Saturday 21 November 2009

शोक-सभा




हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि रामकृष्ण पांडेय के असामयिक निधन पर आज पटना की प्रलेस इकाई ने केदार भवन स्थित अपने कर्यालय में एक शोक-सभा आयोजित की. पिछले सोमवार की रात दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था. वे करीब 61 साल के थे. रामकृष्‍ण पांडेय पिछले कुछ समय से मधुमेह से पीड़ित थे और पिछले सोमवार देर शाम उन्हें दिल का दौरा पड़ा. इसके बाद उन्हें दिल्ली के नरेंद्र मोहन अस्पताल ले जाया गया जहां उनका निधन हो गया. वे लंबे समय से हिंदी संवाद एजेंसी यूनिवार्ता से जुड़े थे. वे कुछ समय तक समाचार भारती में भी रहे. उनके परिवार में उनकी पत्नी के अलावा दो पुत्री हैं. मूल रूप से पटना के रहने वाले रामकृष्‍ण पांडेय ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी में पीचएडी की थी और वे कम्युनिस्ट आंदोलन से गहरे जुड़े रहे. साहित्य की विभिन्न विधाओं में रुचि रखने वाले पांडेय एक बेहतरीन कवि भी थे।

शोक-सभा में वरिष्ठ आलोचक खगेन्द्र ठाकुर, वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा, अरुण कमल, विश्वजीत सेन, योगेंद्र कृष्णा, शहंशाह आलम, प्रमोद कुमार सिंह समेत शहर के अनेक साहित्यकार तथा उनके परिजनों ने भी उनके निधन पर अपनी गहरी श्रद्धांजलि अर्पित की.

कवि अरुण कमल के प्रस्ताव पर सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि जनवरी में स्व. पांडेय के जन्म-दिन के अवसर पर उनके नाम पर एक स्मृति व्याख्यान की शुरुआत की जाए.

Sunday 15 November 2009

नई सदी में संस्कृति

कला पर नई दृष्टि की ज़रूरत




शांता सरबजीत सिंह

भारत की राजधानी का वर्तमान परिदृश्य इससे और अधिक त्रासद क्या हो सकता है कि जहां अनगिनत निजी प्रबंधन वाली सरकारी कोष प्राप्त सांस्कृतिक संस्थाएं मौजूद हों, लेकिन जो बिना भारी शुल्क अदा किए युवा कलाकारों या संस्कृतिकर्मियों के लिए उपलब्ध नहीं हों. समय आ चुका है जब सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए कि संस्कृति और नई नीति--जिसमें बुनियादी और कठोर कदम भी उठाने की जरूरत पड़ सकती है--पर यदि समुचित ध्यान नहीं दिया गया तो संभव है कि राष्ट्र निर्माण एवं विकास के लिए आवश्यक हम अपने बेहद मूल्यवान तथा अमूर्त संसाधन खो बैठें.

मैं अपनी बात कुछ प्रश्नों के साथ आरंभ करना चाहूंगी. क्या हमारे युवाओं को यह जानने की ज़रूरत है कि भरत नाट्यम क्या है? क्या ध्रुपद के उस्ताद फहीमुद्दीन डागर की कला की जानकारी या किशोरी अमोणकर की ग्वालियर शैली किस तरह किरण घराना के गायकी अंग से अलग है जैसी बारीकियां उनके लिए महत्वपूर्ण हैं? क्या नए युग की इस पीढ़ी का मुख्य लक्ष्य आत्म-निर्भर होना या अपने ही दोनों पांव पर खड़ा होना, जीवन में निरंतर आगे बढ़ना और केवल अवसरों की तलाश--जिसे आप पैसा भी कह सकते हैं--नहीं है? उनकी इस परिकल्पना में `कला और संस्कृति´ का क्या महत्व है?

