Saturday, 27 June, 2009

आलोक श्रीवास्तव को दुष्यंत कुमार पुरस्कार




मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने इस बार अपना प्रतिष्ठित 'दुष्यंत कुमार पुरस्कार' युवा ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव को देने की घोषणा की है. आलोक को यह पुरस्कार उनके बहुचर्चित ग़ज़ल संग्रह 'आमीन' के लिए दिया जाएगा. साल 2007 में राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित इस संग्रह के लिए आलोक श्रीवास्तव को मिलने वाला यह तीसरा प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार है.इससे पहले उन्हें राजस्थान के 'डॉ भगवतीशरण चतुर्वेदी पुरस्कार' और प्रख्यात आलोचक डॉ.नामवर सिंह के हाथों मुंबई में प्रतिष्ठित 'हेमंत स्मृति कविता सम्मान' से नवाज़ा जा चुका है. हाल ही में ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने अपने नए एलबम 'इंतेहा' में आलोक की ग़ज़ल को अपनी आवाज़ दी है. प्रख्यात शास्त्रीय गायिका शुभा मुदगल भी अपने चर्चित एलबम 'कोशिश' में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्मों के साथ आलोक के गीतों को स्वर दे चुकी हैं. पेशे से टीवी पत्रकार आलोक, मूलत: विदिशा (म.प्र.) के हैं और इन दिनों दिल्ली में न्यूज़ चैनल 'आजतक' से जुड़े हैं.

आलोक को शब्दसृजन की बधाई!


आलोक की कुछ गजलें

एक
चिंतन दर्शन जीवन सर्जन रूह नज़र पर छाई अम्मा,
सारे घर का शोर शराबा, सूनापन तनहाई अम्मा।

सारे रिश्ते- जेठ-दुपहरी, गर्म हवा, आतिश, अंगारे,
झरना, दरिया, झील, समंदर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा।

घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा।

उसने ख़ुदको खो कर मुझमें एक नया आकार लिया है,
धरती, अंबर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मा।

बाबूजी गुज़रे आपस में सब चीज़ें तक़्सीम हुईं, तब-
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा।


दो
घर की बुनियादें, दीवारें, बामो-दर थे बाबूजी,
सबको बांधे रखने वाला, ख़ास हुनर थे बाबूजी।

तीन मुहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था,
अच्छे-ख़ासे, ऊंचे-पूरे, क़द्दावर थे बाबूजी।

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है,
अम्माजी की सारी सजधज, सब ज़ेवर थे बाबूजी।

भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता,
अलग, अनूठा, अनबूझा-सा, इक तेवर थे बाबूजी।

कभी बड़ा-सा हाथ ख़र्च थे, कभी हथेली की सूजन,
मेरे मन का आधा साहस, आधा डर थे बाबूजी।

तीन
वही आंगन, वही खिड़की, वही दर याद आता है,
मैं जब भी तन्हा होता हूं, मुझे दर याद आता है।

मेरे सीने की हिचकी भी, मुझे खुलकर बताती है,
तेरे अपनों को गांव में, तू अक्सर याद आता है।

जो अपने पास हो उसकी कोई क़ीमत नहीं होती,
हमारे भाई को ही लो, बिछड़ कर याद आता है।

सफलता के सफ़र में तो कहां फ़ुर्सत के' कुछ सोचें,
मगर जब चोट लगती है, मुक़द्दर याद आता है।

मई और जून की गर्मी, बदन से जब टपकती है,
नवम्बर याद आता है, दिसम्बर याद आता है।

चार
ये सोचना ग़लत है के' तुम पर नज़र नहीं,
मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर, बेख़बर नहीं।

अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया,
मैं आपका रहूंगा मगर उम्र भर नहीं।

