरित करते, तुर्गनेव पर इनका असर ठीक प्रतिकूल होता.
अपनी बहन के विचारों से पूरी तरह सहमत होते हुए, मैं केवल उन्हें उनके भाई, निकोलाई निकोलायेविच, के शब्दों में व्यक्त करना चाहूंगा, जिन्होंने कहा था कि, ``तुर्गनेव के लिए इस बात को स्वीकार करना संभव नहीं हो पा रहा था कि ल्योवोचका बड़ा हो रहा है और उनके संरक्षण से स्वयं को आज़ाद कर रहा है.´´
और सच पूछें तो, तुर्गनेव जिस समय एक प्रख्यात लेखक के रूप में स्थापित हो चुके थे, तोलस्तोय का किसी ने नाम तक नहीं सुना था, ``उनकी `बचपन की कहानियों´ की छिटपुट चर्चा´´ अगर छोड़ दें, जैसा कि फेत कहते हैं.
मैं कल्पना कर सकता हूं कि एक युवा रचनाकार ने, जिसने सृजन की दुनिया में अभी-अभी पांव रखा था, तुर्गनेव के प्रति अपने अभ्यंतर में कितनी श्रद्धा छुपाए रखी होगी, और विशेषकर तब, जबकि तुर्गनेव मेरे पिता के अग्रज, निकोलाई, के बहुत आत्मीय थे. मैं बहुत जोर देकर और निश्चित तौर पर तो यह बात नहीं कहना चाहता, लेकिन मुझे ऐसा लगता है, कि जिस प्रकार तुर्गनेव उनके साथ `केवल मित्रता की हदों´ में ही नहीं रहना चाहते थे, ठीक वैसे ही, मेरे पिता भी ईवान सर्जेयेविच को बेहद स्नेहसिक्त श्रद्धा के भाव से देखते थे, और यही कारण था कि वे जब भी मिले असहमतियों और झगड़ों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.
मैं जो बात कह रहा हूं उसकी संपुष्टि के तौर पर यहां उस पत्र से एक उद्धरण पेश करना चाहता हूं जो बॉतविन ने उनके झगड़े के तुरंत बाद ए. ए. फेत को लिखा था. बॉतविन मेरे पिता एवं ईवान सर्जेयेविच, दोनों ही के अंतरंग मित्र थे :
मैं सोचता हूं कि तोलस्तोय की प्रकृति दरअसल बेहद भावप्रवण एवं स्नेहशील है, और वह तुर्गनेव को पूरी भावप्रवणता के साथ चाहता है, लेकिन दुर्भाग्यवश, उसके आवेगपूर्ण भावनाओं के जवाब में उसे एक सहृदय एवं सद्भावपूर्ण उदासीनता के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगता, और वह किसी कीमत पर इतने से संतोष नहीं कर सकता.
तुर्गनेव ने स्वयं कहा है कि जब वे पहली बार एक दूसरे से मिले, तो मेरे पिता उनके पीछे इस तरह भागे जैसे `प्रेम में कोई महिला´ भागती है, और एक समय वे उनसे अपना पीछा भी छुड़ाते रहे, क्योंकि वे प्रतिरोध की उनकी प्रवृत्ति से संत्रस्त थे.
परिचय के शुरुआती दौर से ही तुर्गनेव ने अपने व्यवहार में मेरे पिता के प्रति जो एक अभिभावकीय मुद्रा अपना रखी थी, उससे संभवत: वे क्षुब्ध थे, और दूसरी तरफ, तुर्गनेव को मेरे पिता की `सनक´ से चिढ़ थी, जो उन्हें `उनके सही अध्यवसाय, साहित्य´ से विलगाती थी.
1870 में, उनके बीच झगड़े के दिन के पूर्व, तुर्गनेव ने फेत को लिखा था :
``ल्यॉफ तोलस्तोय की सनक बरक़रार है. जाहिर है कि यह उसके भाग्य में ही लिखा है. वह अपनी अंतिम कलाबाज़ी कब लेगा और आखिरकार कब अपने पैरों पर सीधा खड़ा होगा ?´´
मेरे पिता की पुस्तक कॉन्फेशन के बारे में भी तुर्गनेव का दृष्टिकोण ठीक वैसा ही था. यह पुस्तक उन्होंने मेरे पिता के निधन के कुछ ही दिनों पूर्व पढ़ी थी. इसे पढ़ने, `समझने´, और `क्रोधित नहीं होने´ का वादा कर, उन्होंने इसपर अपनी प्रतिक्रिया के तौर पर `एक लंबा पत्र लिखना शुरू किया, लेकिन विवादास्पद हो जाने के डर से यह कभी पूरा नहीं हुआ.´
डी. वी. ग्रीगोरेविच को संबोधित अपने एक पत्र में तुर्गनेव ने इस पुस्तक, जो उनकी राय में मिथ्या धारणाओं पर आधारित थी, को `संपूर्ण जीवित मानव-जीवन का निषेध´ तथा एक नए प्रकार का शून्यवाद (निहीलिज्म) कहा.
ज़ाहिर है कि बावजूद इन सब के, तुर्गनेव यह बात नहीं समझ पाए कि अपने नए जीवन-दर्शन से मेरे पिता ने कितनी सलाहियत हासिल की थी, और उन्होंने इस तरह के उनके जज्बे को उनकी उसी पुरानी `सनक´ और `कलाबाजी´ की परिणति के रूप में देखा, जैसे वे उनके अन्य कार्यकलापों--स्कूल-मास्टरी, खेती-बारी, पर्चों के प्रकाशन आदि--को देखते थे.
मेरी जानकारी में, ईवान सर्जेयेविच तीन बार यास्नाया पोल्याना आए थे--अगस्त और सितंबर, 1878 में, तथा तीसरी और अंतिम बार मई, 1880 के प्रारंभ में. मुझे ये तीनों मुलाक़ातें याद हैं, हालांकि बहुत संभव है कि इनके कुछ ब्यौरे मेरी याददाश्त में अब नहीं हों.
मुझे याद है, तुर्गनेव जब पहली बार हमारे घर आने वाले थे, यह हमारे लिए एक बड़ी घटना थी, और घर में सर्वाधिक उत्तेजित और उत्साहित मेरी मां थीं. उन्होंने हमें बताया कि मेरे पिता ने तुर्गनेव के साथ झगड़ा किया था, और एक बार उन्हें द्वंद्व-युद्ध के लिए चुनौती दी थी, और यह कि वे मेरे पिता के आमंत्रण पर हमारे घर मेलमिलाप के लिए आ रहे हैं.
तुर्गनेव ने सारा समय मेरे पिता के साथ बैठ कर बिताया, और जबतक वे हमारे यहां ठहरे मेरे पिता ने अपने सारे कार्य स्थगित रखे, और एक बार दिन के मध्य में, बिलकुल अनपेक्षित घड़ी में, मेरी मां ने हमलोगों को ड्राईंग-रूम में एकत्रित किया, जहां ईवान सर्जेयेविच ने हमें अपनी कहानी द डॉग सुनाई.