इन प्रश्नों का जवाब `हां´ है--एक उच्चस्वरीय हां, अगर हम विषय को अराजकता के उस परिप्रेक्ष्य में देखें जिसमें चीजें आज हैं. बीसवीं सदी के दौरान प्राय: हमारा ध्यान केवल अर्थशास्त्र, राजनीति, प्रौद्योगिकी और विझान पर केंद्रित रहा है. और इस तरह अपना ध्यान इन विषयों पर केंद्रित करने में, इनमें से किसी भी विषय को उस सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ने की कोशिश नहीं की गई जहां से ये विषय पैदा होते हैं और जिसमें इनकी जड़ें अवस्थित हैं. जब कृषि का कोई नया औज़ार या संकर बीज उपयोग में लाया जाना था तो नए उत्पाद को उपयोग में लाने के पूर्व किसी ने आंध्र प्रदेश के किसानों के कृषि-ढांचे को समझने की कोशिश नहीं की. और देखें इसका परिणाम क्या हुआ! निष्प्राण और यांत्रिक लक्ष्य के किस दलदल में हम पहुंचे हैं! लक्ष्य प्राप्त हो जाने के बाद भी यह हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि यह हमारे जीवन को संपोषित करने वाला नहीं है. अन्य विकसित देशों ने इसे पहले ही महसूस कर लिया है. और अब समय आ गया है कि हम भी यह बात समझ लें कि —षि या अर्थतंत्र या विज्ञान या कोई भी अन्य विषय संस्कृति से अलग कर नहीं देखे जा सकते जिसमें वे अपस्थित हैं, और `संस्कृति´ की भूमिका को सबसे पहले स्वीकार किए बिना कोई भी विकास संभव नहीं है.

यदि कल के नागरिक को वैश्वीकरण और सांस्कृतिक वैविध्य के बीच रिश्ता स्थापित करना है, अगर उन्हें वैश्वीकरण के सांस्कृतिक परिणाम समझने हैं--उदाहरण के लिए, प्रवसन, सांस्कृतिक संपर्क, जन-माध्यम जैसी घटनाएं--और यदि उन्हें सांस्कृतिक वैश्वीकरण से जुड़ी गतिकी को समझने की शुरुआत करनी है, तो संस्कृति पर एक नई और गतिशील दृष्टि का होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है.

एक स्तर पर, युवा पीढ़ी के लिए यह बात महत्वपूर्ण है कि अबतक भारतीय नृत्य और संगीत वैश्विक चेतना में प्रवेश पा चुका है. दूसरे शब्दों में, संस्कृति, जो हमें अपनी पहचान का बोध कराती है और जिस पर हम भरोसा करते हैं, आज वैश्विक परिदृश्य के महत्वपूर्ण हिस्सों को सजाने-संवारने लगी है. सुदूर पर्थ में जापानी युवतियां हैं जो कथक पढ़ाती हैं. इंग्लैण्ड के योर्क युनिवर्सिटी में भारतीय क्लासिक संगीत की एक स्वतंत्र पीठ है जहां हर वर्ष भारत के संगीताचार्य क्लास संचालित करते हैं. और कुछ अत्यंत प्रतिभाशाली तबला-वादक बेल्जियम और हॉलैण्ड में पैदा हो रहे हैं, जहां ज़ाकिर हुसैन और शिवमणि जैसे तबला-वादकों के अकसर भ्रमण के लिए हम आभारी हैं. अमेरिका में भरत नाट्यम, कुचिपुड़ी, कथक आदि के विद्यालय उतनी ही संख्या में मौजूद हैं जितनी कि वहां पर क्लासिक कलाओं में प्रशिक्षित प्रवासी भारतीय युवतियां. जीविका की तलाश में अपने पति का साथ देने को विवश इन युवतियों में से प्रत्येक ने अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और विकास का रास्ता चुना है.