आ ही गए हैं ख़्वाब तो फिर जाएंगे कहां,
आंखों से आगे इनकी कोई रहगुज़र नहीं।

कितना जिएं, कहां से जिएं और किस लिए,
ये इख़्तियार हम पे' है, तक़्दीर पर नहीं।

माज़ी की राख उलटें तो चिंगारिया मिलें,
बेशक किसी को चाहो मगर इस क़दर नहीं।

Wednesday, 27 May, 2009

अपने कार्यालय के कमरे से…



मैं जिस संस्था में काम करता हूं वह बिहार विधानमंडल का उच्च सदन है : बिहार विधान परिषद। और इस संस्था के जिस कमरे में मैं बैठता हूं वह यहां का प्रकाशन विभाग है जहां से यहां के हिंदी प्रकाशनों से जुड़ी तकरीबन तमाम प्रक्रियाओं का निष्पादन होता है। यहां के प्रकाशनों में सदन की कार्यवाहियों, समितियों के प्रतिवेदनों के अतिरिक्त यहां से निकलने वाली पत्रिकाएं--संवाद तथा साक्ष्य शामिल हैं। संवाद यहां की इन-हाउस जर्नल है, जबकि साक्ष्य के अंक साहित्यिक, सामाजिक एवं संसदीय विषयों पर आयोजित होते हैं, और जिससे आपमें से कई लोग परिचित भी हैं। साक्ष्य की स्तरीयता तथा विभिन्न विषयों पर केंद्रित इसके विशेषांकों ने देश भर के साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों तथा पाठकों के बीच अपनी ठोस उपस्थिति दर्ज़ की है।

यह एक सुखद और विरल संयोग-सा प्रतीत हो सकता है कि यहां जिस कमरे में मैं बैठता हूं, वहां, इसी कमरे में, और भी कई चर्चित-अल्पचर्चित युवा रचनाकार, कवि, कथाकार हमारे सहकर्मी के रूप में कार्यरत हैं। इनमें से तीन कवियों की कविता-पुस्तक अभी-अभी एक साथ प्रकाशित हुई है।

  • अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस / शहंशाह आलम

  • बुतों के शहर में / एम के मधु

  • इच्छाओं की पृथ्वी के रंग / राकेश प्रियदर्शी
ये तीनों कविता-पुस्तकें अपनी अंतर्वस्तु, शिल्प, संवेदना एवं दृष्टि में एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी अपनी सहकालीन उपस्थिति के कारण एक दूसरे से जुड़ती हैं। इनमें जो एक महत्वपूर्ण साम्य है वह यह कि बिहार के राजभाषा विभाग ने पांडुलिपि प्रकाशन के लिए इस वर्ष अनुदान हेतु जिन पांडुलिपियों का चयन किया उनमें ये तीनों पुस्तकें शामिल हैं।

ये तो रही उन कवियों के बारे में जिनकी कविता पुस्तक अभी-अभी आई है। लेकिन इन तीन कवियों के अतिरिक्त भी कई रचनाकर्मी परिषद के इस साहित्य-प्रकोष्ठ में साथ-साथ बैठते हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में लगातार सृजनरत हैं, जैसे--मुसाफिर बैठा (कवि), अरुण नारायण (समीक्षक), अजय कुमार मिश्र (कवि-कथाकार), चंद्रमोहन मिश्र (लेखक-टिप्पणीकार)।

किसी सरकारी संस्था के एक प्रकोष्ठ में एक साथ इतनी-इतनी सृजनात्मक प्रतिभाओं की उपस्थिति क्या एक महज संयोग की बात हो सकती है? शायद नहीं। याद कीजिए, एक समय जिस तरह भोपाल में किसी शख्स ने भारत भवन की संकल्पना को साकार करने का संघर्ष किया था, उसी तरह बिहार में भी एक शख्स हिंदी भवन को आकार देने की कोशिश में लहूलुहान हुआ… लहूलुहान इसलिए कि बिहार की राजनीतिक परिस्थितियां साहित्य-संस्कृति के लिए भोपाल जैसी अनुकूल नहीं, बल्कि बुरी तरह प्रतिकूल थीं। फिर भी, उस प्रयास के अवशेष के रूप में जो कुछ अच्छी चीजें बची रह गईं, उन्हीं में ये प्रतिभाएं भी शामिल हैं।