मुझे याद है उनका लंबा कद, दबंग व्यक्तित्व, उनके भूरे रेशमी केश, हल्की, इत्मीनान वाली चाल, और पतली आवाज़, जो उनकी भव्य काया के अनुरूप नहीं थी, बच्चों की तरह उनकी दबी-सी हंसी. और जब वे हंसते तो उनकी आवाज़ और पतली हो जाती.
शाम के वक्त़, भोजन के बाद, हम सभी जाला में इकट्ठे हुए. उस समय यास्नाया में अंकल सर्योझा, प्रिंस लियोनिद दिमित्रियेविच उरुसॉफ, तुला प्रांत के उप-राज्यपाल--अंकल सशा बेहर्स और उनकी युवा पत्नी, खूबसूरत जॉर्जियन पैटी--और कुजमिंस्की का पूरा परिवार रह रहा था.
आंट तान्या से गाने के लिए कहा गया. अपने दिल की तेज धड़कनों के साथ हमलोगों ने उनके गीत सुने, और फिर हमें तुर्गनेव, जो एक प्रख्यात कलामर्मज्ञ थे, की प्रतिक्रिया का इंतज़ार था. सचमुच उन्होंने ईमानदारी के साथ उनके गीत की सराहना की. इसके बाद एक क्विड्रल (सामूहिक नृत्य) आयोजित हुआ. नृत्य के बीच ही अचानक, ईवान सर्जेयेविच, जो एक किनारे बैठे नृत्य देख रहे थे, अपनी जगह से उठे और वहां उपस्थित महिलाओं में से एक का हाथ थाम लिया और अपने अंगूठे वेस्टकोट की बगल में डाल कर, पेरिस नृत्यकला की आधुनिकतम शैली के अनुरूप कैन-कैन नृत्य ( फ्रांस का एक उद्दाम एवं अश्लील नृत्य ) करने लगे. हम सभी लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो गए, और सबसे अधिक तो स्वयं तुर्गनेव ही.
चाय के बाद, `बड़े लोग´ किसी वाद-विवाद में शामिल हो गए, उनके बीच कोई गर्मागरम बहस छिड़ गई. यह उरुसॉफ थे जिन्होंने सर्वाधिक ग़र्मजोशी के साथ बहस में हिस्सा लिया और तुर्गनेव के पक्ष में खड़े रहे.
तीसरी बार जब तुर्गनेव यास्नाया आए तो मुझे उस दौरान की वुडकॉक पक्षी के शिकार की एक घटना याद है. यह घटना 2 या 3 मई, 1880 की है.
हम सभी लोग वोरोन्का के उस पार के जंगल में पहुंचे--मेरे पिता, मेरी मां और सभी बच्चे. मेरे पिता ने तुर्गनेव के लिए सबसे अच्छी जगह चुनी, और स्वयं को उनसे डेढ़ सौ क़दमों की दूरी पर दूसरी तरफ़ तैनात कर लिया.
मेरी मां तुर्गनेव के पास रहीं, और हम बच्चों ने वहां से कुछ ही दूरी पर अलाव जला लिया.
मेरे पिता ने कई गोलियां दागीं और दो पक्षियों को मार गिराया. भाग्य ने ईवान सर्जेयेविच का साथ नहीं दिया, और पूरे समय उन्हें मेरे पिता के भाग्य पर रश्क होता रहा. आखिरकार, जब अंधेरा घिरने लगा, तुर्गनेव को अपने ऊपर आकाश में एक पक्षी उड़ान भरता दिखा, और उन्होंने गोली दागी.
``क्या मारा उसे ?´´ मेरे पिता ने वहीं से आवाज़ लगाकर पूछा.
``पत्थर की तरह गिरा, अपना कुत्ता भेज दो, ढूंढ़ लाने के लिए´´, ईवान सर्जेयेविच ने जवाब दिया.
मेरे पिता ने हमलोगों को कुत्ते के साथ वहां भेज दिया. तुर्गनेव ने हमें वह स्थान दिखा दिया जहां पक्षी की तलाश की जानी है, लेकिन हमारी और कुत्ते की लाख कोशिशों के बाद भी वहां कोई पक्षी नहीं मिला.
``शायद केवल उसके पंख में गोली लगी हो, और गिरने के बाद धरती पर चल कर भागने में सफल रहा हो,´´ आश्चर्य में मेरे पिता ने अनुमान लगाया, ``यह असंभव है कि यह कुत्ता ढूंढ़ने में असफल रहे, मार गिराया गया कोई भी परिंदा इसकी नज़र से बच नहीं सकता.´´
``मेरी बात मानो, मैंने अपनी आंखों से देखा, ल्यॉफ निकोलायेविच, वह पत्थर की तरह गिरा. मैंने उसे घायल नहीं किया, मैंने उसे सीधे मार गिराया. दोनों का फर्क मुझे पता है.´´
``तब कुत्ता उसे ढूंढ़ क्यों नहीं पा रहा है ? यह असंभव है... कुछ गड़बड़ है.´´
``उस बारे में मैं कुछ नहीं जानता,´´ तुर्गनेव ने जोर दे कर कहा. ``मेरा यकीन करो, मैं झूठ नहीं बोल रहा, वह पत्थर की तरह वहां गिरा, जहां मैं बता रहा हूं.´´
वुडकॉक नहीं मिला, और यह घटना एक अप्रीतिकर स्वाद छोड़ गई थी, जैसे उनमें से कोई एक तो गलत था. चाहे तो तुर्गनेव शेखी बघार रहे थे कि उन्होंने पक्षी को सीधे मार गिराया, या मेरे पिता, यह कहते हुए कि कुत्ते की नजर से मार गिराया गया कोई पक्षी बच ही नहीं सकता.
और यह भी एक ऐसे समय में घटित हो रहा था जब वे दोनों ही, हर प्रकार की ग़लतफ़हमियों से बचने के लिए चिंताकुल थे ! और यही कारण था कि सावधानीवश वे गंभीर विमर्श से परहेज़ कर रहे थे, और अपना पूरा समय उन्होंने मनोरंजन में ही बिताया था.
उस रात मेरे पिता ने हमसे गुडनाइट कहते समय दबी जुबान में कहा था कि हमें सुबह जल्द उठ कर उस जगह पर पुन: जाना है और पक्षी को ठीक से ढूंढ़ना है.
और इसका परिणाम ? वुडकॉक, नीचे गिरने के क्रम में, एक आस्पेन वृक्ष की ठीक फुनगी पर एक द्विशाख में फंस कर रह गया था, और हमलोगों ने इतना भर किया कि उसे मार कर वहां से नीचे गिराया.
जब अपनी कामयाबी से उल्लसित, हमलोगों ने इसे घर लाया तो यह एक `उत्सव´ जैसा था, और हमलोगों से भी कहीं अत्यधिक आह्लादित मेरे पिता और तुर्गनेव थे. वे दोनों ही सही साबित हुए थे, और सब कुछ का अंत दोनों ही के लिए संतोषजनक ढंग से हुआ था.
