Wednesday, 7 May, 2008
कविता
निरंजन श्रोत्रिय की कविता जुगलबंदी
निरंजन श्रोत्रिय की यह कविता प्रतिकूलताओं से भरे इस कठिन समय में भयावह दुर्घटनाओं और दुःस्वप्नों से उबरने के लिए एक ऐसी समन्वयकारी दृष्टि और मानवीय सौन्दर्य को प्रतिष्ठापित करती है जो क्रूरताओं और हिंसा के विरुद्ध कोमलताओं और मानवीय संवेदना की पक्षधर है।
यह कविता देश की किसी खास एक घटना के संदर्भ में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में घट रही हिंसा और अमानवीयता के विरुद्ध एक विवेकशील मानवीय प्रस्तावना है। एक गहरी मानवीय दृष्टि निरंजन की इस कविता को इस विषय पर लिखी अन्य कवियों की कविताओं से अलग करती है और इसके शिल्प को एक अद्भुत मौलिकता एवं विश्वसनीयता से लैस करती है।
हाल में निरंजन की यह कविता चर्चाओं-विवादों में रही। तब मैंने यह कविता पढी नहीं थी, लेकिन विवादों-चर्चाओं पर गौर ज़रूर किया था। आज कविता पढने के बाद तय पाता हूं कि ये विवाद बिलकुल बेमानी थे, यह निर्विवाद एक अद्भुत मौलिक कविता है, अपनी संवेदना में इतनी नाज़ुक कि अपने ही समय की कठोरता से टकराकर लहुलुहान होती हुई, और फिर अपनी ही आंतरिक ऊर्जा से उठ खडी होती हुई … यहां प्रस्तुत है आधार प्रकाशन, पंचकूला से अभी-अभी प्रकाशित उनकी काव्य-पुस्तक जुगलबंदी से यह कविता -- योगेन्द्र कृष्णा
यह कविता देश की किसी खास एक घटना के संदर्भ में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में घट रही हिंसा और अमानवीयता के विरुद्ध एक विवेकशील मानवीय प्रस्तावना है। एक गहरी मानवीय दृष्टि निरंजन की इस कविता को इस विषय पर लिखी अन्य कवियों की कविताओं से अलग करती है और इसके शिल्प को एक अद्भुत मौलिकता एवं विश्वसनीयता से लैस करती है।
हाल में निरंजन की यह कविता चर्चाओं-विवादों में रही। तब मैंने यह कविता पढी नहीं थी, लेकिन विवादों-चर्चाओं पर गौर ज़रूर किया था। आज कविता पढने के बाद तय पाता हूं कि ये विवाद बिलकुल बेमानी थे, यह निर्विवाद एक अद्भुत मौलिक कविता है, अपनी संवेदना में इतनी नाज़ुक कि अपने ही समय की कठोरता से टकराकर लहुलुहान होती हुई, और फिर अपनी ही आंतरिक ऊर्जा से उठ खडी होती हुई … यहां प्रस्तुत है आधार प्रकाशन, पंचकूला से अभी-अभी प्रकाशित उनकी काव्य-पुस्तक जुगलबंदी से यह कविता -- योगेन्द्र कृष्णा
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जुगलबंदी
(पंडित शिवकुमार शर्मा और उस्ताद शफ़ात अहमद खान की संतूर
और तबले पर जुगलबंदी से प्रेरित)
(पंडित शिवकुमार शर्मा और उस्ताद शफ़ात अहमद खान की संतूर
और तबले पर जुगलबंदी से प्रेरित)
यह कविता साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में
कथित रूप से घटित घटना के बारे में है
वह दुर्घटना जिसके बारे में कहा जाता है कि
थी वह एक काला इतिहास
एक गहरा धब्बा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर
सन् 2002 के किसी मनहूस दिन गोधरा में ।
पढ़ता हूं फोरेन्सिक विज्ञान प्रयोगशाला, अहमदाबाद की
रिपोर्ट क्रमांक 2 संदर्भ सी. आर. 9/2002 गोधरा रेलवे पुलिस स्टेशन...
मौके पर की गई जांच जिसमें दर्ज़ है पिघला हुआ लोहा, एल्यूमीनियम
उनसठ लोगों की राख का ढेर
और उसमें दबी हुई चिन्गारी
जिसने जन्म दिया था गुजरात के दावानल को।
बहुत से तथ्य, निष्कर्ष और अनुमान दर्ज़ हैं उस रिपोर्ट में
कि 60 लीटर अतिज्वलनशील तरल पदार्थ आया होगा कहां से...
कोच के पूर्वी भाग से पश्चिम की तरफ फैली होंगी लपटें
किस तरह झुलसे होंगे आदमी, औरतें और बच्चे...
रिपोर्ट में दर्ज़ है यह सब।
लेकिन जो दर्ज़ नहीं है ......वो एक तथ्य
जो रहा ओझल मीडिया की लपलपाती आंखों से
नज़रअंदाज हुआ जो प्रत्यक्षदर्शियों से
जो चूक गया गहन वैज्ञानिक परीक्षणों से भी
यह कविता साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में उस दिन
दर्ज़ किया गया वही तथ्य है......
उस दिन दो यात्री और चढ़े थे उस बोगी में अलस्सुबह
और कुल जमा पचास मिनट पच्चीस सैकण्ड की
एक अभूतपूर्व जुगलबंदी हुई थी वहां स्वर और थाप की!
एक थे पंडित शिवकुमार शर्मा
जिन्होंने खचाखच भरी बोगी में
निकालकर संतूर छेड़ दिया था राग कलावती......
सा नि सा प ध सा नि सा
सा ग रे रे ग रे ग प ग प ग रे
नि सा सा सा नि सा ध नि सा सा ग प ध प ग रे रे
नि सा ग रे नि सा नि ध प ध नि प नि सां
.....यह आलाप था.... रचना विलंबित लय रूपक ताल.....
स्ट्राइकर्स से थिरक रहा था
संतूर का एक-एक तार
थम गया था शोर डिब्बे का और सांस रोक कर
सुना जा रहा था स्वर-लहरियों को
पंडित शिवकुमार शर्मा जिनके बाल यूं ही नहीं घुंघराए थे जन्मजात
वह किसी छेड़े गये राग की संगत थी
कभी-कभार उठाते अपना सिर झटका देकर
और इस बहाने खोजते आसपास जमा स्तब्ध भीड़ में कुछ
था तो सब पूरा-पूरा लेकिन फिर भी लग रहा अधूरा.....
एक आगाज़ था..... एक शुभारंभ..... एक सूर्योदय
जिसकी पहली-पहली केसरिया किरणें
बल खा रही थीं झंकृत होकर समूचे डिब्बे में!
सा नि नि सा प नि ध नि नि प नि सा
तभी ठीक 14 मिनट 43 सैकण्ड बाद
प्रकट हुआ वह दूसरा यात्री
मुस्कराते हुए एक देवदूत की तरह
उस्ताद शफ़ात अहमद खान ……
खेल रहे थे मानो छुपा-छाई
कि देखें बच्चू कितना बजा लेते हो बगैर मेरे!!
निकाले तबले कपड़े के बैग से और
बगैर ठोंक-पीट के शुरू हो गई उंगलियां……
ति ति ना धी ना धी ना
ति ति नाना धीधी नाना धीधी नाना
ति ति नाना धध तिरकिट धध तिरकिट
ति ति नाना धध तिरकिट धध तिरकिट
ग प ग रे प नि ध ध प ग प ग रे नि सा
ति ति नाना धिधी नाना धीधी नाना
एक सुहागन जो भूली मांग भरना की सूनी मांग में
बिछ गई थी सूरज की सारी लालिमा
और दीप्त हो उठा चेहरा कलावती का एक अपरिभाषित गरिमा में
यह पहली जुगलबंदी थी संतूर और तबले की
ठीक पच्चीस मिनट बीस सैकण्ड बाद जब थमी उंगलियां
तब भी जारी थीं स्वर-लहरियां होकर परावर्तित
दीवारों और छत से डिब्बे की……
लौट रही होकर दुगनी ……पैठ चुकी थी
हर हृदय…… हर मस्तिष्क में !
चूंकि इस समय संसार का सबसे अलौकिक स्थल था एस-6
चूंकि वह नहीं था बाज़ार
इसलिये कमर्शियल ब्रेक नहीं था
शुरू हो गया संवाद फिर उंगलियों की भाषा में
सा ग प ध ग प ध प नि
ध प ग प ध प ग रे ग प
ध प नि प ग प ध प
ग रे नि सा ग रे प ग रे ग प नि ध प
धिन धिन धागे तिरकिट तूना कत्ता धागे तिरकिट धीना
धिन धिन धागे तिरकिट तूना कत्ता धागे तिरकिट धीना
ग प नि ध प ग प नि ध प ग प नि ध प
राग था कलावती ही…… रचना मध्य लय एक ताल
कोई नहीं जानता था पूर्णत्व की परिभाषा
मगर सब महसूस रहे थे कि हां ……यही है……शायद……
शायद नहीं….… बिल्कुल यही…… शत प्रतिशत!
राग कलावती…… मध्य लय एक ताल……
छेड़ रखा था पंडित शिवकुमार शर्मा ने
जो पैदा हुए जम्मू में
रचाया संगीत अपनी शिराओं में पांच वर्ष की उम्र से ही
अपने पिता पंडित उमादत्त शर्मा
और गुरु बनारस के पंडित बड़े रामदासजी की छांह में !
संतूर के साथ वह अकेला योद्धा
लड़ता रहा संगीत के पंडों और उनके दम्भ से
……इट वाज़ एन इन्टेन्सिव लोनली बैटल
अगेन्स्ट द रिजिड ऑर्थोडॉक्सी विच हैड डिक्लेयर्ड
संतूर ऐज़ टोटली अनसूटेबल टू द डिमांड ऑफ इंडियन क्लासिकल म्यूज़िक
……किसी ने कहा था!