जानकार लोग जानते हैं कि परिषद कार्यालय के इस कमरे की खिड़कियों-दरवाजों से बाहर झांकती… दूर-दूर तक रचनात्मक हस्तक्षेप करती इन प्रतिभाओं की उपस्थिति एक सुनियोजित दृष्टि का प्रतिफलन रही है। विधानमंडल के इस उच्च सदन को इसके नाम और गरिमा के अनुरूप अपनी सृजनात्मक कल्पना-दृष्टि से संचालित करने के लिए प्रो जाबिर हुसेन ने अपने सभापतित्व-काल में (वे 1995 से 2006 तक बिहार विधान परिषद के सभापति रहे, और संप्रति सांसद हैं) रूढ़ परंपराओं से मुठभेड़ करते हुए इन प्रतिभाओं का चयन किया था… इसलिए ये प्रतिभाएं अगर हमें आश्चर्य में डालती हैं तो केवल इसलिए कि यहां के पूरे सचिवालयीय बाबूमय पर्यावरण में, जहां राजनीतिक दांव-पेंच, कर्मियों के बीच अपने दायित्वों के प्रति गहरी उदासीनता और बेफिक्री तथा विद्वता और प्रतिभा के प्रति अनादर और विद्रोह-भाव तक का वर्चस्व हो, ये अपने दायित्वों के प्रति निष्ठा, समर्पण और रचनात्मकता से अपनी अलग पहचान बनाए रख सके हैं।

इनकी रचनात्मकता पर आप स्वयं गौर करें। हाल में आई इनकी पुस्तकों से यहां प्रस्तुत हैं इनकी कुछ कविताएं :




मकालीन हिंदी कविता में शहंशाह आलम एक जाना-माना नाम है। अपने पहले संग्रह गर दादी की कोई खबर आए (1993) के साथ शहंशाह ने समकालीन हिंदी कविता के उर्वर प्रदेश में दस्तक दी थी। फिर दो साल बाद अभी शेष है पृथ्वी-राग (1995) के साथ वे उपस्थित हुए। इसके बाद एक लंबे अंतराल के बाद उनका यह नया संग्रह अच्छे दिनों में ऊंटनियों का कोरस (2009) अभी हाल में प्रकाशित हुआ है। कविता के अतिरिक्त कला एवं रेखांकन में भी इनकी गहरी रुचि है, तथा इनके रेखांकन देश की लगभग सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।




शहंशाह आलम

अभी-अभी


अभी-अभी
एक शब्द जनमा
उस बच्चे के मुंह से
मां से जनमी
एक पूरी भाषा समृद्ध

अभी-अभी
यह समय था तुम्हारा
अब हुआ किसी अन्य का

अभी-अभी
वह दरख़्त हुआ
उस चिड़िया का
एकदम अपना

अभी-अभी
एक पूरा युद्ध लड़ा गया
खुरपी से
हंसिया से
कुदाल से
लाठी से

अभी-अभी
खुली एक ट्रेन
कि दूसरी आ लगी झट से

अभी-अभी
रसोईघर से निकल
फैली इस पृथ्वी पर
लहसुन की गंध अनोखी

अभी-अभी
यह देह हुई उसकी
यह बीज
यह कामना
यह शोर
यह एकांत हुआ उसी का

अभी-अभी
आग हुई मेरी
फाग हुआ मेरा
राग हुआ मेरा

अभी-अभी
वहां था सूर्यास्त
अब दिखता था
सूर्योदय वहीं पर

अभी-अभी
जो भूल गया था
रास्ता अपने घर का
बता रहा था
किसी अन्य को
उसके घर का रास्ता

अभी-अभी
वह मटका था खाली
अब भरा था
मीठे जल से

अभी-अभी
एक लड़का कूदा पानी में
बहा धार में
एक दूसरे लड़के ने लांघा
अपने ही अंदर के पुरुष को