ईवान सर्जेयेविच निचली मंजिल पर मेरे पिता के अध्ययन-कक्ष में सोते थे. जब रात की बैठक स्थगित होती, तो मैं उन्हें उनके कमरे तक छोड़ने आता, और जबतक वे कपड़े बदल रहे होते, मैं बिस्तर पर बैठ जाता और उनसे शिकार आदि की बातें करता.
उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं बंदूक चला सकता हूं. मैंने कहा, हां, लेकिन मैं शूटिंग के लिए बाहर नहीं निकलता, क्योंकि मेरे पास एक सड़ियल एकनाली बंदूक के अलावा और कुछ नहीं है.
``मैं तुम्हें एक बंदूक दूंगा,´´ उन्होंने कहा. ``पेरिस में मेरे पास दो हैं, और स्वाभाविक है कि मुझे दो की आवश्यकता नहीं है. यह बंदूक बहुत महंगी नहीं है, लेकिन अच्छी है. अगली बार जब मैं रूस आऊंगा तो अपने साथ लेता आऊंगा.´´
उनकी बात सुन कर मैं अचंभित था, और उन्हें मैंने हार्दिक धन्यवाद दिया. मैं यह बात सोच कर बेहद खुश था कि मेरे पास सचमुच की एक अच्छी बंदूक होगी.
और दुर्भाग्यवश, इसके बाद वे फिर कभी रूस नहीं आए. बाद में मैंने उनके वसीयतदारों से उनकी वह बंदूक खरीदने की कोशिश की, एक अच्छी सेंट्रल-फायर बंदूक होने के कारण नहीं, बल्कि तुर्गनेव की बंदूक होने के कारण, लेकिन मुझे सफलता नहीं मिली.
इस सहज, सौहार्दपूर्ण, प्रसन्नचित्त व्यक्ति--जिसकी आंखें और हंसी बच्चों जैसी थी--के बारे में मुझे बस इतना ही याद है, और मेरे मन में उनकी जो एक छवि अंकित है, उसमें उनकी महानता की स्मृतियां उनके सहज निर्मल स्वभाव की दीप्ति में घुल जाती हैं.
1883 में मेरे पिता को ईवान सर्जेयेविच का अंतिम विदाई-पत्र मिला. यह पत्र मृत्यु-शैय्या पर पेंसिल से लिखा गया था, और मुझे याद है, कितनी भावविह्वलता के साथ मेरे पिता ने इसे पढ़ा था. और जब उनकी मृत्यु की खबर उन्हें मिली तो उन्होंने कई दिनों तक इसके अलावा कोई दूसरी बात नहीं की, और सभी जगहों से उनकी बीमारी तथा अंतिम दिनों के बारे में जानकारियां हासिल करते रहे.
तुर्गनेव के इस पत्र के संदर्भ में एक बात का ज़िक्र करना चाहूंगा, वह यह कि मेरे पिता सचमुच बिलकुल तंग आ गए थे जब उन पर `रूस की धरती के महान लेखक´ जैसे विशेषण चस्पां किए जाने लगे, जो इसी पत्र से लिए गए थे.
वे हमेशा से इस तरह के निरर्थक ठप्पे नापसंद करते थे, और इस विशेषण को वे अत्यंत भोंडा मानते थे.
``क्यों नहीं `धरती के लेखक´ ? इसके पूर्व मैंने कभी नहीं सुना कि कोई व्यक्ति किसी एक जगह का लेखक हो सकता है. लोग कुछ अर्थहीन जुमलों के दास हो जाते हैं, और उन्हें जब-तब और जहां-तहां प्रयोग में ले आया करते हैं.´´
मैंने ऊपर तुर्गनेव के कुछ पत्रों से कतिपय उद्धरण दिए हैं. इन उद्धरणों में मेरे पिता की साहित्यिक प्रतिभा की सराहना के संदर्भ में एक निरअपवाद सुसंगति दिखाई पड़ती है. दुर्भाग्यवश, यही बात मैं तुर्गनेव के प्रति अपने पिता के दृष्टिकोण के संदर्भ में नहीं कह सकता.
इस संदर्भ में भी, मेरे पिता के स्वभाव में तटस्थता का अभाव उद्घाटित होता है. व्यक्तिगत संबंध उन्हें वस्तुपरक होने से रोकते थे.
1867 में, तुर्गनेव की रचना `स्मोक´, जो उसी समय प्रकाशित हुई थी, के संदर्भ में उन्होंने फेत को लिखा :
`स्मोक´ में शायद ही किसी चीज के प्रति कोई सरोकार अभिव्यक्त हुआ है, और शायद ही इसमें कोई काव्यात्मकता है. जिस एक चीज के प्रति इसमें कोई सरोकार दिखता है, वह है हलका मजाकिया व्यभिचार, और इसलिए कहानी की काव्यात्मकता घृणास्पद है. ऐसी राय अभिव्यक्त करने में मुझे संकोच का अहसास है, क्योंकि मैं किसी ऐसे लेखक के बारे में, जिसका व्यक्तित्व मुझे नापसंद है, कोई मर्यादित निर्णय नहीं दे सकता.
1865 में, तुर्गनेव से अंतिम अलगाव के पूर्व, उन्होंने फेत को पुन: लिखा :
मुझे `एनफ´ पसंद नहीं है ! व्यक्तिगत एवं आत्मनिष्ठ निरूपन कदापि अच्छा नहीं होता, जबतक कि यह जीवंत और उन्मादपूर्ण न हो, लेकिन यहां व्यक्तिपरकता निष्प्राण वेदना से आप्लावित है.
1883 के शरत्काल में, तुर्गनेव की मृत्यु के बाद, जब पूरा परिवार सर्दियां बिताने मास्को चला गया, मेरे पिता अगाफ्या मिखाईलोव्ना के साथ यास्नाया पोल्याना में रह गए, और तुर्गनेव की रचनाएं पूरी गंभीरता से पढ़नी शुरू कीं.
उन दिनों उन्होंने मेरी मां को लिखा :
मैं लगातार तुर्गनेव के बारे में सोच रहा हूं. वे मुझे बेहद पसंद हैं, उन्हें लेकर मुझे ग्लानि है, और उन्हें पढ़ने के अलावा मैं और कुछ नहीं करता. पूरी तरह मैं उनके साथ रह रहा हूं. मैं उनपर एक व्याख्यान ज़रूर दूंगा, या पढ़े जाने के लिए एक पेपर लिखूंगा, युर्येफ को बताना.
`एनफ´ को पढ़ गया, यह सचमुच बहुत सुंदर है.
दुर्भाग्यवश, तुर्गनेव पर मेरे पिता का प्रस्तावित वह व्याख्यान कभी सामने नहीं आ पाया. अपने दिवंगत मित्र के प्रति अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित करने पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया, क्योंकि जिनके साथ वे जीवनपर्यंत झगड़ते रहे उनके प्रति उनका तटस्थ हो पाना संभव नहीं था.