टकराती है आंखें अचानक दोनों उस्तादों की
भरी हुई कूट भाषा से
भरने लगती है चौकड़ी कलावती
द्रुत लय तीन ताल में 16 मात्राओं के साथ
ग प सां नि ध प
प सां नि ध प ग प सां नि प
ग प नि ध सां प नि सां
ग प सां नि प ग प ग प सां
ध धिन धिन ध, ध धिन धिन ध, ध तिन तिन ता, ता धिन धिन ध
ना धिन धिन ना, ना धिन धिन ना, ना तिन तिन ना, ता धिन धिन ना
साबरमती भी क्या दौड़ रही थी
कभी तेज़ तो कभी धीमी……
कभी मध्य तो कभी द्रुत लय में
संगत बिठाती स्वरों से जो गूंज रहे थे एस-6 कोच में
पटरियां बदलते वक्त हो जाती धीमी
आवाज़ कम-से-कम कि टूटे न लय इस जुगलबंदी की !
बेसुध् थे यात्री उस कोच के
सूरदास की गोपियों की तरह
बीडीयां बुझ चुकी थीं कब की
सूख चुकी थीं पूडियां हाथों में ही
दुबक गई थी अचार की गंध एक कोने में
मांएं भूलीं ढांपना उघड़े स्तन अपने
और बच्चे छोड़कर दूध
स्वर-लोरियों के सहारे डूब चुके थे गहरी नींद में……!
अठारह मिनट पैंतालीस सैकण्ड की इस दूसरी जुगलबंदी के बाद
फिर हुआ इशारा दोनों के बीच
और बगैर अंतराल के मुड़ गई दिशा स्वर लहरियों की
रचना मिश्र खमाज…… ठुमरी अंग…… दादरा ताल……!
प ध म प ग प ध म प ग
म ध नि प नि सां नि ध ध प
धक्क धिना धिन ताक्क धिना धिन
धक्क धिना धिन ताक्क धिना धिन
साबरमती एक्सप्रेस का एस-6 कोच साक्षी था
उस अलौकिक सम्मोहन का
जब मरा हुआ चाम हो उठता है जीवित दूसरे चाम के स्पर्श से
उस्ताद शफ़ात अहमद खान……
दिल्ली घराने के कलाकार……
जिन्होंने सीखा संगीत अपने पिता एवं गुरु
छम्मा खान से
जो सिद्धहस्त थे बजाने में
चाटी का बाज…… परम्परा 18 वीं शताब्दी की जिसे रखा जीवित
इस उस्ताद ने तमाम उपेक्षाओं के बावजूद !
जुगलबंदी नहीं यह प्रार्थना थी दरअसल
कि लहलहा उठें मुरझाई फसलें
बहने लगें झरने सदियों से सूखे
भर जाएं उजास से अंधेरी सुरंगें दुनिया की
स्पंदन होने लगे पत्थरों में ।
चरम पर जब पहुंची जुगलबंदी
आंखें मुंदी और प्रार्थना में उठे हुए थे हाथ
अल्लाह ने ले लिया था सभी को अपने अमान में
देवता बरसा रहे थे फूल आकाश से एस-6 कोच पर
उन फूलों का भी ज़िक्र नहीं हैं फोरेन्सिक रिपोर्ट में !
चलती रही जुगलबंदी
समय भी था भौंचक रुका हुआ एक जगह
कि आखिर कौन कर रहा है किसकी संगत !!
यह एक काफिर और एक म्लेच्छ की जुगलबंदी थी……
जो दुनिया को एक लय में बांध लेना चाहती थी
यह जुगलबंदी एक विस्तार था उन जुगलबंदियों का……
जो खेतों-कारखानों में पसीना बहाते
पत्थर तोड़ते - मकान बनाते
क्रिकेट और हॉकी खेलते
या विवाह के मंत्रोच्चार के बीच शहनाई बजाते उस्ताद बिस्मिल्ला खान द्वारा
की जाती है ।
जुगलबंदी जो इकबाल नारायण जैसे नामों
शहंशाह अकबर के साम्राज्य
शरद जोशी, नासिरा शर्मा, अमजद अली खां और शाहरुख खान
जैसे लोगों के घरों
और अलगू चौधरी-जुम्मन शेख के
प्रगाढ़ आलिंगन में मौजूद होती है ।
तभी रुकी ट्रेन झटके से……
स्वर लहरियों ने खामोश कर दिये थे उन्मादी नारे
उतर गये दोनों योद्धा साथी गलबहियां करते
पंडित शिवकुमार शर्मा और उस्ताद शफ़ात अहमद खान
अपने हथियारों समेत
चीर कर भीड़ को करते हुए गर्जना
`नासमझो ! यह जुगलबंदी का देश है !!´
(अब क्या इसके बाद यह कहने की ज़रूरत है
इस कविता में
……कि थम गई थी भीड़ वहीं
और फेंक दिया गया था अतिज्वलनशील तरल पदार्थ
वहीं कहीं झाडियों में
……कि फरवरी 2002 की सत्ताईस तारीख को
साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में
नहीं हुआ था कोई हादसा
……कि फोरेन्सिक विज्ञान प्रयोगशाला, अहमदाबाद की
रिपोर्ट क्रमांक 2 सी आर नम्बर 9/2002 में दर्ज़ निष्कर्ष
दरअसल किसी भयानक दु:स्वप्न के हैं
दु:स्वप्न जिसे देखने के लिये अभिशप्त थे
दुनिया के तमाम लोग एक साथ
और जिसने जन्म दिया दु:स्वप्नों की एक श्रृंखला को
……कि लय, ताल, प्रेम और आनंद से ठसाठस भरी उस तरल बोगी में
जगह कहां थी किसी लपट की !!
……कि यह दु:स्वप्न एक महान रचना में प्रक्षिप्त ऐसा क्षेपक है
जिसका कोई सम्बन्ध नहीं होता मूल पाण्डुलिपि से !!)
(इस कविता के सांगीतिक पक्ष में श्री प्रवीण बिरथरे, श्री सुरेन्द्र तिवारी, आकाशवाणी, गुना एवं प्रो एच. ए. खान का सहयोग रहा)
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निरंजन श्रोत्रिय
जन्म 17 नवम्बर 1960 को उज्जैन में।
एक कहानी-संग्रह `उनके बीच का जहर तथा अन्य कहानियां´ 1987 में पराग प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित। एक कविता-संग्रह `जहां से जन्म लेते हैं पंख´ 2002 में आधर प्रकाशन, पंचकूला द्वारा प्रकाशित तथा नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में जारी। हिन्दी की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं (पहल, साक्षात्कार, वागर्थ, हंस, पल प्रतिपल, कथादेश, इंडिया टुडे, वसुधा, उद्भावना, अक्षरा, समकालीन जनमत, परिवेश, दस्तावेज, संडेमेल, संडे ऑब्जर्वर, आवेग, प्रखर, आदमी, संभवा, जनसत्ता, दैनिक हिन्दुस्तान, अहा! जिंदगी, सहारा समय, नई दुनिया, दैनिक भास्कर में कहानियां, कविताएं, आलोचना तथा निबन्ध प्रकाशित। नव साक्षरों के लिये पर्यावरण की पुस्तक का लेखन। देश के अनेक महत्वपूर्ण कथा-कविता समारोहों में शिरकत।
जीवन और साहित्य के प्रगतिशील मूल्यों में आस्था। अनेक कविताएं अंग्रेजी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित। हाल ही में साम्प्रदायिक सद्भाव पर `पहल´ में प्रकाशित कविता `जुगलबंदी´ चर्चा के केन्द्र में रही। रेखांकन का शौक। 1984 में अन्तरजातीय विवाह।
सम्मान: 1998 में अभिनव कला परिषद, भोपाल द्वारा `शब्द शिल्पी सम्मान´ ।
सम्प्रति: शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गुना में वनस्पति शास्त्र विभाग के प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष।
सम्पर्क: `विन्यास´, कैन्ट रोड, गुना- 473 001 (मध्य प्र)
दूरभाष: (07542) 254734 मोबाइल: 98270 07736
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Thursday, 1 May, 2008
समीक्षा

रमेशचंद्र शाह
दूर देखती आंखें :
अनुवाद में बारीक मानवीय संवेदनाएं
योगेन्द्र कृष्णा
रमेशचंद्र शाह उन गिने-चुने सम्मानित-पुरस्कृत वरिष्ठ साहित्यकारों में से एक हैं जिनके रचनाकर्म में बारीक अनुभूतियां केंद्रीय भूमिका में होती हैं. विशेषकर काव्य विधा में ये बारीक संवेदनाएं अर्थवत्ता के कई-कई स्तरों पर उद्घाटित होती हैं, जिन्हें हम अपनी-अपनी संवेदनशीलता एवं आस्वाद-क्षमता के आधार पर अलग-अलग स्तरों पर पकड़ पाते हैं. क्या यही कारण नहीं है कि वर्षों पूर्व पढ़ी गई कोई उत्कृष्ट कृति बाद के वर्षों में पढ़े जाने पर पहले से कहीं अधिक स्तरों पर खुलती प्रतीत होती हैं? यह बात गद्य से कहीं अधिक काव्य के संदर्भ में महसूस की जाती रही है.
काव्यानुवाद में मूल संवेदनाओं की बारीकियों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित कर पाना मूल रचनाकर्म से भी कहीं अधिक गंभीर, चुनौतीपूर्ण एवं जोखिम भरा कर्म है. रमेशचंद्र शाह ने विश्व कविता संचयन दूर देखती आंखें की कविताओं के अनुवाद में, बल्कि पुनर्सृजन में, यह जोखिम बखूबी उठाया है. हिंदी में बहुत कम ऐसे काव्यानुवाद पढने को मिले हैं जिनमें मूल कविताओं के आंतरिक लय को भी अक्षुण्ण रखने का सफल प्रयास दिखता हो. कवि के इस संचयन पर कुछ लिखने में मुझे इसलिए भी समय की कुछ छूट लेनी पड़ गई कि मैं हिंदी में अनूदित इनमें से अधिकतर कविताओं को, विशेषकर आसानी से उपलब्ध ब्रिटिश कविताओं को मूल में पढ़ना चाहता था. इसलिए भी कि साहित्य की किसी भी विधा में अनुवाद की समीक्षा मूल रचना को बिना पढ़े शायद संभव नहीं है.
