Tuesday 16 August 2011

आलोक श्रीवास्तव को अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान


मास्को, 15 अगस्त। ''तुम्हारे पास आता हूं, तो सांसें भीग जाती हैं / मुहब्बत इतनी मिलती है, कि आंखें भीग जाती हैं.'' हिन्दी के जाने-माने कवि आलोक श्रीवास्तव ने अपनी यह पंक्तियां जब हिंदुस्तानियों की ओर से भारतीय साहित्य और संस्कृति के चहेते रूसियों को नज़्र कीं तो मॉस्को में आयोजित पूश्किन सम्मान समारोह में मौजूद लोगों की आंखें सचमुच भीग गईं. कार्यक्रम समाप्त हुआ तो इन पंक्तियों के साथ कई लोग देर तक भारत-रूस के पुराने-रिश्ते को याद करते रहे.

आलोक श्रीवास्तव यहां रूस का प्रतिष्ठित 'अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान' लेने आए हुए हैं. आलोक को यह सम्मान उनके चर्चित ग़ज़ल संग्रह 'आमीन' के लिए प्रसिद्ध रूसी कवि अलेक्सान्दर सेंकेविच के हाथों दिया गया. रूस का भारत मित्र समाज' पिछले बारह वर्षों से प्रतिवर्ष हिन्दी के एक प्रसिद्ध कवि या लेखक को मास्को में हिन्दी-साहित्य का यह महत्वपूर्ण सम्मान देता है. इस बार यह सम्मान भारतीय स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिया गया.

रूस में बसे भारतीयों के साथ हिंदी-रूसी भाषा के साहित्यकारों और विद्वानों की मौजूदगी में आलोक को सम्मान स्वरूप प्रख्यात रूसी कवि अलेक्सान्दर पूश्किन की पारम्परिक प्रतिमा, सम्मान-पत्र और प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया. सम्मान के अन्तर्गत आलोक दस दिन तक रूस के विभिन्न शहरों की साहित्यिक-यात्रा करेंगे और यहां प्रसिद्ध रूसी-कवियों, लेखकों और बुद्धिजीवियों से मिलेंगे. इस अवसर पर 'भारत मित्र समाज' आलोक श्रीवास्तव की प्रतिनिधि रचनाओं का रूसी भाषा में अनुवाद भी प्रकाशित करेगा. 'भारत मित्र समाज' के महासचिव अनिल जनविजय ने मॉस्को से जारी विज्ञप्ति में यह सूचना दी है.

पेशे से टीवी पत्रकार आलोक लगभग दो दशक से साहित्यिक-लेखन में सक्रिए हैं. उनकी रचनाएं हिन्दी-साहित्य की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. वर्ष 2007 में प्रकाशित उनके पहले ग़ज़ल-संग्रह 'आमीन' से उन्हें विशेष पहचान मिली. इसी पुस्तक के लिए आलोक को मप्र साहित्य अकादमी का 'दुष्यंत कुमार पुरस्कार', 'हेमंत स्मृति कविता सम्मान' और 'परम्परा ऋतुराज सम्मान' जैसे कई प्रतिष्ठित साहित्यिक-सम्मान मिल चुके हैं मगर वे हिंदी के पहले ऐसे युवा ग़ज़लकार हैं जिन्हें रूस का यह महत्वपूर्ण सम्मान दिया गया है. हिन्दी-रूसी साहित्य के मूर्धन्य कवि-लेखकों व अध्येता-विद्वानों की पांच सदस्यीय निर्णायक-समिति ने जनवरी 2011 में आलोक श्रीवास्तव को इस सम्मान के लिए चुना था.

Wednesday 27 April 2011

कोई भी ऐश्वर्य...

कोई भी ऐश्वर्य

कितना भी मोहक…

पथभ्रष्टकारी क्यों न हो

आदमी से बड़ा नहीं

पहाड़ की ऊंचाई से झरते

उस शीतल फुहार से भी बड़ा नहीं

जो एक चमत्कार की तरह

सौंपती हो हमें हमारा खोया सुकून

कितना भी बड़ा सौभाग्य

उस पेड़ जितना बड़ा नहीं

जो फलों से लद जाने पर

हमारे लिए झुक जाता हो


उस बांझ स्त्री जितना

बड़ा नहीं कोई ऐश्वर्य

जो हमसे छुपकर मंदिर मस्जिद

और मज़ारों पर हमारे लिए

संतान की सच्ची दुआएं मांगती हो


कोई भी सौभाग्य

मां की उस दृष्टि से बड़ा नहीं

जो गृहस्थ जीवन के

सारे कोलाहलों के बीच से

निकाल कर थोड़ी-सी जगह

सो रहे बच्चे को हर बार

दबे पांव निहार जाती हो


क्यों चाहिए मुझे

आसमान की ऊंचाई

स्वयं आसमान जब

मेरे ज़हन में बार-बार उतरता हो…

जिसका बूंद-बूंद पानी

धरती को ही तरसता हो…


क्यों चाहिए मुझे

पहाड़ की चोटियां

जबकि साबुत पहाड़

स्वयं हमारी नदी की सतह पर

दोपहर की रौशनी में

कांपता-लरजता हो…


क्यों चाहिए मुझे सीढियां

जो दुनियाबी रिश्तों के

अनाम समझौतों दांव-पेंच

और जद्दोजहद के बीच

बनती बिगड़ती... टूटती बिखरती हैं


क्यों चाहिए मुझे इंतज़ार

किसी चमत्कार का

जो मेरा सौभाग्य रच सके


फ़ॉस्टस की आत्मा की तरह

किसी शैतान के यहां

गिरवी नहीं हमारी आत्मा


और न ही ईकारस जितनी

महत्वाकांक्षी और आत्मघाती है

मामूली कल्पना की मेरी उड़ान


मुझे मेरी ज़मीन पर

कुछ ऐसे घटित होने दो

कि स्थगित हो जाएं

दुनिया की सारी बेतुकी उड़ानें

और सारी बदहवास ऊंचाइयां

मेरे पड़ोस में सरज़मीं हो जाएं…