मेरा उद्देश्य इस सर्व-स्वीकृत धारणा से इतर कुछ तथ्यों पर प्रकाश डालना है, और यास्नाया पोल्याना में तुर्गनेव की मुलाक़ातों की चर्चा करने के पूर्व, इन दो नेक-दिल इंसान, जिनके बीच परस्पर सौहार्दपूर्ण संबंध रहे, के बीच निरंतर मतभेद के वास्तविक कारणों को मैं यथासंभव पूरी तरह स्पष्ट करना चाहता हूं--ऐसे मतभेद जो अंतिम रूप से उनके बीच झगड़े एवं परस्पर चुनौतियों के कारण बने.
जहां तक मैं जानता हूं, मेरे पिता को अपने संपूर्ण जीवन-काल में कभी किसी अन्य व्यक्ति के साथ कोई गंभीर मतभेद नहीं हुआ. और तुर्गनेव ने 1865 में मेरे पिता को अपने पत्र में लिखा : ``आज तक केवल तुम ही एक ऐसे शख्स हो, जिसके साथ मैं ग़लतफ़हमियों का शिकार हुआ हूं.´´
मेरे पिता जब भी ईवान सर्जेयेविच के साथ अपने झगड़े का ज़िक्र करते, वे इसका सारा दोष स्वयं पर ले लेते. झगड़े के तुरंत बाद, तुर्गनेव ने पत्र लिख कर मेरे पिता से क्षमा-याचना की थी, और इस झगड़े में अपनी भूमिका को कभी सही ठहराने की कोशिश नहीं की.
तब ऐसा क्यों था--तुर्गनेव के ही शब्दों में--कि उनके और मेरे पिता के `नक्षत्र आकाश में निर्बंध विद्वेष के साथ गतिमान रहे´ ?
इस संदर्भ में मेरी बहन, तात्याना ने अपने आलेख, `तुर्गनेव´, जो 2 फरवरी, 1908 को `नोवोये व्रेम्या´ के परिशिष्ट में प्रकाशित हुआ था, में जो लिखा वह इस प्रकार है :
इनके बीच साहित्यिक प्रतिद्वंद्विता के सारे प्रश्न मुझे नितांत अप्रासंगिक लगते हैं. मेरे पिता के साहित्यिक करियर की शुरुआत से ही, तुर्गनेव उनकी प्रखर प्रतिभा को स्वीकार करते थे, और उन्होंने उनके साथ कभी प्रतिद्वंद्विता की बात नहीं सोची. उस क्षण से ही, जब 1854 में उन्होंने कोलबासिना को लिखा था कि, ``अगर ईश्वर ने उसे आयु दी, तो मुझे पूरा विश्वास है कि वह हम सभी को अचंभित कर देगा,´´ तुर्गनेव मेरे पिता की रचनाओं को दिलचस्पी के साथ पढ़ते रहे, और कभी उनकी प्रशंसा करते नहीं थके.
1856 में उन्होंने ड्रझनिन को लिखा :
``इस अंगूरी के किण्वन के बाद जो शराब तैयार होगी, वह देवताओं के पीने लायक होगी.´´
1857 में उन्होंने पोलोंस्की को लिखा :
``यह शख्स बहुत आगे जाएगा, और अपने पीछे गहरी छाप छोड़ जाएगा.´´
बावजूद इसके, किसी प्रकार, ये दोनों आपस में सामंजस्य स्थापित नहीं कर सके. मेरे पिता को लिखे तुर्गनेव के पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि अपने परिचय के आरंभिक दिनों से ही इनके बीच ग़लतफ़हमियां बराबर पैदा होती रहीं, जिन्हें पाटने तथा भूलने का प्रयास वे निरंतर करते रहे, लेकिन कुछ समय के अंतराल पर ये ग़लतफ़हमियां पुन:, कभी दूसरे रूप में भी, प्रकट हो जातीं, जिससे नए स्पष्टीकरण और तालमेल की आवश्यकता पड़ जाती.
1856 में तुर्गनेव ने मेरे पिता को लिखा :
तुम्हारा पत्र पहुंचने में कुछ समय लग गया, मेरे अज़ीज़ ल्यॉफ निकोलायेविच. पत्र के प्रारंभ में मैं यह कहना चाहता हूं कि पत्र भेजने के लिए मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूं. तुम्हारे प्रति मेरा प्यार, और तुम्हारी मित्रता का मूल्य मेरे लिए कभी खत्म नहीं होगा, हालांकि, शायद मेरी ग़लती की वजह से, हममें से किसी को भी लंबे समय तक, दूसरे की उपस्थिति में अजीबोग़रीब अहसास से गुज़रना पड़े... मैं समझता हूं कि तुम स्वयं इस स्थिति का कारण जानते हो. तुम अकेले शख्स हो जिसके साथ मैं ग़लतफ़हमियों का शिकार हुआ हूं.
इसकी वजहें इस तथ्य में निहित हैं कि मैं तुम्हारे साथ केवल मैत्री-संबंध तक सीमित रहने के लिए कभी तैयार नहीं था. मैं हमेशा इससे और आगे तथा और गहराई में जाना चाहता था, लेकिन इसकी कोशिश मैंने अत्यंत फूहड़ तरीके से की. मैंने तुम्हें उत्तेजित और परेशान कर दिया, और जब मैंने अपनी ग़लती देखी, तो शायद जल्दबाज़ी में अपने हाथ वापस खींच लिए, और इसी कारण हमारे रिश्ते में `खाई´ पैदा हुई.
लेकिन यह फूहड़ता मात्र स्थूल स्तर पर प्रकट है, इससे आगे नहीं, और अगर जब हम पुन: मिलें, और मेरी आंखों में तुम्हें वही पुरानी शरारत दिखे, तो मेरी बातों का विश्वास करो, इसकी वजह यह नहीं होगी कि मैं एक बुरा आदमी हूं. मैं तुम्हें भरोसा दिलाता हूं कि किसी और स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं है. शायद मैं यह भी जोड़ना चाहूं कि मैं उम्र में तुमसे काफ़ी बड़ा हूं, और मैं अलग रास्ते पर चला हूं..... हमारी विशिष्ट, तथाकथित `साहित्यिक´ रुचि के बाहर बहुत कम विषय हैं जिनसे हम दोनों का वास्ता है. तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व भविष्य की दिशा में हाथ फैलाए है, मेरा अतीत में निर्मित हुआ है. मेरे लिए तुम्हारा अनुसरण करना असंभव है. उसी तरह, तुम्हारे लिए भी मेरा अनुसरण करने का प्रश्न नहीं उठता. तुम मुझसे काफ़ी दूर अवस्थित हो, इसके अलावे, तुम अपने पैरों पर इतनी मज़बूती और दृढ़ता से खड़े हो कि तुम्हें किसी का शिष्य होने की जरूरत नहीं. मैं तुम्हें आश्वस्त कर सकता हूं कि मैंने तुम्हारे ऊपर कभी कोई दुर्भावना आरोपित नहीं की, मुझे कभी तुम्हारे ऊपर यह संदेह नहीं हुआ कि तुम साहित्यिक विद्वेष के शिकार हो. मुझे अक्सर ऐसा लगा है, अगर तुम मेरी इस बात को माफ़ कर सको, कि तुम्हारे पास सामान्य विवेक की कमी रही है, लेकिन अच्छाइयों की नहीं. तुम्हारी समझ इतनी पैनी है कि यह संभव नहीं कि तुम्हें इस बात का इल्म न हो कि हम दोनो में किसी के पास अगर दूसरे से ईर्ष्या करने का कारण है, तो निश्चय ही वह व्यक्ति तुम नहीं हो जिसके पास मुझसे ईर्ष्या करने का कारण हो.
