Saturday 23 February 2008

शहंशाह आलम की कविताएँ





काठमांडू मैं गया कलकत्ता मैं घूमा

सबसे अनूठा प्रेम मैंने किया
सबसे अनोखी इच्छा मैंने की

भय को मैंने भगाया
शत्रुओं को चेताबनी मैंने दी
गहरे मौन को स्वर मैंने दिया
तोतों को मैंने पुकारा
अदृश्य को दृश्य मैंने किया

सबसे सुंदर कविता
सबसे सुंदर कोलाज
सबसे सुंदर शरीर
सबसे सुंदर चाकू
सबसे सुंदर जादू
मैंने ही तुम्हें दिया

इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति मैंने की
दर्शकों के बीच सबसे बढ़िया अभिनय मैंने किया
चुम्बन के निशान मैंने छोडे
मृत्यु को जीवन में मैंने बदला

काठमांडू मैं गया
कलकत्ता मैं घूमा
तुम्हारी हठ में मैं रहा
भोर के नभ में मैं रहा
नीले उस शंख में मैं रहा

तुम्हारे प्रेमारम्भ में
तुम्हारी स्मृतियों में
तुम्हारे शब्दों वाक्यों छंदों में
तुम्हारे देवताओं में मैं रहा

नदियों झीलों में
फुटपाथ चायखानों में
स्त्रियों के गीतों में
मैं ही दिखा



3 comments:

vipin-choudhary said...

very good poem

Anonymous said...

ाई योगेन्द्र जी ,
नमस्कार
कवितओं
वाला
आपका
खूबसूरत
ब्लॉग
बेहद
अच्छा
लगा ............
अनुवाद
और
आपकी और शहंशाह आलम की कवितायें भी पसंद आई . ...
मुबारकवाद
आपका
राजीव रंजन गिरि

गुस्ताख़ said...

शहंशाह आलम को मैंने सबसे पहले आरोह में पढ़ा था। अच्छा लगा, इतने दिनों बाद उन्हें फिर से पढ़ना..। शहंशाह का ईमेल आई डी हो तो कृपया प्रेषित करें। manjit2007@gmail.com my blog is www.gustakh.blogspot.com

 
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