इन उदाहरणों में संस्कृति पर नई दृष्टि की आवश्यकता के लिए औचित्य ढूंढ़ना बेमानी होगा. न ही इसका औचित्य इस तथ्य में निहित है कि भारत में कला से जुड़ा कोई प्रकाशन नहीं है जो इन विषयों और हजारों अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करता हो. और न कि मुख्यधारा के समाचार माध्यमों--टाइम्स ऑफ इंडिया से हिंदुस्तान टाइम्स तक अनेक `टाइम्स´ में संस्कृति के लिए जगह इस हद तक सिकुड़ गई है कि किसी गंभीर सांस्कृतिक मसले पर प्रसंगवश भी कोई संदर्भ-विंदु ढूंढ़ पाना कठिन हो गया है. वैश्वीकरण की शुरुआत और राष्ट्र की सर्वाधिक महत्वपूर्ण धरोहर--संस्कृति--के हाशियेकरण के बीच का संयोग भी दरअसल कोई इतना बड़ा संयोग नहीं है. इसके समानांतर, उन लोगों के साधारणीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है जो संस्कृति के सर्जक हैं--नर्तक, संगीतज्ञ, चित्रकार, मूर्तिकार, लेखक और कवि. यह वह क्रांतिक समूह है जो संपूर्ण सभ्यता का सूचकांक-फलक और पहचान-पत्र है जिसके माध्यम से किसी राष्ट्र की पहचान बनती है. क्या ही विडंबना है कि इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन, जो प्रमुख भारतीय अखबारों के तथाकथित आदर्श हैं, आज भी अपने आठ-पृष्ठीय स्वरूप में भी ओपेरा, रंगमंच और बैले पर भारी-भरकम समीक्षाएं और वैचारिक आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि अपने यहां भारत में बड़े-बड़े अखबार समीक्षाओं का उपहास करते नज़र आते हैं, और संस्कृति पर सोचने-विचारने के बदले इन्होंने सहर्ष पूरे इस विषय को ही कूड़ेदान में डाल दिया है.

ज़मीनी हकीकत आज यह है कि नृत्य की किसी नई शैली, रंगमंच के किसी नए प्रयोग, स्थापत्य कला की किसी मौलिक और नई अभिव्यक्ति, या सिनेमा में नई भाषा के प्रयोग पर चर्चा करने के बदले, जो इन कलाओं के सर्जक हैं उन्हें पेज-3 के बकबास में अवमूल्यित कर दिया गया है. पिछले दिनों एक युवा उप-संपादक ने जब लिखा कि `उमा शर्मा, भरतनाट्यम नृत्यांगना´ फलां समारोह में देखी गईं, तो वह न तो यह जानता है और न ही उसे यह जानने में दिलचस्पी है कि उमा शर्मा का कला-क्षेत्र कथक है और सांस्कृतिक रूप से सजग कोई भी पीढ़ी इस क्षेत्र में उनके अवदान से गौरवान्वित महसूस करेगी. लेकिन समाचार माध्यमों में उमा शर्मा की प्रतिभा और कला के प्रति सच्ची दिलचस्पी के अभाव में, कोई आश्चर्य नहीं कि अखबारों में चर्चा इस बात पर केंद्रित हो कि किसी समारोह में उन्होंने क्या पहन रखा था और खाने में उन्होंने क्या लिया, न कि इस बात पर कि उनके वैचारिक और रचनात्मक अवदान क्या हैं.

एक ऐसी नीति, जो हमारी संस्कृति के नैरंतर्य और उसकी समकालीन प्रासंगिकता दोनों ही पर ध्यान केंद्रित करती हो, का औचित्य नकारात्मक संदर्भों में नहीं, बल्कि इस तथ्य में निहित है कि भारत पूरी शिÌत के साथ केवल अपनी संस्कृति में वास करता है, और यहां के प्रत्येक व्यक्ति के लिए--जो यहां की हवा को अपनी सांसों में भरता है, इसकी मिट्टी पर अपने कदम रखता है--स्वयं को जानने-समझने का और अपनी भाषा, समाज, स्मृति, इतिहास और जीवनानुभवों के विशिष्ट प्रतिमानों के आधार पर अपने जीवन को रचने का एक माध्यम है, संभवत: एकमात्र महत्वपूर्ण माध्यम.

इस नई नीति का सत्त्व अन्वेषण और संरक्षण के बीच, नवीन और पुरातन के द्वैत के बीच, लोक और नागर के बीच, लोकप्रिय संस्कृति के निर्माण की दिशा में तथा संप्रदाय या सामूहिक चेतना को बचाए रखने की दिशा में सक्रिय शक्तियों के बीच एक संतुलन बनाए रखने में निहित होगा.