आगामी वर्ष तुर्गनेव ने मेरे पिता को एक पत्र लिखा जो, मुझे लगता है, मेरे पिता के प्रति उनके दृष्टिकोण को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है :
तुम लिखते हो कि तुम्हें बेहद खुशी है कि तुमने मेरी राय नहीं मानी, और तुम एक विशुद्ध लेखक बन गए. मैं इस बात से इनकार नहीं करता, शायद तुम सही हो. फिर भी, मैं अपने मंद मस्तिष्क की कितनी भी मगज़मारी क्यों न कर लूं, मेरे लिए यह कल्पना करना मुश्किल है कि तुम अगर लेखक नहीं हो, तो आखिर हो क्या. सैनिक ? जमींदार ? दार्शनिक ? नए धार्मिक मत का संस्थापक ? लोक-सेवक ? व्यवसायी ?..... मेरी मुश्किलों का समाधान करो, और बताओ कि इनमें से कौन-सी धारणा सही है. मैं मजाक कर रहा हूं, लेकिन इन सब के बावजूद, अंतत: मैं तुम्हें अपने मार्ग पर हर तरह से अग्रसर देखना चाहता हूं.
मुझे लगता है कि तुर्गनेव ने, एक कलाकार के रूप में मेरे पिता की प्रखर साहित्यिक प्रतिभा के अतिरिक्त उनमें और कुछ नहीं देखा. वे उन्हें एक कलाकार और एक लेखक के अतिरिक्त कुछ और होने का अधिकार नहीं देना चाहते थे. किसी भी दूसरे क्षेत्र में उनकी सक्रियता से उन्हें जैसे तकलीफ़ पहुंचती थी, और वे उनसे नाराज़ हो जाते थे क्योंकि मेरे पिता ने उनकी राय नहीं मानी. वे मेरे पिता से बहुत बड़े थे. (तुर्गनेव तालस्ताय से दस वर्ष बड़े थे.) उन्हें अपनी प्रतिभा को मेरे पिता की प्रतिभा से कमतर आंकने में कोई संकोच नहीं था, लेकिन वे उनसे केवल एक चीज़ ज़रूर चाहते थे और वह यह कि वे अपने जीवन की सारी ऊर्जा साहित्यिक कार्यों को समर्पित करें. लेकिन यह क्या ! मेरे पिता उनकी उदारता और विनम्रता की कोई परवाह नहीं करते, उनकी राय नहीं सुनते और अपने उस मार्ग पर चलने की ज़िद पर अड़े होते जो उनकी फ़ितरत और अभिरुचि के अनुकूल होता. तुर्गनेव की अभिरुचियां एवं विशेषताएं मेरे पिता के बिलकुल प्रतिकूल थीं. प्रतिरोध जहां मेरे पिता को हमेशा प्रेरित करते, तुर्गनेव पर इनका असर ठीक प्रतिकूल होता.
अपनी बहन के विचारों से पूरी तरह सहमत होते हुए, मैं केवल उन्हें उनके भाई, निकोलाई निकोलायेविच, के शब्दों में व्यक्त करना चाहूंगा, जिन्होंने कहा था कि, ``तुर्गनेव के लिए इस बात को स्वीकार करना संभव नहीं हो पा रहा था कि ल्योवोचका बड़ा हो रहा है और उनके संरक्षण से स्वयं को आज़ाद कर रहा है.´´
और सच पूछें तो, तुर्गनेव जिस समय एक प्रख्यात लेखक के रूप में स्थापित हो चुके थे, तोलस्तोय का किसी ने नाम तक नहीं सुना था, ``उनकी `बचपन की कहानियों´ की छिटपुट चर्चा´´ अगर छोड़ दें, जैसा कि फेत कहते हैं.
मैं कल्पना कर सकता हूं कि एक युवा रचनाकार ने, जिसने सृजन की दुनिया में अभी-अभी पांव रखा था, तुर्गनेव के प्रति अपने अभ्यंतर में कितनी श्रद्धा छुपाए रखी होगी, और विशेषकर तब, जबकि तुर्गनेव मेरे पिता के अग्रज, निकोलाई, के बहुत आत्मीय थे. मैं बहुत जोर देकर और निश्चित तौर पर तो यह बात नहीं कहना चाहता, लेकिन मुझे ऐसा लगता है, कि जिस प्रकार तुर्गनेव उनके साथ `केवल मित्रता की हदों´ में ही नहीं रहना चाहते थे, ठीक वैसे ही, मेरे पिता भी ईवान सर्जेयेविच को बेहद स्नेहसिक्त श्रद्धा के भाव से देखते थे, और यही कारण था कि वे जब भी मिले असहमतियों और झगड़ों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.
मैं जो बात कह रहा हूं उसकी संपुष्टि के तौर पर यहां उस पत्र से एक उद्धरण पेश करना चाहता हूं जो बॉतविन ने उनके झगड़े के तुरंत बाद ए. ए. फेत को लिखा था. बॉतविन मेरे पिता एवं ईवान सर्जेयेविच, दोनों ही के अंतरंग मित्र थे :
मैं सोचता हूं कि तोलस्तोय की प्रकृति दरअसल बेहद भावप्रवण एवं स्नेहशील है, और वह तुर्गनेव को पूरी भावप्रवणता के साथ चाहता है, लेकिन दुर्भाग्यवश, उसके आवेगपूर्ण भावनाओं के जवाब में उसे एक सहृदय एवं सद्भावपूर्ण उदासीनता के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगता, और वह किसी कीमत पर इतने से संतोष नहीं कर सकता.
तुर्गनेव ने स्वयं कहा है कि जब वे पहली बार एक दूसरे से मिले, तो मेरे पिता उनके पीछे इस तरह भागे जैसे `प्रेम में कोई महिला´ भागती है, और एक समय वे उनसे अपना पीछा भी छुड़ाते रहे, क्योंकि वे प्रतिरोध की उनकी प्रवृत्ति से संत्रस्त थे.