संभव है कविता के कुछ सुधी पाठक दूर देखती आंखें की कविताओं से पूर्व से परिचित हों. क्योंकि इनमें से अधिकतर कविताएं पहली बार विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं. लेकिन आज एक जगह संकलित होने के बाद इन कविताओं ने अगर एक खास प्रकार की तारतम्यता एवं नैरन्तर्य हासिल कर ली हैं तो यह आकिस्मक नहीं है. विभिन्न देशों से अनुवाद के लिए इन कविताओं--जिनमें ब्रिटिश, कोरियाई, श्रीलंकाई एवं जापानी कविताएं शामिल हैं--के चयन में एक आंतरिक प्रवाह और संगति दिखती है. बाहर से, स्थूल एवं भौगोलिक स्तर पर, अलग-थलग दिखती इन रचनाओं में बारीक मानवीय संवेदना एवं ऊष्मा की एक सार्वभौमिक अंतर्धारा शुरू से अंत तक प्रवाहित है. और सभ्यताओं-संस्कृतियों के आर-पार जातीं ये कविताएं सिर्फ दूर ही नहीं, गहराई में भी देखती हैं.
विभिन्न देशों की कुछ कविताओं के उद्धरण यहां दृष्टव्य हैं जो विषय की विविधता के बावजूद मूल संवेदना में कितनी जीवनोन्मुख एवं एकात्म दिखती हैं :
टहल रहे हम साथ आज, मैं, मेरी बिटिया
कितनी उजली पकड़ हाथ की उसके पूरे
मेरी इस उंगली पर
आजीवन आलोक-वलय यह
इस हड्डी के गिर्द करूंगा अनुभव मैं, जब
हो जाएगी बड़ी--आज से दूर, कि जैसे
दूर देखती आंखें उसकी अभी, आज ही
(अपनी बेटी के लिए / स्तेफान स्पेंडर)
रात यहां चुपचाप पड़ी है घर में
जहां पुरानी सभी आहटें, भूली बिसरी
निश्चल पड़ी हुई हैं जैसे किसी झील में डूबे पत्ते
बेकाबू है रात वही, पर बाहर
(जाड़े की एक रात / टोमास ट्रांसटोमर)
छाया है भारी शरीर से
चलते हैं हम इसीलिए तो, सिर लटकाए
गाते हुए गीत आदमी की चीजों के
नमक लहू में घोल, आंसुओं में भी शक्कर
प्यार आदमी से करना है सबसे अधिक अकेला होना
(पीड़ा का त्यौहार / चांग ह्यांग जांग)
जब तक उगा नहीं है वह दिन
जाना ही है मुझे छोड़ कर तुम्हें यहां पर
क्योंकि अंधेरे कोने में उस तंग गली के
इंतजार करते वे मेरा--जाना ही होगा अब मुझको
उनकी आग बुझाने
(एक अनाथ बालिका के प्रति / डब्लू ए अबेसिंघे)
इन कविताओं से गुजरते हुए हम एक ओर जहां अपने जीवन की आंतरिक दुनियाओं के यथार्थ और उनकी कोमलताओं से रू-ब-रू होते हैं, वहीं दूसरी ओर लौकिक जीवन की स्थूल हकीकतों से भी टकराते हैं. जीवन को सही अर्थों में जीने के लिए आवश्यक सच्चे प्रेम, सौन्दर्य और भावोन्माद की ऊष्माएं यहां अपने सारे उपादानों के साथ मौजूद हैं. यहां आकाश और तारे तथा स्वप्न और आकांक्षाएं ही नहीं, देह और देहातीत सुख-दुख की स्मृतियों के बारीक रेशे तथा आकाश और पृथ्वी में खुलती खिड़कियां भी हैं.
उजली रेत पर साथ-साथ लेटे
हम देखा किए देर तक
ढलती हुई सांझ को...
(उत्सव / कोलिन फॉल्क)
सुबह-सुबह चिड़ियां आके भंग कर देती हैं
हमारा आलिंगन
कुछ इस तरह आती हैं वे पेश हमारे साथ
मानो हम बच्चे हों--निहायत अबोध
जैसे उन्हें पता हो कि इसका अंत होना है
आखिरकार आंसुओं में...
(सुबह-सुबह / ह्यूगो विलियम्स)
जैसे धूप-तपा पत्थर हो भरा मुट्ठी में
खड़ा पेड़ के नीचे गोताखोर गगन का.
भंवरजाल को चीर मृत्यु के आर-पार भी
क्या प्रकाश का छत्र तनेगा उस के ऊपर?
(जाड़े की एक रात / टोमास ट्रांसटोमर)
संकलन की इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें पढ़ते हुए हमें क्षण भर के लिए भी यह अहसास नहीं होता कि हम इन्हें अनुवाद में पढ़ रहे हैं--इस हद तक कि अगर ये कविताएं हमारे सामने अनुवाद के रूप में नहीं परोसी गई होतीं तो हम इन्हें मूल कविताओं की तरह पढ़ रहे होते.
विदेशी भाषा में रची गई किसी कविता को पढ़ कर उसे अपनी भाषा में अनूदित करने की प्रेरणा कब और क्यों होती है? यह कैसा मानव-मर्म है जो सभ्यताओं-संस्कृतियों के आर-पार कौंध जाता है और इसी कारण हमारी अपनी आवाज में, हमारी अपनी बोली-बानी में भी प्रगट होने की मांग करता है? इन प्रश्नों के संदर्भ में बहुत सारे कारण गिनाए जा सकते हैं, लेकिन अगर दूर देखती आंखें के संदर्भ में इन प्रश्नों को देखा जाए तो यह इन रचनाओं को कवि-अनुवादक द्वारा आत्मसात करने की प्रक्रिया भर नहीं प्रतीत होती, बल्कि इससे भी बहुत दूर, भावप्रवण एवं प्रांजल आत्माभिव्यक्ति तक जाती रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में कौंधती है. शायद इसलिए भी अनुवाद इतना जीवंत और रचनात्मक रूप से मौलिक बन पाया है.
अधिकतर उत्कृष्ट कविताएं अपने होने में ही अपनी सार्थकता अर्जित कर लेती हैं. उन्हें व्याख्यायित-रूपायित करना उनके होने को, उनके आस्वाद को सीमित करने, और कभी-कभी तो विरूपित करने जैसा उपक्रम हो जाता है. इसलिए कि अच्छी कविताओं का कोई अर्थात नहीं होता. और आप पाएंगे कि इस संकलन की भी अधिकांश कविताएं अपने होने के लिए किसी अर्थात पर निर्भर नहीं हैं. आलोचक एफ. आर. लीविस ने भी कहा था कि कविता में शब्द हमें सोचने के लिए या निर्णय सुनाने के लिए आमंत्रित नहीं करते, बल्कि वे छूने, टटोलने, स्पर्श करने, कुछ रचने के लिए बुलाते हैं. रमेशचंद्र शाह ने इन कविताओं के आमंत्रण को स्वीकार किया है, इन्हें छू कर, टटोल कर, स्पर्श कर कुछ अद्बुत रचा है. आप भी अब इन्हें अपनी भाषा में छू-टटोल सकते हैं.
प्यार नहीं कर सकते कविता को कविता से
किसे भला प्यार तब करोगे तुम कविता से?
कोई नहीं देखता है बर्फ को, जो गिरती है रात में
कोई नहीं चलता है उस पर : पगचापहीन
वह है वहां : नीरव, स्वच्छ
सुन्दर अपने आप में.
(कविता खाली कविता / चांग ह्यांग जांग)
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दूर देखती आंखें ( विश्व कविता से एक चयन )
अनुवाद : रमेशचंद्र शाह
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग, बीकानेर
पृष्ठ : 95
मूल्य : 125 रु. ( सजिल्द )
योगेन्द्र कृष्णा
रमेशचंद्र शाह उन गिने-चुने सम्मानित-पुरस्कृत वरिष्ठ साहित्यकारों में से एक हैं जिनके रचनाकर्म में बारीक अनुभूतियां केंद्रीय भूमिका में होती हैं. विशेषकर काव्य विधा में ये बारीक संवेदनाएं अर्थवत्ता के कई-कई स्तरों पर उद्घाटित होती हैं, जिन्हें हम अपनी-अपनी संवेदनशीलता एवं आस्वाद-क्षमता के आधार पर अलग-अलग स्तरों पर पकड़ पाते हैं. क्या यही कारण नहीं है कि वर्षों पूर्व पढ़ी गई कोई उत्कृष्ट कृति बाद के वर्षों में पढ़े जाने पर पहले से कहीं अधिक स्तरों पर खुलती प्रतीत होती हैं? यह बात गद्य से कहीं अधिक काव्य के संदर्भ में महसूस की जाती रही है.
काव्यानुवाद में मूल संवेदनाओं की बारीकियों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित कर पाना मूल रचनाकर्म से भी कहीं अधिक गंभीर, चुनौतीपूर्ण एवं जोखिम भरा कर्म है. रमेशचंद्र शाह ने विश्व कविता संचयन दूर देखती आंखें की कविताओं के अनुवाद में, बल्कि पुनर्सृजन में, यह जोखिम बखूबी उठाया है. हिंदी में बहुत कम ऐसे काव्यानुवाद पढने को मिले हैं जिनमें मूल कविताओं के आंतरिक लय को भी अक्षुण्ण रखने का सफल प्रयास दिखता हो. कवि के इस संचयन पर कुछ लिखने में मुझे इसलिए भी समय की कुछ छूट लेनी पड़ गई कि मैं हिंदी में अनूदित इनमें से अधिकतर कविताओं को, विशेषकर आसानी से उपलब्ध ब्रिटिश कविताओं को मूल में पढ़ना चाहता था. इसलिए भी कि साहित्य की किसी भी विधा में अनुवाद की समीक्षा मूल रचना को बिना पढ़े शायद संभव नहीं है.
