Thursday 28 February 2008

स्कोतिश कवि एडविन म्यूर की कविता



एडविन म्यूर



एक बालक का मृत्युबोध


पराई अपनी दुनिया
भरता हूँ मैं तुम्हारे सितारों को
अपनी जेब में
और इस तरह विदा होता हूँ तुमसे
की मैं छोड़ सकूं तुम्हें
जा सकूं बिल्कुल जा सकूं
तमाम संदेहों के परे जा सकूं...
मेरे पिता कहते हैं
अद्भुत है यह दुनिया

तुम अति महान हो और मैं इतना बौना
मैं कुछ भी नहीं हूँ, तुम सब कुछ
इसलिए जाता हूँ मैं इस पथ पर
ओह! नहीं चाहिए मुझे उत्थान या पतन
चूँकि जब मैं बिल्कुल अचल हो जाऊंगा
तुम्हारे तमाम दिवसों से विलग हो जाऊंगा

सुना है कुछेक यादें रह जाती हैं शेष
कहीं दूसरी जगह बारिश में भीगती घास
जमीन पर खड़ी रौशनी
सागर पर बैठी धूप
चंचल सौंदर्य, कोई स्वप्निल चेहरा
लेकिन खत्म हो चुका संसार
कोई जगह नहीं रही शेष अब
जहाँ ये या इनकी परछाईयाँ भी
ठहर सकें कहीं

पिता, हे मेरे पिता
उदास, सर्द, अति सर्द सुदूर कोने से आ रही
इस हवा से डर लगता है मुझे

कौन सा घर, कैसी पकड़, कैसे हाथ हैं ये
दिखती है मुझे रिक्तता
शून्य से भरा अनंत विस्तार
इतनी विराट गोलाकार यह दुनिया
जर्जर और क्षीण हो रही...
थाम लो मेरे हाथ
ओह कसकर थामो
थामे रहो अंत के पहले तक
मैं बदल रहा

तुम्हारे हाथों मी मेरा यह हाथ
अब और नहीं बदलेगा
जबकि बदलता रहेगा तुम्हारा...

तुम यहाँ मैं वहां
और हाथ में हाथ... दो जुड़वे गम
मैं नहीं जनता था
मृत्यु
इतनी अनजान होती है



अनुवाद : योगेन्द्र कृष्णा

1 comments:

Raviratlami said...

सुंदर कविता है.
शब्द सृजन का आभार.

 
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