परिचय के शुरुआती दौर से ही तुर्गनेव ने अपने व्यवहार में मेरे पिता के प्रति जो एक अभिभावकीय मुद्रा अपना रखी थी, उससे संभवत: वे क्षुब्ध थे, और दूसरी तरफ, तुर्गनेव को मेरे पिता की `सनक´ से चिढ़ थी, जो उन्हें `उनके सही अध्यवसाय, साहित्य´ से विलगाती थी.
1870 में, उनके बीच झगड़े के दिन के पूर्व, तुर्गनेव ने फेत को लिखा था :
``ल्यॉफ तोलस्तोय की सनक बरक़रार है. जाहिर है कि यह उसके भाग्य में ही लिखा है. वह अपनी अंतिम कलाबाज़ी कब लेगा और आखिरकार कब अपने पैरों पर सीधा खड़ा होगा ?´´
मेरे पिता की पुस्तक कॉन्फेशन के बारे में भी तुर्गनेव का दृष्टिकोण ठीक वैसा ही था. यह पुस्तक उन्होंने मेरे पिता के निधन के कुछ ही दिनों पूर्व पढ़ी थी. इसे पढ़ने, `समझने´, और `क्रोधित नहीं होने´ का वादा कर, उन्होंने इसपर अपनी प्रतिक्रिया के तौर पर `एक लंबा पत्र लिखना शुरू किया, लेकिन विवादास्पद हो जाने के डर से यह कभी पूरा नहीं हुआ.´
डी. वी. ग्रीगोरेविच को संबोधित अपने एक पत्र में तुर्गनेव ने इस पुस्तक, जो उनकी राय में मिथ्या धारणाओं पर आधारित थी, को `संपूर्ण जीवित मानव-जीवन का निषेध´ तथा एक नए प्रकार का शून्यवाद (निहीलिज्म) कहा.
ज़ाहिर है कि बावजूद इन सब के, तुर्गनेव यह बात नहीं समझ पाए कि अपने नए जीवन-दर्शन से मेरे पिता ने कितनी सलाहियत हासिल की थी, और उन्होंने इस तरह के उनके जज्बे को उनकी उसी पुरानी `सनक´ और `कलाबाजी´ की परिणति के रूप में देखा, जैसे वे उनके अन्य कार्यकलापों--स्कूल-मास्टरी, खेती-बारी, पर्चों के प्रकाशन आदि--को देखते थे.
मेरी जानकारी में, ईवान सर्जेयेविच तीन बार यास्नाया पोल्याना आए थे--अगस्त और सितंबर, 1878 में, तथा तीसरी और अंतिम बार मई, 1880 के प्रारंभ में. मुझे ये तीनों मुलाक़ातें याद हैं, हालांकि बहुत संभव है कि इनके कुछ ब्यौरे मेरी याददाश्त में अब नहीं हों.
मुझे याद है, तुर्गनेव जब पहली बार हमारे घर आने वाले थे, यह हमारे लिए एक बड़ी घटना थी, और घर में सर्वाधिक उत्तेजित और उत्साहित मेरी मां थीं. उन्होंने हमें बताया कि मेरे पिता ने तुर्गनेव के साथ झगड़ा किया था, और एक बार उन्हें द्वंद्व-युद्ध के लिए चुनौती दी थी, और यह कि वे मेरे पिता के आमंत्रण पर हमारे घर मेलमिलाप के लिए आ रहे हैं.
तुर्गनेव ने सारा समय मेरे पिता के साथ बैठ कर बिताया, और जबतक वे हमारे यहां ठहरे मेरे पिता ने अपने सारे कार्य स्थगित रखे, और एक बार दिन के मध्य में, बिलकुल अनपेक्षित घड़ी में, मेरी मां ने हमलोगों को ड्राईंग-रूम में एकत्रित किया, जहां ईवान सर्जेयेविच ने हमें अपनी कहानी द डॉग सुनाई.
मुझे याद है उनका लंबा कद, दबंग व्यक्तित्व, उनके भूरे रेशमी केश, हल्की, इत्मीनान वाली चाल, और पतली आवाज़, जो उनकी भव्य काया के अनुरूप नहीं थी, बच्चों की तरह उनकी दबी-सी हंसी. और जब वे हंसते तो उनकी आवाज़ और पतली हो जाती.
शाम के वक्त़, भोजन के बाद, हम सभी जाला में इकट्ठे हुए. उस समय यास्नाया में अंकल सर्योझा, प्रिंस लियोनिद दिमित्रियेविच उरुसॉफ, तुला प्रांत के उप-राज्यपाल--अंकल सशा बेहर्स और उनकी युवा पत्नी, खूबसूरत जॉर्जियन पैटी--और कुजमिंस्की का पूरा परिवार रह रहा था.
आंट तान्या से गाने के लिए कहा गया. अपने दिल की तेज धड़कनों के साथ हमलोगों ने उनके गीत सुने, और फिर हमें तुर्गनेव, जो एक प्रख्यात कलामर्मज्ञ थे, की प्रतिक्रिया का इंतज़ार था. सचमुच उन्होंने ईमानदारी के साथ उनके गीत की सराहना की. इसके बाद एक क्विड्रल (सामूहिक नृत्य) आयोजित हुआ. नृत्य के बीच ही अचानक, ईवान सर्जेयेविच, जो एक किनारे बैठे नृत्य देख रहे थे, अपनी जगह से उठे और वहां उपस्थित महिलाओं में से एक का हाथ थाम लिया और अपने अंगूठे वेस्टकोट की बगल में डाल कर, पेरिस नृत्यकला की आधुनिकतम शैली के अनुरूप कैन-कैन नृत्य ( फ्रांस का एक उद्दाम एवं अश्लील नृत्य ) करने लगे. हम सभी लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो गए, और सबसे अधिक तो स्वयं तुर्गनेव ही.
चाय के बाद, `बड़े लोग´ किसी वाद-विवाद में शामिल हो गए, उनके बीच कोई गर्मागरम बहस छिड़ गई. यह उरुसॉफ थे जिन्होंने सर्वाधिक ग़र्मजोशी के साथ बहस में हिस्सा लिया और तुर्गनेव के पक्ष में खड़े रहे.
तीसरी बार जब तुर्गनेव यास्नाया आए तो मुझे उस दौरान की वुडकॉक पक्षी के शिकार की एक घटना याद है. यह घटना 2 या 3 मई, 1880 की है.
हम सभी लोग वोरोन्का के उस पार के जंगल में पहुंचे--मेरे पिता, मेरी मां और सभी बच्चे. मेरे पिता ने तुर्गनेव के लिए सबसे अच्छी जगह चुनी, और स्वयं को उनसे डेढ़ सौ क़दमों की दूरी पर दूसरी तरफ़ तैनात कर लिया.
मेरी मां तुर्गनेव के पास रहीं, और हम बच्चों ने वहां से कुछ ही दूरी पर अलाव जला लिया.