संभव है कविता के कुछ सुधी पाठक दूर देखती आंखें की कविताओं से पूर्व से परिचित हों. क्योंकि इनमें से अधिकतर कविताएं पहली बार विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं. लेकिन आज एक जगह संकलित होने के बाद इन कविताओं ने अगर एक खास प्रकार की तारतम्यता एवं नैरन्तर्य हासिल कर ली हैं तो यह आकिस्मक नहीं है. विभिन्न देशों से अनुवाद के लिए इन कविताओं--जिनमें ब्रिटिश, कोरियाई, श्रीलंकाई एवं जापानी कविताएं शामिल हैं--के चयन में एक आंतरिक प्रवाह और संगति दिखती है. बाहर से, स्थूल एवं भौगोलिक स्तर पर, अलग-थलग दिखती इन रचनाओं में बारीक मानवीय संवेदना एवं ऊष्मा की एक सार्वभौमिक अंतर्धारा शुरू से अंत तक प्रवाहित है. और सभ्यताओं-संस्कृतियों के आर-पार जातीं ये कविताएं सिर्फ दूर ही नहीं, गहराई में भी देखती हैं.
विभिन्न देशों की कुछ कविताओं के उद्धरण यहां दृष्टव्य हैं जो विषय की विविधता के बावजूद मूल संवेदना में कितनी जीवनोन्मुख एवं एकात्म दिखती हैं :
टहल रहे हम साथ आज, मैं, मेरी बिटिया
कितनी उजली पकड़ हाथ की उसके पूरे
मेरी इस उंगली पर
आजीवन आलोक-वलय यह
इस हड्डी के गिर्द करूंगा अनुभव मैं, जब
हो जाएगी बड़ी--आज से दूर, कि जैसे
दूर देखती आंखें उसकी अभी, आज ही
(अपनी बेटी के लिए / स्तेफान स्पेंडर)
रात यहां चुपचाप पड़ी है घर में
जहां पुरानी सभी आहटें, भूली बिसरी
निश्चल पड़ी हुई हैं जैसे किसी झील में डूबे पत्ते
बेकाबू है रात वही, पर बाहर
(जाड़े की एक रात / टोमास ट्रांसटोमर)
छाया है भारी शरीर से
चलते हैं हम इसीलिए तो, सिर लटकाए
गाते हुए गीत आदमी की चीजों के
नमक लहू में घोल, आंसुओं में भी शक्कर
प्यार आदमी से करना है सबसे अधिक अकेला होना
(पीड़ा का त्यौहार / चांग ह्यांग जांग)
जब तक उगा नहीं है वह दिन
जाना ही है मुझे छोड़ कर तुम्हें यहां पर
क्योंकि अंधेरे कोने में उस तंग गली के
इंतजार करते वे मेरा--जाना ही होगा अब मुझको
उनकी आग बुझाने
(एक अनाथ बालिका के प्रति / डब्लू ए अबेसिंघे)
इन कविताओं से गुजरते हुए हम एक ओर जहां अपने जीवन की आंतरिक दुनियाओं के यथार्थ और उनकी कोमलताओं से रू-ब-रू होते हैं, वहीं दूसरी ओर लौकिक जीवन की स्थूल हकीकतों से भी टकराते हैं. जीवन को सही अर्थों में जीने के लिए आवश्यक सच्चे प्रेम, सौन्दर्य और भावोन्माद की ऊष्माएं यहां अपने सारे उपादानों के साथ मौजूद हैं. यहां आकाश और तारे तथा स्वप्न और आकांक्षाएं ही नहीं, देह और देहातीत सुख-दुख की स्मृतियों के बारीक रेशे तथा आकाश और पृथ्वी में खुलती खिड़कियां भी हैं.
उजली रेत पर साथ-साथ लेटे
हम देखा किए देर तक
ढलती हुई सांझ को...
(उत्सव / कोलिन फॉल्क)
सुबह-सुबह चिड़ियां आके भंग कर देती हैं
हमारा आलिंगन
कुछ इस तरह आती हैं वे पेश हमारे साथ
मानो हम बच्चे हों--निहायत अबोध
जैसे उन्हें पता हो कि इसका अंत होना है
आखिरकार आंसुओं में...
(सुबह-सुबह / ह्यूगो विलियम्स)
जैसे धूप-तपा पत्थर हो भरा मुट्ठी में
खड़ा पेड़ के नीचे गोताखोर गगन का.
भंवरजाल को चीर मृत्यु के आर-पार भी
क्या प्रकाश का छत्र तनेगा उस के ऊपर?
(जाड़े की एक रात / टोमास ट्रांसटोमर)
संकलन की इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें पढ़ते हुए हमें क्षण भर के लिए भी यह अहसास नहीं होता कि हम इन्हें अनुवाद में पढ़ रहे हैं--इस हद तक कि अगर ये कविताएं हमारे सामने अनुवाद के रूप में नहीं परोसी गई होतीं तो हम इन्हें मूल कविताओं की तरह पढ़ रहे होते.
विदेशी भाषा में रची गई किसी कविता को पढ़ कर उसे अपनी भाषा में अनूदित करने की प्रेरणा कब और क्यों होती है? यह कैसा मानव-मर्म है जो सभ्यताओं-संस्कृतियों के आर-पार कौंध जाता है और इसी कारण हमारी अपनी आवाज में, हमारी अपनी बोली-बानी में भी प्रगट होने की मांग करता है? इन प्रश्नों के संदर्भ में बहुत सारे कारण गिनाए जा सकते हैं, लेकिन अगर दूर देखती आंखें के संदर्भ में इन प्रश्नों को देखा जाए तो यह इन रचनाओं को कवि-अनुवादक द्वारा आत्मसात करने की प्रक्रिया भर नहीं प्रतीत होती, बल्कि इससे भी बहुत दूर, भावप्रवण एवं प्रांजल आत्माभिव्यक्ति तक जाती रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में कौंधती है. शायद इसलिए भी अनुवाद इतना जीवंत और रचनात्मक रूप से मौलिक बन पाया है.
अधिकतर उत्कृष्ट कविताएं अपने होने में ही अपनी सार्थकता अर्जित कर लेती हैं. उन्हें व्याख्यायित-रूपायित करना उनके होने को, उनके आस्वाद को सीमित करने, और कभी-कभी तो विरूपित करने जैसा उपक्रम हो जाता है. इसलिए कि अच्छी कविताओं का कोई अर्थात नहीं होता. और आप पाएंगे कि इस संकलन की भी अधिकांश कविताएं अपने होने के लिए किसी अर्थात पर निर्भर नहीं हैं. आलोचक एफ. आर. लीविस ने भी कहा था कि कविता में शब्द हमें सोचने के लिए या निर्णय सुनाने के लिए आमंत्रित नहीं करते, बल्कि वे छूने, टटोलने, स्पर्श करने, कुछ रचने के लिए बुलाते हैं. रमेशचंद्र शाह ने इन कविताओं के आमंत्रण को स्वीकार किया है, इन्हें छू कर, टटोल कर, स्पर्श कर कुछ अद्बुत रचा है. आप भी अब इन्हें अपनी भाषा में छू-टटोल सकते हैं.
प्यार नहीं कर सकते कविता को कविता से
किसे भला प्यार तब करोगे तुम कविता से?
कोई नहीं देखता है बर्फ को, जो गिरती है रात में
कोई नहीं चलता है उस पर : पगचापहीन
वह है वहां : नीरव, स्वच्छ
सुन्दर अपने आप में.
(कविता खाली कविता / चांग ह्यांग जांग)
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दूर देखती आंखें ( विश्व कविता से एक चयन )
अनुवाद : रमेशचंद्र शाह
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग, बीकानेर
पृष्ठ : 95
मूल्य : 125 रु. ( सजिल्द )
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रमेशचंद्र शाह
जन्म : 1937, अलमोड़ा
इलाहाबाद वि वि से बी एससी तथा आगरा से एम ए, पीएच डी
1997 में हमीदिया महाविद्यालय (भोपाल) से अंगरेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद दिसबर, 2000 तक निराला सृजनपीठ (भोपाल) के निदेशक रहे
जन्म : 1937, अलमोड़ा
इलाहाबाद वि वि से बी एससी तथा आगरा से एम ए, पीएच डी
1997 में हमीदिया महाविद्यालय (भोपाल) से अंगरेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद दिसबर, 2000 तक निराला सृजनपीठ (भोपाल) के निदेशक रहे
सम्मान-पुरस्कार : उपन्यास पूर्वापर भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, तथा गोबरगणेश हिंदी सस्थान उत्तर प्रदेश तथा मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा पुरस्कृत। मध्यप्रदेश सस्कृति विभाग द्वारा शिखर सम्मान तथा के के बिड़ला फ़ाउंडेशन द्वारा व्यास सम्मान।
उपन्यास : गोबरगणेश, किस्सा गुलाम, पूर्वापर, आखिरी दिन, पुनर्वास तथा आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू
कहानी संग्रह : जंगल में आग, मुहल्ले का रावण, मानपत्र, थिएटर, प्रतिनिधि कहानियां (राजकमल पेपरबैक)
कविता संग्रह : कछुए की पीठ पर, हरिश्चंद्र आओ, नदी भागती आई, प्यारे मुचकुंद को, देखते हैं शब्द भी अपना समय, चाक पर समय (प्रतिनिधि कविताओं का संचयन, वाग्देवी पाकेट बुक्स)
निबंध संग्रह : रचना के बदले, शैतान के बहाने, आडू का पेड़, पढते-पढते, स्वधर्म और कालगति तथा हिंदी की दुनिया में
यात्रा-संस्मरण : एक लंबी छांह
साक्षात्कार : मेरे साक्षात्कार
समालोचना : छायावाद की प्रासंगिकता, समानांतर, सबद निरंतर, वागर्थ, भूलने के विरुद्ध, वागर्थ का वैभव, जयशंकर प्रसाद, आलोचना का पक्ष, समय संवादी
नाटक : मारा जाई खुसरो, मटियाबुर्ज
अनुवाद : छंद और पक्षी (कैथलीन रैन की कविताओं का हिंदी रूपांतर)
अंगरेज़ी में
येट्स ऐंड एलिएट, पर्सपेक्टिव्ज़ आन इंडिआ, टुवड्ज़ अ फिलोसफी आव इमैजिनेशन : फोर लेक्चर्स डेलिवर्ड इन टेमेनोस एकेडमी, लंदन
येट्स ऐंड एलिएट, पर्सपेक्टिव्ज़ आन इंडिआ, टुवड्ज़ अ फिलोसफी आव इमैजिनेशन : फोर लेक्चर्स डेलिवर्ड इन टेमेनोस एकेडमी, लंदन
संपर्क : एम-4, निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल 462003
Saturday, 26 April, 2008
विरासत
तुर्गनेव और तोलस्तोय
दो महान हस्तियों के बीच की टकराहटें
तोलस्तोय के पुत्र इल्या तोलस्तोय के संस्मरण
दो महान हस्तियों के बीच की टकराहटें
तोलस्तोय के पुत्र इल्या तोलस्तोय के संस्मरण
अनुवाद : योगेंद्र कृष्णा

मेरे पिता और तुर्गनेव के बीच जो ग़लतफ़हमियां थीं, और जो 1861 में उनके बीच संपूर्ण अलगाव का सबब बनीं, उन सब को याद करना यहां मेरा प्रयोजन नहीं है. इस कहानी के वास्तविक वाह्य तथ्य सार्वजनिक हो चुके हैं, और उनका यहां पुन: उल्लेख करना आवश्यक नहीं है. (फेत, जिनके घर में इन दोनों के बीच झगड़ा हुआ था, ने अपने संस्मरण में इस बारे में विस्तार से लिखा है. तोलस्तोय ने तुर्गनेव की पुत्री के संदर्भ में नारीसुलभ उदारता पर दुराग्रहपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया था. तुर्गनेव ने आवेश में आकर उनके कान उमेठने की चेतावनी दी थी. इस पर तोलस्तोय ने उन्हें द्वंद्व-युद्ध के लिए ललकारा, और तुर्गनेव ने क्षमा-याचना कर ली.)