इसे इन दो ध्रुवांतों के बीच की नाजु़क जगहों को पाटने के साथ-साथ, निरंतर विकसित हो रहे भारत के मध्य वर्ग के जेहन में संस्—ति को संस्कार, सुरक्षा कवच, जीवित बचे रहने के लिए हमारा अपना ही एक विशिष्ट उपकरण के रूप में बिठाने का काम करना होगा. और आखिर किस चीज से हम स्वयं को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं र्षोर्षो संक्षेप में कहें तो, भावात्मक तथा भौतिक विध्वंस से. मानव सभ्यता का मर्म आज भी, और वैश्वीकरण के इस युग में विशेषकर, संस्कृतियों की विराट विविधता में अवस्थित है. हालांकि इसके साथ ही, सांस्कृतिक विभिन्नताएं अकसर संकट और द्वंद्व का सबब बन कर उभरती हैं. इसलिए, अंतरसांस्कृतिक संवाद, जिसमें आत्म-छवि और प्रतिद्वंद्वी-छवि पर तार्किक विमर्श शामिल हो, इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है.

कल्पना करें इस परिदृश्य की : आप नाश्ते पर बैठे हैं नई दिल्ली में, साथ में है दार्जिलिंग की चाय, जैव ऊर्जा से भरपूर ऊबरमार्क की मुस्ली और डेनमार्क का पनीर. सुबह के अखबार पर जब आप सरसरी नजर डालते हैं तो कुछ इस प्रकार के समाचार आपके सामने उभरते हैं : जापान के शहर नोरीकुरा में कोरियाई यॉडेलर किम चुल हांग ने प्रथम पुरस्कार जीता है, जर्मनी की और जापान की एक कंपनी ने संयुक्त पहलकदमी की घोषणा की है. बाद में, बीबीसी वल्र्ड सर्विस बांग्लादेश के एक बैंक की नई पहलकदमी के बारे में एक रिपोर्ट प्रसारित करती है. यह बैंक अपने 2.1 मिलियन ग्राहकों को सेल्युलर टेलीफोन प्रदान करने जा रहा है, जिससे कि दुनिया के सर्वाधिक गरीब देशों में से एक के लिए सीधे सूचना-युग में प्रवेश का द्वार खुलता है.

जहां एक दशक पूर्व तक भी दुनिया की एक तस्वीर खींचना, खास ठिकानों के संदर्भ में आर्थिक और राजनीतिक तंत्र का पूर्वानुमान लगाना संभव प्रतीत होता था, आज इस तरह के प्रयास प्रश्नों और संदेहों से परे नहीं दिखते. वैश्वीकरण का प्रभाव हर क्षेत्र और दिशा में पड़ रहा है. मुद्राएं, कंपनियां, विचार और लोग--ये सभी पूर्व के किसी भी समय की तुलना में आज कहीं अधिक गतिशील हो गए हैं. बावजूद इसके, एक ओर जहां समाज के भीतर वैश्विक नेटविर्कंग के आर्थिक तथा राजनीतिक परिणाम पर गरमागरम बहसें जारी हैं, हमारा ध्यान इस बात पर बहुत कम ही गया है कि हमारी संस्कृति और रोजमर्रे की दुनिया पर ये परिवर्तन कैसा प्रभाव डाल रहे हैं.

भारत में सर्वाधिक प्रभावशाली एवं दूरगामी जो परिवर्तन घटित हो रहे हैं वे हैं शहरी, अप्रबुद्ध मध्य वर्ग संस्कृति का नये से नये एवं अबतक अनछुए सार्वजनिक इलाकों में विस्तार. उदाहरण के लिए, पिछले पांच दशकों में शहरी भारतवासियों का अनुपात केवल पांच प्रतिशत बढ़ा है, (यह 20 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत हुआ है), लेकिन समग्रता में देखा जाए तो इससे जो आंकड़ा उभर कर सामने आता है वह आश्चर्यजनक है : यह हमें दुनिया के सबसे बड़े मध्य-वर्ग जनसंख्या वाले देशों के बीच लाकर खड़ा कर देता है. सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य पर आज इसका प्रभुत्व जिस पैमाने पर है वह दो दशक पूर्व तक भी कल्पनातीत था. भारत के लंबे इतिहास में, पहली बार हमारे यहां एक ऐसी लोक संस्—ति अस्तित्व में आई है जिसमें लोकप्रिय सिनेमा, क्रिकेट, दूरदर्शन धारावाहिक और पॉप म्यूजिक जैसे नए रूपाकार हमारी पुरानी विधाओं--यथा यात्रा, कथा, रामलीला और कृष्णलीला आदि--में शामिल हुए हैं.