मेरे पिता ने कई गोलियां दागीं और दो पक्षियों को मार गिराया. भाग्य ने ईवान सर्जेयेविच का साथ नहीं दिया, और पूरे समय उन्हें मेरे पिता के भाग्य पर रश्क होता रहा. आखिरकार, जब अंधेरा घिरने लगा, तुर्गनेव को अपने ऊपर आकाश में एक पक्षी उड़ान भरता दिखा, और उन्होंने गोली दागी.
``क्या मारा उसे ?´´ मेरे पिता ने वहीं से आवाज़ लगाकर पूछा.
``पत्थर की तरह गिरा, अपना कुत्ता भेज दो, ढूंढ़ लाने के लिए´´, ईवान सर्जेयेविच ने जवाब दिया.
मेरे पिता ने हमलोगों को कुत्ते के साथ वहां भेज दिया. तुर्गनेव ने हमें वह स्थान दिखा दिया जहां पक्षी की तलाश की जानी है, लेकिन हमारी और कुत्ते की लाख कोशिशों के बाद भी वहां कोई पक्षी नहीं मिला.
``शायद केवल उसके पंख में गोली लगी हो, और गिरने के बाद धरती पर चल कर भागने में सफल रहा हो,´´ आश्चर्य में मेरे पिता ने अनुमान लगाया, ``यह असंभव है कि यह कुत्ता ढूंढ़ने में असफल रहे, मार गिराया गया कोई भी परिंदा इसकी नज़र से बच नहीं सकता.´´
``मेरी बात मानो, मैंने अपनी आंखों से देखा, ल्यॉफ निकोलायेविच, वह पत्थर की तरह गिरा. मैंने उसे घायल नहीं किया, मैंने उसे सीधे मार गिराया. दोनों का फर्क मुझे पता है.´´
``तब कुत्ता उसे ढूंढ़ क्यों नहीं पा रहा है ? यह असंभव है... कुछ गड़बड़ है.´´
``उस बारे में मैं कुछ नहीं जानता,´´ तुर्गनेव ने जोर दे कर कहा. ``मेरा यकीन करो, मैं झूठ नहीं बोल रहा, वह पत्थर की तरह वहां गिरा, जहां मैं बता रहा हूं.´´
वुडकॉक नहीं मिला, और यह घटना एक अप्रीतिकर स्वाद छोड़ गई थी, जैसे उनमें से कोई एक तो गलत था. चाहे तो तुर्गनेव शेखी बघार रहे थे कि उन्होंने पक्षी को सीधे मार गिराया, या मेरे पिता, यह कहते हुए कि कुत्ते की नजर से मार गिराया गया कोई पक्षी बच ही नहीं सकता.
और यह भी एक ऐसे समय में घटित हो रहा था जब वे दोनों ही, हर प्रकार की ग़लतफ़हमियों से बचने के लिए चिंताकुल थे ! और यही कारण था कि सावधानीवश वे गंभीर विमर्श से परहेज़ कर रहे थे, और अपना पूरा समय उन्होंने मनोरंजन में ही बिताया था.
उस रात मेरे पिता ने हमसे गुडनाइट कहते समय दबी जुबान में कहा था कि हमें सुबह जल्द उठ कर उस जगह पर पुन: जाना है और पक्षी को ठीक से ढूंढ़ना है.
और इसका परिणाम ? वुडकॉक, नीचे गिरने के क्रम में, एक आस्पेन वृक्ष की ठीक फुनगी पर एक द्विशाख में फंस कर रह गया था, और हमलोगों ने इतना भर किया कि उसे मार कर वहां से नीचे गिराया.
जब अपनी कामयाबी से उल्लसित, हमलोगों ने इसे घर लाया तो यह एक `उत्सव´ जैसा था, और हमलोगों से भी कहीं अत्यधिक आह्लादित मेरे पिता और तुर्गनेव थे. वे दोनों ही सही साबित हुए थे, और सब कुछ का अंत दोनों ही के लिए संतोषजनक ढंग से हुआ था.
ईवान सर्जेयेविच निचली मंजिल पर मेरे पिता के अध्ययन-कक्ष में सोते थे. जब रात की बैठक स्थगित होती, तो मैं उन्हें उनके कमरे तक छोड़ने आता, और जबतक वे कपड़े बदल रहे होते, मैं बिस्तर पर बैठ जाता और उनसे शिकार आदि की बातें करता.
उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं बंदूक चला सकता हूं. मैंने कहा, हां, लेकिन मैं शूटिंग के लिए बाहर नहीं निकलता, क्योंकि मेरे पास एक सड़ियल एकनाली बंदूक के अलावा और कुछ नहीं है.
``मैं तुम्हें एक बंदूक दूंगा,´´ उन्होंने कहा. ``पेरिस में मेरे पास दो हैं, और स्वाभाविक है कि मुझे दो की आवश्यकता नहीं है. यह बंदूक बहुत महंगी नहीं है, लेकिन अच्छी है. अगली बार जब मैं रूस आऊंगा तो अपने साथ लेता आऊंगा.´´
उनकी बात सुन कर मैं अचंभित था, और उन्हें मैंने हार्दिक धन्यवाद दिया. मैं यह बात सोच कर बेहद खुश था कि मेरे पास सचमुच की एक अच्छी बंदूक होगी.
और दुर्भाग्यवश, इसके बाद वे फिर कभी रूस नहीं आए. बाद में मैंने उनके वसीयतदारों से उनकी वह बंदूक खरीदने की कोशिश की, एक अच्छी सेंट्रल-फायर बंदूक होने के कारण नहीं, बल्कि तुर्गनेव की बंदूक होने के कारण, लेकिन मुझे सफलता नहीं मिली.
इस सहज, सौहार्दपूर्ण, प्रसन्नचित्त व्यक्ति--जिसकी आंखें और हंसी बच्चों जैसी थी--के बारे में मुझे बस इतना ही याद है, और मेरे मन में उनकी जो एक छवि अंकित है, उसमें उनकी महानता की स्मृतियां उनके सहज निर्मल स्वभाव की दीप्ति में घुल जाती हैं.
1883 में मेरे पिता को ईवान सर्जेयेविच का अंतिम विदाई-पत्र मिला. यह पत्र मृत्यु-शैय्या पर पेंसिल से लिखा गया था, और मुझे याद है, कितनी भावविह्वलता के साथ मेरे पिता ने इसे पढ़ा था. और जब उनकी मृत्यु की खबर उन्हें मिली तो उन्होंने कई दिनों तक इसके अलावा कोई दूसरी बात नहीं की, और सभी जगहों से उनकी बीमारी तथा अंतिम दिनों के बारे में जानकारियां हासिल करते रहे.
तुर्गनेव के इस पत्र के संदर्भ में एक बात का ज़िक्र करना चाहूंगा, वह यह कि मेरे पिता सचमुच बिलकुल तंग आ गए थे जब उन पर `रूस की धरती के महान लेखक´ जैसे विशेषण चस्पां किए जाने लगे, जो इसी पत्र से लिए गए थे.