मेरा उद्देश्य इस सर्व-स्वीकृत धारणा से इतर कुछ तथ्यों पर प्रकाश डालना है, और यास्नाया पोल्याना में तुर्गनेव की मुलाक़ातों की चर्चा करने के पूर्व, इन दो नेक-दिल इंसान, जिनके बीच परस्पर सौहार्दपूर्ण संबंध रहे, के बीच निरंतर मतभेद के वास्तविक कारणों को मैं यथासंभव पूरी तरह स्पष्ट करना चाहता हूं--ऐसे मतभेद जो अंतिम रूप से उनके बीच झगड़े एवं परस्पर चुनौतियों के कारण बने.
जहां तक मैं जानता हूं, मेरे पिता को अपने संपूर्ण जीवन-काल में कभी किसी अन्य व्यक्ति के साथ कोई गंभीर मतभेद नहीं हुआ. और तुर्गनेव ने 1865 में मेरे पिता को अपने पत्र में लिखा : ``आज तक केवल तुम ही एक ऐसे शख्स हो, जिसके साथ मैं ग़लतफ़हमियों का शिकार हुआ हूं.´´
मेरे पिता जब भी ईवान सर्जेयेविच के साथ अपने झगड़े का ज़िक्र करते, वे इसका सारा दोष स्वयं पर ले लेते. झगड़े के तुरंत बाद, तुर्गनेव ने पत्र लिख कर मेरे पिता से क्षमा-याचना की थी, और इस झगड़े में अपनी भूमिका को कभी सही ठहराने की कोशिश नहीं की.
तब ऐसा क्यों था--तुर्गनेव के ही शब्दों में--कि उनके और मेरे पिता के `नक्षत्र आकाश में निर्बंध विद्वेष के साथ गतिमान रहे´ ?
इस संदर्भ में मेरी बहन, तात्याना ने अपने आलेख, `तुर्गनेव´, जो 2 फरवरी, 1908 को `नोवोये व्रेम्या´ के परिशिष्ट में प्रकाशित हुआ था, में जो लिखा वह इस प्रकार है :
इनके बीच साहित्यिक प्रतिद्वंद्विता के सारे प्रश्न मुझे नितांत अप्रासंगिक लगते हैं. मेरे पिता के साहित्यिक करियर की शुरुआत से ही, तुर्गनेव उनकी प्रखर प्रतिभा को स्वीकार करते थे, और उन्होंने उनके साथ कभी प्रतिद्वंद्विता की बात नहीं सोची. उस क्षण से ही, जब 1854 में उन्होंने कोलबासिना को लिखा था कि, ``अगर ईश्वर ने उसे आयु दी, तो मुझे पूरा विश्वास है कि वह हम सभी को अचंभित कर देगा,´´ तुर्गनेव मेरे पिता की रचनाओं को दिलचस्पी के साथ पढ़ते रहे, और कभी उनकी प्रशंसा करते नहीं थके.
1856 में उन्होंने ड्रझनिन को लिखा :
``इस अंगूरी के किण्वन के बाद जो शराब तैयार होगी, वह देवताओं के पीने लायक होगी.´´
1857 में उन्होंने पोलोंस्की को लिखा :
``यह शख्स बहुत आगे जाएगा, और अपने पीछे गहरी छाप छोड़ जाएगा.´´
बावजूद इसके, किसी प्रकार, ये दोनों आपस में सामंजस्य स्थापित नहीं कर सके. मेरे पिता को लिखे तुर्गनेव के पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि अपने परिचय के आरंभिक दिनों से ही इनके बीच ग़लतफ़हमियां बराबर पैदा होती रहीं, जिन्हें पाटने तथा भूलने का प्रयास वे निरंतर करते रहे, लेकिन कुछ समय के अंतराल पर ये ग़लतफ़हमियां पुन:, कभी दूसरे रूप में भी, प्रकट हो जातीं, जिससे नए स्पष्टीकरण और तालमेल की आवश्यकता पड़ जाती.
1856 में तुर्गनेव ने मेरे पिता को लिखा :
तुम्हारा पत्र पहुंचने में कुछ समय लग गया, मेरे अज़ीज़ ल्यॉफ निकोलायेविच. पत्र के प्रारंभ में मैं यह कहना चाहता हूं कि पत्र भेजने के लिए मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूं. तुम्हारे प्रति मेरा प्यार, और तुम्हारी मित्रता का मूल्य मेरे लिए कभी खत्म नहीं होगा, हालांकि, शायद मेरी ग़लती की वजह से, हममें से किसी को भी लंबे समय तक, दूसरे की उपस्थिति में अजीबोग़रीब अहसास से गुज़रना पड़े... मैं समझता हूं कि तुम स्वयं इस स्थिति का कारण जानते हो. तुम अकेले शख्स हो जिसके साथ मैं ग़लतफ़हमियों का शिकार हुआ हूं.
इसकी वजहें इस तथ्य में निहित हैं कि मैं तुम्हारे साथ केवल मैत्री-संबंध तक सीमित रहने के लिए कभी तैयार नहीं था. मैं हमेशा इससे और आगे तथा और गहराई में जाना चाहता था, लेकिन इसकी कोशिश मैंने अत्यंत फूहड़ तरीके से की. मैंने तुम्हें उत्तेजित और परेशान कर दिया, और जब मैंने अपनी ग़लती देखी, तो शायद जल्दबाज़ी में अपने हाथ वापस खींच लिए, और इसी कारण हमारे रिश्ते में `खाई´ पैदा हुई.
लेकिन यह फूहड़ता मात्र स्थूल स्तर पर प्रकट है, इससे आगे नहीं, और अगर जब हम पुन: मिलें, और मेरी आंखों में तुम्हें वही पुरानी शरारत दिखे, तो मेरी बातों का विश्वास करो, इसकी वजह यह नहीं होगी कि मैं एक बुरा आदमी हूं. मैं तुम्हें भरोसा दिलाता हूं कि किसी और स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं है. शायद मैं यह भी जोड़ना चाहूं कि मैं उम्र में तुमसे काफ़ी बड़ा हूं, और मैं अलग रास्ते पर चला हूं..... हमारी विशिष्ट, तथाकथित `साहित्यिक´ रुचि के बाहर बहुत कम विषय हैं जिनसे हम दोनों का वास्ता है. तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व भविष्य की दिशा में हाथ फैलाए है, मेरा अतीत में निर्मित हुआ है. मेरे लिए तुम्हारा अनुसरण करना असंभव है. उसी तरह, तुम्हारे लिए भी मेरा अनुसरण करने का प्रश्न नहीं उठता. तुम मुझसे काफ़ी दूर अवस्थित हो, इसके अलावे, तुम अपने पैरों पर इतनी मज़बूती और दृढ़ता से खड़े हो कि तुम्हें किसी का शिष्य होने की जरूरत नहीं. मैं तुम्हें आश्वस्त कर सकता हूं कि मैंने तुम्हारे ऊपर कभी कोई दुर्भावना आरोपित नहीं की, मुझे कभी तुम्हारे ऊपर यह संदेह नहीं हुआ कि तुम साहित्यिक विद्वेष के शिकार हो. मुझे अक्सर ऐसा लगा है, अगर तुम मेरी इस बात को माफ़ कर सको, कि तुम्हारे पास सामान्य विवेक की कमी रही है, लेकिन अच्छाइयों की नहीं. तुम्हारी समझ इतनी पैनी है कि यह संभव नहीं कि तुम्हें इस बात का इल्म न हो कि हम दोनो में किसी के पास अगर दूसरे से ईर्ष्या करने का कारण है, तो निश्चय ही वह व्यक्ति तुम नहीं हो जिसके पास मुझसे ईर्ष्या करने का कारण हो.