अभी-अभी
जलतरंग बजाया उसने अद्भुत
ओझल को प्रकट किया उसी ने

अभी-अभी
मैं धंसा तुम्हारी ही धमक में
तुम धंसी मुझ में
सन्नाटे को चीर





म के मधु की कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं--कथादेश, उद्भावना, वनिता, सरिता, हिंदुस्तान, प्रभात खबर आदि--में प्रकाशित तथा दूरदर्शन से समय-समय पर प्रसारित होती रही हैं। समय के शिलालेख संग्रह के बाद बुतों के शहर में, जो अभी-अभी प्रकाशित हुआ है, इनका दूसरा कविता संग्रह है। अन्य विधाओं में पत्रकारिता, रंगमंच तथा सिनेमा से गहरा जुड़ाव है। राष्ट्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य भी रहे।



एम के मधु

इन दिनों


इन दिनों
मेरी परछाइयां हिल रही हैं
इन दिनों
शब्द मेरे गडमड हो रहे हैं

इन दिनों
हर आहट पर
मेरी आंखें
खिड़की से फिसलकर
दरवाजे तक चली जाती हैं

इन दिनों
सड़क का शोर
अनसुना लगता है

इन दिनों
आकाश में उड़ती पतंगें
लगता है मेरे लिए उड़ी है…
कट कर गिरती हैं
तो लगता है
मेरे लिए गिरी हैं

इन दिनों
बहुत अच्छा लगता है
घुटर-घूं, घुटर-घूं करता
पड़ोसी की दीवार पर
कबूतर का जोड़ा

आधा रास्ता चल लेने पर भी
मन बार-बार
लौट जाने को करता है
इन दिनों…




युवा कवि राकेश प्रियदर्शी लंबे समय से रचना-कर्म में सक्रिय हैं। इनकी कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा आकाशवाणी पटना तथा दूरदर्शन से प्रसारित होती रही हैं। कविता के अलावा रेखांकन में भी इनकी गहरी रुचि है तथा इनके रेखांकन हंस समेत देश की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। हिंदी के अलावा मगही में भी कविताएं लिखते हैं, तथा स्कूल पाठ्यक्रम में भी इनकी मगही कविता शामिल है।



राकेश प्रियदर्शी

कागज बीनता बच्चा


कूड़े के ढेर से कगज बीनता बच्चा
पूरा का पूरा हिंदुस्तान की जीती-जागती तस्वीर है
कागज बीनता बच्चा हमारी वर्तमान व्यवस्था
की पोल खोल रहा है

उसके फटे-चीटे कपड़े देख कर भी हम
स्वच्छ और विकसित होने की कर रहे हैं
घोषनाएं अगले दशक के अंत तक

उसकी भूख से सटी हुई आंतों और गालों पर
सूखे हुए आंसुओं के निशान से
हम लिख रहे हैं भारत का इतिहास

कूड़े के ढेर से कागज बीनता बच्चा
बाजार के विरुद्ध एक चीख है

हम कर रहे हैं जिस कूड़े के ढेर से घृणा
वही उसका सपना है
भारत का सपना
भारत का भविष्य और कूड़े का ढेर!

कुड़े के ढेर से कागज बीनता बच्चा
कूड़े के ढेर पर सफ़ेदी की ऊंचाई नाप रहा है अपनी आंखों से
कूड़े के ढेर की खोज में भटकता बच्चा
कोसों नंगे पांव चलता है पीठ से बोरा लटकाए
बोरे के वजन में उसके पूरे परिवार की
रोटी की संख्या छिपी है
कहां-कहां नहीं कूड़े के ढेर से मिलती है
उसे रोटी की गंध!

कूड़े के ढेर से कागज बीनते बच्चे के बारे में सोचता हूं
यह हम सब पर निर्भर करता है कि वह
भविष्य का निर्माता बनेगा या विध्वंसकारक

 
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