वे हमेशा से इस तरह के निरर्थक ठप्पे नापसंद करते थे, और इस विशेषण को वे अत्यंत भोंडा मानते थे.
``क्यों नहीं `धरती के लेखक´ ? इसके पूर्व मैंने कभी नहीं सुना कि कोई व्यक्ति किसी एक जगह का लेखक हो सकता है. लोग कुछ अर्थहीन जुमलों के दास हो जाते हैं, और उन्हें जब-तब और जहां-तहां प्रयोग में ले आया करते हैं.´´
मैंने ऊपर तुर्गनेव के कुछ पत्रों से कतिपय उद्धरण दिए हैं. इन उद्धरणों में मेरे पिता की साहित्यिक प्रतिभा की सराहना के संदर्भ में एक निरअपवाद सुसंगति दिखाई पड़ती है. दुर्भाग्यवश, यही बात मैं तुर्गनेव के प्रति अपने पिता के दृष्टिकोण के संदर्भ में नहीं कह सकता.
इस संदर्भ में भी, मेरे पिता के स्वभाव में तटस्थता का अभाव उद्घाटित होता है. व्यक्तिगत संबंध उन्हें वस्तुपरक होने से रोकते थे.
1867 में, तुर्गनेव की रचना `स्मोक´, जो उसी समय प्रकाशित हुई थी, के संदर्भ में उन्होंने फेत को लिखा :
`स्मोक´ में शायद ही किसी चीज के प्रति कोई सरोकार अभिव्यक्त हुआ है, और शायद ही इसमें कोई काव्यात्मकता है. जिस एक चीज के प्रति इसमें कोई सरोकार दिखता है, वह है हलका मजाकिया व्यभिचार, और इसलिए कहानी की काव्यात्मकता घृणास्पद है. ऐसी राय अभिव्यक्त करने में मुझे संकोच का अहसास है, क्योंकि मैं किसी ऐसे लेखक के बारे में, जिसका व्यक्तित्व मुझे नापसंद है, कोई मर्यादित निर्णय नहीं दे सकता.
1865 में, तुर्गनेव से अंतिम अलगाव के पूर्व, उन्होंने फेत को पुन: लिखा :
मुझे `एनफ´ पसंद नहीं है ! व्यक्तिगत एवं आत्मनिष्ठ निरूपन कदापि अच्छा नहीं होता, जबतक कि यह जीवंत और उन्मादपूर्ण न हो, लेकिन यहां व्यक्तिपरकता निष्प्राण वेदना से आप्लावित है.
1883 के शरत्काल में, तुर्गनेव की मृत्यु के बाद, जब पूरा परिवार सर्दियां बिताने मास्को चला गया, मेरे पिता अगाफ्या मिखाईलोव्ना के साथ यास्नाया पोल्याना में रह गए, और तुर्गनेव की रचनाएं पूरी गंभीरता से पढ़नी शुरू कीं.
उन दिनों उन्होंने मेरी मां को लिखा :
मैं लगातार तुर्गनेव के बारे में सोच रहा हूं. वे मुझे बेहद पसंद हैं, उन्हें लेकर मुझे ग्लानि है, और उन्हें पढ़ने के अलावा मैं और कुछ नहीं करता. पूरी तरह मैं उनके साथ रह रहा हूं. मैं उनपर एक व्याख्यान ज़रूर दूंगा, या पढ़े जाने के लिए एक पेपर लिखूंगा, युर्येफ को बताना.
`एनफ´ को पढ़ गया, यह सचमुच बहुत सुंदर है.
दुर्भाग्यवश, तुर्गनेव पर मेरे पिता का प्रस्तावित वह व्याख्यान कभी सामने नहीं आ पाया. अपने दिवंगत मित्र के प्रति अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित करने पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया, क्योंकि जिनके साथ वे जीवनपर्यंत झगड़ते रहे उनके प्रति उनका तटस्थ हो पाना संभव नहीं था.




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शैलजा सक्सेनाः आपकी पत्रिका का अप्रील अंक देखा, बहुत अच्छा लगा। इल्या तोलस्तोय के विचार और फिर लेखकों के बीच पत्राचार की श्रृंखला में आपका और निर्मल वर्मा जी के बीच पत्राचार का प्रकाशन लेखकों के मनोजगत का दर्शन कराता है। निर्मल जी के साथ हुए आपके पत्राचार से पुन: निर्मल जी की याद और उनके जाने से उत्पन्न अभाव पर मन बुझ गया। मुझे भी निर्मल जी से अपने युनिवर्सिटी के दिनों में दिल्ली युनिवर्सिटी में मिलने का अवसर मिला था। बहुत छोटी-सी गोष्ठी, केवल रिसर्च के स्टूडेंट्स और थोड़े से प्रोफेसर्स के बीच निर्मल जी का रुक-रुक कर गंभीर आवाज़ में बोलना, बहुत वर्ष बीत जाने पर सब कुछ अभी भी साकार है। मैंने भी अंतिम अरण्य के बहाने निर्मल जी पर अपने श्रद्धा-सुमन साहित्यकुंज डोट नेट के माध्यम से चढाए थे और आप की ही तरह मुझे यह अजीब संयोग लगा था कि जीवन को थाहने वाला, अपने अंतिम उपन्यास में जीवन के अरण्य से मृत्यु-जीवन का कैसा दर्शन खोज कर लाया है।
आपको पत्रिका प्रकाशन और अंक की सफ़लता पर बधाई।
योगेन्द्र जी,
तुर्ग्नेव और तोल्स्तोय के विषय में पढा़. फेत के यहां जो विवाद दोनों में हुआ था उसके विषय में तोल्स्तोय के एक जीवनीकार ’विक्टर श्लोव्स्की’ का कहना है कि उसका कारण था तोल्स्तोय की बहन और तुर्गनेव के प्रेम संबन्ध. तुर्गनेव के कारण उनकी बहन ने अपने पति से तलाक ले लिया था और उसे आशा थी कि तुर्गनेव उससे विवाह करेगें, लेकिन तुर्गनेव किसी और से विवाह करना चाहते थे और तोल्स्तोय की बहन से एक प्रकार से वह फ्लर्ट कर रहे थे. तोल्स्तोय इससे बहुत आहत थे. लगता यह बडा़ कारण था. वैसे तुर्गनेव का दॉस्तोएव्स्की के प्रति रवैय्या बहुत ही खराब था, जिसका विस्तार से मैनें अपनी पुस्तक ’दॉस्तोएव्स्की के प्रेम’ में ,जो संवाद प्रकाशन से प्रकाशित हुई है, विस्तार से किया है.
रूप सिंह चन्देल
न केवल अद्भूत बल्कि मंत्रमुग्ध के समानार्थी प्रभाव पड़ा इसे पढ़कर.
धन्यवाद एवं आभार भी आपके इस परिश्रम व योगदान के लिए.
वाकई तरसता रहता हूं इस तरह के ज्ञान व जानकारियों के लिए.
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