आगामी वर्ष तुर्गनेव ने मेरे पिता को एक पत्र लिखा जो, मुझे लगता है, मेरे पिता के प्रति उनके दृष्टिकोण को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है :
तुम लिखते हो कि तुम्हें बेहद खुशी है कि तुमने मेरी राय नहीं मानी, और तुम एक विशुद्ध लेखक बन गए. मैं इस बात से इनकार नहीं करता, शायद तुम सही हो. फिर भी, मैं अपने मंद मस्तिष्क की कितनी भी मगज़मारी क्यों न कर लूं, मेरे लिए यह कल्पना करना मुश्किल है कि तुम अगर लेखक नहीं हो, तो आखिर हो क्या. सैनिक ? जमींदार ? दार्शनिक ? नए धार्मिक मत का संस्थापक ? लोक-सेवक ? व्यवसायी ?..... मेरी मुश्किलों का समाधान करो, और बताओ कि इनमें से कौन-सी धारणा सही है. मैं मजाक कर रहा हूं, लेकिन इन सब के बावजूद, अंतत: मैं तुम्हें अपने मार्ग पर हर तरह से अग्रसर देखना चाहता हूं.
मुझे लगता है कि तुर्गनेव ने, एक कलाकार के रूप में मेरे पिता की प्रखर साहित्यिक प्रतिभा के अतिरिक्त उनमें और कुछ नहीं देखा. वे उन्हें एक कलाकार और एक लेखक के अतिरिक्त कुछ और होने का अधिकार नहीं देना चाहते थे. किसी भी दूसरे क्षेत्र में उनकी सक्रियता से उन्हें जैसे तकलीफ़ पहुंचती थी, और वे उनसे नाराज़ हो जाते थे क्योंकि मेरे पिता ने उनकी राय नहीं मानी. वे मेरे पिता से बहुत बड़े थे. (तुर्गनेव तालस्ताय से दस वर्ष बड़े थे.) उन्हें अपनी प्रतिभा को मेरे पिता की प्रतिभा से कमतर आंकने में कोई संकोच नहीं था, लेकिन वे उनसे केवल एक चीज़ ज़रूर चाहते थे और वह यह कि वे अपने जीवन की सारी ऊर्जा साहित्यिक कार्यों को समर्पित करें. लेकिन यह क्या ! मेरे पिता उनकी उदारता और विनम्रता की कोई परवाह नहीं करते, उनकी राय नहीं सुनते और अपने उस मार्ग पर चलने की ज़िद पर अड़े होते जो उनकी फ़ितरत और अभिरुचि के अनुकूल होता. तुर्गनेव की अभिरुचियां एवं विशेषताएं मेरे पिता के बिलकुल प्रतिकूल थीं. प्रतिरोध जहां मेरे पिता को हमेशा प्रेरित करते, तुर्गनेव पर इनका असर ठीक प्रतिकूल होता.
अपनी बहन के विचारों से पूरी तरह सहमत होते हुए, मैं केवल उन्हें उनके भाई, निकोलाई निकोलायेविच, के शब्दों में व्यक्त करना चाहूंगा, जिन्होंने कहा था कि, ``तुर्गनेव के लिए इस बात को स्वीकार करना संभव नहीं हो पा रहा था कि ल्योवोचका बड़ा हो रहा है और उनके संरक्षण से स्वयं को आज़ाद कर रहा है.´´
और सच पूछें तो, तुर्गनेव जिस समय एक प्रख्यात लेखक के रूप में स्थापित हो चुके थे, तोलस्तोय का किसी ने नाम तक नहीं सुना था, ``उनकी `बचपन की कहानियों´ की छिटपुट चर्चा´´ अगर छोड़ दें, जैसा कि फेत कहते हैं.
मैं कल्पना कर सकता हूं कि एक युवा रचनाकार ने, जिसने सृजन की दुनिया में अभी-अभी पांव रखा था, तुर्गनेव के प्रति अपने अभ्यंतर में कितनी श्रद्धा छुपाए रखी होगी, और विशेषकर तब, जबकि तुर्गनेव मेरे पिता के अग्रज, निकोलाई, के बहुत आत्मीय थे. मैं बहुत जोर देकर और निश्चित तौर पर तो यह बात नहीं कहना चाहता, लेकिन मुझे ऐसा लगता है, कि जिस प्रकार तुर्गनेव उनके साथ `केवल मित्रता की हदों´ में ही नहीं रहना चाहते थे, ठीक वैसे ही, मेरे पिता भी ईवान सर्जेयेविच को बेहद स्नेहसिक्त श्रद्धा के भाव से देखते थे, और यही कारण था कि वे जब भी मिले असहमतियों और झगड़ों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.
मैं जो बात कह रहा हूं उसकी संपुष्टि के तौर पर यहां उस पत्र से एक उद्धरण पेश करना चाहता हूं जो बॉतविन ने उनके झगड़े के तुरंत बाद ए. ए. फेत को लिखा था. बॉतविन मेरे पिता एवं ईवान सर्जेयेविच, दोनों ही के अंतरंग मित्र थे :
मैं सोचता हूं कि तोलस्तोय की प्रकृति दरअसल बेहद भावप्रवण एवं स्नेहशील है, और वह तुर्गनेव को पूरी भावप्रवणता के साथ चाहता है, लेकिन दुर्भाग्यवश, उसके आवेगपूर्ण भावनाओं के जवाब में उसे एक सहृदय एवं सद्भावपूर्ण उदासीनता के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगता, और वह किसी कीमत पर इतने से संतोष नहीं कर सकता.
तुर्गनेव ने स्वयं कहा है कि जब वे पहली बार एक दूसरे से मिले, तो मेरे पिता उनके पीछे इस तरह भागे जैसे `प्रेम में कोई महिला´ भागती है, और एक समय वे उनसे अपना पीछा भी छुड़ाते रहे, क्योंकि वे प्रतिरोध की उनकी प्रवृत्ति से संत्रस्त थे.
परिचय के शुरुआती दौर से ही तुर्गनेव ने अपने व्यवहार में मेरे पिता के प्रति जो एक अभिभावकीय मुद्रा अपना रखी थी, उससे संभवत: वे क्षुब्ध थे, और दूसरी तरफ, तुर्गनेव को मेरे पिता की `सनक´ से चिढ़ थी, जो उन्हें `उनके सही अध्यवसाय, साहित्य´ से विलगाती थी.
1870 में, उनके बीच झगड़े के दिन के पूर्व, तुर्गनेव ने फेत को लिखा था :
``ल्यॉफ तोलस्तोय की सनक बरक़रार है. जाहिर है कि यह उसके भाग्य में ही लिखा है. वह अपनी अंतिम कलाबाज़ी कब लेगा और आखिरकार कब अपने पैरों पर सीधा खड़ा होगा ?´´
मेरे पिता की पुस्तक कॉन्फेशन के बारे में भी तुर्गनेव का दृष्टिकोण ठीक वैसा ही था. यह पुस्तक उन्होंने मेरे पिता के निधन के कुछ ही दिनों पूर्व पढ़ी थी. इसे पढ़ने, `समझने´, और `क्रोधित नहीं होने´ का वादा कर, उन्होंने इसपर अपनी प्रतिक्रिया के तौर पर `एक लंबा पत्र लिखना शुरू किया, लेकिन विवादास्पद हो जाने के डर से यह कभी पूरा नहीं हुआ.´
डी. वी. ग्रीगोरेविच को संबोधित अपने एक पत्र में तुर्गनेव ने इस पुस्तक, जो उनकी राय में मिथ्या धारणाओं पर आधारित थी, को `संपूर्ण जीवित मानव-जीवन का निषेध´ तथा एक नए प्रकार का शून्यवाद (निहीलिज्म) कहा.
ज़ाहिर है कि बावजूद इन सब के, तुर्गनेव यह बात नहीं समझ पाए कि अपने नए जीवन-दर्शन से मेरे पिता ने कितनी सलाहियत हासिल की थी, और उन्होंने इस तरह के उनके जज्बे को उनकी उसी पुरानी `सनक´ और `कलाबाजी´ की परिणति के रूप में देखा, जैसे वे उनके अन्य कार्यकलापों--स्कूल-मास्टरी, खेती-बारी, पर्चों के प्रकाशन आदि--को देखते थे.
मेरी जानकारी में, ईवान सर्जेयेविच तीन बार यास्नाया पोल्याना आए थे--अगस्त और सितंबर, 1878 में, तथा तीसरी और अंतिम बार मई, 1880 के प्रारंभ में. मुझे ये तीनों मुलाक़ातें याद हैं, हालांकि बहुत संभव है कि इनके कुछ ब्यौरे मेरी याददाश्त में अब नहीं हों.
मुझे याद है, तुर्गनेव जब पहली बार हमारे घर आने वाले थे, यह हमारे लिए एक बड़ी घटना थी, और घर में सर्वाधिक उत्तेजित और उत्साहित मेरी मां थीं. उन्होंने हमें बताया कि मेरे पिता ने तुर्गनेव के साथ झगड़ा किया था, और एक बार उन्हें द्वंद्व-युद्ध के लिए चुनौती दी थी, और यह कि वे मेरे पिता के आमंत्रण पर हमारे घर मेलमिलाप के लिए आ रहे हैं.
तुर्गनेव ने सारा समय मेरे पिता के साथ बैठ कर बिताया, और जबतक वे हमारे यहां ठहरे मेरे पिता ने अपने सारे कार्य स्थगित रखे, और एक बार दिन के मध्य में, बिलकुल अनपेक्षित घड़ी में, मेरी मां ने हमलोगों को ड्राईंग-रूम में एकत्रित किया, जहां ईवान सर्जेयेविच ने हमें अपनी कहानी द डॉग सुनाई.
मुझे याद है उनका लंबा कद, दबंग व्यक्तित्व, उनके भूरे रेशमी केश, हल्की, इत्मीनान वाली चाल, और पतली आवाज़, जो उनकी भव्य काया के अनुरूप नहीं थी, बच्चों की तरह उनकी दबी-सी हंसी. और जब वे हंसते तो उनकी आवाज़ और पतली हो जाती.
