Thursday 28 February 2008

जर्मन कवि रॉबर्ट गर्नहार्ट की कविता



रॉबर्ट गर्नहार्ट


रसोईघर


खाने की मेज पर
बिल्कुल शांत बैठी है बिल्ली
सोचती हुई
भाप छोड़ती मछली के बारे में

आसपास पड़े हैं
तीन अदद चेरी
बिल्कुल शांत और चुपचाप

बेचैन और उद्विग्न
हो जाती है इस मौन से

रसोईघर की आलमारी में पड़ी मछली


राजी-खुशी
चिल्लाकर वह कहना चाहती है :
'ईश्वर के लिए आख़िर कुछ टू कहो'

चालाक है
इसलिए ऐसा कहती नहीं

क्योंकि अगर चिल्लाती है
ढूंढ ली जाएगी वह
और चुप रहती है अगर
जान नहीं पाएगा कोई
उसका ठिकाना

सब शांत हैं इसलिए
बिल्ली, चेरी और मछली

कराहती है
बस कभी-कभार
खाने की केवल मेज



अनुवाद : योगेन्द्र कृष्णा

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