Saturday 8 March 2008

अमेरिकी कवि जो वेंदरौथ की कविता



प्रक्षेपित वस्तु का भार


चिकने पत्थरों ने मुझे सदैव आकर्षित किया है
वे नदी के पत्थर कहे जाते हैं, शायद,
गोकि बेहतरीन पत्थर पाए जाते हैं समंदर के किनारों पर
जहाँ चट्टानें टूट रही होती हैं, लहरें उठ रही होती हैं
गिर रही होती हैं
और तराश रही होती हैं जिन्हें तोडा है.
उदाहरण के लिए, मेन में दूर गहराई तक
एक दूसरे पर गहराई में सजे पत्थरों का किनारा है
जैसे बच्चों के मेले में सजे प्लास्टिक के गेंद
उनके आकर्षण का केन्द्र

हर रात और सुबह
उसपर पड़ता है पानी का वजन
समुद्र का भार
और वे एक दूसरे पर अपनी करवटें बदलते हैं
जबतक कि वे चिकने नहीं हो जाते
जबतक कि वे एक प्रकार की व्यवस्था के प्रति
आत्मसमर्पण नहीं कर देते--
हम इसे प्रक्षेपित वस्तु के भार की व्यवस्था कह सकते हैं.

कुछ पत्थर अंडे जैसे चिकने हैं, या रंग पट्टिका जैसे
आकार जैसा भी हो
वे उस व्यवस्था के साक्ष्य हैं
मूल सत्ता के निरंतर क्षीण होते उस स्वरूप के साक्ष्य
जिसे हम सजावटी कहते हैं

मैंने कहा अंडे की तरह, लेकिन अंडा भी कितना अजीब.
सिर्फ़ हाड़ के बने किसी जीव की कल्पना करें--
सिर्फ़ हाड़ के बने
ऐसे जीव पैदा नहीं होते,
ऐसे जीव निर्मित होते हैं.
मुझे लगता है यह संकेत करना कितना रोचक होगा कि
आदमी की कारीगरी से बिल्कुल अलग
कोई निर्माता हो सकता है
कितना संतोषप्रद है ऐसा सोचना
के समुद्र का भार
और अर्थ का भार
किसी रूप में एक दूसरे से जुड़े हैं.
शायद इस कल्पना की तह में जाना जरूरी हो.

चिकना पत्थर, एक शब्द की तरह
कृत्रिम रूप से परिष्कृत किया जाता है.
इसे इसकी जगह से उठा कर अपने हाथ में लीजिये
यह आपको अजीब लगेगा.
क्यों लगता है यह अजीब?
इसलिए कि यह बहुत असरदार है--
क्योंकि, एक शव की तरह, यह इतनी सहजतापूर्वक
अपनी निरर्थक उन्मुक्तता के साथ हमसे रू-ब-रू है.

हमारी पृथ्वी इन चिकने पत्थरों का ढेर कैसे हो सकती है?
हमारी भाषा शब्दों का ढेर कैसे हो सकती है?

लेकिन एक शव के विपरीत, चिकने पत्थर को
हाथ में महसूस करना कितना सुखद है

चिकना पत्थर एक हथियार है, और,
अगर सही आकार का हो, तो एक आकर्षक हथियार.
इतना ही नहीं, यह एक ऐसा हथियार है
जो हमें एक महान घटना की ओर ले जाता, और
महान इसलिए कि इससे जुड़ी है
एक प्रकार की प्रतिभा की भूमिका
और यह प्रक्षेपक की क्षमता प्रदर्शित करता है.

कोई भाषा, ख़ास किसी समय में,
बहुत सारे शब्दों की उपज है.
यह सागर का एक किनारा है.
गौर करें, डी डे* पर सागर के
विभिन्न किनारों के नामकरण पर :
जूनो, स्वोर्ड, ओहामा, ऊटाह, गोल्ड.
इस मानचित्र का और विस्तार करें
तो आप पृथ्वी के तमाम भाषाई किनारों से रू-ब-रू होंगे
कुछ तो एक दूसरे के इतने करीब हैं
कि परस्पर एक-दूसरे में व्याप्त हैं--
दूसरे काफ़ी दूर-दूर हैं.
हालांकि उनकी आपसी दूरियां बेमानी हैं
उनका पार्थक्य बनावटी है.

प्रत्येक किनारा चिकने पत्थर हैं
और ये पत्थर पैदा नहीं हुए हैं--
निर्मित हुए हैं.
लेकिन गौरतलब है
कि ये किसी सायकिल की तरह निर्मित नहीं हुए--
ये सायास नहीं बनाए गए हैं--
बल्कि भार से निर्मित हुए हैं,
प्रक्षेपण शक्ति से निर्मित हुए हैं,
और यह प्रक्षेपण-कर्म, दरअसल, किसी ने किया नहीं है,
कौन जाने किस प्रयोजन से.

शायद इसीलिए, जब हमपर, कोई शब्दप्रहार
ऐसे करता है जैसे वे शब्द उसके अपने हों
जैसे उन शब्दों का वजन उसका अपना हो
तो हम कितना आशंकित अचंभित हो उठते हैं

दरअसल, केवल अनाम के शब्द गुंजायमान हैं

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