शाम के वक्त़, भोजन के बाद, हम सभी जाला में इकट्ठे हुए. उस समय यास्नाया में अंकल सर्योझा, प्रिंस लियोनिद दिमित्रियेविच उरुसॉफ, तुला प्रांत के उप-राज्यपाल--अंकल सशा बेहर्स और उनकी युवा पत्नी, खूबसूरत जॉर्जियन पैटी--और कुजमिंस्की का पूरा परिवार रह रहा था.
आंट तान्या से गाने के लिए कहा गया. अपने दिल की तेज धड़कनों के साथ हमलोगों ने उनके गीत सुने, और फिर हमें तुर्गनेव, जो एक प्रख्यात कलामर्मज्ञ थे, की प्रतिक्रिया का इंतज़ार था. सचमुच उन्होंने ईमानदारी के साथ उनके गीत की सराहना की. इसके बाद एक क्विड्रल (सामूहिक नृत्य) आयोजित हुआ. नृत्य के बीच ही अचानक, ईवान सर्जेयेविच, जो एक किनारे बैठे नृत
मेरा उद्देश्य इस सर्व-स्वीकृत धारणा से इतर कुछ तथ्यों पर प्रकाश डालना है, और यास्नाया पोल्याना में तुर्गनेव की मुलाक़ातों की चर्चा करने के पूर्व, इन दो नेक-दिल इंसान, जिनके बीच परस्पर सौहार्दपूर्ण संबंध रहे, के बीच निरंतर मतभेद के वास्तविक कारणों को मैं यथासंभव पूरी तरह स्पष्ट करना चाहता हूं--ऐसे मतभेद जो अंतिम रूप से उनके बीच झगड़े एवं परस्पर चुनौतियों के कारण बने.
जहां तक मैं जानता हूं, मेरे पिता को अपने संपूर्ण जीवन-काल में कभी किसी अन्य व्यक्ति के साथ कोई गंभीर मतभेद नहीं हुआ. और तुर्गनेव ने 1865 में मेरे पिता को अपने पत्र में लिखा : ``आज तक केवल तुम ही एक ऐसे शख्स हो, जिसके साथ मैं ग़लतफ़हमियों का शिकार हुआ हूं.´´
मेरे पिता जब भी ईवान सर्जेयेविच के साथ अपने झगड़े का ज़िक्र करते, वे इसका सारा दोष स्वयं पर ले लेते. झगड़े के तुरंत बाद, तुर्गनेव ने पत्र लिख कर मेरे पिता से क्षमा-याचना की थी, और इस झगड़े में अपनी भूमिका को कभी सही ठहराने की कोशिश नहीं की.
तब ऐसा क्यों था--तुर्गनेव के ही शब्दों में--कि उनके और मेरे पिता के `नक्षत्र आकाश में निर्बंध विद्वेष के साथ गतिमान रहे´ ?
इस संदर्भ में मेरी बहन, तात्याना ने अपने आलेख, `तुर्गनेव´, जो 2 फरवरी, 1908 को `नोवोये व्रेम्या´ के परिशिष्ट में प्रकाशित हुआ था, में जो लिखा वह इस प्रकार है :
इनके बीच साहित्यिक प्रतिद्वंद्विता के सारे प्रश्न मुझे नितांत अप्रासंगिक लगते हैं. मेरे पिता के साहित्यिक करियर की शुरुआत से ही, तुर्गनेव उनकी प्रखर प्रतिभा को स्वीकार करते थे, और उन्होंने उनके साथ कभी प्रतिद्वंद्विता की बात नहीं सोची. उस क्षण से ही, जब 1854 में उन्होंने कोलबासिना को लिखा था कि, ``अगर ईश्वर ने उसे आयु दी, तो मुझे पूरा विश्वास है कि वह हम सभी को अचंभित कर देगा,´´ तुर्गनेव मेरे पिता की रचनाओं को दिलचस्पी के साथ पढ़ते रहे, और कभी उनकी प्रशंसा करते नहीं थके.
1856 में उन्होंने ड्रझनिन को लिखा :
``इस अंगूरी के किण्वन के बाद जो शराब तैयार होगी, वह देवताओं के पीने लायक होगी.´´
1857 में उन्होंने पोलोंस्की को लिखा :
``यह शख्स बहुत आगे जाएगा, और अपने पीछे गहरी छाप छोड़ जाएगा.´´
बावजूद इसके, किसी प्रकार, ये दोनों आपस में सामंजस्य स्थापित नहीं कर सके. मेरे पिता को लिखे तुर्गनेव के पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि अपने परिचय के आरंभिक दिनों से ही इनके बीच ग़लतफ़हमियां बराबर पैदा होती रहीं, जिन्हें पाटने तथा भूलने का प्रयास वे निरंतर करते रहे, लेकिन कुछ समय के अंतराल पर ये ग़लतफ़हमियां पुन:, कभी दूसरे रूप में भी, प्रकट हो जातीं, जिससे नए स्पष्टीकरण और तालमेल की आवश्यकता पड़ जाती.
1856 में तुर्गनेव ने मेरे पिता को लिखा :
तुम्हारा पत्र पहुंचने में कुछ समय लग गया, मेरे अज़ीज़ ल्यॉफ निकोलायेविच. पत्र के प्रारंभ में मैं यह कहना चाहता हूं कि पत्र भेजने के लिए मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूं. तुम्हारे प्रति मेरा प्यार, और तुम्हारी मित्रता का मूल्य मेरे लिए कभी खत्म नहीं होगा, हालांकि, शायद मेरी ग़लती की वजह से, हममें से किसी को भी लंबे समय तक, दूसरे की उपस्थिति में अजीबोग़रीब अहसास से गुज़रना पड़े... मैं समझता हूं कि तुम स्वयं इस स्थिति का कारण जानते हो. तुम अकेले शख्स हो जिसके साथ मैं ग़लतफ़हमियों का शिकार हुआ हूं.
इसकी वजहें इस तथ्य में निहित हैं कि मैं तुम्हारे साथ केवल मैत्री-संबंध तक सीमित रहने के लिए कभी तैयार नहीं था. मैं हमेशा इससे और आगे तथा और गहराई में जाना चाहता था, लेकिन इसकी कोशिश मैंने अत्यंत फूहड़ तरीके से की. मैंने तुम्हें उत्तेजित और परेशान कर दिया, और जब मैंने अपनी ग़लती देखी, तो शायद जल्दबाज़ी में अपने हाथ वापस खींच लिए, और इसी कारण हमारे रिश्ते में `खाई´ पैदा हुई.
लेकिन यह फूहड़ता मात्र स्थूल स्तर पर प्रकट है, इससे आगे नहीं, और अगर जब हम पुन: मिलें, और मेरी आंखों में तुम्हें वही पुरानी शरारत दिखे, तो मेरी बातों का विश्वास करो, इसकी वजह यह नहीं होगी कि मैं एक बुरा आदमी हूं. मैं तुम्हें भरोसा दिलाता हूं कि किसी और स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं है. शायद मैं यह भी जोड़ना चाहूं कि मैं उम्र में तुमसे काफ़ी बड़ा हूं, और मैं अलग रास्ते पर चला हूं..... हमारी विशिष्ट, तथाकथित `साहित्यिक´ रुचि के बाहर बहुत कम विषय हैं जिनसे हम दोनों का वास्ता है. तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व भविष्य की दिशा में हाथ फैलाए है, मेरा अतीत में निर्मित हुआ है. मेरे लिए तुम्हारा अनुसरण करना असंभव है. उसी तरह, तुम्हारे लिए भी मेरा अनुसरण करने का प्रश्न नहीं उठता. तुम मुझसे काफ़ी दूर अवस्थित हो, इसके अलावे, तुम अपने पैरों पर इतनी मज़बूती और दृढ़ता से खड़े हो कि तुम्हें किसी का शिष्य होने की जरूरत नहीं. मैं तुम्हें आश्वस्त कर सकता हूं कि मैंने तुम्हारे ऊपर कभी कोई दुर्भावना आरोपित नहीं की, मुझे कभी तुम्हारे ऊपर यह संदेह नहीं हुआ कि तुम साहित्यिक विद्वेष के शिकार हो. मुझे अक्सर ऐसा लगा है, अगर तुम मेरी इस बात को माफ़ कर सको, कि तुम्हारे पास सामान्य विवेक की कमी रही है, लेकिन अच्छाइयों की नहीं. तुम्हारी समझ इतनी पैनी है कि यह संभव नहीं कि तुम्हें इस बात का इल्म न हो कि हम दोनो में किसी के पास अगर दूसरे से ईर्ष्या करने का कारण है, तो निश्चय ही वह व्यक्ति तुम नहीं हो जिसके पास मुझसे ईर्ष्या करने का कारण हो.
आगामी वर्ष तुर्गनेव ने मेरे पिता को एक पत्र लिखा जो, मुझे लगता है, मेरे पिता के प्रति उनके दृष्टिकोण को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है :
तुम लिखते हो कि तुम्हें बेहद खुशी है कि तुमने मेरी राय नहीं मानी, और तुम एक विशुद्ध लेखक बन गए. मैं इस बात से इनकार नहीं करता, शायद तुम सही हो. फिर भी, मैं अपने मंद मस्तिष्क की कितनी भी मगज़मारी क्यों न कर लूं, मेरे लिए यह कल्पना करना मुश्किल है कि तुम अगर लेखक नहीं हो, तो आखिर हो क्या. सैनिक ? जमींदार ? दार्शनिक ? नए धार्मिक मत का संस्थापक ? लोक-सेवक ? व्यवसायी ?..... मेरी मुश्किलों का समाधान करो, और बताओ कि इनमें से कौन-सी धारणा सही है. मैं मजाक कर रहा हूं, लेकिन इन सब के बावजूद, अंतत: मैं तुम्हें अपने मार्ग पर हर तरह से अग्रसर देखना चाहता हूं.