वर्तमान में भारत का यह मध्य वर्ग जहां एक ओर समाज के एवज़ में आधुनिक जीवन-शैली से जुड़ी अनेक प्रकार की असहज आगतों को साधने में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ़ यह समाज के सामूहिक संस्कार, इसके सांस्कृतिक प्रतिमानों को भी अद्यतन कर रहा है. सत्यजित राय, रित्विक घटक या अदूर गोपाल्कृष्णन जैसे महान फिल्म निर्माता, रविन्द्रनाथ टैगोर और अमृता शेरगिल जैसे चाक्षुष कलाकार, शरतचंद चट्टोपाध्याय और प्रेमचंद जैसे लेखक, ये सभी मध्य वर्ग की उपज थे, और यहीं से इन हस्तियों ने बदलाव के लिए काम किया. नई सांस्कृतिक नीति को समकालीन जीवन की ऐसी शख्सीयतों, और उनके माध्यम से पर्यावरण, समाज और समय के प्रति उनकी सजगता और सरोकार पर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा. और जिसका उद्देश्य भारत के लोगों को नई सदी में एक दिशा प्रदान करना होगा.

संस्कृति और व्यक्तित्व को देखने के नए तरीकों का संधान करना होगा क्योकि संस्कृति के बारे में सामान्य समझ है कि यह ऐतिहासिक उद्भव से जुड़ा एक अपेक्षाकृत स्थिर उपोत्पाद है. मानव-वैज्ञानिक उल्फ हैन्नर्ज़ विरोधाभासों एवं अर्थ-प्रणाली की पारगम्य सीमाओं को उचित ठहराने के लिए `क्रियोलाइजेशन´ शब्द का सहारा लेते हैं. भाषिक संदर्भ में यह कैरिबियाइयों की पिडगिन भाषाओं की ओर संकेत करता है जो औपनिवेशिक तथा अफ़्रिकी भाषाओं का मिश्रण थे. सामान्यत: यह शब्द वैसी किसी नई विविधता को दर्शाता है जो स्वायत्तता से कहीं अधिक संबंधों पर आधारित है. यह संस्कृति को एक स्थिर, बंद प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि विविध अर्थों से भरी, बहती एक नदी के रूप में देखता है जो पुराने रिश्तों को निरंतर जज्ब करती और नए संबंधों-संपर्कों को बनाती चलती है. इसे आंकड़ों के आइने में देखें तो जर्मनी जैसा देश हमारे सामने एक उदाहरण है, जहां आज से कुछ वर्ष बाद यहां के प्रमुख शहरों में बच्चों और युवाओं की कुल संख्या का 40 प्रतिशत से 50 प्रतिशत प्रवासी परिवारों की संतान होंगे. एक गतिशील नई सांस्कृतिक नीति को, पूरी दुनिया और अपने देश के संदर्भ में भी, ऐसे ही प्रतिमानों (पाराडाइम) पर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा.

कतिपय सुधारों की तुरंत आवश्यकता है. भारत की राजधानी का वर्तमान परिदृश्य इससे और अधिक त्रासद क्या हो सकता है कि जहां अनगिनत निजी प्रबंधन वाली सरकारी कोष प्राप्त सांस्कृतिक संस्थाएं मौजूद हों, लेकिन जो बिना भारी शुल्क अदा किए युवा कलाकारों या संस्कृतिकर्मियों के लिए उपलब्ध नहीं हों. समय आ चुका है जब सरकार को यह बात समझ लेनी चाहिए कि संस्कृति और नई नीति--जिसमें बुनियादी और कठोर कदम भी उठाने की जरूरत पड़ सकती है--पर यदि समुचित ध्यान नहीं दिया गया तो संभव है कि राष्ट्र निर्माण एवं विकास के लिए आवश्यक हम अपने बेहद मूल्यवान तथा अमूर्त संसाधन खो बैठें.

ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि जो संस्कृति हूणों और मंगोलों, तुर्कों और फारसियों, असीरियाइयों और अरबों, पुर्तगालियों, फ्रांसिसियों, और अंग्रेजों के हाथों भी, बच कर निकल गई, वह भारतीयों के हाथों नहीं बच पाएगी !



अंग्रेज़ी से अनुवाद : योगेन्द्र कृष्णा
साभार : पूर्वग्रह ( अक्तूबर-दिसंबर, २००९ )

 
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