में नया अध्याय जोड़ती हैं : अरुण कमल
आयोजन की शुरुआत करते हुए कवि शहंशाह आलम ने कहा कि योगेंद्र कृष्णा के इस रचनात्मक साहस को वे सलाम करते हैं.
इस अवसर पर समीक्षक ओम निश्चल ने पुस्तक की अंतर्वस्तु पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आठवें दशक से ही बिहार का काव्य-परिदृश्य काफी समृद्ध हुआ है. पुस्तक में संकलित कविताओं की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इनकी कई कविताएं मूल्यों के टूटने का दर्द बयान करते हुए वर्तमान समय को रूपांतरित करती हैं. यथार्थ को बुनने का उनका एक अपना तरीका है. वे नेपथ्य की गतिविधियों को संजीदगी से दर्ज करते हैं. उन्होंने कवि की सुबह के पक्ष में, हत्यारे जब बुद्धिजीवी होते हैं, हत्यारे जब मसीहा होते हैं, बीत चुके अपने शहर में, पूर्वजों के गर्भ में ठहरा समय, कम पड़ रहीं बारूदें तथा दिल्ली में पहली बार जैसी कविताओं की विशेष चर्चा करते हुए कहा कि इन कविताओं के माध्यम से कवि अपने समय के बड़े प्रश्नों से मुठभेड़ करता दिखता है. उन्होंने कहा कि अपनी कविताओं में योगेंद्र बिलकुल ही नए एवं मौलिक मुहावरे के साथ प्रस्तुत हुए हैं. ये कविताएं इन्हें अग्रिम पंक्ति के समकालीन कवियों के बीच खड़ा करती हैं.
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि योगेंद्र कृष्णा ने अपनी हत्यारा सीरीज की कविताओं में समय की जो बारीकियां दर्ज की हैं वे बेहद दिलचस्प हैं.
समारोह का समापन कथाकार शिवदयाल ने अपने धन्यवा्द-ज्ञापण के साथ किया. इस अवसर पर रवींद्र राजहंस, कुमार मुकुल, विनय कुमार, संजय कुमार कुंदन, भगवती प्रसाद द्विवेदी, सुधीर सुमन, जावेद हसन, एम के मधु, मुसाफिर बैठा, अरुण नारायण समेत शहर के अनेक सुधी पाठक, साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी उपस्थित थे.
कुछ कविताएं बीत चुके शहर में से
वे तुम्हें ऐसे नहीं मारते
बख्श देते हैं तुम्हारी ज़िंदगी
बड़ी चालाकी से
झपट लेते हैं तुमसे
तुम्हारा वह समय
तुम्हारी वह आवाज़
तुम्हारा वह शब्द
जिसमें तुम रहते हो
तुम्हारे छोटे-छोटे सुखों का ठिकाना ढूंढ लेते हैं
ढूंढ लेते हैं
तुम्हारे छोटे-छोटे
दुखों और उदासियों के कोने
बिठा देते हैं पहरे
जहां-जहां तुम सांस लेते हो
रचते हैं झूठ
और चढ़ा लेते हैं उस पर
तुम्हारे ही समय
तुम्हारी ही आवाज़
तुम्हारे ही शब्दों के
रंग रस गंध
वे
तुम्हारे ही शब्दों से
कर देते हैं
तुम्हारी हत्या
हत्यारे जब मसीहा होते हैं
हत्यारे जब मसीहा होते हैं
वे तुम्हें ऐसे नहीं मारते...
बचा लेते हैं ढहने से
खंडहर होते तुम्हारे सपनों
की आखिरी ईंट को
किसी चमत्कार की तरह...
कि तुम इन हत्यारों में ही
देख सको
दैवी चमत्कार की
अलौकिक कोई शक्ति
तुम्हारी जर्जरित सांसों के
तार-तार होने तक
वे करते रहेंगे
और भी कई-कई चमत्कार
कि तुम उन्हें पूज सको
किसी प्राच्य देवता की तरह...
कि तुम्हारी अंतिम सांस के
स्खलित होने के ठीक पहले
उनके बारे में दिया गया
तुम्हारा ही बयान
अंततः बचा ले सके उन्हें
दरिंदगी के तमाम संगीन आरोपों से
बीत चुके अपने शहर में
तेजी से बीत चुके
अपने शहर में लौटा हूँ
और ठिठक गया हूं
उस गोरैये की तरह
जो लौटती है अपने घोंसले में
चोंच में दाना लिए
और ठिठक जाती है हवा में
घोंसले की जगह शून्य देख कर...
पंख फरफराती हुई...
इर्द-गिर्द देर तक मंडराती हुई...
नहीं मिला मुझे भी
मेरा घर
मेरा देखा-सुना शहर
मेरी खोई दुनिया का कोई सुराग...
बहुत ऊंचाई पर
लगभग हवा में टंगी
घंटा घर की वह घड़ी
ज़रूर मिली
घर लौटते हुए जिसमें मुझे
मां की प्रतीक्षारत
झुर्रियां दिखती थीं
और जिसे देख कर मैं
अपनी साईकिल की रफ़्तार
तेज या धीमी करता था
लेकिन वही घड़ी
मुंह बाए
आज पूछती है मुझसे...
किस मौसम की कौन सी तारीख है यह
इस शहर में इस वक्त
आख़िर कितना बजा है?
कुछ ही दूरी पर
मलबे से झांकता
मील का वह पत्थर भी दिखा
जिसे देख कर मैं जान जाता था
की घर अब
बस एक कोस दूर है
रास्ते का मुसाफिर बना
अपनी जगह ढूंढता
वही पत्थर
आज पूछता है मुझसे...
शहर का यह रास्ता
अब किधर जाता है?
खड़ा हूं स्तब्ध-मौन...
सामने उनके
अपने ही शहर की
तारीख, समय और
मील का पत्थर बन कर




3 comments:
सभी रचनायें बेमिसाल...
खड़ा हूं स्तब्ध-मौन...
सामने उनके
अपने ही शहर की
तारीख, समय और
मील का पत्थर बन कर
-भीतर तक झंकझोर दिया.
बेहतरीन कविताएं हैं। पूरा संग्रह पढ़ने की लालसा हो रही है।
बहुत अच्छी कविताएं हैं. संग्रह के लिए बधाई. और कविताएं डालें ब्लॉग पर, धीरे-धीरे. इंतज़ार रहेगा.
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