मुझे लगता है कि तुर्गनेव ने, एक कलाकार के रूप में मेरे पिता की प्रखर साहित्यिक प्रतिभा के अतिरिक्त उनमें और कुछ नहीं देखा. वे उन्हें एक कलाकार और एक लेखक के अतिरिक्त कुछ और होने का अधिकार नहीं देना चाहते थे. किसी भी दूसरे क्षेत्र में उनकी सक्रियता से उन्हें जैसे तकलीफ़ पहुंचती थी, और वे उनसे नाराज़ हो जाते थे क्योंकि मेरे पिता ने उनकी राय नहीं मानी. वे मेरे पिता से बहुत बड़े थे. (तुर्गनेव तालस्ताय से दस वर्ष बड़े थे.) उन्हें अपनी प्रतिभा को मेरे पिता की प्रतिभा से कमतर आंकने में कोई संकोच नहीं था, लेकिन वे उनसे केवल एक चीज़ ज़रूर चाहते थे और वह यह कि वे अपने जीवन की सारी ऊर्जा साहित्यिक कार्यों को समर्पित करें. लेकिन यह क्या ! मेरे पिता उनकी उदारता और विनम्रता की कोई परवाह नहीं करते, उनकी राय नहीं सुनते और अपने उस मार्ग पर चलने की ज़िद पर अड़े होते जो उनकी फ़ितरत और अभिरुचि के अनुकूल होता. तुर्गनेव की अभिरुचियां एवं विशेषताएं मेरे पिता के बिलकुल प्रतिकूल थीं. प्रतिरोध जहां मेरे पिता को हमेशा प्रेरित करते, तुर्गनेव पर इनका असर ठीक प्रतिकूल होता.
अपनी बहन के विचारों से पूरी तरह सहमत होते हुए, मैं केवल उन्हें उनके भाई, निकोलाई निकोलायेविच, के शब्दों में व्यक्त करना चाहूंगा, जिन्होंने कहा था कि, ``तुर्गनेव के लिए इस बात को स्वीकार करना संभव नहीं हो पा रहा था कि ल्योवोचका बड़ा हो रहा है और उनके संरक्षण से स्वयं को आज़ाद कर रहा है.´´
और सच पूछें तो, तुर्गनेव जिस समय एक प्रख्यात लेखक के रूप में स्थापित हो चुके थे, तोलस्तोय का किसी ने नाम तक नहीं सुना था, ``उनकी `बचपन की कहानियों´ की छिटपुट चर्चा´´ अगर छोड़ दें, जैसा कि फेत कहते हैं.
मैं कल्पना कर सकता हूं कि एक युवा रचनाकार ने, जिसने सृजन की दुनिया में अभी-अभी पांव रखा था, तुर्गनेव के प्रति अपने अभ्यंतर में कितनी श्रद्धा छुपाए रखी होगी, और विशेषकर तब, जबकि तुर्गनेव मेरे पिता के अग्रज, निकोलाई, के बहुत आत्मीय थे. मैं बहुत जोर देकर और निश्चित तौर पर तो यह बात नहीं कहना चाहता, लेकिन मुझे ऐसा लगता है, कि जिस प्रकार तुर्गनेव उनके साथ `केवल मित्रता की हदों´ में ही नहीं रहना चाहते थे, ठीक वैसे ही, मेरे पिता भी ईवान सर्जेयेविच को बेहद स्नेहसिक्त श्रद्धा के भाव से देखते थे, और यही कारण था कि वे जब भी मिले असहमतियों और झगड़ों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.
मैं जो बात कह रहा हूं उसकी संपुष्टि के तौर पर यहां उस पत्र से एक उद्धरण पेश करना चाहता हूं जो बॉतविन ने उनके झगड़े के तुरंत बाद ए. ए. फेत को लिखा था. बॉतविन मेरे पिता एवं ईवान सर्जेयेविच, दोनों ही के अंतरंग मित्र थे :
मैं सोचता हूं कि तोलस्तोय की प्रकृति दरअसल बेहद भावप्रवण एवं स्नेहशील है, और वह तुर्गनेव को पूरी भावप्रवणता के साथ चाहता है, लेकिन दुर्भाग्यवश, उसके आवेगपूर्ण भावनाओं के जवाब में उसे एक सहृदय एवं सद्भावपूर्ण उदासीनता के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगता, और वह किसी कीमत पर इतने से संतोष नहीं कर सकता.
तुर्गनेव ने स्वयं कहा है कि जब वे पहली बार एक दूसरे से मिले, तो मेरे पिता उनके पीछे इस तरह भागे जैसे `प्रेम में कोई महिला´ भागती है, और एक समय वे उनसे अपना पीछा भी छुड़ाते रहे, क्योंकि वे प्रतिरोध की उनकी प्रवृत्ति से संत्रस्त थे.
परिचय के शुरुआती दौर से ही तुर्गनेव ने अपने व्यवहार में मेरे पिता के प्रति जो एक अभिभावकीय मुद्रा अपना रखी थी, उससे संभवत: वे क्षुब्ध थे, और दूसरी तरफ, तुर्गनेव को मेरे पिता की `सनक´ से चिढ़ थी, जो उन्हें `उनके सही अध्यवसाय, साहित्य´ से विलगाती थी.
1870 में, उनके बीच झगड़े के दिन के पूर्व, तुर्गनेव ने फेत को लिखा था :
``ल्यॉफ तोलस्तोय की सनक बरक़रार है. जाहिर है कि यह उसके भाग्य में ही लिखा है. वह अपनी अंतिम कलाबाज़ी कब लेगा और आखिरकार कब अपने पैरों पर सीधा खड़ा होगा ?´´
मेरे पिता की पुस्तक कॉन्फेशन के बारे में भी तुर्गनेव का दृष्टिकोण ठीक वैसा ही था. यह पुस्तक उन्होंने मेरे पिता के निधन के कुछ ही दिनों पूर्व पढ़ी थी. इसे पढ़ने, `समझने´, और `क्रोधित नहीं होने´ का वादा कर, उन्होंने इसपर अपनी प्रतिक्रिया के तौर पर `एक लंबा पत्र लिखना शुरू किया, लेकिन विवादास्पद हो जाने के डर से यह कभी पूरा नहीं हुआ.´
डी. वी. ग्रीगोरेविच को संबोधित अपने एक पत्र में तुर्गनेव ने इस पुस्तक, जो उनकी राय में मिथ्या धारणाओं पर आधारित थी, को `संपूर्ण जीवित मानव-जीवन का निषेध´ तथा एक नए प्रकार का शून्यवाद (निहीलिज्म) कहा.
ज़ाहिर है कि बावजूद इन सब के, तुर्गनेव यह बात नहीं समझ पाए कि अपने नए जीवन-दर्शन से मेरे पिता ने कितनी सलाहियत हासिल की थी, और उन्होंने इस तरह के उनके जज्बे को उनकी उसी पुरानी `सनक´ और `कलाबाजी´ की परिणति के रूप में देखा, जैसे वे उनके अन्य कार्यकलापों--स्कूल-मास्टरी, खेती-बारी, पर्चों के प्रकाशन आदि--को देखते थे.
मेरी जानकारी में, ईवान सर्जेयेविच तीन बार यास्नाया पोल्याना आए थे--अगस्त और सितंबर, 1878 में, तथा तीसरी और अंतिम बार मई, 1880 के प्रारंभ में. मुझे ये तीनों मुलाक़ातें याद हैं, हालांकि बहुत संभव है कि इनके कुछ ब्यौरे मेरी याददाश्त में अब नहीं हों.
मुझे याद है, तुर्गनेव जब पहली बार हमारे घर आने वाले थे, यह हमारे लिए एक बड़ी घटना थी, और घर में सर्वाधिक उत्तेजित और उत्साहित मेरी मां थीं. उन्होंने हमें बताया कि मेरे पिता ने तुर्गनेव के साथ झगड़ा किया था, और एक बार उन्हें द्वंद्व-युद्ध के लिए चुनौती दी थी, और यह कि वे मेरे पिता के आमंत्रण पर हमारे घर मेलमिलाप के लिए आ रहे हैं.
तुर्गनेव ने सारा समय मेरे पिता के साथ बैठ कर बिताया, और जबतक वे हमारे यहां ठहरे मेरे पिता ने अपने सारे कार्य स्थगित रखे, और एक बार दिन के मध्य में, बिलकुल अनपेक्षित घड़ी में, मेरी मां ने हमलोगों को ड्राईंग-रूम में एकत्रित किया, जहां ईवान सर्जेयेविच ने हमें अपनी कहानी द डॉग सुनाई.
मुझे याद है उनका लंबा कद, दबंग व्यक्तित्व, उनके भूरे रेशमी केश, हल्की, इत्मीनान वाली चाल, और पतली आवाज़, जो उनकी भव्य काया के अनुरूप नहीं थी, बच्चों की तरह उनकी दबी-सी हंसी. और जब वे हंसते तो उनकी आवाज़ और पतली हो जाती.
शाम के वक्त़, भोजन के बाद, हम सभी जाला में इकट्ठे हुए. उस समय यास्नाया में अंकल सर्योझा, प्रिंस लियोनिद दिमित्रियेविच उरुसॉफ, तुला प्रांत के उप-राज्यपाल--अंकल सशा बेहर्स और उनकी युवा पत्नी, खूबसूरत जॉर्जियन पैटी--और कुजमिंस्की का पूरा परिवार रह रहा था.
आंट तान्या से गाने के लिए कहा गया. अपने दिल की तेज धड़कनों के साथ हमलोगों ने उनके गीत सुने, और फिर हमें तुर्गनेव, जो एक प्रख्यात कलामर्मज्ञ थे, की प्रतिक्रिया का इंतज़ार था. सचमुच उन्होंने ईमानदारी के साथ उनके गीत की सराहना की. इसके बाद एक क्विड्रल (सामूहिक नृत्य) आयोजित हुआ. नृत्य के बीच ही अचानक, ईवान सर्जेयेविच, जो एक किनारे बैठे नृत
